भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

२०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २० ]

तण्डुलीयकमण्डूकपण्यः, गन्धं घृतं, सैन्धवं, दाडिमामल-कमित्येष वर्गः सर्वप्राणिनां सामान्यतः पथ्यतमः ॥१॥

सब प्राणियों के पथ्य आहार के लिये इस निम्नलिखित वर्ग का उपदेश करते हैं। यथा—लाल चावल, पछि (श्वेत साठी), कङ्कुक (कङ्कनी), सुकुन्द (काले साठी), पाण्डुक (पीले धान्य), पीतक, प्रमोदक, कालक, असनक, पुष्पक, कर्दमक, शकुनाहृत, सुगन्धक (देवशालि), कमल, नीवार, कोद्रव (कोदौ), उद्दालक (वनकोद्रव), श्यामाक (सांवक), गेहूँ, वैणव (वेणुव) और जो ये शूकधान्यों में उत्तम हैं। एण (काला-हरिण), हरिण, कुरङ्ग, मृगमातृका, श्वदंशु (कर्कटक), कराल कस्तूरीमृग), क्रकर (क्रकस पक्षी), कबूतर, बटेर, तीतर, कपि-ज्जल, वत्तीर, वत्तिका—इनका मांस जांगल मृग एवं जांगल पक्षियों में श्रेष्ठ है। मूङ्ग, वनमूङ्ग, मोठ, कलाय (मटर), मसूर, मङ्गल्य (पाण्डुवर्ण मसूर), चना, हरेणु (सतीन का भेद), आङ्की (अरहर), सतीन (वर्तुलक), चिल्ली (खेत का बथुवा), वास्तुक (बथुवा), सुनिषणक (चौपतिया), जीवन्ती, तण्डुली-यक (चौलाई), मण्डूकपर्णी—ये वेदल—दालों में तथा शाकों में श्रेष्ठ हैं। स्नेहों में गाय का घी उत्तम है। नमकों में सैन्धव, फलों में आँवला और अनार उत्तम हैं। यह वर्ग सामान्यरूप में सब प्राणियों के लिये हितकारी है ॥१॥

तथा ब्रह्मचर्य्यनिवातशयनोष्णोदकस्नाननिशास्वप्न-व्यायामाश्रैकान्ततः पथ्यतमाः ॥६॥

आहार को कहकर विहार को कहते हैं। यथा—ब्रह्मचर्य्य निवात शयन (वायु रहित स्थान में सोना), गरम पानी से स्नान, रात्रि में सोना और व्यायाम तथा उपस्थित वेगों को न रोकना—ये कार्य पूर्णरूप से हितकारी हैं ॥६॥

एकान्तहितान्येकान्तहितानि तु प्रागुपदिष्टानि, हितानि तु यद्वायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमिति ॥७॥

एकान्त हित (पानी आदि) और एकान्त अहित (अग्नि आदि) वस्तुओं को पहिले कह चुके हैं। हितकारी एवं अहित कारी जो वस्तुयें वायु के लिये हैं, वे ही पित्त के लिए अपथ्य हैं ॥७॥

संयोगतस्त्वपराणि विषतुल्यानि भवन्ति। तद्यथा-वल्लीफलकवककरीराम्लफललवणकुल्लथपिण्याकदधितैल-विरोहिपिष्टगुष्कगाकाजाविकमांसमद्यजाम्बवचिलिचिम-मत्स्यगोधावराहश्रै नैकध्यमरनीयात् पयसा ॥८॥

अन्य द्रव्य संयोग के कारण विष के समान अहितकारी हो जाते हैं। यथा—वल्लीफल (बेल पर लगानेवाला फल—कूम्भाण्ड आदि), कवक (छत्रक), करीर (वंशांकुर), अम्लफल (आम्रतक), लवण, कुल्लथी, पिण्याक (तिलपिष्ट), दही; तैल, आनूप मांस, औदक मांस, विरोहि (जड़ा हुआ धान्य), पिष्ट

(पीठी), शुष्कशाक, बकरी या भेड़ का मांस, मद्य, जामुन फल, चिलचिम मस्य (सकली) गोधा, वराह—इन वस्तुओं को एक समय में दूध के साथ नहीं खाना चाहिये ॥८॥

रोगं सात्स्यं च देशं च कालं देहं च बुद्धिमान् ॥

अवेक्ष्याग्न्यादिकान् भावान् रोगवृत्तेः प्रयोजयेत् ॥९॥

बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि रोग (उदर आदि), सात्स्य (जाति, आतुर, ओषध, अन्न, रस, देश, ऋतु, उदक), देश (आनूप आदि), काल (शीत-उष्णवर्षा) देह स्थूल, कृश और मध्य, अग्नि आदि पदार्थों का भी उपयोग करे। यथा—उदर रोग में तिलमात्र विषमक्षण, या कृष्णसर्प से दष्ट में हस्तु का मक्षण भी हितकारी है।

वि० मन्तव्य—सात्स्य—जो शरीर में उपकार के लिये शयन करे लीन-बिलीन हो जाय “सात्स्यं नाम तत् यद् आत्मनि उपशेते तत् सात्स्यम्—सात्स्याथो हि उपशयार्थः।” सात्स्य का नाम उपशय भी है और दोनों शब्दों का तात्पर्य एक ही है ॥९॥

अवस्थान्तरबाहुल्याद्वोगादीनां व्यवस्थितम् ॥

द्रव्यं नेच्छन्ति भिषज इच्छन्ति स्वस्थरक्षणं ॥१०॥

द्वयोरन्यतरादाने वदन्ति विषदुग्धयोः।

दुग्धस्वैकान्तहिततां विषमेकान्ततोऽहितम् ॥११॥

एवं युक्तरसेष्वेषु द्रव्येषु सलिलादिषु।

एकान्तहिततां विद्धि वत्स सुश्रुत नान्यथा ॥१२॥

वैद्य को रोग आदि की अवस्था भेद के कारण हित एवं अहित की व्यवस्था को नहीं चाहते। स्वस्थवृत्त में हित एवं अहित का विचार करते हैं, रोग में नहीं करते। दूध और विष इन दोनों के ग्रहण करने में एक को (विष को) एकान्त रूप में अधिकारी कहते हैं। हे सुश्रुत! इस प्रकार दूध की भांति प्रभाव संसिद्ध रसयुक्त सलिल आदि द्रव्यों को एकान्त रूप से हितकारी समझना चाहिये ॥१०—१२॥

अतोऽन्यान्यपि संयोगादहितानि वद्यामः—नवविरु-दधान्यैर्वैसामधुपयोगदुग्धमाषैर्वा ग्राम्यान्पौदकपिशितादीनि नाभ्यवहरेत्; न पयोमधुभ्यां रोहिणीशाकं जानुकशाकं वाशनीयात्, बलाकां वारुणीकुल्माषाभ्यां, काकमाचीं पिपल्लीमरिचाभ्यां, नाडीभङ्गशाककुक्कुटदधीनि च नैकध्यं; मधु चोष्णोदकानुपानं; पितेन चाममांसानि सुराकृशरापायसांश्च नैकध्यं; सौवोरेकेण सह तिलगङ्कुरीं मत्स्यैः सहैह्विकारान्; गुडेन काकमाचीं, मधुना मूलकं गुडेन वाराहं, मधुना च सह विरुद्धं; क्षीरेण मूलकम् आप्राजाम्बवश्चाविच्छूकरगोधाश्र; सर्वाश्च मत्स्यान् पयसा; विगपेण चिलिचिमं; कदलीफलं ताळफलं पयसा दध्ना तक्केष्ट वा; लकुचफलं पयसा दध्ना माष-सूपेन वा प्राक् पयसः पयसोऽन्ते वा ॥१३॥