सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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केरोदकैर्वा रूकरसकाजिकप्रसादा रूकोदकप्रियङ्गुफलयुक्तमुद्गनयूषसवर्णत्वानोति ॥३॥
इसके आगे सुव प्रकार के खावों को कहते हैं—
आगन्तुज कारणवश त्वचा पर रगड़ लगने से या कट जाने से, अथवा अन्तःकारण से त्वचा के फटने से, ब्रण के विदीर्ण होने से पानी के समान पतला कुल आमगन्धि और पीले रंग का सा खाव होता है। सांसर्गत ब्रण का खाव-घी के समान , साद्ध (घना), रुचेत और पिच्छिल होता है। आगन्तुज कारण से शिरा के तुरन्त कट जाने से रक्त बहुत बहता है । शिरा के अन्तःकारण से पक होकर विदीर्ण होने पर पानी के समान पूय बहती है, खाव-पतला, थोड़ा थोड़ा, पिच्छिल, अवलम्बनशील (रुकनेवाला), काला-सा एवं ओस के कणों के समान बूंद-बूंद होता है। स्नायुगत ब्रणों का खाव स्निग्ध, घन, नासिका के मल के समान और रक्तमिश्रित होता है। अस्थिगत ब्रण में अस्थि पर चोट लगने से अस्थि फटती है, टूटती है। दोष के कारण अस्थि के विदीर्ण होने पर अस्थि साररहित हो जाती है-क्योंकि दोष के कारण अस्थि खाई जाती है। इसलिये अस्थि-सोप के समान, धुले वस्त्र के समान सफेद चमकती है। और अस्थि का खाव-मजा एवं रक्तमिश्रित, स्निग्ध होता है। सन्धिगु में खाव होने से दबाने से बाहर नहीं आता, परन्तु अङ्ग को सिकोड़ने फैलाने, ऊपर उठाने, नीचे करने, दौड़ने, खाँसने और प्रवाहण (खाँचने) से बाहर आता है। इसमें खाव का रंग-पिच्छिल, अवलम्बी (रुकनेवाला), झाग और पूयमिश्रित एवं कुछ रक्त, मथित (मथा सा) होता है। कोष्ठगत ब्रण में —रक्त, मूत्र, मल, पूय और जल रस बलेद (या पानी) क्षवित होता है। सर्गगत खाव का अन्तर्भाव त्वग आदि के खाव में ही हो जाता है, इसलिये अलग नहीं कहते।
इनमें त्वग आदि स्थानों के खाव वात आदि दोषों के क्रमानुसार निम्न हैं। यथा—
वायु के कारण —कठोरता, कालापन, ओस के समान बूंद, दधि, मस्तु, क्षारोदक, मांस के धोवन के समान, पुलाकोदक (गवेधुक के या धान की पुराली के पानी) के समान वायु से खाव होता है, पित्त के कारण खाव गोमेद के समान, गोमूत्र, शंख भस्म, कपायोदक के समान, माध्वीक (महुवे) के, तैल के समान होता है। रक्त के कारण खाव पित्त की भांति होता है और बहुत दुर्गन्ध युक्त होता है। कृफ के कारण मक्खन, कासीस, मज्जा के, पिष्ट (पीसे) तिल के-नारियल के पानी के, बराह की बछा के समान होता है। सन्निपात के कारण खाव नारियल के पानी, ककड़ी के रस के, काँजी के ऊपर के स्वच्छ भाग के, आरु (आरु), प्रियंगु के फल, यकृत और मूत्र के धूप के समान होता है ॥४॥
इलोकौ चात्र भवतः—
पक्वाशयादासाध्यस्तु पुलाकोदकसन्निभः।
क्षारोदकनिभः खावो वख्यो रक्ताशयात्स्ववन् ॥६॥
आमाशयात् कलायाम्भोनिभश्च त्रिकसन्निभः।
खावानेतान् परीक्ष्यादौ ततः कर्माचरेद् भिषक् ॥१०॥
दो श्लोक भी कहे हैं—
पुलाकोदक (पुराली के पानी) के समान-पक्वाशय से होने वाला खाव असाध्य है। और जो खाव रक्ताशय से—क्षारोदक के समान बहता है, वह भी असाध्य है। आमाशय से और त्रिक (कटि के अधोभाग) प्रदेश से जो खाव मटर के पानी के समान बहता है—वह भी असाध्य है। वैद्य को चाहिये कि पहिले इन खावों की परीक्षा करके फिर चिकित्सा कर्म में हाथ लगाये ॥६,१०॥
अत ऊर्ध्व सर्वत्रणवेदना वक्ष्यामः—तोदनभेदतताडनच्छेदनायमनमन्थनविच्छेपणचुमुचुमायननिर्देहनावभञ्जनस्फोटनविदारणोत्पाटनकम्पनविविधशूलविश्लेषणविकिरणस्तम्भनपूरणस्तम्भनस्वप्नानुच्छ्रान्ताङ्गिकाः संभवन्ति, अनिमित्तविविधवेदनाप्रादुर्भावो वा मुहुर्मुहुर्ब्रान्गच्छन्ति वेदनाविशेषास्तं वातिकमिति विद्यात्; ओषधोषपरिदाहपूमायनानि यत्र गात्रमङ्गारावकोणमिव पच्यते यत्र चोष्माभिर्वृद्धिः क्षते क्षारावसिकतवच्च वेदनाविशेषास्तं पैंतिकमिति विद्यात्, पित्तवृद्धकसमुत्थं जानीयात्, कण्डूर्गुरुत्वं सुमत्त्वमुपदेहात्स्ववेदनत्वं स्तम्भः शैत्यं च यत्र तं श्लैष्मिकमिति विद्यात्, यत्र सर्वार्सा वेदनानामुत्पत्तिस्तं सान्नप्रातिकमिति विद्यात् ॥११॥
इसके आगे सब ब्रणों की वेदना कहते हैं—
जिन ब्रणों में निम्न प्रकार की वेदना हो उनको वातिक ब्रण समझना चाहिये। यथा—सूई के समान चुभने की, भेदने (त्वचा आदि के फटने की), ताड़ने (दण्ड आदि से अभिह्वन की), छेदने (काटने की), आयमन (तानने की), मन्थन (मथने की), विच्छेपण (फेंकने की), चुमुचुमायन (राई या सरसों के लेप की भांति चुमुचुमाने की सी), निर्देहन वृद्धि से जलने की, अवभंजन (वायु से टूटने की), स्फोटन (फूटने की), विदारण (नख आदि से फाड़ने की), उत्पाटन (उखाड़ने की), कम्पन (काँपने की), विविध-शूल, विश्लेषण (नाना प्रकार की पीड़ाओं की), विकिरण (ब्रण के भिन्न २ अवयवों में वेदन), पूरण (भरना), स्तम्भन (स्तम्भता), स्वप्न (स्पर्शज्ञान को हानि), आकुचन (संकोच), अंकुशिका (खल्की-बालों का गिरना), विना कारण के नाना प्रकार की वेदनायें उत्पन्न होने लगती हैं, और बार बार जहाँ पर वेदनायें हों उस ब्रण को वातिक समझना चाहिये।