सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १२ ]
ओष्ठस्याप्येष सन्धाने यथोहिष्टो विधिः स्मृतः । बुद्धयोत्प्रेक्ष्याभियुक्तं तथा चास्थिषु जानता ॥४२॥ उत्तिष्ठतो निषण्णस्य शयनं चाधिगच्छतः ।
गच्छतो विविधैर्यौर्नैर्नास्य दुष्पति स व्रणः ॥४३॥
यह कही हुई विधि ओष्ठ के सन्धान में भी बरतनी चाहिए । विद्वान् वैद्य को चाहिए कि अपनी बुद्धि से विचार-कर अस्थि आदि जोड़ने के काल में भी उपर्युक्त विधि को काम में लाये । बन्धन बाँधने से-उठते बैठते लेटते समय, नाना प्रकार की सवारियों से जाने पर भी व्रण दृषित नहीं होता ॥४२,४३॥
ये च स्मृमससंस्था वै त्वगताश्च तथा व्रणाः ।
सन्ध्यस्थिकोष्ठप्राप्ताश्च सिरास्तायुगतास्ताथा ॥४४॥
तथाऽवगाढगम्भीराः सर्वतो विषमस्थिताः ।
नाते साधयितुं शक्या कृते बन्धाद्भवन्ति हि ॥४४॥
जो व्रण मांस में या त्वचा में आश्रित हो, सन्धि अस्थि कोष्ठ के व्रण, सिरा-स्तनायु के व्रण, गम्भीर व्रण, सम्पूर्ण रूप से (चारों ओर से) विषम व्रण-ये सब बिना योग्य बन्धन के अच्छे (स्वस्थ) नहीं हो सकते—इनमें बन्धन बाँधना आवश्यक है ॥ ४४,४५ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणालेपनबन्धनविधि- र्नामाध्यादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
एकोनविंशोऽध्यायः
अथातो वृणितोपासनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे वृणितोपासनीय (सेवनीय) अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥ १-२ ॥
व्रणितस्य प्रथममेवागारमन्विच्छेत्, तच्छागारं
प्रशस्तवास्त्वादिकं कार्यम् ॥३॥
व्रणी पुरुष के लिए सबसे प्रथम शय्या, आसन, घर आदि की व्यवस्था करनी चाहिए और यह घर प्रशस्त प्रदेश में होना चाहिए ॥ ३ ॥
प्रशस्तवास्तुनि गृहे शुचावातपवर्जिते ।
निवाते न च रोगाः स्युः अरीरागन्तुमानसाः ॥४॥
१ प्रशस्त प्रदेश—ऊँचो-नीची भूमि रहित, पूर्व या उत्तर की ओर ढलवान्, काली, या स्वर्णमृत्तिकावाला प्रदेश उत्तम है । विस्तार के लिये चरक-सूत्रस्थान में कूटागार विधि दी है । यथा—“अपहृतास्थि-शर्कराकपाले देवे प्रशस्तरूपसगन्धायाम् भूमौ गुणवति प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमृत्तिके स्वर्णमृत्तिके वा ।” वास्तुशास्त्र में—बिल्बो निर्भरश्च निर्गुण्डी पिण्डितः सप्तपर्णकः । सहकारश्च पद्मवृत्तः आरुढा या समस्थली । निष्कपाला निस्सला कृष्णवल्मीकवर्जिता”—इत्यादि ।
क्योंकि प्रशस्त प्रदेश में बने घर में, पवित्र-स्वच्छ एवं धूप तथा सीधी वायु की रक्षावट (घर में वायु आये-परन्तु सीधी जोर से नहीं आनी चाहिए )—वाले घर में शारीरिक एवं आगन्तु तथा मानसिक रोग नहीं होते ॥४॥
तस्मिन् शयनसमंसाधं स्वास्तीर्णं मनोज्ञं प्राकृजिरस्कं सशस्त्रं च कुर्वीत ॥५॥
इस घर में शय्या—पीड़ा रहित, असंकुचित (पर्याप्त लम्बी चौड़ी), शोभन गढ़े-चादरवाली, रमणीय, हिंसा-निवारण के लिए शस्त्र युक्त करनी चाहिये । शय्या का सिर पूर्व की ओर रखना चाहिये ॥५॥
मुखचेष्ठाप्रचारः स्यात् स्वास्तीर्णं शयने वृणी ।
प्राच्यां दिशि स्थिता देवास्तत्पूजार्थं च तच्छिरः ॥६॥
इस प्रकार शय्या पर सोने से लाम—ब्रह्म-रोगी पुरुष सुन्दर बिलौनेवाली शय्या पर सोकर अपनी चेष्टायेँ मली प्रकार से आराम से कर सकता है । पूर्व दिशा में देवता रहते हैं (सूर्य आदि) । उनकी पूजा के लिए रोगी का सिर पूर्व दिशा में रखा जाता है । “सूर्य आत्मा जगतस्तत्पुष्यश्च ॥” श्रुतिः, “आरोग्यं भास्करादिच्छेत्” ॥ ६ ॥
तस्मिन् सुहृद्भिरनुकूलैः प्रियंवदैरुपास्यमानो यथेष्ठमासीत ॥७॥
इस घर में अपने मन के अनुकूल, प्रिय बोलनेवाले मित्रों के साथ मिलकर यथेष्ठ समय तक निवास करे ॥ ७ ॥
सुहृदो विक्षिपन्त्याशु कथाभिन्नैर्गवेदनाः ।
आश्वासयन्तो बहुगः स्वानुकूलाः प्रियंवदाः ॥८॥
क्योंकि मित्र लोग नई नई बातें कहकर रोग की वेदना को भुला देते हैं । नाना प्रकार से सान्त्वना देते हुए, मन के अनुकूल प्रिय—कहनेवाले मित्र—वेदना को कम कर देते हैं ॥
न च दिवा निद्रावशगः स्यात् ॥९॥
दिवास्वप्नान्द वृणे कण्डुर्गुत्राणां गौरवं तथा ।
श्रयथुवदना रागः स्नावश्चैव भुशं भवेत् ॥१०॥
व्रणी पुरुष को कभी भी दिन में नहीं सोना चाहिए । क्योंकि—दिन में सोने से व्रण में कण्डु उत्पन्न हो जाती है, अङ्गों में भारीपन आ जाता है, व्रण में सूजन, लालिमा और बहुत स्नाव आरम्भ हो जाता है ॥ ९,१० ॥
उत्थानसवैशनपरिवर्तनचड्कमणोच्चैर्भाषणद्यास्वा- त्मचेष्ठास्वप्रभतो वृणं संरक्षेत् ॥११॥
स्थानासनं चड्कमणं दिवास्वप्नं तथैव च ।
वृणितो न निषेवेत् शक्तिमानपि मानवः ॥१२॥
व्रणी पुरुष को चाहिए कि अपनी चेष्टाओं में—उठने, बैठने, वाम-दक्षिण करवट बदलने में—चलने में—बहुत सावधानी बरते । उठना, बैठना, धूमना, दिन में सोना बलवान् भी व्रणी सेवन न करे ॥११,१२॥