भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० २१ ]

तत्र 'वा' गतिगन्धनयोः, इति धातुः, 'तप' संतापे, 'शिल्प' आलिङ्गने, एतेषां कृद्धिहितैः प्रत्ययैर्वातः पित्तं श्लेष्मेति च रूपाणि भवन्ति ॥५॥

निरुक्ति—वात शब्द 'वा गतिगन्धनयोः' इस धातु से 'त' औणादिक प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इसलिये वात का अर्थ गति से है, यह गति चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो। पित्तशब्द—'तप संतापे' इस धातु से त के स्थान में इत् प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इसलिये शरीर में जो भी उष्णिमा है। वह सब पित्त है। श्लेष्मा शब्द—'शिल्प-आलिङ्गने' इस धातु के साथ मनिन् प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इसलिये संश्लेषण रूपी कार्य कफ का है। चरक में कहा भी है—सर्वा हि चेष्टा वातेन, पित्तादेवोष्मणः पक्तिर्नरणा मुपजायते।'

वि० मन्तव्य—वात, पित्त एवं कफ की महिमा का वर्णन च० सू० अ० १२ में देखिये—वायु गति करता रहता है, फलतः शरीर में गति होती रहती है अर्थात् शरीर में जितनी या जितने प्रकार की गतियाँ होती हैं उन सबका कारण वायु है। पित्त—शरीर के सन्ताप, ऊष्मा-गर्मी का हेतु पित्त है, पित्त का नाम "मायु" भी है जो "डु मिञ् प्रक्षेपणे" धातु (स्वादि गणीय) से बनता है। इसका अर्थ है 'मिनोति देहे ऊष्माण' अर्थात् जो देह में ऊष्मा को फेंकता-फैलाता है—व्याप्त करता है। कफ—कं जलम्, केन जलेन फणति-निष्पद्यते इति कफः—जो जल से उत्पन्न होता है, बढ़ता है। यह श्लेष्मा का पर्याय है। संश्लेषण—सटाना, जोड़ना, चिपकाना, चिपकना आदि कार्य कफ का है। कफ का दूसरा अर्थ है—के शिरसि फणति इति कफः, कं शिरः। शोणित—यह शब्द "शोणु-वर्णगत्योः" धातु से निष्पन्न होता है। जो रंग गया—रस को रंगकर रक्त बनाया गया है और गति करता रहता है उसका नाम शोणित है ॥५॥

दोषस्थानान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः—तत्र समोसेन वातः श्रोणिगुदसंश्रयः, तदुपर्यधो नामेः पक्षाशयः, पक्वामाशय-स्यं पित्तस्य, आमाशयः श्लेष्मणः ॥६॥

इसके आगे दोषों के स्थानों को कहते हैं। इनमें संक्षेप से वायु का स्थान—श्रोणि (कटि) और गुदा है। श्रोणि और गुदा के ऊपर और नामि के नीचे पक्वाशय का स्थान है। पित्त का स्थान-पक्वाशय का और आमाशय के बीच में चित्त का स्थान है। कफ का स्थान—आमाशय है। (चरक में यह विषय—सुस्थान अध्याय २०।८ में दिया है)।

वि० मन्तव्य—पक्वामाशयमध्यं—पक्व—सर्वथा परि-पक्व अर्थात् द्रव मल—केवल मूत्र-पूरीषमय मल का आशय

(मलाशय) कहलाता है और आम—सर्वथा आम अपक्व (भोजन-आहार सुक्त द्रव्य) का आशय आमाशय कहलाता है। उक्त दोनों का मध्य—मध्यवर्ती अवयव "पक्वाऽऽमाशय" कहलाता है, जिसे लुद्गान्न (पतला अन्न—अन्तर्द्वी) कहते हैं। पाचक पित्त का कर्मक्षेत्र यही है और पाचक पित्त ही प्रधान पित्त है, वही सब पित्तों को बल देता है ॥६॥

अतः परं पञ्चधा विभज्यन्ते। तत्र वातस्य वातव्याधौ वक्ष्यामः; पित्तस्य यकृत्प्लोहानो हृदयं दृष्टिस्त्वक् पूर्वोक्तं च; श्लेष्मण उरः शिरः कण्ठो जिह्वामूलं सन्धय इति पूर्वोक्तं च; एतानि खलु दोषाणां स्थानान्यव्यापन्तानाम् ॥

इसके आगे इनको पाँच भागों में विभक्त किया जाता है। यथा—वात का पाँच प्रकार से विभाग वातव्याधि में कहेंगे। पित्त का—यकृत, प्लीहा, हृदय, दृष्टि—(कृष्ण तारका के अन्दर रहनेवाली मसूर दल मात्रा), त्वचा एवं पूर्वोक्त स्थान पित्त का है। कफ का स्थान उर, शिर, कण्ठ, जिह्वामूल, सन्धियाँ और पूर्वोक्त आमाशय हैं। ये प्रकृतिस्थ दोषों के स्थान हैं।

वि० मन्तव्य—दृष्टि—समस्त नेत्र अथवा विशेषतः आधुनिकों का "पीतबिन्दु"। देखिये 'हमारे शरीर की रचना' नेत्रप्रकरण ॥७॥

भवति चान्न—

विसर्गोदानविक्षेपैः सोमसूर्यान्तिला यथा।

धारयन्ति जगदेहं कफपित्तान्तिलास्तथा ॥८॥

जिस प्रकार चन्द्रमा, सूर्य और वायु ये तीनों विसर्ग, आदान एवं विक्षेप इन कार्यों से जगत् का धारण करते हैं, उसी प्रकार कफ, पित्त वायु अपने कार्यों से इस शरीर का धारण करते हैं ॥८॥

तत्र जिह्वास्थं किं पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निः? आहोस्वित् पित्तमेवाग्निरिति? अत्रोच्यते—न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरपलभ्यते, आग्नेयस्वात् पित्ते दहनपचनादिष्वभिप्रवर्तमानेऽग्निस्वदुपचारः क्रियतेऽन्तराग्निरिति; क्षीण ह्यग्निगुणे तत्समानद्रव्योपयोगात्, अतिवृद्धे जीतक्रियोपयोगात्, आगमाच्च पश्यामो न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरिति ॥९॥

यहाँ पर सन्देह है कि—क्या पित्त से अतिरिक्त और कोई अग्नि इस शरीर में है—या नहीं अथवा पित्त ही अग्नि है। इसका उत्तर यह है कि—पित्त से अतिरिक्त और कोई अग्नि इस शरीर में नहीं मिलती। क्योंकि—आग्नेय होने से तथा पित्त के दहन (जलाना), पचना (पकाना), आदि (रञ्जन-दर्शन) कार्य होने से पित्त में अग्नि के समान व्यवहार होता है। पित्त ही अन्तराग्नि है। पित्त के क्षीण होने पर अग्नि