सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमृतसंहिता
[ अ० १७ ]
आमशोथ के छेदन करने पर—मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि, स्निग्ध की विकृति बहुत अधिक मात्रा में रक्त का खाव, वेदना का होना, फटना, अनेक प्रकार के उपद्रवों का होना, अथवा क्षतजन्य विद्रवि उत्पन्न हो जाती है। और जब कभी वैद्य मय या मोह के कारण पक्व शोथ को भी अपक्व समझकर देर तक उपेक्षा करता रहता है तब दूर तक घुसी पूय द्वार के न मिलने से अपने आश्रय को फाड़कर उत्सन्न (क्रोड़) या बड़े भारी अवकाश को उत्पन्न करके नाड़ीव्रण बना देती है। इस तरह कष्टसाध्य या असाध्य हो जाती है।
वि० मन्तव्य—यह चेतावनी उस व्रण के लिये है जिसमें आमता या पक्वता में सन्देह होता है, वस्तुतः पका होता है और गम्भीर होने से स्वतः नहीं फूटता तथा चौरा लगाना आवश्यक होता है ॥ ६ ॥
भवति चात्र—
यश्चित्तन्याममज्ज्ञानावश्व पक्वमुपेक्षते।
श्वपचाविष मन्तव्यौ तानन्निश्चितकारिणौ ॥ १० ॥
कहा भी है—
जो वैद्य अज्ञानवश आम शोथ का छेदन करता है, और जो पक्व शोथ की उपेक्षा करता है, इन दोनों असमीक्षकारी वैद्यों को चाण्डाल के समान समझना चाहिये, (क्योंकि समझकर ये काम नहीं करते)।
वि० मन्तव्य—आम को चौरना और पक्व (फोड़ा) को न चौरना बुरा है ॥ १० ॥
प्राक् शस्त्रकर्मणश्चोष्टं भोजयेदातुरं भिषक्।
मद्यपं पाययेन्मद्यं तीक्ष्णं यो वेदनाऽसहः ॥ ११ ॥
न मूर्च्छत्यन्नसंयोगान्मत्तः शस्त्रं न बुभ्यते।
तस्मादवर्यं भोक्तव्यं रोगेषूक्तेषु कर्मणि ॥ १२ ॥
प्राणो ह्याभ्यन्तरो नृणां बाह्यप्राणगुणान्वितः।
धारयत्यविरोधेन शरीरं पाञ्चभौतिकम् ॥ १३ ॥
शस्त्रकर्म से पूर्व रोगी को भोजन करा देना चाहिये, और जो पुरुष मद्य पीता हो वेदना को न सहनेवाला हो उसको तीक्ष्ण मद्य पिला देना चाहिये। इसका लाभ-अन्न के कारण रोगी मूर्च्छित नहीं होता, और मस्त होने से शस्त्र-पीड़ा का अनुभव नहीं करता। इसलिये कहे हुए रोगों में (मूढ़गर्भोदरा शौरमरी आदि को छोड़कर) अवश्य भोजन कराना चाहिये। मनुष्यों का आभ्यन्तर प्राण (बल-शक्ति)—बाह्य प्राण (अन्न) के गुणों के समान गुणवाला है। इसलिये बिना विरोध के इस पांचभौतिक शरीर को धारण करता है ॥ ११-१३ ॥
१ 'योऽवेदनासहः' इस पाठ में—'जो मनुष्य वेदना का सहन कर सके उसको मद्य पिलाये' यह अर्थ है।
अल्पो महान् वा क्रियया विना यः
समुच्छिन्नतः पाकमुपैति शोफः।
विशालमूलो विषमं विदग्धः
स कृच्छ्रतां यात्यवगाढदोषः ॥ १४ ॥
उत्पन्न हुआ अल्प या महान् जो शोथ बिना आलेष आदि क्रिया के पकता है, वह शोथ विशालमूलवाला, विषमपाकी, तथा आभ्यन्तर पूयवाला होता है, इसलिये कष्टसाध्य है। विषमपाकी सब अङ्गों में ठीक प्रकार से नहीं पकता।
वि० मन्तव्य—तात्पर्य यह कि विस्लापन आदि से व्रण शोथ नहीं शान्त होता और पाकामिमुख हो जाता है तब पांचन लेप आदि की व्यवस्था अवश्य करनी चाहिये। अन्यथा स्वतः पकने ने लिये छोड़ रखने से यदि पकता है तो कष्टसाध्य होता है। यही सू० १५ में स्पष्ट किया गया है ॥ १४ ॥
आलेषविज्ञावणगोधनैस्तु
सम्यक्प्रयुक्तैर्यदि नोपशम्येत।
पच्येत शीघ्रं सममल्पमूलः
स पिण्डितश्चोपरि चोन्नतः स्यात् ॥ १५ ॥
समान-अल्पमूलवाला शोथ आलेषन, रक्त मोक्षण, संशोधन आदि उपचारों के मली प्रकार से प्रयुक्त करने पर भी यदि शान्त नहीं होता अपितु पकता ही है, तब यह शोथ गोलकार होकर ऊपर को उठ आता है ॥ १५ ॥
कक्षं समासाद्य यथैव बहि-
वाग्भैरितः संदहति प्रसह्य।
तथैव पूयोऽप्यविनिःस्तुतो हि
मांसं सिराः स्नायु च खादतीह ॥ १६ ॥
जिस प्रकार कि व्रण-बहुल (घास के ढेरवाले) प्रदेश में लगी आग वायु के कारण प्रबल होकर—बलपूर्वक सम्पूर्ण ढेर को जला देती है। उसी प्रकार बाहर न निकली हुई पूय मांस, शिरा, स्नायुओं का भक्षण करती है।
वि० मन्तव्य—अतः पूय को निकालने का प्रयत्न करना चाहिये ॥ १६ ॥
आदौ विस्लापनं कुर्याद् द्वितीयमवसेचनम्।
तृतीयमुपनाहं तु चतुर्थं पाटनक्रियाम् ॥ १७ ॥
आभ्यन्तर प्राण—अन्नपानरस, बाह्यप्राण अन्न यह भी अर्थ है। "प्राणो वा अन्नम्" "शरीरमन्नादम्"। प्राणः शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः ॥ तैत्तिरीयोपनिषत्।
डल्हन ने आभ्यन्तर प्राण का अर्थ—अग्नि, सोम, वायु, सत्य राज तम, पंचैन्द्रिय और भूतारम्भा किया है। और बाह्यप्राण—आगनेय, सौम्य, वायव्य, पदार्थ, दिन, वायु, रात, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध किया है। इनमें बाह्यप्राण के अति गुणों से—कष्ट, अम्ल-लक्षण आदि से—अन्तरंग शरीर को धारण करती है।