सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[अ० १६]
करनेवाले बड़े शक्तिशाली महेश; कुबेर और कार्तिकेय की आज्ञा का पालन करनेवाले राक्षस—मांस एवं रक्त की चाहना से रक्त के कारण व्रणी पुरुष के पास आते हैं। इनके आने का उद्देश्य-पूजा प्राप्त करना या गतायुष को मारने के लिये आना है। ॥२३॥
कहा भी है—
भवति चात्र—
तेषां सत्कारकामानां प्रयतेतान्तरात्मना ।
धूपबल्युपहारान्श्च भक्ष्यान्श्चोपहारयेत् ॥२४॥
इन पूजाभिलाषी अनुचरों के सत्कार के लिये अन्तरात्मा से प्रयत्न करना चाहिये। इनको धूप (नैवेद्य), बलि (पूजा), उपहार (पशुबलि) एवं उत्तम भक्ष्य देने चाहिये ॥२४॥
ते तु संतर्पिता आत्मवन्तं न हिंस्युः । तस्मात् सतत-मतन्द्रितो जनपरिवृतो नित्यं दीपोदकशस्त्रसम्पुष्पला-जायलङ्कृते वैश्वमनि संपनमङ्गलमनोऽनुकूलाः कथा शृण्वन्नासीत् ॥२५॥
ये अनुचर भली प्रकार से तृप्त होने पर जितेन्द्रिय पुरुष को नहीं मार सकते, इसलिये सदा सावधान (चौकश), मनुष्यों से घिरा, सदा दीप-पानी-शस्त्र-संग (सिर की माला), दाम-फूल-लाजा-वीणा-चन्दन आदि ऐश्वर्य से युक्त होकर मङ्गल, सुन्दर एवं अनुकूल (मन-पसन्द) कथाओं को सुनता हुआ समय बिताये ॥२५॥
संपदाद्यनुकूलाभिः कथाभिः प्रीतमानसः ।
आशावान् व्याधिभोक्षाय क्षिप्रं सुखमवाप्नुयात् ॥२६॥
उपर्युक्त ऐश्वर्य से युक्त होकर अनुकूल मन के प्रिय कथाओं को सुनते हुए, रोग की शान्ति में आशा रखने से (मैं अवश्य अच्छा हो जाऊँगा) शीघ्र स्वस्थ हो जाता है ॥२६॥
ऋग्यजुःसामाथर्ववेदाभिहितैरपरेआशीर्विधानैरुपा-
ध्याया भिषजश्च सन्ध्ययो रक्षां कुर्युः ॥२७॥
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद में कहे तथा अन्य आशीर्वादों द्वारा पुरोहित तथा वैद्य प्रातः सायं दोनों सन्ध्या-कालों में रोगी की रक्षा करें ॥२७॥
सर्षपारिष्टुपत्राभ्यां सर्पिषा लवणेन च ।
द्विरहः कारयेद् धूपं दशरात्रमतन्द्रितः ॥२८॥
सरसों, अरिष्टपत्र (निम्बपत्र), घी और सेन्धव नमक, इनके साथ दुस दिन तक बिना आलस्य किये-प्रातः सायं 'धूप' देना
१ पूजा के लिये आगे कहेंगे—
“अशुचि भिक्षुभ्यां क्षतं वा यदि वाऽक्षतम् ।
हित्यहिसाविहाराय सत्कारार्थमथापि वा ॥
विस्तार के लिये 'अमानुषोपसर्गं प्रतिषेधं' नामक अध्याय देखिये ।
चाहिये—(त्रण के सिवाय विस्तार कपड़े आदि पर भी धूप देना चाहिये—जैसा चरक० शारीर द अ० में कहा है ।) ॥२८॥
छत्रामतिच्छत्रां लाङ्ग (ङ्ग)लीं जटिलां ब्रह्मचारिणीं लक्ष्मीं गुहामतिगुहां वचामतिविषां शतवीर्यां सहस्रवीर्यां सिद्धार्थकांश्च शिरसा धारयेत् ॥२९॥
निम्न औषधियों को सिर पर धारण करना चाहिये । यथा छत्र, अतिच्छत्र (दोनों द्रोणपुष्पी-गोमा), लांगली (कलिहारी या कपिकच्छु-कौंच), जटिला (जटामांसी), ब्रह्मचारिणी (मुण्डतिका या लालचन्दन वा मण्डूकपर्णी), लक्ष्मी (लक्ष्मणा या शमी), गुहा (शालपर्णी), अतिगुहा (घृशिनपर्णी), शतवीर्या (शतावरी या दूर्वा) सहस्रवीर्या (श्वेत दूर्वा), और सिद्धार्थक (सरसों), इनको सिर पर धारण करना चाहिये ॥२९॥
व्यज्येत बालव्यजनेत्रैर्णं न च विघट्येत ।
न तु देव च कण्डूयेच्छयानः परिपालयेत् ॥ ० ॥
त्रण को चमर से वायु करते रहना चाहिये, दवाना, सूई आदि से वैधना तथा खुजाना नहीं चाहिये और त्रणरोगी सौते समय भी त्रण की रक्षा करता रहे अर्थात् त्रण पर कोई आश्रय न पहुँचे ॥३०॥
अनेन विधिना युक्तमादावेव निशाचराः ।
वन्तं केशरिणाऽऽक्रान्तं वर्जयन्ति मृगा इव ॥३१॥
इस उपर्युक्त विधि के सेवन करने से राक्षस लोग पहले से ही भाग जाते हैं, जिस प्रकार कि केशरी-सिंह से आक्रान्त वन में मृग नहीं घुसते, इसी प्रकार राक्षस भी त्रण के पास नहीं आते ॥३१॥
जीर्णशाल्योदनं स्निग्धमल्पमुण्डं द्रवोत्तरम् ।
मुञ्जानो जाङ्गलैर्मांसैः शोघ्रं त्रणमपोहति ॥३२॥
तण्डुलीयकजीवनतीसुनिषण्णकवास्तुकेः ।
बालमूळकवातांकपटोलेः कारवेत्तलकैः ॥३३॥
सदाडिमैः सामलकैर्घृतश्चष्टैः ससैन्धवैः ।
अन्यैरेवंगुणैर्वाऽपि मुद्गादादीनां रसेन वा ।
सक्तून् विलेपी कुलमाषाङ्गजलं चापि श्रुतं पिबेत् ॥३४॥
सेव्यविधि—स्निग्धं, अल्प उष्णं एवं द्रव-बहुल, पुराने शाली खावलों के भात को जांगल मांस के साथ
१ राक्षस शब्द या इसके पर्याय निशाचर आदि वर्तमान कालीन रोगोत्पादक कीटाणु-मच्छर आदि के लिये सङ्गत हैं। राक्षसों की भांति ये भी रात को अन्धेरे में, असावधानी में आक्रमण करते हैं, इनको मांस, रक्त पसन्द है। पवित्रता होने से भागते हैं।
२ द्रवोत्तर का अर्थ-भोजन के पोछे पानी पीने से भी है। क्योंकि—'क्षिप्रं जरां गच्छति, वातमनुलोमयति, अनुदीर्घाव्याजितम् दीरयति। अधिक पानी अर्थ करना ठीक नहीं। क्योंकि भोजन इसको हानिकारक कहा है—बूणे च मधुमेहे च पानीयं मन्दावबरेत् ।