सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १८]
सूत्रस्थानम्
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पञ्चमं शोधनं कुर्यात् पञ्चं रोपणमिष्यते ।
एते क्रमाः त्रणशयोक्ताः सप्तमं वैकृतापहम् ॥१८॥
त्रणशोक की चिकित्सा इस सूत्रस्थान में कहते हैं :—
सब से प्रथम विम्लापन (अङ्गुली आदि से मर्दन) करना चाहिये दूसरा—जलोका आदि से अवसेचन (रक्तमोक्षण), तीसरा—उपनाह (पकाने के लिये बन्धन-पुलटिस आदि), चतुर्थ—पाटनक्रिया (शस्त्र से); पाँचवाँ—शोधन (पञ्चवल्क-लक्षाय से), छठा—रोपण (प्रलेप आदि) कार्य और सातवाँ कार्य—वैकृतापह (सवर्णकरना, रोमसंजनन आदि कार्य) करना—ये वरण के सात कार्य हैं। वैकृतापहम्—विकृति को दूर करना।
वि० मन्तव्य—पाटन दो प्रकार से किया जाता है—
१—शस्त्र से चीरना फाड़ना और २—दारुण लेप से दारुण करना-फोड़ना। विम्लापन से बैठ जाता है, यदि न बैठे तो अवसेचन से दब जाता है यदि न दबे तो उपनाह से पकाना चाहिये और पकने पर पाटन अथवा दारुण करे। तदनन्तर शोधन—त्रणशोधन करे—पूय निकलता रहे, फिर शोधन के साथ रोपण करे, समतल होने पर केवल रोपण करे। यदि त्रण-भूमि पर काला या श्वेत दाग पड़ जाय तो उसके नाश का उपाय करे। विशेष देखिये—चि० स्था० अ० १ ॥१७,१८॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने आमपकैषणीयो
नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥१७॥
अष्टादशोऽध्यायः
अथातो त्रणालेपनबन्धविधिमध्येयं व्याख्यास्यामः ॥११॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥११॥
इसके आगे त्रण के लिये आलेपन, त्रण के बाँधने की विधि को बताने के लिये 'त्रणालेपनबन्धविधि' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥११,२॥
आलेप आद्य उपक्रमः, एष सर्वशोकानां सामान्यः प्रधानतमश्च, तं च प्रतिरोगं वद्यामः, ततो बन्धः प्रधानं, तेन शुद्धिर्व्रणरोपणमस्थिसन्धिस्थैर्यं च ॥११॥
आलेप ही सबसे (बहिःपरिमार्जन या अन्तःपरिमार्जन) औषध द्रव्यों से श्रेष्ठ एवं समीपस्थ उपाय है। यही सब प्रकार के शोथों में सामान्य (तुल्य है) और सब उपायों में शीघ्र पीड़ा हर लेने से यही प्रधानतम है। इस आलेप की प्रत्येक
१ आगे त्रणशोक के उपक्रम साठ बताये हैं। इन साठों में ये सात मुख्य हैं और सदा कार्य में आते हैं—इसलिये इनको कहते हैं।
रोग के लिये सूत्रस्थान और चिकित्सास्थान में कहेंगे। आलेप के बाद बन्ध प्रधान है। इस बन्ध के द्वारा त्रण का शोधन, त्रण का रोपण, अस्थि की स्थिरता एवं सन्धि की दृढ़ता होती है ॥१३॥
तत्र प्रतिलोममालिम्पेतु। प्रतिलोमे हि सन्मगोषध-सवतिष्ठतेऽनुप्रविशति च रोमकूपान् स्वेदवाहिभिश्च सिरामुखैर्वीर्यं प्राप्नोति ॥१४॥
आलेप को लोमों के अभिमुख (प्रतिलोम) लगाना चाहिये, अनुलोम (लोमों के अनुकूल) नहीं करना चाहिये। क्योंकि—प्रतिलोम लगाने पर औषध भली प्रकार से स्थिति करती है और अन्दर प्रविष्ट होती है। रोमकूपों द्वारा, स्वेदवाहिनियों से तथा सिरामुखों द्वारा जाकर वीर्यवान् होती है ॥१४॥
त च शुभ्यमाणमुपेक्षेत, अन्यत्र पीडयितव्यात्, शुष्को ह्यार्थकौ रूकरश्च ॥१५॥
पीड़न द्रव्यों से जिस त्रण का पीड़न करना अभीष्ट हो, उसको छोड़कर अन्य सूखे हुए आलेप की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। क्योंकि—सूखा हुआ आलेप निरर्थक और दर्द करने वाला होता है ॥१५॥
स त्रिविधः—प्रलेपः, प्रदेहः आलेपश्च। प्रलेपप्रदेह-योरन्तरं—तत्र प्रलेपः शीतस्तनुरविशोषी विशोषी वा, प्रदेहस्तूष्णः शीतो वा बहलोऽबहुरविशोषी च, मध्यमोऽत्रालेपः। तत्र, रक्तपित्तप्रसादकदालेपः, प्रदेहो वातश्लेष्मप्रशमनः शोधनो रोपणः शोफवेदनापहश्च, तस्योपयोगः क्षताक्षतेषु, यस्तु क्षतेषूपयुज्यते स भूयः 'कल्क' इति संज्ञां लभते निरुद्गालेपनसंज्ञः, तेनात्रावसन्निरोधो मृदुतापूतिमांसापकर्षणमनन्तदोषता त्रणशुद्धिश्च भवति ॥
यह आलेप तीन प्रकार का होता है। यथा—प्रलेप, प्रदेह और आलेप। प्रलेप और प्रदेह में अन्तर (भेद)—प्रलेप—शीतल, पतला, अपीडितव्य त्रण में अविशोषि, पीडितव्य त्रण में विशोषि (सूखनेवाला), (चन्दन के समान जो लेप है, वह प्रलेप है)। प्रदेह—विषय की अपेक्षा से उष्ण (वात-कफ-बहुल त्रण में); शीत (पित्त-रक्त-प्रधान त्रण में), बहल (स्थूल); बहुत न सूखने वाला, (कल्क को पिण्डाकार करके त्रण के ऊपर लगाना—प्रदेह—प्रदेह है। आलेप—मध्यम (प्रलेप एवं प्रदेह के मिश्रित) लक्षणवाला है।
इनमें आलेप—रक्त-पित्त शोथ को शान्त करता है, प्रदेह—वात-कफ को शान्त करता है; जोड़नेवाला, शोषक, रोपक (भरनेवाला), शोफ एवं वेदना को मिटाता है। इस आलेप का उपयोग क्षत अक्षत शोथ में होता है। जो आलेप क्षतजन्य त्रणों में बरता जाता है, उसकी कल्क संज्ञा है। इसी को 'निरुद्गालेपन' कहते हैं। क्योंकि इस आलेप से क्षय का निरोध