भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० २० ] ११

सूत्रस्थानम्

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इसके आगे अन्य संयोग से अहितकारी द्रव्यों को कहते है। अकुरित धान्यों के साथ, या बसा, शहद, दूध, गुड़ और उड़दों के साथ ग्राम्य आनूर या औदक ( जलचर ) मांस नहीं खाना चाहिए। दूध और घी के साथ—रोहिणी शाक या जातुक शाक ( पौष्कर शाक ) नहीं खाना चाहिये। बलाका ( कानावकी ) पक्षी को वारुणी ( मदिरा ) और कुल्माष ( अर्द्धस्विन्न गेहूँ आदि ) के साथ नहीं खाना चाहिये। काक-माची ( मकोय ) को पिण्ली एवं कालीमिरचों के साथ, नाड़ी-पल्लव, शाक, कुक्कुट और दही को एक साथ नहीं खाना चाहिये। शहद को गरम अनुगान के साथ, पित्त को कच्चे मांस के साथ; सुरा, कृशरा ( तिल-तण्डुल माष से बनी ) और पायस ( खीर ) को एक साथ नहीं खाना चाहिए। सोबीरक ( काड़ी ) के साथ तिल की पूरी को, मछलियों के साथ गन्ने के रस से बनी वस्तुओं को, गुड़ के साथ मकोय को, मधु के साथ मूली को, गुड़ के साथ वराह को (कहीं २ दूध के साथ वराह को—ऐसा पाठ है), और मधु के साथ विरुद्ध आहार को न खाये, ये विरुद्ध हैं। दूध के साथ मूली, आम, जामुन, श्रावित्, शूकर और गोह को, सब मछलियों को खासकर चिलिचिम मत्स्य को नहीं खाना चाहिए। केले के फल को तालफल, दूध, दही या छाछ के साथ, लकुच ( बड़हल ) को दूध, दही, या उड़द की दाल अथवा दूध से पूर्व या दूध के पीछे नहीं खाना चाहिये ॥ १३ ॥

अतः कर्मविरुद्धान् वद्यामः—कपोतान् सर्पपतैलभृ-शात्रावात्; कपिञ्जलमयूरलावतिचिरिगोधाश्वैरण्डदार्भ-ग्निसिद्धा एरण्डतैलसिद्धा वा नावात्, कांस्यभाजने दशरात्रपुर्णितं सर्पिः, मधु चोष्णैरुष्णे वा, मत्स्यपरिपचने शृङ्गवेरपरिपचने वा सिद्धां काकमाचीं, तिलकलकसिद्ध-मुपोदिकाशकं नारिकेलेन वराहवसापरिभृष्टां बलाकां, भासमङ्गारशूल्यं, नारनीयादिति ॥ १४ ॥

अब कर्मविरुद्ध द्रव्यों को कहते हैं—सरसों के तेल में भूने कबूतर नहीं खाने चाहिए। एरण्ड की लकड़ियों की अग्नि में कपिञ्जल, मोर, बटेर, तीतर, गोधा—इनका मांस नहीं खाना चाहिये। अथवा एरण्डतैल में सिद्ध इन पशु-पक्षियों का मांस नहीं खाना चाहिये। कांस के पात्र में दस दिन का रक्खा घी नहीं खाना चाहिये। उष्णवीर्य पदार्थों के साथ या उष्णकाल ( ग्रीष्म एवं शरद् ) में मधु नहीं खाना चाहिये। जिस पात्र में मछलियाँ या सौंठ पकाई हो उस पात्र में सिद्ध काकमाची ( मकोय ) नहीं खानी चाहिये। उपोदिका के शाक को तिल-कलक में सिद्ध करके नहीं खाना चाहिये। वराह की बसा में

भूने बलाका पक्षी को नारियल के साथ, भास पक्षी को शूल से वीथकर अङ्गारों में पकाकर नहीं खाना चाहिये।

वि० मन्तव्य—कर्मविरुद्ध—कर्म अर्थात् संस्कार। पकाना-भूतना तलना आदि। तथा रखना-रख छोड़ना, अन्य पदार्थ-वाले भाण्ड में अन्य पदार्थ बनाना-पकाना आदि कर्म कहलाता है। कर्म के प्रभाव से जो द्रव्य अहित हो जाते हैं वे “कर्म-विरुद्ध” कहलाते हैं ॥ १४ ॥

अतो मानविरुद्धान् वद्यामः—मध्वस्मनुनी मधुसर्पिषी मानतस्तुल्ये नारनीयात्, स्नेहौ मधुस्नेहौ जलस्नेहौ वा विशेषादान्तीक्ष्णोदकानुपानौ ॥ १५ ॥

इसके आगे मानविरुद्ध द्रव्यों को कहते हैं—शहद और पानी, शहद और घी—इनको समान वजन में नहीं खाना चाहिये, मधु और स्नेह, एवं जल और स्नेह को ( खासकर वर्षा के पानी के साथ ) एक समान तौल में नहीं खाना चाहिये।

वि० मन्तव्य—मानविरुद्ध-मान-परिमाण तौल के कारण जो विरुद्ध अर्थात् अहित हो जाते हैं वे मानविरुद्ध कहे जाते हैं। यह आहार रूप में भरपेट नहीं खाने चाहिये, औषध के अनुपान एवं थोड़ी मात्रा में खाने में कोई हानि नहीं होती, अतएव सितोपलादि चूर्ण आदि में मधुघृत का अनुपान लिखा है, और यदि थोड़ी मात्रा में १-१ तौ० मधु घृत समान मात्रा में भी खाया जाता है तो उरुक्षत आदि में लाभ करता है तथा रक्त पित्त में भी। चरक में भी आहार के अधिकरण में इसका उल्लेख किया गया है। देखिये च० सू० अ० २६ का सूत्र ८७-८६ ॥ १५ ॥

अत ऊर्ध्वं रसद्रन्धानि रसतो वीर्यतो विपाकतश्च विरुद्धानि वद्यामः—तत्र मधुराम्लौ रसवीर्यविरुद्धौ मधुर-लवणौ च, मधुरकटुकौ च सर्वतः, मधुरतिकौ रसविपाकाभ्यां मधुरकषायौ च, अम्ललवणौ रसतः, अम्लकटुकौ रसविपाकाभ्याम्, अम्लतिकावम्लकषायौ च सर्वतः, लवणकटुकौ रसविपाकाभ्यां, लवणतिकौ लवणकषायौ च सर्वतः, कटुतिकौ रसवीर्यभ्यां कटुकषायौ च तित्तकषायौ रसतः ॥ १६ ॥

इसके आगे रस, वीर्य-और विपाक में विरुद्धद्रव्यों को कहते हैं। यथा—मधुर और अम्ल-रस वीर्यविरुद्ध हैं मधुर-लवण, और मधुर-कटुक, रस-वीर्य-विपाक तीनों से परस्पर विरुद्ध हैं। मधुर-तित्तक, रस एवं विपाक में, मधुर-कषाय और अम्ल-लवण रस में, अम्ल-कटु, रस और विपाक में, अम्ल-तित्तक और अम्ल-कषाय, रस वीर्यविपाक में, लवण-कटु रस और विपाक में, लवण-तित्तक और लवण-कषाय रस वीर्य विपाक में, कटु-तित्तक-रसवीर्य में, कटु-कषाय और तित्तक-कषाय रसमें परस्पर विरुद्ध है।