सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १६ ]
सूत्रस्थानम्
७७
उत्थानाद्योऽसन् स्थानं शय्या चातिनिषेविता ।
प्राप्नुयान्मास्तादङ्गरुजस्तस्माद्विजयेत् ॥१३॥
अधिक उठने से, अधिक बैठने से, अधिक सीधा खड़ा होने से, अधिक विस्तर पर पड़े रहने से अङ्गों में वायु प्रकुपित होती है, इससे दर्द बढ़ जाती है ॥१३॥
गम्यानां च स्त्रीणां संदर्शनसंभाषणसंस्पर्शनानि दूरत एव परिहरेत् ॥१४॥
गम्य ग्राम्यधर्म के योग्य स्त्रियों के दर्शन, इनके साथ बोल-चाल, इनके स्पर्श से-दूर से ही बचना चाहिये । (अगम्य स्त्रियों की बात ही नहीं) ॥१४॥
स्त्रीदर्शनादिभिः शुक्लं कदाचिच्छलितं स्रवेत् ।
ग्राम्यधर्मकृतान्दोषान् सोऽसंसर्गोऽप्यवाप्नुयात् ॥१५॥
क्योंकि कभी अकस्मात् स्त्रीदर्शन आदि से शुक्ल क्षतित हो जाय तो ग्राम्यधर्म के बिना भी, ग्राम्यधर्म द्वारा उत्पन्न विकार-इस शुक्लक्षव से उत्पन्न हो जाते हैं ॥१५॥
नवधान्यमाषतिलकलायकुल्लथनिष्पात्रहरितकशाका- मल्लवणकटुकगुडपिष्टविकृतिवल्लूरशुष्कशाकाजाविकान्- पौदकमांसवसाशीतोदककुशरापायसदधिदुग्धतकप्रभृ- तानि परिहरेत् ॥१६॥
निम्न आहार का परित्याग करना चाहिये-नये धान्य (एक साल जिन धान्यों पर नहीं बीता), उड़द, तिल, कलाय (मटर), कुल्लथी, निष्पात्र (राजशिम्ब), हरितक१ अम्ल, लवण, कटुरस, गुडपिष्टी-गुड से बने पदार्थ, वल्लूर (शुष्क मांस), शुष्क शाक, बकरी-भेड़ का मांस, आनूप मांस, औदक मांस, बसा, शीत पानी, कुशरा (तिल-तण्डुल-माष से बनी यवागू), पायस (खीर), दधि, दूध, तक प्रभृति (गुरु पदार्थों) का परित्याग करना चाहिये॥
तकान्तो नवधान्यादियोऽयं वर्ग उदाहृतः ।
दोषसजननो ह्येष विज्ञेयः पूयवर्धनः ॥१७॥
नवधान्य से लेकर तक तक जो पदार्थ कहे हैं, ये सब वृण में दोष उत्पन्न करनेवाले हैं । इनके सेवन से वृण में पूय बढ़ती है ॥१७॥
मद्यपक्ष मरैयारिष्टासवसीधुसुराविकारान् परिहरेत् ॥१८॥
व्रणी पुरुष यदि मद्यपी हो (या न भी हो) तो भी उस को मरैय (सुरा और आसव को एक पात्र में बन्द करके बनाने से) अरिष्ट (स्वाथ से बनाया), सीधु (सस्यक), सुरा (लोहित वर्ण)- मद्य के विकारों का परित्याग करना चाहिये । (कई आचार्यों
का मत है कि 'अम्लादि गुण युक्त सब प्रकार के मद्य का निषेध है' परन्तु अम्लादि से विपरीत-द्राक्षारसादि पिठाने चाहिये) ॥ मद्यमलं तथा रूक्षं तीक्ष्णगुणं च वीर्यतः॥
आशुकारि च तत् पीतं क्षिप्रं व्यापादयेद् व्रणम् ॥१९॥
मद्य-अम्लरस, रूक्ष, तीक्ष्णगुण, उष्णवीर्य, और शरीर में शीघ्र व्याप्त होने से क्षिप्रकारी है, इसलिये व्रण को बहुत जल्दी दूषित कर देता है । (मद्य के दस गुण ओज के गुणों से विपरीत हैं । इसलिये मद्य ओज का नाश करने से व्रण में अहितकर है)॥
वातातपरजोधूमावश्ययायतिसेवनातिभोजनातिष्ठभोजनश्रवणदर्शनेष्यांमर्षभयशोकध्यानरात्रिजागरणविषमाशनशयनोपवासवाग्ध्यायामस्थानचङ्क्रमणशीतवातविरुद्धाध्यशनाजीर्णमक्षिकावाबाधाः परिहरेत् ॥२०॥
बाह्य आहार-विहार-वात, धूप, धूल, धूवा, ओस, इनका अधिक सेवन, अतिभोजन, अनिष्ट भोजन, अनिष्ट वात का सुनना, अनिष्ट वस्तु का दर्शन, ईष्यां, क्रोध, मय, शोक, चिन्ता, रात्रि में जागना, विषमाशन, उपवास करना, विषम शयन, अनशन, वाणी का श्रम (जोर से बोलना), सीधा खड़ा होना, चलना, शीतवायु, विरुद्ध भोजन(दूध, मछली को साथ खाना), अजीर्ण, मक्खी आदि से बचना चाहिये । (विषमशयन-कम या अधिक खोना) ॥२०॥
व्रणिनः संप्रतप्तस्य कारणैरेवमादिभिः ।
क्षीणशोणितमांसस्य भुक्तं सम्यङ् न जीर्यति ॥२१॥
अजीर्णात् पवनादोनां विघ्नभो बलवान् भवेत् ।
ततः शोफरुजास्त्रावदाहपाकान्वाप्नुयात् ॥२२॥
उपर्युक्त एवं अन्य इसी प्रकार के कारणों से व्रणी पुरुष के दुःखी होने पर-मांस और रक्त क्षीण हो जाता है, जिससे कि खाया भोजन मली प्रकार से जीर्ण नहीं होता । अजीर्ण के होने से वात-पित्त कफ का स्थानान्तर में जाना होता है । इससे सूजन, पीड़ा, रक्तक्षव, विदाह और पाक उत्पन्न हो जाते हैं ॥२१, २२॥
सदा नीचनखरोग्णा शुचिना शुक्लवाससा शान्ति- मङ्गलदेवताब्राह्मणगुरुपरेण भवितव्यमिति । तत् कस्य हेतोः ? हिंसविहाराणि हि महाचीवीणि रक्ष्यासि पशु- पतिकुबेरकुमारानुचराणि मांसशोणितप्रियत्वात् क्षतज- निमित्तं व्रणिनमुपसर्पन्ति, सत्कारार्थं जिघासून्नि वा कदाचित् ॥२३॥
व्रणी पुरुष को सदा नख और बाल कटाकर पवित्र-साफ, श्वेत वस्त्र धारण करने चाहिये । मन की शान्ति, मङ्गल, देवता, ब्राह्मण और गुरु की आज्ञाव सेवा में सदा तत्पर रहना चाहिये। यह सब किसलिये ? क्योंकि हिंसा के लिये विहार (प्रवृत्ति)
१ हरितशाक--'कुठेर-शिषु-सुरस-सुमखासुरि-भूस्तृणाः । चुकाक-शुक्रिका चेति वर्ग हरितकं विदुः'॥