सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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गुणवाले-अग्नि के समान उष्ण द्रव्यों का उपयोग होता है। पित्त के अधिक बढ़ने पर शीतक्रिया का उपयोग होता है। आगम समस्त आयुर्वेद शास्त्र से भी ज्ञात है कि-पित्त से अतिरिक्त और कोई अग्नि इस शरीर में नहीं मिलती ॥६॥
तच्छादृष्टहेतुकेन विशेषेण पक्वामाशयमध्यस्थं पित्तं चतुर्विधमन्तपानं पचति, विवेचयति च दोषरसमूत्रपुरीषाणि, तत्रस्थमेव चात्मशक्त्या शेषाणां पित्तस्थानानां शरीरस्थ चाग्निकर्माण्मुत्रमृहं करोति, तस्मिन् पित्ते पाचकोऽग्निरिति संज्ञा, यत्तु यकृतप्लोहोः पित्तं तस्मिन् रञ्जकोऽग्निरिति संज्ञा, स च रसस्य रागकृदुक्तः यत् पित्तं हृदयस्थं तस्मिन् साधकोऽग्निरिति संज्ञा, सोऽभिप्रायितमनोरथसाधनकृदुक्तः, यद् दृष्ट्या पित्तं तस्मिन्नालोचकोऽग्निरिति संज्ञा, स रूपग्रहणाधिकृतः, यत्तु त्वच्चि पित्तं तस्मिन् भ्राजकोऽग्निरिति संज्ञा, सोऽभ्यङ्गपरिषेकावगाहालेपनादीनां क्रियाद्रव्याणां पक्ता छायाणां च प्रकाशकः ॥१०॥
प्राक्तन कर्मों के कारण पक्वाशय और आमाशय के मध्य भाग में स्थित पित्त-चार प्रकार के अन्न ( मत्स्य, लेहा, चोष्ण, पेय ) को पंचाता है। उसमें से दोष, रस, मूत्र और मल को पृथक् करता है। पक्वाशय और आमाशय के मध्य में स्थित रहकर ही अपनी शक्ति से शेष पित्तस्थ पित्तों का और अग्नि ( उष्णिमा ) कर्म से शरीर का उपकार करता है, इसी पित्त को 'पाचक अग्नि' कहते हैं। और जो पित्त यकृत एवं प्लीहा में है, उसको 'रञ्जक अग्नि' कहते हैं। क्योंकि यह रस में राग ( रञ्ज ) उत्पन्न करता है। और जो पित्त हृदय में स्थित है, उसको 'साधक अग्नि' कहते हैं, क्योंकि यह अभिप्रायित-मनोरथों ( धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूपी पुरुषार्थ ) को सिद्ध करता है। जो पित्त दृष्टि में है उसको 'आलोचक अग्नि' कहते हैं, क्योंकि इसके द्वारा ही रूप का ग्रहण होता है। और जो पित्त त्वचा में है उसको 'भ्राजक अग्नि' कहते हैं। यही अभ्यङ्ग, परिषेक, अवगाहन, अवलेपन आदि क्रिया द्रव्यों का पाक करती है ( शरीर में विलेपन करती है ) और छाया एवं प्रभा को प्रकाशित करती है।
वि० मन्तव्य—साधक अग्नि-पित्त—हृदि तिष्ठति यत् शुद्धं रक्तं ईषत् सपीतकम्। ओजः शरीरे संख्यातं तन्नाशाद् ना विनश्यति ॥ च० सू० अ० ७, श्लो० ७४। अर्थात् हृदय में जो शुद्ध—स्वच्छ कुष्ठ लाल एवं कुष्ठ पीला ( लाल पीला सा )
१ जिस प्रकार कि एक ही देवदत्त अपने कार्यभेद से अनेक नामोंवाला (रसोईया, फोटोग्राफर, अध्यापक, बड़ई) बन जाता है, उसी प्रकार एक ही दोष अपने कार्य एवं स्थानभेद से पाँच प्रकार का हो जाता है।
पदार्थ रहता है वह "ओजस्" है, यही साधक पित्त है। 'साधयति अभिप्रायितमनोरथान् इति साधकम्।' ओजस्वी मानव ही कार्य साधन में समर्थ होता है ॥१०॥
पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीलं पीतं तथैव च ।
उष्णं कटुरसं चैव विदग्धं चाम्लमेव च ॥११॥
पित्त के लक्षण—पित्त-तीक्ष्णगुण ( राई मिर्च के समान ), द्रव, पूति ( सड़ी गन्धवाला ), नील ( सामान्यता में ), पीत ( निरामाक्ष्यता में ), उष्ण, कटुरस ( प्रकृतिस्थ रूप में ), और विदग्धत्वस्थता में अम्ल है ॥११॥
अत ऊर्ध्वं श्लेष्मस्थानान्यनुत्तुष्यास्व्यासामः। तत्र, आमाशयः पित्ताशयस्योपरिष्टात् तत्प्रत्यनीकत्वादूर्ध्वगति-त्वात्तेजसः, चन्द्र इव आदित्यस्य, चतुर्विधस्याहारास्याधारः, स च तत्रोदकैर्गुणैराहारः प्रकिलन्नो भिन्नसंघातः सुखजरो भवति ॥१२॥
इसके आगे कफ के स्थानों को कहते हैं—आमाशय पित्ताशय के ऊपर स्थित है। क्योंकि कफ का स्वभाव पित्त के विरुद्ध है एवं पित्त अग्नि गुण होने से ऊर्ध्वगामी है, पानी अधोगामी होने से अग्नि को शान्त करता है, इसलिये आमाशय पित्ताशय के ऊपर स्थित है, जिस प्रकार कि चन्द्रमा सूर्यमण्डल से ऊपर स्थित है। यह आमाशय चारों प्रकार के आहार का आधार है और यह चार प्रकार का आहार पानी के द्रवस्नेह आदि गुणों के कारण आर्द्र बनकर टुकड़े टुकड़े होकर सुगमता से पचने योग्य हो जाता है।
वि० मन्तव्य—आधुनिक-आमाशयिक रसों को भी पाचक रस कहते हैं, परन्तु आयुर्वेद—उनको क्लेदक कफ मानता है। दोनों कथनों में सम्यक् क्या है पाठक विचार करें। सुख की लाली भी क्लेदक कफ ही है, देखिये सू० ३ पाचक रस पेटिकरस को ही कहना चाहिये ॥१२॥
माधुर्यात् पिच्छलत्वाच्च प्रकलेदित्वात्तथैव च ।
आमाशये संभवति श्लेष्मा मधुरशीतलः ॥१३॥
स तत्रस्थ एव स्वशक्त्या शेषाणां श्लेष्मस्थानानां शरीरस्थ चोदककर्माण्मुत्रमृहं करोति, उरःस्थठिकसन्धारणमात्सवीर्यणान्नरससहितेन हृदयावलम्बनं करोति, जिह्वामूलकण्ठस्थो जिह्वेन्द्रियस्य सौम्यत्वात् सम्यग्रसज्ञाने
१ विष्णुपुराण में कहा है कि—चन्द्रमण्डल सूर्यमण्डल से ऊपर है। यथा—
"भूमयोर्जनलक्षे तु सोरं मैत्रेयमण्डलम् ।
लक्षाद्विवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्थितम् ॥"
वरक में भी इसको स्पष्ट किया है। यथा—
"एवं रसमलामाक्षमाशयस्यमध्यस्थितः ।
पचत्यग्निर्नयथा स्थाल्यामोदनायाम्बुतण्डुलम् ॥"