सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुश्रतसंहिता
[ अ० २० ]
वि० मन्तव्य—ये रस, वीर्य, विपाक के कारण विरुद्ध-अहित हो जाते हैं। यह सब भी अधिक मात्रा में ही विरुद्ध होते हैं, क्योंकि—मधुर कपाय (गुड़ एवं हरड) अम्ललक्षण (अचार, चटनी) लक्षण कपाय लक्षण एवं हरड के योग आदि २ खाये ही जाते हैं, परन्तु—विरुद्ध नहीं, अपितु हित होते हैं ॥ १६ ॥
तरतमयोगयुक्तान्त्र भावानतिस्निग्धानतिरुक्षानत्यु- ष्णानतिशोतानित्येवमादीन् विवर्जयेत् ॥ १७ ॥
तर-तम योग से युक्त अतिरुक्ष, अतिस्निग्ध, अति उष्ण, अतिशीत,—इस प्रकार के पदार्थों का परित्याग कर देना चाहिए। यथा—भैंस का दूध गाय के दूध से अधिक स्निग्ध है। इसलिये स्वस्थ एवं समाग्न पुरुष के लिए त्याज्य और तीक्ष्णगनि पुरुष के लिए संज्य है ॥ १७ ॥
भवति चात्र— विरुद्धान्येवमादीनि वीर्यतो यानि कानिचित् । तान्येकान्ताहितान्येव शेषं विद्याद्विताहितम् ॥ १८ ॥ कहा भी है—
इस प्रकार से अन्य जो भी द्रव्य वीर्य से, गुणों से (२० गुण) तथा रस से विरुद्ध हों, वे सब पूर्णरूप में अहितकारी हैं। इसके विरुद्ध जो शेष द्रव्य (माषादि) हैं, उनको हितकारी तथा अहितकारी दोनों प्रकार का समझना चाहिए। कोई द्रव्य दोष का प्रकोपक है और कोई द्रव्य दोष को शान्ति करता है ॥ १८ ॥
व्याधिभिन्द्रियदौर्बल्यं मरणं चाधिगच्छति ।
विरुद्धरसवीर्याणि मुञ्जानोऽन्तात्मवाक्षरः ॥ १९ ॥
अजितेन्द्रिय मनुष्य रस, वीर्य, विपाकविरुद्ध द्रव्यों का एक साथ सेवन करने से व्याधि (पाण्डु, अन्धत्व, वीर्य आदि), इन्द्रियदौर्बल्य (निर्बलता) अथवा मृत्यु को प्राप्त करता है ॥
यत्किंचिदोषमुक्तेऽथ मुक्तं कायात्र निर्हरेत् ।
रसादिष्वयथार्थं वा तद्विकाराय कल्पते ॥ २० ॥
कुछ भी खायो हुआ पदार्थ जो कि दोषों को प्रकृपित करके (मेनफल या त्रिदुत की भांति ऊर्ध्व या अधः मार्ग द्वारा) शरीर से बाहर नहीं निकलता, वह पदार्थ रोगोत्पत्ति करता है
१ चरक में यह विषय बहुत विस्तार से दिया है—यथा—
यत्किंचिदोषमात्राण्य न निर्हरति कायतः ।
आहारजातं तत् सर्वमहितायोपद्यते ॥
यच्चापि देशकालनिमात्रासात्स्यानिलादिभिः ।
संस्कारतो वीर्यतरश्नं कोष्ठावस्थाक्रमेरपि ॥
परिहारोपचाराभ्यां पाकात् संयोगतोऽपि च ।
विरुद्धं तच्च न हितं हृत्सम्प्रद्विषिभिक्ष यत् ॥
ब० सू० अ० २६
अथवा रस आदि धातुओं में विकार उत्पन्न करता है। पदार्थ दो प्रकार के हैं। एक—दोषों को (वातादि को) दूषित करने वाले, दूसरे—रसादि धातुओं को विकृत करनेवाले ॥ २० ॥
विरुद्धान्नजनान् रोगान् प्रतिहन्ति विरेचनम् ।
वमनं शमनं वाऽपि पूर्वं वा हितसेवनम् ॥ २१ ॥
चिकित्सासूत्र—
विरुद्ध भोजन से उत्पन्न रोगों को प्रत्यनीक विरेचन नष्ट करता है, (कुछ व्याधि के विरुद्ध दिया विरेचन विरुद्ध भोजन से उत्पन्न कुछ को नष्ट करता है, इसी प्रकार से प्रत्येक रोग के विरुद्ध विरेचन देना चाहिए।) वमन या शमन क्रिया तथा हितकारी पदार्थों का पूर्वकालीन सेवन रोगों को नष्ट करता है। बलवान् पुरुष में वमन और विरेचन देना चाहिए। निर्बल के लिये शमन चिकित्सा करनी चाहिये। स्वर्णलोहादि रसायन का प्रथम सेवन करना भी रोगों से बचाता है ॥ २१ ॥
सात्त्व्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्तान्गनेस्तरुणस्य च ।
स्निग्धव्यायामबलिनो विरुद्धं वितथं भवेत् ॥ २२ ॥
निम्न अवस्थाओं में विरुद्ध भोजन भी निष्फल हो जाता है। यथा—सात्त्व्य (प्रकृति के अनुकूल हो जाने) से, मात्रा में अल्प होने से, और तरुण पुरुष की अग्नि के दीप्त होने से, स्निग्ध द्रव्यों के सेवन से बलवान् बने या व्यायाम से बलवान् बने पुरुष में विरुद्ध भोजन भी निष्फल होता है ॥ २२ ॥
अथ वातगुणान् वदयामः—
पूर्वः समधुरः स्निग्धो लक्षणश्चैव मासृतः ।
गुरुर्विदाहजनो रक्तपित्ताभिवर्धनः ॥ २३ ॥
क्षतानां विषजुष्टानां त्रणिनः श्लेष्मलारुच ये ।
तेषामेव विशेषेण सदा रोगविवर्धनः ॥ २४ ॥
१ शमन का लक्षण—
‘न शोधयति यद् दोषान् समाश्रोदीरयत्यपि ।
समीकरोति विषमान् तत् संशमनमुच्यते ॥ चरक ॥
जिस प्रकार कमल के पत्ते पर पानी नहीं लगता इसी प्रकार
स्वर्णसंक्षेप से विषप्रभाव नहीं करता ।
‘न सज्यते हेमपाणे विषं पद्मदलेऽम्बुवत्’
पाण्डयविषसर्पदोदराणां विस्फोटकोन्मादभगन्दराणाम् ।
मूच्छिमादघ्नान्गलग्रहाणां पाण्डुवामयस्यामविषस्य चैव ॥
किलासकुण्डग्रहणीगदानां शोथाम्लपित्तज्वरपीनसानाम् ।
सन्तानदोषस्य तथैव मृत्योः विरुद्धमन्नं प्रबर्द्धति हेतुम् ॥
एषां खल्वपरेषां च वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामिमे
प्रतिकरा भवन्ति । यथा—वमनं विरेचनं च, तद्विरोधिनो द्रव्याणां संशमनार्थमुपयोगः तथाविधैरुक्तं द्रव्यैः पूर्वमभिज्ञातं शरीरस्येति ॥ चरक सू० अ० २६ ॥