भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० २१ ]

१२

सूत्रस्थानम्

८६

एवं सर्वाङ्गात्-व्याधि को, उत्पन्न करते हैं। इन दोषों का अत्यर्थ सन्निवेश होने पर रोग के जो पूर्वरूप—लक्षण उत्पन्न होते हैं, उन लक्षणों को प्रत्येक रोग में यथास्थान कहेंगे। पूर्वरूप (भावि रोग के प्रारम्भिक लक्षण) के लक्षण प्रकट होने पर—चतुर्थ क्रियाकाल है ॥३३॥

अत ऊर्ध्वं व्याधेर्वर्शनां बद्ध्यामः—शोफार्बुदप्रस्थिवि-द्वधिविसर्पप्रभृतीनां प्रत्यक्षलक्षणता ज्वरातीसारप्रभृतीनां च। तत्र पञ्चमः क्रियाकालः ॥३४॥

इसके आगे रोग के दर्शन (ज्ञान) को कहते हैं। यथा—शोफ (स्वचा-मांस में दोष का एकत्रित होना), अर्बुद, प्रस्थि, विद्वधि, विसर्प आदि एवं ज्वर (सन्ताप लक्षण), अतिसार आदि रोगों के लक्षणों का स्पष्ट हो जाना यह-पञ्चम-(पाँचवाँ) क्रियाकाल है। व्याधि की विरुद्ध चिकित्सा करने का पाँचवाँ काल है ॥३४॥

अत ऊर्ध्वमेतेषामवदोषीनां व्रणभावमापन्नानां षष्ठः क्रियाकालः, ज्वरातिसारप्रभृतीनां च दीर्घकालानुबन्धः। तत्रापतिक्रियमाणेऽसाध्यतामुपयान्ति ॥३५॥

इसके आगे शोफ आदि के पककर फूट जाने पर तथा ज्वर, अतिसार आदि के दीर्घकाल पर्यन्त अनुबन्ध (लगा रहना) रहने पर छठा क्रिया काल है। इस समय चिकित्सा न करने पर वे रोग असाध्य हो जाते हैं ॥३५॥

भवति चात्र—

संचयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थानसंश्रयम् ।

व्यक्ति भेदं च यो वेत्ति दोषाणां स भवेद्विषक् ॥३६॥

कहा भी है—

जो दोषों के संचयकाल को प्रकोपकाल को, प्रसरकाल को, स्थान-आश्रय को, व्यक्ति के भेदों (पूर्वरूप तथा रूप) को जानता है, वह वास्तव में वैद्य है ॥३६॥

संचयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गतीः ।

ते तूत्तरासु गतिषु भवन्ति बलवत्तराः ॥३७॥

संचयकाल में ही यदि दोषों का अपहरण कर दिया जाये, तो अगली गतियों को प्राप्त नहीं करते। उत्तरोत्तर स्थिति में पहुँचकर दोष अधिक—अधिक बलवान् होते जाते हैं। (अपहरण विधि—बहुदोष में शोधन, मध्यमदोष में—लङ्घन-पाचन, अल्पदोष में संशमन किया करनी चाहिये) ॥३७॥

१ तत्र लङ्घनमल्पबलदोषाणां लङ्घनेन ह्यनिमास्तवृद्ध्या वातातपरीतमिवाल्पमुदकमल्पो दोषः प्रदोषमापद्यते। लङ्घनपाचने तु मध्यमबलदोषाणाम् । बहुदोषाणां पुनर्दोषावसेचनमेव कार्यम्—नह्यभिन्ने केदारसेतो प्लवलाप्रसोकोऽस्ति तद्वद् दोषावसेचनम् ॥

चरक० वि० अ० ३।४४।

सर्वैर्भावेऽिभिर्वाऽपि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः ।

संसर्गे कुपितः कुद्वं दोषं दोषोऽनुधावति ॥३८॥

तीन से अधिक सब भावों से (वायु के लिये रुक्ष आदि, पित्त के लिये उष्णिमा आदि, कफ के लिये स्निग्धत्व आदि), या तीन भावों के अथवा दो के या एक ही भाव के संसर्ग होने पर कुपित हुआ दोष, कुद्व हुए दोष के साथ लग जाता है। अनुबन्ध और अनुबन्ध रूप में मिल जाते हैं। प्रथम कुद्व हुए दोष को अनुबन्ध कहते हैं, और जो दोष साथ में मिलता है उसको अनुबन्ध कहते हैं। प्रधान व्यक्त लक्षणोंवाला रोग अनुबन्ध, दूसरा गौण—असङ्घता लक्षणवाला अनुबन्ध है ॥

संसर्गे यो गरीयान् स्यादुपक्रम्यः स वै भवेत् ।

शेषदोषाविरोधेन सन्निपाते तथैव च ॥३९॥

दोषों के परस्पर संसर्ग में जो दोष बलवान् हो, उसी दोष की चिकित्सा सब से प्रथम करनी चाहिये। चिकित्सा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि शेष—दूसरे दोष के साथ इस चिकित्सा का विरोध न हो। यही विधि सन्निपात में (तीनों दोषों के मिलने पर) भी बरतनी चाहिये ॥

वृणोति यस्माद्दृढेऽपि व्रणवस्तु न नश्यति ।

आदेहधारणात्तस्माद् व्रण इत्युच्यते बुधैः ॥४०॥

व्रण शब्द की निरुक्ति—यह आच्छादन करता है (वृणोति) इसलिये व्रण है, भर जाने पर—अच्छा हो जाने पर भी व्रण का चिह्न नष्ट नहीं होता है, इसलिये व्रण कहते हैं। जब तक जीवन रहता है, तब तक व्रण (चिह्न) रहता है, इसलिये 'व्रण' कहा जाता है। (व्रण का लक्षण चिकित्सा में—'व्रण गात्रविचूर्णने' 'व्रणयतीति व्रणः' दिया है।) ॥४०॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणप्ररनाध्यायो

नामैकविंशोऽध्यायः ॥२१॥

—*:—

१ स्वतन्त्रो व्यक्ततिलगो यथोक्तसमुत्थानप्रशमो भवत्यनुबन्धः। तद्विपरीतलक्षणस्त्वनुबन्धः। अनुबन्ध्यात्तुल्यसमन्वित्तास्तत्र यदि दोषा भवन्ति तत् त्रिकं सन्निपातमाच्छत्ते, द्रव्यं वा संसर्गम्। अनुबन्ध्यानुबन्धविशेष-कृतस्तु बहुविधो दोषभेदः ॥

चरक० वि० अ० ६।११

२ श्रोघाणकर जी ने इसमें प्रधान और अप्रधान दोष का निर्णय माना है। उनका कहना है कि जब कुपित दोषों का संसर्ग होता है, तब तीन, दो या एक भाव से कुपित हुआ दोष सर्वभाव से कुपित हुए दोष में लीन हो जाता है, इस नियम के अपवाद भी हैं। यथा—अतिसार में 'त्रयाणां वा जयेत्पूर्वं यो भवेत् बलावत्तमः' कहा है, परन्तु ज्वर में 'कफस्यात्तानुपूर्व्यां वा सन्निपातज्वरं जयेत्।' इसी से अष्टांगसंग्रह में 'इतु सब मर्तों का संग्रह किया है। देखिये संग्रह सूत्र अ० २१।