भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १८ ]

यन्त्रणमूर्ध्वमधस्तिर्यकं च ॥ १६ ॥

मृदु, सर्म और गाढ़ भेद से बन्ध (गांठ) तीन प्रकार का है। यन्त्रण ब्रण की गांठ, ऊपर नीचे और तिरछे भेद से तीन प्रकार की है। ब्रण की आकृतियों के भिन्न भिन्न आकार होने पर भी यन्त्रण तीन ही प्रकार का है ॥ १६ ॥

तत्र घनां कवलिकां दन्वा वामहस्तपरिच्छेपमुजुमना-विद्वमसंकुचितं मृदु पटुं निवेश्य बधनीयात्। न च ब्रण-स्योपरि कुर्याद् ग्रन्थिमाबाधकरं च ॥ २० ॥

ब्रण के उपर घनी कवलिका (गद्दी, औषध और पट्टी के बीच में रखली वस्तु-केले का पत्ता आदि जो कि औषध की रक्षा के लिये एवं वायु संचार को रोकने के लिये रखली जाती है) रखकर वाम और कोमल पट्टी को घुमाते हुए सरल, सीधा (बिना उलझनों के) एवं मूर्तियों रहित (सिलवटों के बिना) दक्षिण हाथ से बाँधना चाहिये। ब्रण के ऊपर या ब्रण के चारों ओर—(वाम—दक्षिण—पार्श्व में, या पीछे की गई गांठ—सोते समय कष्ट देती है) पीड़ा करनेवाली गांठ नहीं देनी चाहिए ॥ २० ॥

न च विकेशिकौषधे अतिस्निग्धे-अतिरुद्धे विषमे वा कुर्वीत, यस्मादतिस्तेहात् क्लेदः, रौदयाच्छेदः, दुर्न्यासाद् ब्रणवत्सर्मावधर्षणमिति ॥ २१ ॥

औषधकल्क—जी एवं शहद को मिलाकर बल्ल या धागों से बनाई वर्त्ति को विकेशिका कहते हैं। यह विकेशिका—सड़े मांस युक्त ब्रणों में भरी जाती है। इस विकेशिका में औषध-कल्क अधिक नहीं होना चाहिये। न इसमें अधिक स्नेह न अधिक रुक्षता होनी चाहिये। और न इस विकेशिका को बुरी प्रकार (दबाकर या ढीला) रखना चाहिये। क्योंकि अतिस्नेह से क्लिन्नता, रुक्षता के कारण छेदन (विदीर्णता) और बुरी प्रकार से प्रविष्ट करने पर-ब्रणमुख का अवधर्षण होता है ॥ २१ ॥

तत्र ब्रणायतनविशेषाद् बन्धविशेषश्चि विधो भवति—गाढः, समः, शिथिल इति ॥ २२ ॥

पीडयन्तरुजो गाढः सोच्छ्वासः शिथिलः स्मृतः।

नैव गाढो न शिथिलः समो बन्धः प्रक्रीतितः ॥ २३ ॥

ब्रण के स्थानभेद से बन्ध भी तीन प्रकार के हैं। यथा—गाढ़, सर्म और शिथिल। जो बन्ध दवाते समय पीड़ा न करे उसका नाम गाढ़ है, जो बन्ध अन्तः श्वास के साथ हिले—तने-उसका नाम शिथिल और जो बन्धन न गाढ़ और न शिथिलसमान हो उसको 'सम' कहते हैं ॥ २२, २३ ॥

तत्र स्फिककुक्षिकक्षावडक्षणोरुशिरःसु समः, अक्षणोः वदनकर्णकण्ठमेदुमुष्कपृष्ठपाधोदरोःसु समः, अक्षणोः सन्धिष च शिथिल इति ॥ २४ ॥

ब्रण के स्थान भेद से बन्ध—

स्फिक, कुक्षि, कक्षा, वंक्षण, ऊरु एवं शिर इनमें गाढ़ बन्धन चाहिये। शाखा (हाथ-पाँव, मुख, कान, कण्ठ, शिरन, अण्डकोश, पीठ, पार्श्व, उदर और उर में सम बन्ध बाँधना चाहिये। आँखों में तथा सन्धियों में शिथिल बन्ध बाँधना चाहिये ॥ २४ ॥

तत्र पैत्तिकं गाढस्थाने समं बधनीयात्, समस्थाने शिथिलं, शिथिलस्थाने नैव, एवं शोणितदुष्टं च, श्लैष्मिकं शिथिलस्थाने समं, समस्थाने गाढं, गाढस्थाने गाढतरम्, एवं वातदुष्टं च ॥ २५ ॥

दोष विशेष से बन्ध—पैत्तिक ब्रणों में—जिन स्थानों में गाढ़ बन्धन (स्फिक आदि में) बाँधा जाता है वहाँ सम बन्ध बाँधना चाहिये और जिन स्थानों (कान-मुख आदि) में सम बन्ध बाँधना है, वहाँ शिथिल, शिथिलबन्ध के स्थानों में बन्ध बाँधना ही नहीं चाहिये। यही नियम रक्तदूषित ब्रणों में व्यवहार करना चाहिये। श्लैष्मिक ब्रणों में—शिथिल बन्धन के स्थान पर सम, सम के स्थान पर गाढ़ और गाढ़ के स्थान पर अधिक गाढ़ बन्धन बाँधना चाहिये। इसी प्रकार वातदूषित ब्रण बन्धन बाँधना चाहिये ॥ २५ ॥

तत्र पैत्तिकं शरदि ग्रीष्मे द्विरहो बधनीयात्, रक्तो पटुतमप्येवं, श्लैष्मिकं हेमन्तवसन्तयोऽव्यहात्, वातोपटु-तमप्येवम्। एवमभ्यूहा बन्धविपर्ययं च कुर्यात् ॥ २६ ॥

कालविशेष से बन्ध विशेष—पैत्तिक ब्रणों को—शरदऋतु में, और ग्रीष्म में—दिन में दो बार बाँधना चाहिये। रक्त-दूषित ब्रणों को भी इसी विधि से बाँधना चाहिए। श्लैष्मिक ब्रणों को—हेमन्त एवं वसन्त के तीसरे दिन बाँधना चाहिये। इसी प्रकार से रक्तदूषित ब्रणों को भी बाँधना चाहिये। इस प्रकार अपनी बुद्धि से विचार कर ब्रण के बन्धन-विपर्यय को तथा ब्रणमोक्षण को करना चाहिये। यथा—पित्तश्लेष्म ब्रणों को—प्रातःकाल ग्रीष्म एवं शरदऋतु में, हेमन्त में पैत्तिक ब्रणों को प्रतिदिन बाँधना चाहिये ॥ २६ ॥

तत्र, समशिथिलस्थानेषु गाढं बद्धे विकेशिकौषधं नैरर्थक्यं शोफवेदनाप्रादुर्भावश्च। गाढसमस्थानेषु शिथिलं बद्धे विकेशिकौषधपतनं पटुसंचाराद् ब्रणवत्सर्मावधर्षणमिति। गाढशिथिलस्थानेषु समं बद्धे गुणाभाव इति ॥ २७ ॥

यदि सम एवं शिथिल बन्ध के स्थान पर गाढ़ बन्ध बाँध जायगा तो विकेशिका की औषध निरर्थक हो जायेगी एवं शोफ तथा वेदना उत्पन्न हो जायेगी। गाढ़ एवं सम के स्थान पर शिथिल बन्ध बाँधने से विकेशिका की औषधि गिर जायेगी। पट्टी के हिलने से ब्रण का मुख रगड़ेगा। गाढ़ एवं शिथिल के स्थान पर सम बन्ध बाँधने से गुण नहीं होता ॥ २७ ॥

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