भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३२ ]

(रुकावट) होता है- कोमलता आती है, सड़ा मांस [दूर होता है (खींचता है), पूर्य बाहर आती है और व्रण का संशोधन होता है ॥६॥

अविदग्धेषु शोफेषु हितमालेपनं भवेत् ।

यथासर्वं दोषग्रसनं दाहकण्डूरुजापहम् ॥७॥

त्वक्प्रसादनमेवाग्र्यं मांसरक्तप्रसादनम् ।

दाहप्रग्रसनं श्रेष्ठं रुजाकण्डूविनाशनम् ॥८॥

समदेशेषु ये रोगा गुह्येष्वपि तथा नृणाम् ।

संशोधनाय तेषां हि कुर्यादालेपनं भिषक् ॥९॥

(षड्भागं पैत्तिके स्नेहं चतुर्भागं तु वातिके ।

अष्टभागं तु कफजे स्नेहमात्रां प्रदापयेत् ॥१०॥)

अविदग्ध शोथों में आलेप ही हितकारी है, (विदग्ध शोथों

में प्रदेह उपनाह उत्तम है)। इससे दाह (पित्त की), कण्डू (कफ की) रुजा-पीड़ा (वायु की) अपने अपने दोषों का शमन होता है। त्वचा का प्रसादन करने से सब से श्रेष्ठ (प्रधान) है, मांस-रक्त का प्रसादन करता है, दाह की शान्ति करने से श्रेष्ठ है, तोदकण्डू को नष्ट करता है—ये आलेप के कार्य हैं। पुरुषों के मर्मस्थानों में तथा गुह्य भागों में जो रोग (भगन्दर-अर्श आदि) हों—उनके संशोधन के लिये आलेप ही वैद्य को करना चाहिये। आलेप के अन्दर स्नेह की मात्रा—पैत्तिक आलेप में छठा भाग, वातिक में चौथा भाग, कफजन्य में आठवाँ भाग होती चाहिये।

वि० मन्तव्य—आलेपनों (मलहमों) में—राल आदि द्रव्यों का छठा, चौथा अथवा आठवाँ भाग स्नेह (घृत, तैल अथवा बसा) मिलाया जाता है। विधि भेद से आलेपन ४ प्रकार का होता है। १—स्नेह में अष्टमांश मोम डालकर अग्नि पर उष्ण किया जाता है, मोम पिघलने पर उतार लिया जाता है, शीतल होने पर जम जाता है। इस में छ गुने चौगुने अथवा आठगुने द्रव्यों का कण्डूछान चूर्ण मिला दिया जाता है। २—द्रव्यों के कण्डूछान चूर्ण को स्नेह में मिला, योड़ा २ जल डालकर घोटा, पीसा, फेंटा जाता है, माखन सा होने पर रख लिया जाता है। ३—कण्डूछान द्रव्यों को अथवा कूटे तिल अतसी आदि को स्नेह में डाल हलुवा बना लिया जाता है। अथम २ का नाम “मलहम” है और तीसरे का नाम “पुलटिस” और चौथा—द्रव्यों को पीसकर-कलक बनाकर लेप करना चाहिये ॥७-१०॥

तस्य प्रमाणं भविष्यार्द्धचर्मोत्सेधमुपदिशन्ति ॥११॥

इस आलेप का प्रमाण—भैंस का गीला चमड़ा जितना मोटा होता है, उतना ही आलेप करना चाहिये। चरक में—“त्रिभगमाङ्गुष्ठमात्रः स्यात् प्रलेपः कलकपेक्षितः” ॥११॥

च आलेपं रात्रौ म्रयुञ्जीत, सा भूच्छैत्यविहोतृष्णस्तदन्निर्गमाद्विकारप्रवृत्तिरिति ॥१२॥

आलेप को रात्रि में नहीं लगाना चाहिये। क्योंकि—शोफ में आलेप की शीतलता से ऊष्मा के अन्दर रुक जाने से—बाहर न आने के कारण किसी अन्य विकार की उत्पत्ति न हो जाये—इसलिये रात्रि में आलेप नहीं करना चाहिये। एक दूसरा कारण—“तमसा पिहितोद्गुष्मा रोमकूपैरनावृतः। लेपाद् विनैव निर्याति रात्रौ नालेपयेदतः” ॥१२॥

प्रदेहसाध्ये व्याधौ तु हितमालेपनं दिवा । पित्तरक्तभिघातोत्थे सविषे च विशेषतः ॥१३॥ न च पर्युषितं लेपं कदाचिद्वचारयेत् । उपर्युपरि लेपं च न कदाचित् प्रदापयेत् ॥१४॥ ऊष्माणं वेदनां दाहं घनत्वाज्जनयेत् स हि । न च तेनैव लेपेन प्रदेहं दापयेत् पुनः ।

शुष्कभावात्स निर्वीर्यो युक्तोऽपि स्यादपार्थकः ॥१५॥ प्रदेहसाध्ये व्याधि में दिन में आलेप करना उत्तम है। पित्तजन्य, रक्तजन्य, अभिघातजन्य, एवं विषजन्य शोथ में भी खासकर दिन में ही आलेप करना चाहिये, पर्युषित (बासे-एक दिन पुराने) आलेप को व्रण में नहीं लगाना चाहिये। एक किये आलेप के ऊपर दूसरा आलेप भी कभी नहीं करना चाहिये। क्योंकि इस प्रकार करने से—अधिक उष्णमा वेदना, दाह, उत्पन्न होता है। ऊपर ऊपर लेप करने से लेप मोटा-घन हो जाता है—इससे ये उपद्रव होते हैं। और एक बार लगाये आलेप को पुनः नहीं लगाना चाहिये। क्योंकि शुष्क होने से वह निर्वीर्य होता है और ठीक होने पर भी यह निरर्थक है ॥१३-१५॥

१ प्रदेहाः सर्व एवैते कर्तव्याः संप्रसादनाः । क्षणे क्षणे प्रयोक्तव्याः पूर्वमुद्भूय लेपनम् ॥ अधावनोद्भूते पूर्व प्रदेहा बहुशोऽधनाः । देयाः प्रदेहाः कफजे पर्याधानोद्भूते घनाः ॥ त्रिभगमाङ्गुष्ठमात्रः स्यात् प्रलेपः कलकपेक्षितः । नातिस्निग्धेन रुक्षश्च न पिण्डो न द्रवः समः ॥ न च पर्युषितं लेपं कदाचिद्वचारयेत् । न च तेनैव लेपेन पुनर्जातु प्रलेपयेत् ॥ क्लैदवीसर्पशूलानि सीणभावात् प्रवर्तयेत् । लेपो ह्युपरि पटुस्य कृतः स्वेदयति व्रणम् ॥ स्वेदजाः पिंडकास्तस्य कण्डूस्वेदोपजायते । उपर्युपरि लेपस्य लेपो यद्यवचार्यते ॥ तानेव दोषाज्जनयेत् पटुस्योपरि यान् कृतः । अतिस्निग्धोऽतिद्रवश्च लेपो यद्यवचार्यते ॥ त्वच्च न विलम्बते सम्यङ् न दोषं समयत्यपि । तन्वालिप्तं न कुर्वीत संशुष्को ह्यापुटायते ॥