भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० १८ ] १०

सूत्रस्थानम्

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अत ऊर्ध्वं व्रणबन्धनद्रव्याण्युपदेद्यामः, तद्यथा— क्षौमकार्पासाविकदुकुलकौशेयपत्रोर्णचौनपट्टचमोन्तर्वलक- लालावृशकललताविदलरञ्जुतुलफलसन्तानिकाळीहानीति; तेषां व्याधिं कालं चावेद्योपयोगः, प्रकरणतश्चेषामादेशः ॥

इसके आगे व्रणबन्धन द्रव्यों की व्याख्या कहते हैं। यथा- क्षौम ( सन से बनाया ), कार्पास ( रूई ), आविक ( मेढे के बालों से बुना ), दुकुल ( पट्ट बन्ध ), कौशेय ( कौशेय-कोशा- कार क्रम से बना-रेशम ), चौन पट्ट ( चौन देश में बना बन्ध ), चर्म ( हरिण आदि का ), अन्तर्वलकल ( भूजपत्र-गूल्सर आदि की छाल ), अलावृशकल—( तुम्भीफल का टुकड़ा ), लता, विदल ( बांस की खरपट आदि ), रञ्जु, तुलफल ( सिम्रल का फल आदि ), सन्तानिका, लौह ( स्वर्ण-सीसा आदि ) व्रण को बाँधने के द्रव्य हैं।

इन व्रणबन्धन द्रव्यों का उपयोग व्याधि और काल के अनुसार करना चाहिये, यथा—वात-कफ रोगों में घने व्रण- बन्धन द्रव्यों का, उष्णकाल में पतले व्रण द्रव्यों का उपयोग करना चाहिये। इसी प्रकार प्रकरणानुसार इनका आदेश करना चाहिये। यथा—सर्पदण्ड में अग्निबन्ध, रक्तस्त्राव में क्षीरसन्ता- निका का, भग्नसन्धि के लिये विदल लता आदि का, शिर के ब्रणों के लिये अलावृशकलों का उपयोग करना चाहिए। सन्ता- निका का अर्थ घाणेकर जी ने—दो तह या चार तह किया बन्ध—किया है। डल्हन ने 'क्षीरसंतानिका' भी अर्थ दिया है।

तत्र कोगदामस्वस्तिकानुवेलितमु(प)तोलीमण्डलस्थ- गिकायमकखट्वाचीनविवन्धवितानगोफणाः पञ्चचाङ्गी वेति चतुर्दशा बन्धविशेषाः। तेषां नामभिरैवाकृतयः प्रायेण व्याख्याताः ॥ १७ ॥

पट्टियाँ —चौदह प्रकार की पट्टियाँ ( बाँधने के प्रकार ) हैं। यथा—कोश, दाम, स्वस्तिक, अनुवेलित, उत्तौली, मण्डल, स्थगिका, यमक, खट्वा, चीनविवन्ध, वितान, गोफण और पञ्चाङ्गी—ये चौदह प्रकार की पट्टियाँ हैं। प्रायः इनकी आकृ- तियाँ इसके नामों से ही स्पष्ट हैं ॥ १७ ॥

न चौषधिरसो व्याधिं प्राप्नोत्यपि च शुष्यति।

तन्वा लिप्येत ये दोषाः तानेव जनयेद् भूशम् ॥

संशुष्कः पीडयेद् व्याधिं निःस्तेहो ह्यवचारितः।

चरक वि अ० २१ ॥ १८ ॥

१ लक्षण—

पुरयित्त्वौषधैर्बन्धः क्रियते कोशकाकृतिः।

कोशकाख्यः स विज्ञेयो वैद्यैर्बन्धेन वजिताम् ॥

दामाकृतिं चतुष्पादां दामाख्यं स्वस्तिकं पुनः।

स्वस्तिकाकृतिमासीव्य पश्चादावैष्ट्यं बध्यते ॥

तत्र कोशमङ्कुष्ठागुलिपर्वसु विद्ध्यात्, दाम सबाधेऽङ्के, सन्धिकूर्चकभूस्तनान्तरतलकर्णेषु स्वस्तिकम्, अनुवेलितं शाखासु, ग्रीवामेढयोः मु ( प्र ) तोली, वृत्तेऽङ्के मण्डलम्, अङ्गुष्ठाङ्गुलिमेढाभ्येषु स्थगिकां, यमलव्रणयोर्मकं, हनुगङ्ग- गण्डेषु खट्वाम्, अपाङ्गयोश्चीनं, पृष्ठेद्विरोः सु विवन्धं, मूर्धनि वितानं, चितुकनासोष्ठासवस्तिषु गोफणां, जत्रुण ऊर्ध्वं पञ्चचाङ्गीमिति, यो वा यस्मिन् शरीरप्रदेशे सुनि- विष्टो भवति तं तस्मिन् विद्ध्यात् ॥ १८ ॥

इनमें कोष वन्ध—अङ्गुष्ठ एवं अंगुलियों के पर्वों में बाँधना चाहिये। दाम—अङ्ग के समीपवाले प्रदेश में—जहाँ दूसरा बन्धन वन्ध न आ सके-अक्षकास्थि आदि में। स्वस्तिक बन्धन- सन्धि कूर्चक ( क्षिप्र सर्प के ऊपर दोनों ओर ), भू, स्तनों के बीच से हाथ-पाव के तलुवों में। अनुवेलित—टांगों बाँहों में ( शाखाओं में )। उत्तौली ग्रीवा एवं शिरन में। मण्डल—गोल अङ्गों में ( बाहु, पाश्वं, उदर, ऊढ आदि में )। स्थगिका- अंगुष्ठ-अंगुलि एवं शिरन के अग्रभाग में। यमक—संयुक्त ब्रणों में। खट्वा—हनु, शंख प्रदेश और गण्डस्थल में। चीन— नेत्रप्रान्तों में। गोफण—चितुक, नासिका, ओष्ठ, अंस और वक्षप्रदेश की संधि ( जत्रु ) के ऊपर बाँधनी चाहिए। अथवा जो बन्धन शरीर के जिस प्रदेश में ठीक बैठे वह बन्धन उस प्रदेश में बाँधना चाहिए ॥ १८ ॥

अनुवेलितं तु तद् विद्यात् मुत्तोलोलक्षणं श्रुणु।

बह्विघ्निमुट्टिकाकारो जालवद् बहुरन्ध्रकः ॥

मुत्तोलोबन्ध एष स्यात् संज्ञान्तरमतः श्रुणु।

गोतुण्डिकां चालनीं च तानेवाहुभिषवराः ॥

मण्डलं वैष्टनाकारं विद्ध्यात् मण्डलाख्यके।

भेषजादिभिरापूर्यं स्थगिका पट्टकेन च ॥

बध्यते मण्डलाकारो यमलव्रणयोस्तु सः।

खट्वा तु बहुभिर्वृत्ता—

चीनबन्धं विजानीयाच्चौराभिर्वहुभिर्वृत्तम्।

विवन्धो विवधो बन्धः स च पञ्चप्रन्थिकायुतः ॥

ज्ञेयो वितानसंज्ञस्तु वितानाकारसंयुतः।

पाषाणगुडकोत्क्षेपकारिणीं गोफणां विदुः ॥

तदाकृतिं सिषक् कुर्यात् फलस्य पञ्चकं विभिः।

पंचांगी तु वृत्तां कुर्यात् सन्ध्याताय चिकित्सकः ॥

लेखक का शल्यतन्त्र देखिये। गोफण को भाषा में गोफना कहते हैं—जिससे पक्षी उड़ाते हैं। दाम-बड़ी मोटी माला का नाम है। कोश—तलवार के कोश के समान, जिसे खोल कहते हैं। अनुवेलित—बेल के समान ऊपर को बल खाये—इसी प्रकार से सब का वर्णन नाम से स्पष्ट है।

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