भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

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प्रकार उपर्युक्त कारणों से कुपित हुए दोषों का प्रसर होता है। अचेतन होने पर भी वायु ही इन सब में गति का कारण है, क्योंकि वायु में ही गति है। क्योंकि वायु ही रजोबहुल है, और रज ही सब पदार्थों का प्रवर्तक है। यथा—जिस प्रकार बहुत अधिक संचित हुआ पानी बन्ध को तोड़कर दूसरे पानी के साथ मिलकर चारों ओर दौड़ने लगता है, उसी प्रकार दोष कुपित होने पर एक दोष से, कभी दोषों से, कभी तीनों दोषों से और कभी रक्त से मिलकर अनेक रूप में फैलते हैं। यथा—वात, पित्त, श्लेष्मा, रक्त, वात-पित्त, वात-श्लेष्मा, पित्त-श्लेष्मा; वात-रक्त, पित्त-रक्त, कफ-रक्त, वात-पित्त-रक्त, वात-कफ-रक्त, पित्त-कफ-रक्त, वात-पित्त-कफ, वात-पित्त-कफ-रक्त, इस प्रकार से पन्द्रह रूप में शरीर में फैलते हैं। यह दोषों का प्रसर है ॥२८॥

कृत्स्नेऽर्धऽवयवे वाऽपि यत्राङ्गे कुपितो भ्रमम् । दोषो विकारं नभसि मेघवत्तत्र वर्षति ॥ २९ ॥ नात्यर्थं कुपितश्चापि लीनो भागेषु तिष्ठति । निऽप्रत्यनीकः कालेन हेतुमासाद्य कुप्यति ॥३०॥

शिर-वाहू-जङ्घा—आदि सम्पूर्ण या आधे अथवा एक भाग (चिबुक-पांव आदि अङ्ग) में बहुत अधिक प्रकुपित हुआ दोष उसी स्थान में विकार उत्पन्न करता है, जिस प्रकार आकाश में एक भाग में स्थित बादल उसी जगह वर्षा करता है; सब जगह नहीं करता। इसी प्रकार दोष जहाँ पर कुपित होते हैं, वही रोग पैदा करते हैं। बहुत अधिक संचित होने पर भी—प्रकोप कारणों के अल्प होने के कारण दोष सहसा विकार को उत्पन्न न करके मार्ग में छिपकर बैठ जाता है। यदि दोष की चिकित्सा न की जाये तो समयवश कारण (प्रकोपकारणों) को पाकर फिर कुपित हो जाता है। (यदा होते त्रयो निदानादिविधोषाः परस्परं नानुबन्धन्ति अथवा कालप्रकर्षाद् अवलीयांसोऽनुबन्धन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्तिः। चिराद् वाऽप्यभिनिर्वर्तन्ते, तनवो वा भवन्ति। चरकः) ॥ २९ ३० ॥

तत्र वायोः पित्तस्थानगतस्य पित्तवत् प्रतीकारः, पित्तस्य च कफस्थानगतस्य कफवत्, कफस्य च वातस्थानगतस्य वातवत्, एष क्रियाविभागः ॥३१॥

पित्तस्थान में पहुँची वायु की पित्त के समान चिकित्सा है, और कफस्थान में पित्त के पहुँचने पर कफ के समान; और वातस्थान में पहुँचे कफ की—वायु के समान चिकित्सा है। यह चिकित्सा कार्य का विभाग है ॥ ३१ ॥

एवं प्रकुपितानां प्रसरतां वायोर्विमार्यगमनस्योपौ, ओषचोषपरिदाहयुमायनानि पित्तस्य अरोचकाविपाकाङ्गसादरुर्ध्वदिश्चेति श्लेष्मणो लिङ्गानि भवन्ति, तत्र तृतीयः क्रियाकालः ॥३२॥

इस प्रकार से प्रकुपित एवं प्रसरित वायु अपने स्वाभाविक मार्ग से अन्य मार्ग में जाने लगती है और दर्द के साथ पेट में विक्षोभ करती है। पित्त-ओष (उष्णमा), चोष (एक प्रदेश में दाह), सर्वत्र जलन, धूम-मिश्रित उद्गार करता है। कफ-अरुचि, अविपाक, अङ्गों में शिथिलता, वमन—ये लक्षण उत्पन्न करता है। यह तीसरा काल है ॥ ३२ ॥

अत ऊर्ध्वं स्थानसंश्रयं वदयामः। एवं प्रकुपिताः तांस्तान् शरीरप्रदेशानाम्गम्य तांस्तान् व्याधीन् जनयन्ति। ते यदोदरसन्निवेशं कुर्वन्ति तदा गुल्मविद्रध्युदराभिसङ्घा-नाहविस्फुचकातिसारप्रभृतीञ्जनयन्ति, बस्तिगताः प्रमेहा-इमरीमूत्राघातमूत्रदोषप्रभृतीन्, मेढ्रगता निरुद्धप्रकणोपदं-शशूकदोषप्रभृतीन्, गुदगता भगन्दराशःप्रभृतीन्, वृषण-गता वृद्धाः, ऊर्ध्वजन्त्रगतास्तूर्ध्वजान्, त्वञ्मांसजोणितस्थाः जुद्ररोगान्कुष्ठानि विसर्पाश्च, मेहोगता ग्रन्थयपच्यवृंदगल-गण्डालजीप्रभृतीन्, अस्थिगता विद्रध्यनुशयप्रभृतीन्, पादगता श्लोपदवातशोणितवातकण्टकप्रभृतीन्, सर्वाङ्ग-गता उवरसर्वाङ्गरोगप्रभृतीन्, तेषामेवमभिसन्निविष्टानां पूर्वस्प्रपादुर्भावः, तं प्रतिरोगं वदयामः। तत्रपूर्वरूपगतेषु चतुर्थः क्रियाकालः ॥ ३३ ॥

फैलते हुए दोषों का जहाँ संग होता है, वह कहते हैं—उपर्युक्त कारणों से कुपित दोष शरीर के उस उस प्रदेश में पहुँच वहाँ उन उन रोगों को करते हैं—वे दोष जब उदर में स्थान बनाते हैं तब गुल्म, विद्रधि, उदर, अग्निमान्द्य, आनाह विस्फुचिका आदि रोगों को उत्पन्न करते हैं। बस्ति में आश्रय बनाकर—प्रमेह, अश्मरी, मूत्राघात और मूत्रदोष आदि को, वृषण में पहुँचकर—वृद्धि रोग को, मेढ्र में पहुँचकर—निरुद्ध-प्रकण्ड, उपदंश, शूकरोग आदि को उत्पन्न करते हैं। गुदा में पहुँचकर भगन्दर, अर्श आदि को, जन्त्र के ऊपर (वक्ष-अंस-सन्धिजन्त्र) पहुँचकर जन्त्र के ऊपर के रोगों को, त्वचा-मांस एवं रक्त का आश्रय करके क्षुद्र रोगों को, कुष्ठ एवं विसर्प रोग को, मेढ्र का आश्रय लेकर—प्रन्थि, अपची, अर्बुद, गलगण्ड, अलजी आदि रोगों को, अस्थि का आश्रय लेकर—विद्रधि आदि को पाद का आश्रय लेकर—श्लोपद, वातरक्त, वातकण्टक आदि रोगों को, सम्पूर्ण अङ्गों का आश्रय लेकर—ज्वर

१ प्रकोपश्रीर प्रसरमे भेद—जमे हुए घी को आग पर गरम करने पर घी का हिलना मात्र दोषों का प्रकोप है। शरीर यदि घी अधिक गरम करने पर झग आकर बाहर गिरने लगता है, इसका नाम प्रसर है। इसी प्रकार कड़ाही में दूध को गरम करना है। कड़ाही में दूध उबलता रहे यह प्रकोप, उफनकर बाहर आये यह प्रसर है।