सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० २२ ]
द्वारिंशतितमोऽध्यायः
अथातो व्रणस्त्रावविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
इसके आगे 'व्रणस्त्रावविज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
त्वङ्मार्गसिरास्नायवस्थिसन्धिकोष्ठमर्माणित्यष्टौ व्रण-वस्तूनि । अत्र सर्वव्रणसन्निवेशः ॥३॥
त्वचा, मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि, सन्धि, कोष्ठ और मर्म ये आठ व्रण के अधिष्ठान (स्थान) हैं। इन्हीं आठ स्थानों में सब प्रकार के व्रण उत्पन्न होते हैं। चरक में—त्वचा, सिरा, मांस, मेद, अस्थि, स्नायु, मर्म और अन्तराश्रय (कोष्ठ) ये आठ माने हैं।
वि० मन्तज्य—'व्रणवास्तूनि' पाठ भी है। अर्थ है—व्रण के वास्तु अर्थात् स्थान या घर। इस अध्याय में—व्रण के स्थान, आकार, साध्यत्व दोषकारण, दुष्ट (बुरे) व्रणों के लक्षण, स्त्राव स्थानमेद से स्त्राव, व्रण में होनेवाली वेदनाएँ और व्रणों के वर्ण कह दिये गये हैं ॥३॥
तत्र, आद्यैरुक्तस्तुसन्निवेशी त्वरभेदी व्रणः सूपचरः, शेषाः स्वयमविदीयमाणो दुरुपचराः ॥४॥
इनमें त्वचा में स्थित, त्वचा का मेदन करनेवाला व्रण सुखमध्य—भली प्रकार से स्वस्थ हो जाता है। शेष स्थानों में स्थित व्रण—जो स्वयं विदीर्ण नहीं होते हैं अतः कठिनाई से अच्छे होते हैं ॥४॥
तत्रायतश्चतुरसौ वृत्तबिपुटक इति व्रणाकृतिसमासः, शेषास्तु विकृताकृतयो दुरुपकमा भवन्ति ॥५॥
संक्षेप में व्रण की आकृतियाँ चार प्रकार की हैं—आयत (दीर्घ), चतुरस (चौकोर), वृत्त (गोल), बिपुटक (त्रिकोण), शेष (अर्द्ध चन्द्राकार-स्वस्तिक आदि) आकृतियाँ विकृत दूषित हैं, इसलिये कुच्छ्रुतमध्य हैं ॥५॥
सर्व एव व्रणाः क्षिप्रं संरोहन्त्यात्मवर्ता सुभिषरिभ-श्रोपक्रान्ताः, अनात्मवर्तामज्ञैश्रोपक्रान्ताः प्रदुष्यन्ति, प्रवृद्धत्वाशेषणाम् ॥६॥
पथ्य-आहार-विहार का सेवन करनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषों के, उत्तम वैद्यों द्वारा चिकित्सा किये जाने पर—सब प्रकार के व्रण शीघ्र भर जाते हैं। अहिताहार-विहार करनेवाले अजितेन्द्रिय पुरुषों के—मूढ़ वैद्यों से चिकित्सा करने पर सब व्रण दूषित हो जाते हैं—क्योंकि इनमें दोष बहुत बढ़े होते हैं ॥६॥
तत्रातिसंयुतोऽतिविद्युतोऽतिकठिनोऽतिमृदुरक्तसन्धोऽव-सन्धोऽतिशीतोऽत्युष्णः कृष्णरक्तपीतशुष्कदादीनां वर्णानाम-
न्यतमव्रणो भैरवः पूतिपूयमांससिरास्नायुप्रभृतिभिः पूर्णः पूतिपूयास्त्राल्युन्मागर्गुत्सङ्गचमनोद्वादशैर्नग्नधोऽत्यर्थ वेदनावान् दाहपाकरागकण्डूशोफपिडकोपदुतोऽत्यर्थ दुष्टशोणितास्त्रावी दीर्घकालानुबन्धी चेति दुष्टव्रणलिगानि । तस्य दोषोच्छ्रायेण षट्त्वं त्रिभञ्ज्य यथास्वं प्रतीकारे प्रयतेतेति ॥
दुष्ट व्रण के लक्षण—अतिसंकुचित, अतिविस्तृत (पित्तरक्त से), अतिकठिन (वात से), अतिमृदु (कफ से), उत्तत मांस, हीन मांस, अति शीत, अति उष्ण, काला-पीला-सफेद इनमें से कोई एक रंग हो, भैरव (डरावने लक्षणोंवाला), सड़ी पूय, सड़े मांस, गली सिरा-स्नायु आदि से परिपूर्ण, सड़ी पूय बहती हो, उन्मागी (तिर्गंगामी) उत्संगी (ऊर्ध्वगति), अशोभन दर्शन, अशोभन गन्ध, अतिवेदनावान्, दाह-पाक-लालिमा-कण्डू-शोफ-पिडिका इन उपद्रवों से युक्त, दुष्ट रक्तस्त्राव करनेवाला, चिरकालीन, ये दूषित व्रण के लक्षण हैं। इस व्रण को दोषों की प्रधानता से छे भागों में (वर्त, पित्त, कफ, रक्त, सन्निर्गत और आगर्गुज) विभक्त करके दोषानुसार चिकित्सा करने का प्रयत्न करना चाहिये ॥७॥
अत ऊर्ध्वं सर्वस्त्रावान् वक्ष्यामः—तत्र घृष्टासु छिन्नासु वा त्वत्तु स्फोटे भिन्ने विदारिते वा सलिलप्रकाशो भवत्यास्त्रावः किंचिद्विस्तः पीतावभासश्च, मांसगतः सर्पिःप्रकाशः सान्द्रः श्वेतः पिच्छिलश्च, सिरागतः सद्यश्चिन्नासु सिरासु रक्तातप्रवृत्तिः पक्वासु च तोयनाडीभिरिव तोयागमनं पूयस्य आस्त्रावश्चात्र तनुर्विच्छिन्नः पिच्छिलोऽवलम्बी श्यावोऽवश्यायप्रतिमश्च, स्नायुगतः स्निग्धो घनः सिंघाणकप्रतिमः सरक्तश्च, अस्थिगतोऽस्थन्यभिहते स्फुटिते भिन्ने दोषावदारिते वा दोषभक्षितत्वादस्थि निःसारं शक्तिधौत-मिवाभाति, आस्त्रावश्चात्र मज्जभिन्नः सरुधिरः स्निग्धश्च, सन्धिगतः पीड्यमानो न प्रवर्तते, आकुञ्चनप्रसारणोन्मन-नविनमनप्रधावनोत्कासनप्रवाहपैश्च रुचति, आस्त्रावश्चात्र पिच्छिलोऽवलम्बी सरुधिरोन्मथितश्च, कोष्ठगतोऽसूक्ष्मत्रुपरीषपूयोदकानि श्रवति, मर्मगतस्तवगादिष्वव-रुद्धत्वान्नोच्यते। तत्र त्वगादिगतानामास्त्रावाणां यथाक्रमं पारुष्यश्यावावश्यायदधिमस्तुक्षारोदकमांसधावनपुलाकोदकसन्निभत्वानि मारुताद्भवन्ति, पित्ताद् गोमेदकगोमूत्र-भस्मगङ्गकषायोदकमाध्वीकतैलसन्निभत्वानि, पित्तवद्-क्तादतिविस्तृत्वं च, कफान्नवनीतकासीसमज्जपिष्टविल-नालिकेरोदकवराहवसासन्निभत्वानि, सन्निपातान्नालि-
१ कविराज हाराणचन्द्र जो ने—उत्पन्न (ऊपर को उठा), अवसन्न (नीचे को दबा), उन्मागी (ऊर्ध्वमुख), उत्संगी (कोटरवादी) यह अर्थ किया है।