भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २३ ]

जिन व्रणों में निम्न लक्षण हो उनको पैतिक समझना, यथा—ओष (एक देश में दाह), चोष (चूसने के समान पीड़ा), परिदाह (जलन), धूम्रायन (धूम्रप्रतीति), जिन में शरीर अङ्गारों से जलता-सा प्रतीत हो, जहाँ पर उष्णमा बढ़ी हो, क्षत में क्षार लगने के समान पीड़ा हो-उनको पैतिक व्रण समझना चाहिये पित्त के समान रक्तजन्य व्रणों को समझना चाहिये ।

जिन व्रणों में निम्न लक्षण हों उनको कृफजन्त्य व्रण समझना चाहिये । यथा—कण्डू (वाज), गुरुत्व (मारीपन), सुसर्व (स्पर्शशान का नाश), थोड़ी वेदना, स्तम्भ (जड़ता) और शीतलता हो, उसे श्लैष्मिक व्रण जानना चाहिये । और जिन व्रणों में सब प्रकार की वेदनायें उत्पन्न होती हों-उन व्रणों को सन्निपातजन्य समझना चाहिये ॥११॥

१ दूषितव्रण—

श्वेतोऽवसवर्त्ताऽतिस्थूलवर्त्ताऽतिपिच्चरः ।

नीलः श्याबोऽतिपिडको रक्तः कृष्णोऽतिपूतिकः ॥

रोप्यः कुम्भीमुखश्चेति प्रदुष्टा द्राक्ष दूणाः ॥

वृण के साव—

लसीकाजलप्यासगृहारिद्रारुणपिच्चराः ।

कषायनीलहरितस्निग्धरुक्षसितासिताः ॥

वृण के रूप—

कृत्योक्त्यस्तथा दुष्टोऽदुष्टो मर्मस्थितो न च ।

संवृतो दारुणस्नावी सबिषो विषमास्थितः ॥

उत्सङ्गचुत्सव एषां च वृणां विद्यात् विषय्यात् ।

इति नानात्वभेदेन निखता विशतिवृणाः ॥

वृण की गन्ध—

सपिस्तैलवसापूयरक्तश्यावाम्लपूतिकाः ।

वृणानां वृणगन्धश्चैरहो गन्धाः प्रकीर्तिताः ॥

दोषों से—

स्तम्भः कठिनसंस्पृशो मन्दस्नाबोऽतितीव्रूक् ।

तुद्यते स्फुरति श्याबो दूष्यो मारुतसंभवः ॥

तृष्णामोहज्वरस्वेददाहदुष्टघवदारुणः ।

वृणं पित्तकृतं विद्यात् गन्धैः स्नावेच्छ पूतिकैः ॥

बहुपिच्छो गुरुः स्निग्धो स्तिमितो मन्दवेदनः ।

पाण्डुवर्णोऽल्पखलेदः चिरकारी कृफवृणः ॥

साध्यासाध्य—

स्वडर्मासजः सुखे देशे तरुणस्यानुपद्रवः ।

धीमतोऽभिन्नः काले सुखसाध्यः स्मृतो व्रणः ॥

गुणैरन्यतमर्हिनः ततः कुच्छो वृणः स्मृतः ।

सर्वविहीनो विज्ञेयस्त्वसाध्यो निरपक्रमः ॥

चरक० चि० अ० २५ ।

अत ऊर्ध्व व्रणवर्णान् वद्यामः—भस्मकपोतास्थिवर्णः परुषोऽरुणः कृष्ण इति मारुतजस्य, नीलः पीतो हरितः श्यावः कृष्णो रक्तः पिङ्गलः इति रक्तपित्तसमुत्थयोः श्वेतः स्निग्धः पाण्डुरिति श्लेष्मजस्य, सर्ववर्णोपेतः सान्निपातिक इति ॥१२॥

इसके आगे व्रण के रङ्गों को कहते हैं । वायु के कारण व्रण का रङ्ग-भस्म (राख), कबूतर की अस्थि के समान, कठोर, लाल, काला, होता है । पित्त के कारण एवं रक्तजन्य व्रण का रङ्ग—नीला, पीला, हरा, काला, श्याव, लाल, कपिल, पिङ्गल (धूसर) होता है । कृफजन्त्य व्रण का रङ्ग—श्वेत, स्निग्ध, पाण्डु होता है । सन्निपातजन्य व्रण में सब दोषों के रङ्ग मिलते हैं ॥ भवति चात्र—

न केवलं व्रणेपूक्तो वेदनावर्णसंग्रहः ।

सर्वशोफविकारेषु व्रणवल्लक्षये द्विषक् ॥१३॥

कहा भी है—

यहाँ पर जो वेदना एवं वर्ण के विषय में कहा है, यह केवल व्रणों के लिये ही नहीं है, अपितु शोफजन्य सब रोगों में व्रण के समान ही (वेदना एवं वर्ण) वैद्य को समझना चाहिये ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणास्नावविज्ञानीयो नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥२२॥

त्रयोविंशतितमोऽध्यायः

अथातः कृत्याकृत्यविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे कृत्याकृत्य विधि (साध्यासाध्य विधि) नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

तत्र, वयःस्थानां दृढानां प्राणवतां सन्त्ववतां (आत्मवतां) च सुचिकित्स्या व्रणाः, एकस्मिन् वा पुरुषे यत्र तदगुणचतुष्टयं तस्य सुखसाधनीयतमाः । तत्र, वयःस्थानां प्रत्यग्रधातुत्वादाशु व्रणा रोहन्ति, दृढानां स्थिरबहुर्मासत्वाच्छस्त्रमवचार्यमाणं सिरास्तन्वाद्यदिविशेषमप्राप्नोति, प्राणवतां वेदनाभिघाताहारयन्त्रादिभिर्न रक्षानिरस्तृप्यते, सन्त्ववतां दारुणैरपि क्रियाविशेषैर्न व्यथा भवति, तस्मादेतेषां सुखसाधनीयतमाः ॥३॥

वयःस्थ (तरुण), दृढ (गूढ़-सिरा-स्निग्धवाले संहत शरीर), प्राणवान् (शक्तिशाली), और सन्त्ववान् (व्यसन में भी न घबरानेवाले) पुरुषों के व्रण सुगमता से चिकित्सा किये जाते हैं । अथवा यदि एक ही पुरुष में उपर्युक्त चारों गुण हों तो उसके व्रण अतिशय सुखसाध्य हैं । इनमें—तरुण पुरुषों में—धातु के नवीन होने से व्रण शीघ्र भरते हैं । दृढ पुरुषों में—मांस के स्थिर एवं बहुत होने से—चलाया हुआ शाख सिरा-स्तंभ आदि तक नहीं पहुँचता । शक्तिशाली पुरुषों में—वेदना,