सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २१ ]
सूत्रस्थानम्
८३
वातल्लानां प्रशस्तश्च श्रान्तानां कफशोषणाम् ।
तेषामेव विशेषेण व्रणकलेदविवर्धनः ॥२५॥
मधुरश्चाविदाही च कषायानुरसो लघुः ।
दक्षिणो मारुतः श्रेष्ठश्चलुण्यो बलवर्धनः ॥२६॥
रक्तपित्तप्रजामनो न च वातप्रकोपणः ।
विगदो रूक्षपुरुषः खरः स्नेहबलापहः ॥२७॥
पश्चिमो मारुतस्तीक्ष्णः कफमेदोविशेषणः ।
सद्यः प्राणक्षयकरः शोषणस्तु शरीरिणाम् ॥२८॥
उत्तरो मारुतः स्निग्धो मृदुमधुर एव च ।
कषायानुरसः शीतो दोषाणां चाप्रकोपणः ॥२९॥
तस्माच्च प्रकृतिस्थानां कलेदनो बलवर्धनः ।
क्षीणक्षयविषार्तानां विशेषेण तु पूजितः ॥३०॥
दिशा के योग से वायु की हितकारिता, अहितकारिता कहते हैं—(दक्षिण और उत्तर की वायु दोषहर होने से हितकारी है, पूर्व और पश्चिम की वायु अहितकारी है)।
पूर्व की वायु मधुर, स्निग्ध, लवण रस, गुरु, विदाहजनक, रक्त पित्त को बढ़ानेवाली, क्षतरोगी, विषरोगी, ब्रणी, कफ प्रकृति मनुष्यों में विशेषकर रोग को बढ़ानेवाली है। दक्षिण दिशा की वायु—वात प्रकृतिवालों के लिये, श्रान्त एवं अतिशय कफ क्षीण हुए पुरुषों के लिये उत्तम है। इन पुरुषों के ब्रणों में कलेद आद्रता को विशेष रूप में बढ़ाती है। मधुर, अविदाही, कषाय अनुरस, लघुगुण, आँखों के लिये हितकारी एवं बलवर्धक है। पश्चिम की वायु—रक्त-पित्त को शान्त करनेवाली, वात प्रकृपित नहीं करती। विशद, रूक्ष, पुरुष, खर (पचण्ड वेग), स्नेह एवं बल का नाश करनेवाली, तीक्ष्ण, कफ-मेद को सुखानेवाली, रोगी के बल का क्षीण क्षय करनेवाली, पुरुष को सुखानेवाली है। उत्तर दिशा की वायु—स्निग्ध, मधुर, कोमल, कषाय-अनुरस, शीतल, दोषों को प्रकृपित नहीं करती है। इसलिये स्वस्थ पुरुषों के लिये बलवर्धक, कलेदन करनेवाली है, एवं क्षीण (रक्त-मांस से क्षीण), क्षय रोगी तथा विषरोगियों के लिये विशेषतः हितकारी है।
वि० मन्तव्य—लङ्का, उज्जयनी तथा कुशनेत्र आदि को स्पर्श करती हुई जो रेखा उत्तर मेरु तक जाती है वह भूमण्डल की मध्य रेखा कही जाती है। यह दक्षिण से उत्तर गई है और जो रेखा कर्क राशि (भारत में विन्याचल श्रेणि) को स्पर्श करती हुई समस्त भूमण्डल पर परिधि (मेखला) बनती है वह विषुवत् रेखा कही जाती है। यह पूर्व से पश्चिम दिशा को जाती है। पूर्व दिशा वह है जिधर सूर्योदय होता है। अब पाठक दिशाओं को समझ सकते हैं। इन दिशाओं का प्रभाव माणियों पर पड़ता है। क्षीणक्षय.....पूजितः—क्षय रोगियों के सिनिटोरियम तथा कुत्ता आदि के विषविनाशार्थ रक्षणल्य
विशेषरूप से हिमालय प्रदेश में क्यों बनाये जाते हैं, पाठक स्वतः विचार करें ॥२२-३०॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने हितहितो यो नाम विशोऽध्यायः ॥२०॥
एकविंशतितमोऽध्यायः
अथातो व्रणप्रश्नमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे 'व्रण प्रश्न' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।
वि० मन्तव्य—व्रण की परिभाषा जानने के लिये किया गया है प्रश्न जिसमें वह अध्याय। इसका उत्तर श्लोक ४० में दिया गया है ॥१,२॥
वातपित्तरुलेधमाण एव देहसंभवहेतवः । तैरेवाव्यापन्नैरधोमध्योध्वंसत्रिविष्टैः शरीरमिदं धारयतेऽगारमिव स्थूणाभित्तिस्तुभिः, अतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके । त एव च व्यापन्नाः प्रलयहेतवः । तदेभिरैव शोणितचतुर्थैः संभवस्थितिप्रलयेष्वप्यविरहितं शरीरं भवति ॥३॥
शरीर की उत्पत्ति में कारण वात, पित्त, कफ ही हैं ये ही तीनों अपनी प्रकृति में स्थित होकर (क्रमशः), नीचे, मध्य में और ऊपर रहकर इस शरीर को धारण करते हैं, जिस प्रकार कि एक घर को तीन स्तम्भ धारण करते हैं। इसलिये कुछ आचार्य इन को 'त्रिस्थूण' शब्द से कहते हैं। ये ही तीनों विकृतावस्था में शरीर के नाश का कारण बनते हैं। संभव (उत्पत्ति), स्थिति, एवं प्रलय में शरीर-इन वात-पित्त-कफ और चौथे रक्त से संयुक्त रहता है ॥३॥
भवन्ति चान्न—
नर्त देहः कफादस्ति न पित्तान्न च मारुतात् ।
शोणितादपि वा नित्यं देह एतैस्तु धारयते ॥४॥
न तो कफ के बिना, न पित्त के बिना, न वायु के बिना और न रक्त के बिना—यह शरीर होता है, अपितु ये चारों संयुक्त होकर ही शरीर को धारण करते हैं। (सुश्रुत में शल्य का विषय होने से और शल्य का सम्बन्ध रक्त से होने के कारण उसे भी इसमें मिला दिया है। चरक में तीन ही प्रकृतियाँ कही हैं—देखिये विमान, अध्याय ८-१५) ॥४॥
१ वृण शब्द से वात आदि कहे जाते हैं, क्योंकि ये ही वृण को उत्पन्न करते हैं।
आचार्यों ने कहा भी है—
‘ऊर्ध्वमूलमधः शाखं त्रिस्थूणं पञ्चदैवतम् ।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं बिद्वांन्यो वै वेद स वेदवित् ॥’