सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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अविपरीतबन्धे वेदोपशान्तिरसूक्तप्रसादो मार्दवं च ॥२८॥ अविपरीत, ठीक प्रकार से, उचित रूप में बाँधने से वेदना की शान्ति, रक्त की स्वच्छता और कोमलता उत्पन्न होती है ॥२८॥ अवध्यमानो दंशमशकतृणकाष्ठोपलपशुगीतवातातप-
प्रभूतिभिर्विजैर्षैरभिहन्त्यते ब्रणः, विविधवेदोपदुत्तरश्च दुष्टतामुपैति, आलेपनादीनि चाशय विशोषमुपयान्ति ॥२९॥
वृण पर पट्टी को न बाँधने से—दंश ( दास-वनमक्षिका ), मशक ( मच्छर ), तिनकों, लकड़ी, पत्थर, धूल, शीत, धूप, वायु आदि से वृण दूषित हो जाता है, नाना प्रकार की वेदनायें ( रोग ) एवं उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं । वृण पर किये आलेप आदि सब सुख जाते हैं ॥२९॥
चूर्णितं मथितं भग्मं विशिष्टमतिपातितम् ।
अस्थिस्नायुसिराच्छिन्नन्मासु बन्धने रोहति ॥३०॥
सुखमेवं ब्रणी शोते सुखं गच्छति तिष्ठति ।
सुखं शय्यासनस्थस्य क्षिप्रं संरोहति ब्रणः ॥३१॥
चूर्णित ( बहुत खण्डों में भग्म ), मथित ( विलोड़ित ), भग्म ( काण्डभग्म ), विशिष्ट ( सन्धिन्युत ), अतिपातित ( स्थान से न्युत-लटकता हुआ ), अस्थिच्छिन्न, स्नायुच्छिन्न, सिराच्छिन्न वृण बन्धन द्वारा शीघ्र भरता है । बन्धन के कारण वृणी पुरुष सुख पूर्वक सोता है, सुखपूर्वक चलता-बैठता है । विस्तर पर लेटने में, आसन पर बैठने में सुख पहुँचता है, वृण जल्दी भरता है ॥ ३०, ३१ ॥
अबन्ध्याः—पित्तरक्ताभिघातविषनिमिक्ता यदा शोक-दाहपाकरागतोदवेदनाभिभूताः क्षाराग्निदग्धाः पाकात् प्रकृथितप्रशीर्णमांसाश्च भवन्ति ॥ ३२ ॥
निम्न अवस्थाओं में बन्धन नहीं बाँधना चाहिए । यथा—पित्तजन्य, रक्तजन्य, अभिघातजन्य और विषजन्य वृण जब शोके, दाहे, पाके, लालिमा, तोदे, वेदना से युक्त हों, क्षार या अग्नि से जलने के कारण पाक के कारण मांस गल गया हो—(लटक रहा हो) तब वृणों पर पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए ॥३२॥
कुष्ठिनामग्निदग्धानां पिडकामधुमेहिनाम् ।
कर्णिकाश्चोन्दुरुविषे विषजुष्टाश्च ये ब्रणाः ॥ ३३ ॥
मांसपाके न बध्यन्ते गुदपाके च दारुणे ।
स्वजुद्धया चापि विभजेत् कृत्याकृत्याश्च बुद्धिमान् ॥ कुष्ठरोगियों के, अग्नि से दग्ध पुरुषों के, मधुमेही पुरुषों की प्रमेहपिडिकायें, मृषिकाविष में, कर्णिका ( दूषित मांसाङ्गुर ) में, विषयुक्त ब्रणों में, मांसपाक की अवस्था में, गुदपाक की भयानक अवस्था में वृणों पर पट्टी नहीं बाँधनी चाहिए । बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपनी बुद्धि से भी बन्ध्य या अबन्ध्य वृणों की परीक्षा करे ॥ ३३, ३४ ॥
देशं दोषं च विज्ञाय ब्रणं च ब्रणकोविदः ।
श्रुतूत्थं परिसंख्याय ततो बन्धानन्तिवैशयेत् ॥ ३५ ॥
ब्रण को जाननेवाला विद्वान् देश, दोष, ब्रण और शीत-उष्ण-साधारण-श्रुतुओं को जानकर बन्धनों को बाँधे ॥३५॥
ऊर्ध्वतिर्यगधस्ताच्च यन्त्रणा त्रिविधा स्मृता ।
यथा च बध्यते बन्धस्तथा वद्याम्यशेषतः ॥३६॥
घनां कवलिकां दन्वा मृदु चैवापि पट्टकम् ।
विकेशिकामोषधं च नातिस्निग्धं समाचरेत् ॥३७॥
प्रकलेदयत्यतिस्निग्धा तथा रूक्षा क्षिणोति च ।
युक्तस्नेहा रोपयति दुर्न्यस्ता वर्त्मं धर्षति ॥३८॥
विषमं च वर्णं कुर्यात् स्तम्भयेत् स्त्रावयेत्तथा ।
यथावृणं विदित्वा तु योगं वैद्यः प्रयोजयेत् ॥३९॥
उपसंहार—
यन्त्रणा तीन प्रकार की है । यथा—ऊर्ध्व, अधः और तिर्यक । जिस प्रकार से बन्ध बाँधा जाता है, उसकी विधि को सम्पूर्ण रूप से कहता हूँ । ब्रण के ऊपर घनी कवलिका को रखकर कोमल वस्त्र से पट्टी बाँधनी चाहिए । विकेशिका की ओषध को न तो बहुत स्निग्ध और न बहुत रूक्ष करना चाहिए । अतिस्निग्ध होने से ब्रण में किल्लता उत्पन्न करती है, और रूक्ष होने से ब्रण का हिंसन करती है । उचित स्नेहवाली बन्ती ब्रण को भरती है, खुरी प्रकार से प्रविष्ट की हुई ब्रण के सुख का धर्षण करती है । ब्रण को विषम बना देती है । स्त्राव को रोक देती है या स्त्राव को आरम्भ कर देती है । इसलिये वैद्य को चाहिए कि ब्रण को देखकर उपचार करे ॥ ३६-३९ ॥
पित्तजे रक्तजे वाऽपि सकृदेव परिक्षिपेत् ।
असंकृतं कफजे वापि वातजे च विचक्षणः ॥४०॥
तलेन प्रतिपीडयाथ स्त्रावयेदनुलोमतः ।
सर्वाश्च बन्धान् गृह्णन्तान् सन्धीश्च विनिवेशयेत् ॥
पित्तजन्य एवं रक्तजन्य ब्रणों में एक बार ही दबाकर दोष निकालना चाहिए । कफजन्य एवं वातजन्य वृणों में बार-बार दबाना आदि करना चाहिए । हाथों के तलुओं से ब्रण को नीचे दबाकर अनुलोम रूप में स्त्राव करना चाहिए । सब प्रकार के बन्ध इस प्रकार बाँधे कि उसके खिरे और जोड़ बाहर से दिखाई न दें ।
वि० मन्तव्य—२ श्लोकों का अर्थ है कि—पित्त ब्रणों पर तथा रक्तजन्य ब्रणों पर पट्टी का एक ही लपेट देना चाहिए, जिससे उसमें ऊष्मा की उत्पत्ति न हो । कफज एवं वातज ब्रणों पर कई लपेट देने चाहिए, जिससे उनका शमन हो । और 'अथ' अर्थात् यथासमय बन्धन खोलकर ब्रण को तल से दबाकर ( यदि उसमें पूरा सञ्चित हो तो ) सीधे मार्ग से पूंज का स्त्रावण करे और फिर बन्धन बाँध देवे । सन्धेपतः सभी बन्धनों में सन्धि बिठाते हुए बन्धन करे । पट्टी के अन्तिम छोर को पट्टी में ही फँसा देवे अर्थात् गाँठ न देवे ॥४०,४१॥