सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
द्वे
वर्तते, शिरःस्थः स्नेहसंतर्पणाधिकृतत्वाद्विन्द्रियाणामात्म- वीर्यणानुग्रहं करोति, सन्धिस्थः श्लेष्मा सर्वसन्धिंसंरले- षात् सर्वसन्ध्यनुग्रहं करोति ॥१४॥
पानी ( कफ ) के गुण—आहार के मधुर, पिच्छल, किल्ल होने से, मधुर-शीतल कफ आमाशय में उत्पन्न होता है । आमाशय में स्थित यह कफ शेष श्लेष्मास्थानों में स्थित श्लेष्मा का तथा क्लेदन-पूर्ण आदि उदक के कार्यों से बारीर का उपकार करता है । उर में स्थित कफ अपने प्रभाव से त्रिक ( पृष्ठवंश का अधोभाग ) का सन्धारण करता है । अन्न रस के साथ मिलकर हृदय का अवलम्बन करता है—( ओज ) । जिह्वामूल और कण्ठ प्रदेश में स्थित कफ—रसेन्द्रिय के सौम्य होने से रस ज्ञान में भली प्रकार कारण बनता है । शिर में स्थित कफ स्नेहन और संतर्पण रूपी कार्य करने से—अपने प्रभाव द्वारा इन्द्रियों का उपकार करता है । सन्धियों में स्थित कफ सब सन्धियों का जोड़ने से सब सन्धियों का उपकार करता है ।
वि० मन्तव्य—“साधुव्यर्त्ति...शीतलः” का अर्थ—आमा- शय में गया हुआ आहार—मीठा हो जाने से, पिच्छल हो जाने से तथा आर्द्रता कारक हो जाने से आमाशयिक रस कफ ही हो सकता है, क्योंकि वह मधुर एवं शीतल है । यदि भोजन करते ही छँदि होती है और वह मीठी एवं पिच्छल ( चिपचिपी ) होती है तो समझा जाता है कि छँदि का वेग केवल आमाशय से ही हुआ है । उसमें पित्त का मिश्रण नहीं हुआ है और आहार गत, कफवर्द्धक उपादान कफ की वृद्धि करते हैं, अतः जितना कफ आहार को आर्द्र करने में व्यय होता है उसकी क्षतिपूर्ति भी साथ-साथ हो जाती है ॥१३,१४॥
भवति चात्र—
श्लेष्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छलः शीत एवं च ।
मधुरस्त्वविदग्धः स्याद्विदग्धो लवणः स्मृतः ॥१५॥
कहा भी है—
श्लेष्मा—कफ श्वेत, गुरु, स्निग्ध, पिच्छल, शीत, मृदु, स्थिर और अपवव अवस्था में मधुररस है । विदग्धपक्वश्लेष्मा लवण रस है ( अथवा प्रकृतिस्थ कफ मधुर रस है और विदग्ध- तिस्थ कफ लवण रस है ) ॥१५॥
शोणितस्थ स्थान यकृतत्लीहानौ, तच्छ प्रागभिहितं, तत्रस्थमेव शेषाणां शोणितस्थानानामनुग्रहं करोति ॥१६॥
रक्त के स्थान यकृत और प्लीहा हैं, यह पहिले कह चुके हैं । अपने इन स्थानों में रहकर ही रक्त अन्य रक्त स्थान में स्थित रक्त का उपकार करता है ॥१६॥
भवति चात्र—
अनुष्णशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तं च वर्णतः ।
शोणितं गुरुं विरक्तं स्याद्विदाहश्यास्य पित्तवत् ॥१७॥
कहा भी है—
रक्त, अनुष्ण शीत ( साधारण ), मधुर, स्निग्ध, रक्त में लाल, गुरु, विरक्त ( आमगन्धि ) है । पित्त के समान इसका विदाह है । जिस प्रकार और जिन वस्तुओं से पित्त विदग्ध होता है, उसी प्रकार और उन्हीं वस्तुओं से रक्त भी विदग्ध होता है ॥१७॥
एतानि खलु दोषस्थानानि, एषु संचीयन्ते दोषाः । प्राक् संचयहेतुरक्तः । तत्र संचितानां खलु दोषाणां स्तब्धपूर्णकोष्ठता पीतावभासता मन्दोष्मता चाङ्गानां गौरवमालस्यं चयकारणविद्वेषश्चेति लिङ्गानि भवन्ति । तत्र प्रथमः क्रियाकालः ॥१८॥
इन उपयुक्त स्थानों में वात आदि दोषों का सञ्चय होता है । दोषों के सञ्चय के कारण ऋतुचर्या-अध्याय में पहिले कह दिये हैं । इन संचित दोषों में—कोष्ठ का स्तब्ध ( जड़ ) होना और पूर्ण ( आध्मन ) होना—वायु का, पीलापन दिखाई देना ( नेत्र-त्वचा-मल में )—पित्त का, उष्णमा का कम होना, और अङ्गों में भारीपन एवं आलस्य का होना कफ का लक्षण है । एवं संचय के कारणों में द्वेष होना—तीनों दोषों का लक्षण है । यह वातादि दोषों के लिये प्रथम कार्य का समय है ॥१८॥
अत ऊर्ध्व प्रकोपणानि वक्ष्यामः । तत्र बलवद्विप्रहा- तिव्यायामव्यायाध्ययनप्रपतनप्रधावनप्रपीडनाभिवातल- ङ्गनप्लवनप्रतरणरात्रिजागरणभारहरणजतुरगरथपदाति- चर्याकटुकषायतिकृत्कृत्स्नलघुशीतवीर्यशुष्ककाकवत्स्वर- कोहालककोरदूषयामाकनावारसुदृगमसूराढकीहरेणुकला- यनिष्पावानशनविषमाशनाध्यशनवातमूत्रपुरीषशुक्लच्छि- क्ष्वथूद्वीगरवाप्पवेगविधातादिभिर्विशेषवायुः प्रकोपमाप- द्यते ॥१९॥
इसके आगे दोषों के प्रकोपक कारणों को कहते हैं । यथा—बलवान् मल्लों के साथ मल्लयुद्ध करना, अतिव्यायाम, अति स्त्री-सेवन, अति अध्ययन, गिरना, दोड़ना, बहुत दबाना, चोट लगाना, लड्डूघन, कूदना, नदी में तैरना, रात में जागना, भार का उठाना, हाथों-पैरों-रथ पर सवारी या पैदल बहुत चलना ( सवारी करना ), कटुकषाय-तिकृत्, लूध, लघु, शीतवीर्य भोजनों का खाना, शुष्क मांस, बरक (कुधान्य-बरटिका), उद्हालक (जङ्गली कांदों), कोरदूष-श्यामाक (सांवक), नीवार (प्रसाधिका), मूङ्ग, मसूर, अरहर, हरेणु (मटर), कलाय, निष्पाव (राजशिम्बो), इनका खाना, उपवास, विषमाशन, अध्यशन (खाने पर खाना), वायु-मूत्र-मल-शुक्ल-छि-छीक- उद्वीगर-आसू के उपस्थित वेगों को रोकने (काम-भय आदि) से वायु कुपित होती है ॥१९॥
स शीताध्रप्रवातेषु घर्मान्ते च विशेषतः ।
प्रत्युपस्यपरान्ते च जीण्डन्ने च प्रकृप्यति ॥२०॥