सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २१ ]
सूत्रस्थानम्
८७
वायु शीतकाल में, बादलों के आनेपर जोर की वायु चलने पर, वर्षा काल में—विशेषकर, कुपित होती है। उषाकाल में, अपराह्ण (तीसरे पहर में) और अन्न के जीर्ण होने पर वायु कुपित होती है ॥ २० ॥
क्रोधगोकभयायासोपवासविदग्धमैथुनोपगमनकट्क्मल्लवणतीक्ष्णलघुविदाहितिल्लैलपिण्याककुलस्थसर्पपातसिहरितकशकागोधामरस्याजाविकमांसदधितककृचि-कामस्तुसौवीरकसुराविकाराम्लफलकट्क्मप्रभृतिभिः पित्तप्रकोपमापद्यते ॥ २१ ॥
निम्न कारणों से पित्त प्रकुपित होता है —क्रोध, शोक, भय, परिश्रम, उपवास, आहारादिजन्य विदाह, मैथुन, कटु-अम्ल-लवण-तीक्ष्ण-उष्ण लघु विदाही (खट्टे डकार आये, दाह-प्यास लगे और जो कठिनाई से जीर्ण हो—पदार्थ विदाही), तिलका तेल, पिण्याक, कुलस्थी, सरसों, अलसी, हरितशाक, गोधा मछली, बकरी-भेड़ का मांस, स्नेह युक्त दधि, तक, कूर्चिका (विप्रथित-फटी छाछ), मस्तु, सौवीरक (कांजी), सुरा विकार (सब मद्य), अम्ल फल (आमातक कमरख आदि), कट्क्म (स्नेह रहित दधि), चुक आदि से पित्त प्रकुपित होता है ॥ २१ ॥
तदुष्णैरुष्णकाले च घनान्ते च विशेषतः ।
मध्याह्ने चार्धरात्रे च जीर्णैत्यन्ने च कुप्यति ॥ २२ ॥
उष्ण द्रव्यों के सेवन से, ग्रीष्मऋतु में, शरदऋतु में, मध्याह्न में, आधी रात में तथा भोजन के पचने के समय पित्त प्रकुपित होता है ॥ २२ ॥
दिवारस्वप्नाऽव्यायामालस्यमधुराम्ललवणशीतस्निग्धगुरुपिच्छिळाभिष्यनिदहायनकयवकनैषवैकटमाषमहामाषगोधूमतिल-पिष्ट-विकृतिदधितुधुकृशरापायसेलुविकारानूपौदकमांसवसाविसमुणालकसेरुकशृङ्गाटकमधुरवल्ली-फलसमगनाध्यशनप्रभृतिभिः श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते ॥ २३ ॥
निम्न कारणों से कफ कुपित होता है । यथा—दिन में सोने से, व्यायाम न करने से, आलस्य, मधुर-अम्ल-लवण-शीत स्निग्ध-गुरु-पिच्छिल, अभिष्यनिद भोजनों से, हायनक (धान्य विशेष) यवक (शूकधान्य विशेष), नैषध, इत्कट (धान्य विशेष), माष, राजमाष, गेहूँ, तिल-पिष्ट (तिलकुट), पिष्ट-विकृति, दही, दूध, कुरारा (तिल तण्डुल-माष से बनी यवामू), खीर, गन्ने से बने पदार्थ, आनूप-मांस-वसा, औदक प्राणियों का मांस-वसा, विस (मिस), मुणाल (पद्ममूल), कसेरु, सिंघाड़ा, मधुरफल (ताड़ नारियल आदि), बल्लीफल (अलाबु आदि), समशन (हित-अहित वस्तुओं का खाना), अध्यशन (अजीर्ण में भोजन करना), इनसे कफ प्रकुपित होता है ॥ २३ ॥
स शीतैः शीतकाले च वसन्ते च विशेषतः ।
पूर्वाह्ने च प्रदोषे च सुक्तात्रे प्रकुप्यति ॥ २४ ॥
शीतल द्रव्यों से, शीतकाल और वसन्त में, पूर्वाह्न में, और रात्रि के प्रथम पहर में तथा भोजन करते ही कफ कुपित होता है ॥ २४ ॥
पित्तप्रकोपणैरेव चाभीदृणं द्रवस्तिग्धगुरुभिराहारैर्दिवास्वप्नक्रोधानलातपश्रमाभिघाताजीर्णविरुद्धाध्यशनादि-भिर्विशेषैरस्तु प्रकोपमापद्यते ॥ २५ ॥
निम्न कारणों से रक्त कुपित होता है। पित्त प्रकोप के कारणों से एवं बार-बार द्रव, स्निग्ध, गुरु भोजनों के सेवन से, दिन में सोने से, क्रोध, आग, धूप, श्रम, चोट के लगने से, विरुद्ध भोजन, अध्यशन आदि कारणों से रक्त कुपित होता है ॥ २५ ॥
यस्माद्भक्तं विना दोषैर्न कदाचित् प्रकुप्यति ।
तस्मात्तस्य यथादोषं कालं विद्यात् प्रकोपणे ॥ २६ ॥
रक्त विना दोषों के—स्वतन्त्र रूप में कभी प्रकुपित नहीं होता। रक्त के प्रकोप में दोष के अनुसार समय समझना चाहिये। (वात से दूषित रक्त—वातप्रकोपकाल में कुपित होता है, पित्त के दूषित रक्त—पित्त प्रकोपकाल में, कफ से दूषित रक्त कफप्रकोपकाल में कुपित होता है) ॥ २६ ॥
तेषां प्रकोपात् कोष्ठतोदसंचरणाम्लिकापिपासापरिदाहाश्लेष्मद्वयोत्कलैदाश्च जायन्ते । तत्र द्वितीयः क्रियाकालः ॥ २७ ॥
इन दोषों के प्रकोप से कोष्ठ में पीड़ा, संचरण (परिभ्रमण-वायु के लक्षण), अम्लिका (अम्लोद्गार), पिपासा, परिदाह (जलन—पित्त के लक्षण), अन्न में विद्रेष, हृदयोत्कलैद (हृदलास—कफ के लक्षण) उत्पन्न होते हैं। यह दूसरा क्रियाकाल है ॥ २७ ॥
अत ऊर्ध्वं प्रसरं वदयामः—तेषामेभिरातङ्गविशेषैः प्रकुपितानां किण्वोदकपिष्टसमवाय इवोद्भितानां प्रसरो भवति। तेषां वायुर्गीतमस्त्वात् प्रसरणहेतुः सत्यप्यचैतन्ये। स हि रजोभूषिष्ठः, रजश्च प्रवर्तकं सर्वभावानाम्। यथा—महातुदकसंचयोऽतिबुद्धः सेतुमवदार्थापरेणोदकेन व्यामिश्रः सर्वतः प्रधावति, एवं दोषाः कदाचिदेकशो द्विशः समस्ताः शोणितसहिता वाऽनेकधा प्रसरन्ति। तद्यथा—वातः, पित्तः, श्लेष्मा, शोणितं, वातपित्ते, वातरुलेष्माणौ, पित्तश्लेष्माणौ, वातशोणिते, पित्तशोणिते, श्लेष्मशोणिते, वातपित्तशोणितानि, वातरुलेष्मशोणितानि, पित्तश्लेष्मशोणितानि, वातपित्तकफाः, वातपित्तकफशोणितानीति, एवं पञ्चदशाधा प्रसरन्ति ॥ २८ ॥
इसके आगे दोषों का प्रसार कहते हैं —
जिस प्रकार किण्व (सुराबीज), पिष्ट (तण्डुलपिष्ट) और पानी के मिश्रण में एक रात रखने पर—उफान आता है उही