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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

२०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २० ]

तण्डुलीयकमण्डूकपण्यः, गन्धं घृतं, सैन्धवं, दाडिमामल-कमित्येष वर्गः सर्वप्राणिनां सामान्यतः पथ्यतमः ॥१॥

सब प्राणियों के पथ्य आहार के लिये इस निम्नलिखित वर्ग का उपदेश करते हैं। यथा—लाल चावल, पछि (श्वेत साठी), कङ्कुक (कङ्कनी), सुकुन्द (काले साठी), पाण्डुक (पीले धान्य), पीतक, प्रमोदक, कालक, असनक, पुष्पक, कर्दमक, शकुनाहृत, सुगन्धक (देवशालि), कमल, नीवार, कोद्रव (कोदौ), उद्दालक (वनकोद्रव), श्यामाक (सांवक), गेहूँ, वैणव (वेणुव) और जो ये शूकधान्यों में उत्तम हैं। एण (काला-हरिण), हरिण, कुरङ्ग, मृगमातृका, श्वदंशु (कर्कटक), कराल कस्तूरीमृग), क्रकर (क्रकस पक्षी), कबूतर, बटेर, तीतर, कपि-ज्जल, वत्तीर, वत्तिका—इनका मांस जांगल मृग एवं जांगल पक्षियों में श्रेष्ठ है। मूङ्ग, वनमूङ्ग, मोठ, कलाय (मटर), मसूर, मङ्गल्य (पाण्डुवर्ण मसूर), चना, हरेणु (सतीन का भेद), आङ्की (अरहर), सतीन (वर्तुलक), चिल्ली (खेत का बथुवा), वास्तुक (बथुवा), सुनिषणक (चौपतिया), जीवन्ती, तण्डुली-यक (चौलाई), मण्डूकपर्णी—ये वेदल—दालों में तथा शाकों में श्रेष्ठ हैं। स्नेहों में गाय का घी उत्तम है। नमकों में सैन्धव, फलों में आँवला और अनार उत्तम हैं। यह वर्ग सामान्यरूप में सब प्राणियों के लिये हितकारी है ॥१॥

तथा ब्रह्मचर्य्यनिवातशयनोष्णोदकस्नाननिशास्वप्न-व्यायामाश्रैकान्ततः पथ्यतमाः ॥६॥

आहार को कहकर विहार को कहते हैं। यथा—ब्रह्मचर्य्य निवात शयन (वायु रहित स्थान में सोना), गरम पानी से स्नान, रात्रि में सोना और व्यायाम तथा उपस्थित वेगों को न रोकना—ये कार्य पूर्णरूप से हितकारी हैं ॥६॥

एकान्तहितान्येकान्तहितानि तु प्रागुपदिष्टानि, हितानि तु यद्वायोः पथ्यं तत् पित्तस्यापथ्यमिति ॥७॥

एकान्त हित (पानी आदि) और एकान्त अहित (अग्नि आदि) वस्तुओं को पहिले कह चुके हैं। हितकारी एवं अहित कारी जो वस्तुयें वायु के लिये हैं, वे ही पित्त के लिए अपथ्य हैं ॥७॥

संयोगतस्त्वपराणि विषतुल्यानि भवन्ति। तद्यथा-वल्लीफलकवककरीराम्लफललवणकुल्लथपिण्याकदधितैल-विरोहिपिष्टगुष्कगाकाजाविकमांसमद्यजाम्बवचिलिचिम-मत्स्यगोधावराहश्रै नैकध्यमरनीयात् पयसा ॥८॥

अन्य द्रव्य संयोग के कारण विष के समान अहितकारी हो जाते हैं। यथा—वल्लीफल (बेल पर लगानेवाला फल—कूम्भाण्ड आदि), कवक (छत्रक), करीर (वंशांकुर), अम्लफल (आम्रतक), लवण, कुल्लथी, पिण्याक (तिलपिष्ट), दही; तैल, आनूप मांस, औदक मांस, विरोहि (जड़ा हुआ धान्य), पिष्ट

(पीठी), शुष्कशाक, बकरी या भेड़ का मांस, मद्य, जामुन फल, चिलचिम मस्य (सकली) गोधा, वराह—इन वस्तुओं को एक समय में दूध के साथ नहीं खाना चाहिये ॥८॥

रोगं सात्स्यं च देशं च कालं देहं च बुद्धिमान् ॥

अवेक्ष्याग्न्यादिकान् भावान् रोगवृत्तेः प्रयोजयेत् ॥९॥

बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि रोग (उदर आदि), सात्स्य (जाति, आतुर, ओषध, अन्न, रस, देश, ऋतु, उदक), देश (आनूप आदि), काल (शीत-उष्णवर्षा) देह स्थूल, कृश और मध्य, अग्नि आदि पदार्थों का भी उपयोग करे। यथा—उदर रोग में तिलमात्र विषमक्षण, या कृष्णसर्प से दष्ट में हस्तु का मक्षण भी हितकारी है।

वि० मन्तव्य—सात्स्य—जो शरीर में उपकार के लिये शयन करे लीन-बिलीन हो जाय “सात्स्यं नाम तत् यद् आत्मनि उपशेते तत् सात्स्यम्—सात्स्याथो हि उपशयार्थः।” सात्स्य का नाम उपशय भी है और दोनों शब्दों का तात्पर्य एक ही है ॥९॥

अवस्थान्तरबाहुल्याद्वोगादीनां व्यवस्थितम् ॥

द्रव्यं नेच्छन्ति भिषज इच्छन्ति स्वस्थरक्षणं ॥१०॥

द्वयोरन्यतरादाने वदन्ति विषदुग्धयोः।

दुग्धस्वैकान्तहिततां विषमेकान्ततोऽहितम् ॥११॥

एवं युक्तरसेष्वेषु द्रव्येषु सलिलादिषु।

एकान्तहिततां विद्धि वत्स सुश्रुत नान्यथा ॥१२॥

वैद्य को रोग आदि की अवस्था भेद के कारण हित एवं अहित की व्यवस्था को नहीं चाहते। स्वस्थवृत्त में हित एवं अहित का विचार करते हैं, रोग में नहीं करते। दूध और विष इन दोनों के ग्रहण करने में एक को (विष को) एकान्त रूप में अधिकारी कहते हैं। हे सुश्रुत! इस प्रकार दूध की भांति प्रभाव संसिद्ध रसयुक्त सलिल आदि द्रव्यों को एकान्त रूप से हितकारी समझना चाहिये ॥१०—१२॥

अतोऽन्यान्यपि संयोगादहितानि वद्यामः—नवविरु-दधान्यैर्वैसामधुपयोगदुग्धमाषैर्वा ग्राम्यान्पौदकपिशितादीनि नाभ्यवहरेत्; न पयोमधुभ्यां रोहिणीशाकं जानुकशाकं वाशनीयात्, बलाकां वारुणीकुल्माषाभ्यां, काकमाचीं पिपल्लीमरिचाभ्यां, नाडीभङ्गशाककुक्कुटदधीनि च नैकध्यं; मधु चोष्णोदकानुपानं; पितेन चाममांसानि सुराकृशरापायसांश्च नैकध्यं; सौवोरेकेण सह तिलगङ्कुरीं मत्स्यैः सहैह्विकारान्; गुडेन काकमाचीं, मधुना मूलकं गुडेन वाराहं, मधुना च सह विरुद्धं; क्षीरेण मूलकम् आप्राजाम्बवश्चाविच्छूकरगोधाश्र; सर्वाश्च मत्स्यान् पयसा; विगपेण चिलिचिमं; कदलीफलं ताळफलं पयसा दध्ना तक्केष्ट वा; लकुचफलं पयसा दध्ना माष-सूपेन वा प्राक् पयसः पयसोऽन्ते वा ॥१३॥

अ० २० ] ११

सूत्रस्थानम्

८१

इसके आगे अन्य संयोग से अहितकारी द्रव्यों को कहते है। अकुरित धान्यों के साथ, या बसा, शहद, दूध, गुड़ और उड़दों के साथ ग्राम्य आनूर या औदक ( जलचर ) मांस नहीं खाना चाहिए। दूध और घी के साथ—रोहिणी शाक या जातुक शाक ( पौष्कर शाक ) नहीं खाना चाहिये। बलाका ( कानावकी ) पक्षी को वारुणी ( मदिरा ) और कुल्माष ( अर्द्धस्विन्न गेहूँ आदि ) के साथ नहीं खाना चाहिये। काक-माची ( मकोय ) को पिण्ली एवं कालीमिरचों के साथ, नाड़ी-पल्लव, शाक, कुक्कुट और दही को एक साथ नहीं खाना चाहिये। शहद को गरम अनुगान के साथ, पित्त को कच्चे मांस के साथ; सुरा, कृशरा ( तिल-तण्डुल माष से बनी ) और पायस ( खीर ) को एक साथ नहीं खाना चाहिए। सोबीरक ( काड़ी ) के साथ तिल की पूरी को, मछलियों के साथ गन्ने के रस से बनी वस्तुओं को, गुड़ के साथ मकोय को, मधु के साथ मूली को, गुड़ के साथ वराह को (कहीं २ दूध के साथ वराह को—ऐसा पाठ है), और मधु के साथ विरुद्ध आहार को न खाये, ये विरुद्ध हैं। दूध के साथ मूली, आम, जामुन, श्रावित्, शूकर और गोह को, सब मछलियों को खासकर चिलिचिम मत्स्य को नहीं खाना चाहिए। केले के फल को तालफल, दूध, दही या छाछ के साथ, लकुच ( बड़हल ) को दूध, दही, या उड़द की दाल अथवा दूध से पूर्व या दूध के पीछे नहीं खाना चाहिये ॥ १३ ॥

अतः कर्मविरुद्धान् वद्यामः—कपोतान् सर्पपतैलभृ-शात्रावात्; कपिञ्जलमयूरलावतिचिरिगोधाश्वैरण्डदार्भ-ग्निसिद्धा एरण्डतैलसिद्धा वा नावात्, कांस्यभाजने दशरात्रपुर्णितं सर्पिः, मधु चोष्णैरुष्णे वा, मत्स्यपरिपचने शृङ्गवेरपरिपचने वा सिद्धां काकमाचीं, तिलकलकसिद्ध-मुपोदिकाशकं नारिकेलेन वराहवसापरिभृष्टां बलाकां, भासमङ्गारशूल्यं, नारनीयादिति ॥ १४ ॥

अब कर्मविरुद्ध द्रव्यों को कहते हैं—सरसों के तेल में भूने कबूतर नहीं खाने चाहिए। एरण्ड की लकड़ियों की अग्नि में कपिञ्जल, मोर, बटेर, तीतर, गोधा—इनका मांस नहीं खाना चाहिये। अथवा एरण्डतैल में सिद्ध इन पशु-पक्षियों का मांस नहीं खाना चाहिये। कांस के पात्र में दस दिन का रक्खा घी नहीं खाना चाहिये। उष्णवीर्य पदार्थों के साथ या उष्णकाल ( ग्रीष्म एवं शरद् ) में मधु नहीं खाना चाहिये। जिस पात्र में मछलियाँ या सौंठ पकाई हो उस पात्र में सिद्ध काकमाची ( मकोय ) नहीं खानी चाहिये। उपोदिका के शाक को तिल-कलक में सिद्ध करके नहीं खाना चाहिये। वराह की बसा में

भूने बलाका पक्षी को नारियल के साथ, भास पक्षी को शूल से वीथकर अङ्गारों में पकाकर नहीं खाना चाहिये।

वि० मन्तव्य—कर्मविरुद्ध—कर्म अर्थात् संस्कार। पकाना-भूतना तलना आदि। तथा रखना-रख छोड़ना, अन्य पदार्थ-वाले भाण्ड में अन्य पदार्थ बनाना-पकाना आदि कर्म कहलाता है। कर्म के प्रभाव से जो द्रव्य अहित हो जाते हैं वे “कर्म-विरुद्ध” कहलाते हैं ॥ १४ ॥

अतो मानविरुद्धान् वद्यामः—मध्वस्मनुनी मधुसर्पिषी मानतस्तुल्ये नारनीयात्, स्नेहौ मधुस्नेहौ जलस्नेहौ वा विशेषादान्तीक्ष्णोदकानुपानौ ॥ १५ ॥

इसके आगे मानविरुद्ध द्रव्यों को कहते हैं—शहद और पानी, शहद और घी—इनको समान वजन में नहीं खाना चाहिये, मधु और स्नेह, एवं जल और स्नेह को ( खासकर वर्षा के पानी के साथ ) एक समान तौल में नहीं खाना चाहिये।

वि० मन्तव्य—मानविरुद्ध-मान-परिमाण तौल के कारण जो विरुद्ध अर्थात् अहित हो जाते हैं वे मानविरुद्ध कहे जाते हैं। यह आहार रूप में भरपेट नहीं खाने चाहिये, औषध के अनुपान एवं थोड़ी मात्रा में खाने में कोई हानि नहीं होती, अतएव सितोपलादि चूर्ण आदि में मधुघृत का अनुपान लिखा है, और यदि थोड़ी मात्रा में १-१ तौ० मधु घृत समान मात्रा में भी खाया जाता है तो उरुक्षत आदि में लाभ करता है तथा रक्त पित्त में भी। चरक में भी आहार के अधिकरण में इसका उल्लेख किया गया है। देखिये च० सू० अ० २६ का सूत्र ८७-८६ ॥ १५ ॥

अत ऊर्ध्वं रसद्रन्धानि रसतो वीर्यतो विपाकतश्च विरुद्धानि वद्यामः—तत्र मधुराम्लौ रसवीर्यविरुद्धौ मधुर-लवणौ च, मधुरकटुकौ च सर्वतः, मधुरतिकौ रसविपाकाभ्यां मधुरकषायौ च, अम्ललवणौ रसतः, अम्लकटुकौ रसविपाकाभ्याम्, अम्लतिकावम्लकषायौ च सर्वतः, लवणकटुकौ रसविपाकाभ्यां, लवणतिकौ लवणकषायौ च सर्वतः, कटुतिकौ रसवीर्यभ्यां कटुकषायौ च तित्तकषायौ रसतः ॥ १६ ॥

इसके आगे रस, वीर्य-और विपाक में विरुद्धद्रव्यों को कहते हैं। यथा—मधुर और अम्ल-रस वीर्यविरुद्ध हैं मधुर-लवण, और मधुर-कटुक, रस-वीर्य-विपाक तीनों से परस्पर विरुद्ध हैं। मधुर-तित्तक, रस एवं विपाक में, मधुर-कषाय और अम्ल-लवण रस में, अम्ल-कटु, रस और विपाक में, अम्ल-तित्तक और अम्ल-कषाय, रस वीर्यविपाक में, लवण-कटु रस और विपाक में, लवण-तित्तक और लवण-कषाय रस वीर्य विपाक में, कटु-तित्तक-रसवीर्य में, कटु-कषाय और तित्तक-कषाय रसमें परस्पर विरुद्ध है।

मुश्रतसंहिता

[ अ० २० ]

वि० मन्तव्य—ये रस, वीर्य, विपाक के कारण विरुद्ध-अहित हो जाते हैं। यह सब भी अधिक मात्रा में ही विरुद्ध होते हैं, क्योंकि—मधुर कपाय (गुड़ एवं हरड) अम्ललक्षण (अचार, चटनी) लक्षण कपाय लक्षण एवं हरड के योग आदि २ खाये ही जाते हैं, परन्तु—विरुद्ध नहीं, अपितु हित होते हैं ॥ १६ ॥

तरतमयोगयुक्तान्त्र भावानतिस्निग्धानतिरुक्षानत्यु- ष्णानतिशोतानित्येवमादीन् विवर्जयेत् ॥ १७ ॥

तर-तम योग से युक्त अतिरुक्ष, अतिस्निग्ध, अति उष्ण, अतिशीत,—इस प्रकार के पदार्थों का परित्याग कर देना चाहिए। यथा—भैंस का दूध गाय के दूध से अधिक स्निग्ध है। इसलिये स्वस्थ एवं समाग्न पुरुष के लिए त्याज्य और तीक्ष्णगनि पुरुष के लिए संज्य है ॥ १७ ॥

भवति चात्र— विरुद्धान्येवमादीनि वीर्यतो यानि कानिचित् । तान्येकान्ताहितान्येव शेषं विद्याद्विताहितम् ॥ १८ ॥ कहा भी है—

इस प्रकार से अन्य जो भी द्रव्य वीर्य से, गुणों से (२० गुण) तथा रस से विरुद्ध हों, वे सब पूर्णरूप में अहितकारी हैं। इसके विरुद्ध जो शेष द्रव्य (माषादि) हैं, उनको हितकारी तथा अहितकारी दोनों प्रकार का समझना चाहिए। कोई द्रव्य दोष का प्रकोपक है और कोई द्रव्य दोष को शान्ति करता है ॥ १८ ॥

व्याधिभिन्द्रियदौर्बल्यं मरणं चाधिगच्छति ।

विरुद्धरसवीर्याणि मुञ्जानोऽन्तात्मवाक्षरः ॥ १९ ॥

अजितेन्द्रिय मनुष्य रस, वीर्य, विपाकविरुद्ध द्रव्यों का एक साथ सेवन करने से व्याधि (पाण्डु, अन्धत्व, वीर्य आदि), इन्द्रियदौर्बल्य (निर्बलता) अथवा मृत्यु को प्राप्त करता है ॥

यत्किंचिदोषमुक्तेऽथ मुक्तं कायात्र निर्हरेत् ।

रसादिष्वयथार्थं वा तद्विकाराय कल्पते ॥ २० ॥

कुछ भी खायो हुआ पदार्थ जो कि दोषों को प्रकृपित करके (मेनफल या त्रिदुत की भांति ऊर्ध्व या अधः मार्ग द्वारा) शरीर से बाहर नहीं निकलता, वह पदार्थ रोगोत्पत्ति करता है

१ चरक में यह विषय बहुत विस्तार से दिया है—यथा—

यत्किंचिदोषमात्राण्य न निर्हरति कायतः ।

आहारजातं तत् सर्वमहितायोपद्यते ॥

यच्चापि देशकालनिमात्रासात्स्यानिलादिभिः ।

संस्कारतो वीर्यतरश्नं कोष्ठावस्थाक्रमेरपि ॥

परिहारोपचाराभ्यां पाकात् संयोगतोऽपि च ।

विरुद्धं तच्च न हितं हृत्सम्प्रद्विषिभिक्ष यत् ॥

ब० सू० अ० २६

अथवा रस आदि धातुओं में विकार उत्पन्न करता है। पदार्थ दो प्रकार के हैं। एक—दोषों को (वातादि को) दूषित करने वाले, दूसरे—रसादि धातुओं को विकृत करनेवाले ॥ २० ॥

विरुद्धान्नजनान् रोगान् प्रतिहन्ति विरेचनम् ।

वमनं शमनं वाऽपि पूर्वं वा हितसेवनम् ॥ २१ ॥

चिकित्सासूत्र—

विरुद्ध भोजन से उत्पन्न रोगों को प्रत्यनीक विरेचन नष्ट करता है, (कुछ व्याधि के विरुद्ध दिया विरेचन विरुद्ध भोजन से उत्पन्न कुछ को नष्ट करता है, इसी प्रकार से प्रत्येक रोग के विरुद्ध विरेचन देना चाहिए।) वमन या शमन क्रिया तथा हितकारी पदार्थों का पूर्वकालीन सेवन रोगों को नष्ट करता है। बलवान् पुरुष में वमन और विरेचन देना चाहिए। निर्बल के लिये शमन चिकित्सा करनी चाहिये। स्वर्णलोहादि रसायन का प्रथम सेवन करना भी रोगों से बचाता है ॥ २१ ॥

सात्त्व्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्तान्गनेस्तरुणस्य च ।

स्निग्धव्यायामबलिनो विरुद्धं वितथं भवेत् ॥ २२ ॥

निम्न अवस्थाओं में विरुद्ध भोजन भी निष्फल हो जाता है। यथा—सात्त्व्य (प्रकृति के अनुकूल हो जाने) से, मात्रा में अल्प होने से, और तरुण पुरुष की अग्नि के दीप्त होने से, स्निग्ध द्रव्यों के सेवन से बलवान् बने या व्यायाम से बलवान् बने पुरुष में विरुद्ध भोजन भी निष्फल होता है ॥ २२ ॥

अथ वातगुणान् वदयामः—

पूर्वः समधुरः स्निग्धो लक्षणश्चैव मासृतः ।

गुरुर्विदाहजनो रक्तपित्ताभिवर्धनः ॥ २३ ॥

क्षतानां विषजुष्टानां त्रणिनः श्लेष्मलारुच ये ।

तेषामेव विशेषेण सदा रोगविवर्धनः ॥ २४ ॥

१ शमन का लक्षण—

‘न शोधयति यद् दोषान् समाश्रोदीरयत्यपि ।

समीकरोति विषमान् तत् संशमनमुच्यते ॥ चरक ॥

जिस प्रकार कमल के पत्ते पर पानी नहीं लगता इसी प्रकार

स्वर्णसंक्षेप से विषप्रभाव नहीं करता ।

‘न सज्यते हेमपाणे विषं पद्मदलेऽम्बुवत्’

पाण्डयविषसर्पदोदराणां विस्फोटकोन्मादभगन्दराणाम् ।

मूच्छिमादघ्नान्गलग्रहाणां पाण्डुवामयस्यामविषस्य चैव ॥

किलासकुण्डग्रहणीगदानां शोथाम्लपित्तज्वरपीनसानाम् ।

सन्तानदोषस्य तथैव मृत्योः विरुद्धमन्नं प्रबर्द्धति हेतुम् ॥

एषां खल्वपरेषां च वैरोधिकनिमित्तानां व्याधीनामिमे

प्रतिकरा भवन्ति । यथा—वमनं विरेचनं च, तद्विरोधिनो द्रव्याणां संशमनार्थमुपयोगः तथाविधैरुक्तं द्रव्यैः पूर्वमभिज्ञातं शरीरस्येति ॥ चरक सू० अ० २६ ॥

अ० २१ ]

सूत्रस्थानम्

८३

वातल्लानां प्रशस्तश्च श्रान्तानां कफशोषणाम् ।

तेषामेव विशेषेण व्रणकलेदविवर्धनः ॥२५॥

मधुरश्चाविदाही च कषायानुरसो लघुः ।

दक्षिणो मारुतः श्रेष्ठश्चलुण्यो बलवर्धनः ॥२६॥

रक्तपित्तप्रजामनो न च वातप्रकोपणः ।

विगदो रूक्षपुरुषः खरः स्नेहबलापहः ॥२७॥

पश्चिमो मारुतस्तीक्ष्णः कफमेदोविशेषणः ।

सद्यः प्राणक्षयकरः शोषणस्तु शरीरिणाम् ॥२८॥

उत्तरो मारुतः स्निग्धो मृदुमधुर एव च ।

कषायानुरसः शीतो दोषाणां चाप्रकोपणः ॥२९॥

तस्माच्च प्रकृतिस्थानां कलेदनो बलवर्धनः ।

क्षीणक्षयविषार्तानां विशेषेण तु पूजितः ॥३०॥

दिशा के योग से वायु की हितकारिता, अहितकारिता कहते हैं—(दक्षिण और उत्तर की वायु दोषहर होने से हितकारी है, पूर्व और पश्चिम की वायु अहितकारी है)।

पूर्व की वायु मधुर, स्निग्ध, लवण रस, गुरु, विदाहजनक, रक्त पित्त को बढ़ानेवाली, क्षतरोगी, विषरोगी, ब्रणी, कफ प्रकृति मनुष्यों में विशेषकर रोग को बढ़ानेवाली है। दक्षिण दिशा की वायु—वात प्रकृतिवालों के लिये, श्रान्त एवं अतिशय कफ क्षीण हुए पुरुषों के लिये उत्तम है। इन पुरुषों के ब्रणों में कलेद आद्रता को विशेष रूप में बढ़ाती है। मधुर, अविदाही, कषाय अनुरस, लघुगुण, आँखों के लिये हितकारी एवं बलवर्धक है। पश्चिम की वायु—रक्त-पित्त को शान्त करनेवाली, वात प्रकृपित नहीं करती। विशद, रूक्ष, पुरुष, खर (पचण्ड वेग), स्नेह एवं बल का नाश करनेवाली, तीक्ष्ण, कफ-मेद को सुखानेवाली, रोगी के बल का क्षीण क्षय करनेवाली, पुरुष को सुखानेवाली है। उत्तर दिशा की वायु—स्निग्ध, मधुर, कोमल, कषाय-अनुरस, शीतल, दोषों को प्रकृपित नहीं करती है। इसलिये स्वस्थ पुरुषों के लिये बलवर्धक, कलेदन करनेवाली है, एवं क्षीण (रक्त-मांस से क्षीण), क्षय रोगी तथा विषरोगियों के लिये विशेषतः हितकारी है।

वि० मन्तव्य—लङ्का, उज्जयनी तथा कुशनेत्र आदि को स्पर्श करती हुई जो रेखा उत्तर मेरु तक जाती है वह भूमण्डल की मध्य रेखा कही जाती है। यह दक्षिण से उत्तर गई है और जो रेखा कर्क राशि (भारत में विन्याचल श्रेणि) को स्पर्श करती हुई समस्त भूमण्डल पर परिधि (मेखला) बनती है वह विषुवत् रेखा कही जाती है। यह पूर्व से पश्चिम दिशा को जाती है। पूर्व दिशा वह है जिधर सूर्योदय होता है। अब पाठक दिशाओं को समझ सकते हैं। इन दिशाओं का प्रभाव माणियों पर पड़ता है। क्षीणक्षय.....पूजितः—क्षय रोगियों के सिनिटोरियम तथा कुत्ता आदि के विषविनाशार्थ रक्षणल्य

विशेषरूप से हिमालय प्रदेश में क्यों बनाये जाते हैं, पाठक स्वतः विचार करें ॥२२-३०॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने हितहितो यो नाम विशोऽध्यायः ॥२०॥

एकविंशतितमोऽध्यायः

अथातो व्रणप्रश्नमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'व्रण प्रश्न' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।

वि० मन्तव्य—व्रण की परिभाषा जानने के लिये किया गया है प्रश्न जिसमें वह अध्याय। इसका उत्तर श्लोक ४० में दिया गया है ॥१,२॥

वातपित्तरुलेधमाण एव देहसंभवहेतवः । तैरेवाव्यापन्नैरधोमध्योध्वंसत्रिविष्टैः शरीरमिदं धारयतेऽगारमिव स्थूणाभित्तिस्तुभिः, अतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके । त एव च व्यापन्नाः प्रलयहेतवः । तदेभिरैव शोणितचतुर्थैः संभवस्थितिप्रलयेष्वप्यविरहितं शरीरं भवति ॥३॥

शरीर की उत्पत्ति में कारण वात, पित्त, कफ ही हैं ये ही तीनों अपनी प्रकृति में स्थित होकर (क्रमशः), नीचे, मध्य में और ऊपर रहकर इस शरीर को धारण करते हैं, जिस प्रकार कि एक घर को तीन स्तम्भ धारण करते हैं। इसलिये कुछ आचार्य इन को 'त्रिस्थूण' शब्द से कहते हैं। ये ही तीनों विकृतावस्था में शरीर के नाश का कारण बनते हैं। संभव (उत्पत्ति), स्थिति, एवं प्रलय में शरीर-इन वात-पित्त-कफ और चौथे रक्त से संयुक्त रहता है ॥३॥

भवन्ति चान्न—

नर्त देहः कफादस्ति न पित्तान्न च मारुतात् ।

शोणितादपि वा नित्यं देह एतैस्तु धारयते ॥४॥

न तो कफ के बिना, न पित्त के बिना, न वायु के बिना और न रक्त के बिना—यह शरीर होता है, अपितु ये चारों संयुक्त होकर ही शरीर को धारण करते हैं। (सुश्रुत में शल्य का विषय होने से और शल्य का सम्बन्ध रक्त से होने के कारण उसे भी इसमें मिला दिया है। चरक में तीन ही प्रकृतियाँ कही हैं—देखिये विमान, अध्याय ८-१५) ॥४॥

१ वृण शब्द से वात आदि कहे जाते हैं, क्योंकि ये ही वृण को उत्पन्न करते हैं।

आचार्यों ने कहा भी है—

‘ऊर्ध्वमूलमधः शाखं त्रिस्थूणं पञ्चदैवतम् ।

क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं बिद्वांन्यो वै वेद स वेदवित् ॥’

८४

मुश्रुतसंहिता

[ अ० २१ ]

तत्र 'वा' गतिगन्धनयोः, इति धातुः, 'तप' संतापे, 'शिल्प' आलिङ्गने, एतेषां कृद्धिहितैः प्रत्ययैर्वातः पित्तं श्लेष्मेति च रूपाणि भवन्ति ॥५॥

निरुक्ति—वात शब्द 'वा गतिगन्धनयोः' इस धातु से 'त' औणादिक प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इसलिये वात का अर्थ गति से है, यह गति चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो। पित्तशब्द—'तप संतापे' इस धातु से त के स्थान में इत् प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इसलिये शरीर में जो भी उष्णिमा है। वह सब पित्त है। श्लेष्मा शब्द—'शिल्प-आलिङ्गने' इस धातु के साथ मनिन् प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इसलिये संश्लेषण रूपी कार्य कफ का है। चरक में कहा भी है—सर्वा हि चेष्टा वातेन, पित्तादेवोष्मणः पक्तिर्नरणा मुपजायते।'

वि० मन्तव्य—वात, पित्त एवं कफ की महिमा का वर्णन च० सू० अ० १२ में देखिये—वायु गति करता रहता है, फलतः शरीर में गति होती रहती है अर्थात् शरीर में जितनी या जितने प्रकार की गतियाँ होती हैं उन सबका कारण वायु है। पित्त—शरीर के सन्ताप, ऊष्मा-गर्मी का हेतु पित्त है, पित्त का नाम "मायु" भी है जो "डु मिञ् प्रक्षेपणे" धातु (स्वादि गणीय) से बनता है। इसका अर्थ है 'मिनोति देहे ऊष्माण' अर्थात् जो देह में ऊष्मा को फेंकता-फैलाता है—व्याप्त करता है। कफ—कं जलम्, केन जलेन फणति-निष्पद्यते इति कफः—जो जल से उत्पन्न होता है, बढ़ता है। यह श्लेष्मा का पर्याय है। संश्लेषण—सटाना, जोड़ना, चिपकाना, चिपकना आदि कार्य कफ का है। कफ का दूसरा अर्थ है—के शिरसि फणति इति कफः, कं शिरः। शोणित—यह शब्द "शोणु-वर्णगत्योः" धातु से निष्पन्न होता है। जो रंग गया—रस को रंगकर रक्त बनाया गया है और गति करता रहता है उसका नाम शोणित है ॥५॥

दोषस्थानान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः—तत्र समोसेन वातः श्रोणिगुदसंश्रयः, तदुपर्यधो नामेः पक्षाशयः, पक्वामाशय-स्यं पित्तस्य, आमाशयः श्लेष्मणः ॥६॥

इसके आगे दोषों के स्थानों को कहते हैं। इनमें संक्षेप से वायु का स्थान—श्रोणि (कटि) और गुदा है। श्रोणि और गुदा के ऊपर और नामि के नीचे पक्वाशय का स्थान है। पित्त का स्थान-पक्वाशय का और आमाशय के बीच में चित्त का स्थान है। कफ का स्थान—आमाशय है। (चरक में यह विषय—सुस्थान अध्याय २०।८ में दिया है)।

वि० मन्तव्य—पक्वामाशयमध्यं—पक्व—सर्वथा परि-पक्व अर्थात् द्रव मल—केवल मूत्र-पूरीषमय मल का आशय

(मलाशय) कहलाता है और आम—सर्वथा आम अपक्व (भोजन-आहार सुक्त द्रव्य) का आशय आमाशय कहलाता है। उक्त दोनों का मध्य—मध्यवर्ती अवयव "पक्वाऽऽमाशय" कहलाता है, जिसे लुद्गान्न (पतला अन्न—अन्तर्द्वी) कहते हैं। पाचक पित्त का कर्मक्षेत्र यही है और पाचक पित्त ही प्रधान पित्त है, वही सब पित्तों को बल देता है ॥६॥

अतः परं पञ्चधा विभज्यन्ते। तत्र वातस्य वातव्याधौ वक्ष्यामः; पित्तस्य यकृत्प्लोहानो हृदयं दृष्टिस्त्वक् पूर्वोक्तं च; श्लेष्मण उरः शिरः कण्ठो जिह्वामूलं सन्धय इति पूर्वोक्तं च; एतानि खलु दोषाणां स्थानान्यव्यापन्तानाम् ॥

इसके आगे इनको पाँच भागों में विभक्त किया जाता है। यथा—वात का पाँच प्रकार से विभाग वातव्याधि में कहेंगे। पित्त का—यकृत, प्लीहा, हृदय, दृष्टि—(कृष्ण तारका के अन्दर रहनेवाली मसूर दल मात्रा), त्वचा एवं पूर्वोक्त स्थान पित्त का है। कफ का स्थान उर, शिर, कण्ठ, जिह्वामूल, सन्धियाँ और पूर्वोक्त आमाशय हैं। ये प्रकृतिस्थ दोषों के स्थान हैं।

वि० मन्तव्य—दृष्टि—समस्त नेत्र अथवा विशेषतः आधुनिकों का "पीतबिन्दु"। देखिये 'हमारे शरीर की रचना' नेत्रप्रकरण ॥७॥

भवति चान्न—

विसर्गोदानविक्षेपैः सोमसूर्यान्तिला यथा।

धारयन्ति जगदेहं कफपित्तान्तिलास्तथा ॥८॥

जिस प्रकार चन्द्रमा, सूर्य और वायु ये तीनों विसर्ग, आदान एवं विक्षेप इन कार्यों से जगत् का धारण करते हैं, उसी प्रकार कफ, पित्त वायु अपने कार्यों से इस शरीर का धारण करते हैं ॥८॥

तत्र जिह्वास्थं किं पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निः? आहोस्वित् पित्तमेवाग्निरिति? अत्रोच्यते—न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरपलभ्यते, आग्नेयस्वात् पित्ते दहनपचनादिष्वभिप्रवर्तमानेऽग्निस्वदुपचारः क्रियतेऽन्तराग्निरिति; क्षीण ह्यग्निगुणे तत्समानद्रव्योपयोगात्, अतिवृद्धे जीतक्रियोपयोगात्, आगमाच्च पश्यामो न खलु पित्तव्यतिरेकादन्योऽग्निरिति ॥९॥

यहाँ पर सन्देह है कि—क्या पित्त से अतिरिक्त और कोई अग्नि इस शरीर में है—या नहीं अथवा पित्त ही अग्नि है। इसका उत्तर यह है कि—पित्त से अतिरिक्त और कोई अग्नि इस शरीर में नहीं मिलती। क्योंकि—आग्नेय होने से तथा पित्त के दहन (जलाना), पचना (पकाना), आदि (रञ्जन-दर्शन) कार्य होने से पित्त में अग्नि के समान व्यवहार होता है। पित्त ही अन्तराग्नि है। पित्त के क्षीण होने पर अग्नि

अ० २१ ]

सूत्रस्थानम्

८५

गुणवाले-अग्नि के समान उष्ण द्रव्यों का उपयोग होता है। पित्त के अधिक बढ़ने पर शीतक्रिया का उपयोग होता है। आगम समस्त आयुर्वेद शास्त्र से भी ज्ञात है कि-पित्त से अतिरिक्त और कोई अग्नि इस शरीर में नहीं मिलती ॥६॥

तच्छादृष्टहेतुकेन विशेषेण पक्वामाशयमध्यस्थं पित्तं चतुर्विधमन्तपानं पचति, विवेचयति च दोषरसमूत्रपुरीषाणि, तत्रस्थमेव चात्मशक्त्या शेषाणां पित्तस्थानानां शरीरस्थ चाग्निकर्माण्मुत्रमृहं करोति, तस्मिन् पित्ते पाचकोऽग्निरिति संज्ञा, यत्तु यकृतप्लोहोः पित्तं तस्मिन् रञ्जकोऽग्निरिति संज्ञा, स च रसस्य रागकृदुक्तः यत् पित्तं हृदयस्थं तस्मिन् साधकोऽग्निरिति संज्ञा, सोऽभिप्रायितमनोरथसाधनकृदुक्तः, यद् दृष्ट्या पित्तं तस्मिन्नालोचकोऽग्निरिति संज्ञा, स रूपग्रहणाधिकृतः, यत्तु त्वच्चि पित्तं तस्मिन् भ्राजकोऽग्निरिति संज्ञा, सोऽभ्यङ्गपरिषेकावगाहालेपनादीनां क्रियाद्रव्याणां पक्ता छायाणां च प्रकाशकः ॥१०॥

प्राक्तन कर्मों के कारण पक्वाशय और आमाशय के मध्य भाग में स्थित पित्त-चार प्रकार के अन्न ( मत्स्य, लेहा, चोष्ण, पेय ) को पंचाता है। उसमें से दोष, रस, मूत्र और मल को पृथक् करता है। पक्वाशय और आमाशय के मध्य में स्थित रहकर ही अपनी शक्ति से शेष पित्तस्थ पित्तों का और अग्नि ( उष्णिमा ) कर्म से शरीर का उपकार करता है, इसी पित्त को 'पाचक अग्नि' कहते हैं। और जो पित्त यकृत एवं प्लीहा में है, उसको 'रञ्जक अग्नि' कहते हैं। क्योंकि यह रस में राग ( रञ्ज ) उत्पन्न करता है। और जो पित्त हृदय में स्थित है, उसको 'साधक अग्नि' कहते हैं, क्योंकि यह अभिप्रायित-मनोरथों ( धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष रूपी पुरुषार्थ ) को सिद्ध करता है। जो पित्त दृष्टि में है उसको 'आलोचक अग्नि' कहते हैं, क्योंकि इसके द्वारा ही रूप का ग्रहण होता है। और जो पित्त त्वचा में है उसको 'भ्राजक अग्नि' कहते हैं। यही अभ्यङ्ग, परिषेक, अवगाहन, अवलेपन आदि क्रिया द्रव्यों का पाक करती है ( शरीर में विलेपन करती है ) और छाया एवं प्रभा को प्रकाशित करती है।

वि० मन्तव्य—साधक अग्नि-पित्त—हृदि तिष्ठति यत् शुद्धं रक्तं ईषत् सपीतकम्। ओजः शरीरे संख्यातं तन्नाशाद् ना विनश्यति ॥ च० सू० अ० ७, श्लो० ७४। अर्थात् हृदय में जो शुद्ध—स्वच्छ कुष्ठ लाल एवं कुष्ठ पीला ( लाल पीला सा )

१ जिस प्रकार कि एक ही देवदत्त अपने कार्यभेद से अनेक नामोंवाला (रसोईया, फोटोग्राफर, अध्यापक, बड़ई) बन जाता है, उसी प्रकार एक ही दोष अपने कार्य एवं स्थानभेद से पाँच प्रकार का हो जाता है।

पदार्थ रहता है वह "ओजस्" है, यही साधक पित्त है। 'साधयति अभिप्रायितमनोरथान् इति साधकम्।' ओजस्वी मानव ही कार्य साधन में समर्थ होता है ॥१०॥

पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीलं पीतं तथैव च ।

उष्णं कटुरसं चैव विदग्धं चाम्लमेव च ॥११॥

पित्त के लक्षण—पित्त-तीक्ष्णगुण ( राई मिर्च के समान ), द्रव, पूति ( सड़ी गन्धवाला ), नील ( सामान्यता में ), पीत ( निरामाक्ष्यता में ), उष्ण, कटुरस ( प्रकृतिस्थ रूप में ), और विदग्धत्वस्थता में अम्ल है ॥११॥

अत ऊर्ध्वं श्लेष्मस्थानान्यनुत्तुष्यास्व्यासामः। तत्र, आमाशयः पित्ताशयस्योपरिष्टात् तत्प्रत्यनीकत्वादूर्ध्वगति-त्वात्तेजसः, चन्द्र इव आदित्यस्य, चतुर्विधस्याहारास्याधारः, स च तत्रोदकैर्गुणैराहारः प्रकिलन्नो भिन्नसंघातः सुखजरो भवति ॥१२॥

इसके आगे कफ के स्थानों को कहते हैं—आमाशय पित्ताशय के ऊपर स्थित है। क्योंकि कफ का स्वभाव पित्त के विरुद्ध है एवं पित्त अग्नि गुण होने से ऊर्ध्वगामी है, पानी अधोगामी होने से अग्नि को शान्त करता है, इसलिये आमाशय पित्ताशय के ऊपर स्थित है, जिस प्रकार कि चन्द्रमा सूर्यमण्डल से ऊपर स्थित है। यह आमाशय चारों प्रकार के आहार का आधार है और यह चार प्रकार का आहार पानी के द्रवस्नेह आदि गुणों के कारण आर्द्र बनकर टुकड़े टुकड़े होकर सुगमता से पचने योग्य हो जाता है।

वि० मन्तव्य—आधुनिक-आमाशयिक रसों को भी पाचक रस कहते हैं, परन्तु आयुर्वेद—उनको क्लेदक कफ मानता है। दोनों कथनों में सम्यक् क्या है पाठक विचार करें। सुख की लाली भी क्लेदक कफ ही है, देखिये सू० ३ पाचक रस पेटिकरस को ही कहना चाहिये ॥१२॥

माधुर्यात् पिच्छलत्वाच्च प्रकलेदित्वात्तथैव च ।

आमाशये संभवति श्लेष्मा मधुरशीतलः ॥१३॥

स तत्रस्थ एव स्वशक्त्या शेषाणां श्लेष्मस्थानानां शरीरस्थ चोदककर्माण्मुत्रमृहं करोति, उरःस्थठिकसन्धारणमात्सवीर्यणान्नरससहितेन हृदयावलम्बनं करोति, जिह्वामूलकण्ठस्थो जिह्वेन्द्रियस्य सौम्यत्वात् सम्यग्रसज्ञाने

१ विष्णुपुराण में कहा है कि—चन्द्रमण्डल सूर्यमण्डल से ऊपर है। यथा—

"भूमयोर्जनलक्षे तु सोरं मैत्रेयमण्डलम् ।

लक्षाद्विवाकरस्यापि मण्डलं शशिनः स्थितम् ॥"

वरक में भी इसको स्पष्ट किया है। यथा—

"एवं रसमलामाक्षमाशयस्यमध्यस्थितः ।

पचत्यग्निर्नयथा स्थाल्यामोदनायाम्बुतण्डुलम् ॥"

[ अ० ३१ ]

सुश्रुतसंहिता

द्वे

वर्तते, शिरःस्थः स्नेहसंतर्पणाधिकृतत्वाद्विन्द्रियाणामात्म- वीर्यणानुग्रहं करोति, सन्धिस्थः श्लेष्मा सर्वसन्धिंसंरले- षात् सर्वसन्ध्यनुग्रहं करोति ॥१४॥

पानी ( कफ ) के गुण—आहार के मधुर, पिच्छल, किल्ल होने से, मधुर-शीतल कफ आमाशय में उत्पन्न होता है । आमाशय में स्थित यह कफ शेष श्लेष्मास्थानों में स्थित श्लेष्मा का तथा क्लेदन-पूर्ण आदि उदक के कार्यों से बारीर का उपकार करता है । उर में स्थित कफ अपने प्रभाव से त्रिक ( पृष्ठवंश का अधोभाग ) का सन्धारण करता है । अन्न रस के साथ मिलकर हृदय का अवलम्बन करता है—( ओज ) । जिह्वामूल और कण्ठ प्रदेश में स्थित कफ—रसेन्द्रिय के सौम्य होने से रस ज्ञान में भली प्रकार कारण बनता है । शिर में स्थित कफ स्नेहन और संतर्पण रूपी कार्य करने से—अपने प्रभाव द्वारा इन्द्रियों का उपकार करता है । सन्धियों में स्थित कफ सब सन्धियों का जोड़ने से सब सन्धियों का उपकार करता है ।

वि० मन्तव्य—“साधुव्यर्त्ति...शीतलः” का अर्थ—आमा- शय में गया हुआ आहार—मीठा हो जाने से, पिच्छल हो जाने से तथा आर्द्रता कारक हो जाने से आमाशयिक रस कफ ही हो सकता है, क्योंकि वह मधुर एवं शीतल है । यदि भोजन करते ही छँदि होती है और वह मीठी एवं पिच्छल ( चिपचिपी ) होती है तो समझा जाता है कि छँदि का वेग केवल आमाशय से ही हुआ है । उसमें पित्त का मिश्रण नहीं हुआ है और आहार गत, कफवर्द्धक उपादान कफ की वृद्धि करते हैं, अतः जितना कफ आहार को आर्द्र करने में व्यय होता है उसकी क्षतिपूर्ति भी साथ-साथ हो जाती है ॥१३,१४॥

भवति चात्र—

श्लेष्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छलः शीत एवं च ।

मधुरस्त्वविदग्धः स्याद्विदग्धो लवणः स्मृतः ॥१५॥

कहा भी है—

श्लेष्मा—कफ श्वेत, गुरु, स्निग्ध, पिच्छल, शीत, मृदु, स्थिर और अपवव अवस्था में मधुररस है । विदग्धपक्वश्लेष्मा लवण रस है ( अथवा प्रकृतिस्थ कफ मधुर रस है और विदग्ध- तिस्थ कफ लवण रस है ) ॥१५॥

शोणितस्थ स्थान यकृतत्लीहानौ, तच्छ प्रागभिहितं, तत्रस्थमेव शेषाणां शोणितस्थानानामनुग्रहं करोति ॥१६॥

रक्त के स्थान यकृत और प्लीहा हैं, यह पहिले कह चुके हैं । अपने इन स्थानों में रहकर ही रक्त अन्य रक्त स्थान में स्थित रक्त का उपकार करता है ॥१६॥

भवति चात्र—

अनुष्णशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तं च वर्णतः ।

शोणितं गुरुं विरक्तं स्याद्विदाहश्यास्य पित्तवत् ॥१७॥

कहा भी है—

रक्त, अनुष्ण शीत ( साधारण ), मधुर, स्निग्ध, रक्त में लाल, गुरु, विरक्त ( आमगन्धि ) है । पित्त के समान इसका विदाह है । जिस प्रकार और जिन वस्तुओं से पित्त विदग्ध होता है, उसी प्रकार और उन्हीं वस्तुओं से रक्त भी विदग्ध होता है ॥१७॥

एतानि खलु दोषस्थानानि, एषु संचीयन्ते दोषाः । प्राक् संचयहेतुरक्तः । तत्र संचितानां खलु दोषाणां स्तब्धपूर्णकोष्ठता पीतावभासता मन्दोष्मता चाङ्गानां गौरवमालस्यं चयकारणविद्वेषश्चेति लिङ्गानि भवन्ति । तत्र प्रथमः क्रियाकालः ॥१८॥

इन उपयुक्त स्थानों में वात आदि दोषों का सञ्चय होता है । दोषों के सञ्चय के कारण ऋतुचर्या-अध्याय में पहिले कह दिये हैं । इन संचित दोषों में—कोष्ठ का स्तब्ध ( जड़ ) होना और पूर्ण ( आध्मन ) होना—वायु का, पीलापन दिखाई देना ( नेत्र-त्वचा-मल में )—पित्त का, उष्णमा का कम होना, और अङ्गों में भारीपन एवं आलस्य का होना कफ का लक्षण है । एवं संचय के कारणों में द्वेष होना—तीनों दोषों का लक्षण है । यह वातादि दोषों के लिये प्रथम कार्य का समय है ॥१८॥

अत ऊर्ध्व प्रकोपणानि वक्ष्यामः । तत्र बलवद्विप्रहा- तिव्यायामव्यायाध्ययनप्रपतनप्रधावनप्रपीडनाभिवातल- ङ्गनप्लवनप्रतरणरात्रिजागरणभारहरणजतुरगरथपदाति- चर्याकटुकषायतिकृत्कृत्स्नलघुशीतवीर्यशुष्ककाकवत्स्वर- कोहालककोरदूषयामाकनावारसुदृगमसूराढकीहरेणुकला- यनिष्पावानशनविषमाशनाध्यशनवातमूत्रपुरीषशुक्लच्छि- क्ष्वथूद्वीगरवाप्पवेगविधातादिभिर्विशेषवायुः प्रकोपमाप- द्यते ॥१९॥

इसके आगे दोषों के प्रकोपक कारणों को कहते हैं । यथा—बलवान् मल्लों के साथ मल्लयुद्ध करना, अतिव्यायाम, अति स्त्री-सेवन, अति अध्ययन, गिरना, दोड़ना, बहुत दबाना, चोट लगाना, लड्डूघन, कूदना, नदी में तैरना, रात में जागना, भार का उठाना, हाथों-पैरों-रथ पर सवारी या पैदल बहुत चलना ( सवारी करना ), कटुकषाय-तिकृत्, लूध, लघु, शीतवीर्य भोजनों का खाना, शुष्क मांस, बरक (कुधान्य-बरटिका), उद्हालक (जङ्गली कांदों), कोरदूष-श्यामाक (सांवक), नीवार (प्रसाधिका), मूङ्ग, मसूर, अरहर, हरेणु (मटर), कलाय, निष्पाव (राजशिम्बो), इनका खाना, उपवास, विषमाशन, अध्यशन (खाने पर खाना), वायु-मूत्र-मल-शुक्ल-छि-छीक- उद्वीगर-आसू के उपस्थित वेगों को रोकने (काम-भय आदि) से वायु कुपित होती है ॥१९॥

स शीताध्रप्रवातेषु घर्मान्ते च विशेषतः ।

प्रत्युपस्यपरान्ते च जीण्डन्ने च प्रकृप्यति ॥२०॥

अ० २१ ]

सूत्रस्थानम्

८७

वायु शीतकाल में, बादलों के आनेपर जोर की वायु चलने पर, वर्षा काल में—विशेषकर, कुपित होती है। उषाकाल में, अपराह्ण (तीसरे पहर में) और अन्न के जीर्ण होने पर वायु कुपित होती है ॥ २० ॥

क्रोधगोकभयायासोपवासविदग्धमैथुनोपगमनकट्क्मल्लवणतीक्ष्णलघुविदाहितिल्लैलपिण्याककुलस्थसर्पपातसिहरितकशकागोधामरस्याजाविकमांसदधितककृचि-कामस्तुसौवीरकसुराविकाराम्लफलकट्क्मप्रभृतिभिः पित्तप्रकोपमापद्यते ॥ २१ ॥

निम्न कारणों से पित्त प्रकुपित होता है —क्रोध, शोक, भय, परिश्रम, उपवास, आहारादिजन्य विदाह, मैथुन, कटु-अम्ल-लवण-तीक्ष्ण-उष्ण लघु विदाही (खट्टे डकार आये, दाह-प्यास लगे और जो कठिनाई से जीर्ण हो—पदार्थ विदाही), तिलका तेल, पिण्याक, कुलस्थी, सरसों, अलसी, हरितशाक, गोधा मछली, बकरी-भेड़ का मांस, स्नेह युक्त दधि, तक, कूर्चिका (विप्रथित-फटी छाछ), मस्तु, सौवीरक (कांजी), सुरा विकार (सब मद्य), अम्ल फल (आमातक कमरख आदि), कट्क्म (स्नेह रहित दधि), चुक आदि से पित्त प्रकुपित होता है ॥ २१ ॥

तदुष्णैरुष्णकाले च घनान्ते च विशेषतः ।

मध्याह्ने चार्धरात्रे च जीर्णैत्यन्ने च कुप्यति ॥ २२ ॥

उष्ण द्रव्यों के सेवन से, ग्रीष्मऋतु में, शरदऋतु में, मध्याह्न में, आधी रात में तथा भोजन के पचने के समय पित्त प्रकुपित होता है ॥ २२ ॥

दिवारस्वप्नाऽव्यायामालस्यमधुराम्ललवणशीतस्निग्धगुरुपिच्छिळाभिष्यनिदहायनकयवकनैषवैकटमाषमहामाषगोधूमतिल-पिष्ट-विकृतिदधितुधुकृशरापायसेलुविकारानूपौदकमांसवसाविसमुणालकसेरुकशृङ्गाटकमधुरवल्ली-फलसमगनाध्यशनप्रभृतिभिः श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते ॥ २३ ॥

निम्न कारणों से कफ कुपित होता है । यथा—दिन में सोने से, व्यायाम न करने से, आलस्य, मधुर-अम्ल-लवण-शीत स्निग्ध-गुरु-पिच्छिल, अभिष्यनिद भोजनों से, हायनक (धान्य विशेष) यवक (शूकधान्य विशेष), नैषध, इत्कट (धान्य विशेष), माष, राजमाष, गेहूँ, तिल-पिष्ट (तिलकुट), पिष्ट-विकृति, दही, दूध, कुरारा (तिल तण्डुल-माष से बनी यवामू), खीर, गन्ने से बने पदार्थ, आनूप-मांस-वसा, औदक प्राणियों का मांस-वसा, विस (मिस), मुणाल (पद्ममूल), कसेरु, सिंघाड़ा, मधुरफल (ताड़ नारियल आदि), बल्लीफल (अलाबु आदि), समशन (हित-अहित वस्तुओं का खाना), अध्यशन (अजीर्ण में भोजन करना), इनसे कफ प्रकुपित होता है ॥ २३ ॥

स शीतैः शीतकाले च वसन्ते च विशेषतः ।

पूर्वाह्ने च प्रदोषे च सुक्तात्रे प्रकुप्यति ॥ २४ ॥

शीतल द्रव्यों से, शीतकाल और वसन्त में, पूर्वाह्न में, और रात्रि के प्रथम पहर में तथा भोजन करते ही कफ कुपित होता है ॥ २४ ॥

पित्तप्रकोपणैरेव चाभीदृणं द्रवस्तिग्धगुरुभिराहारैर्दिवास्वप्नक्रोधानलातपश्रमाभिघाताजीर्णविरुद्धाध्यशनादि-भिर्विशेषैरस्तु प्रकोपमापद्यते ॥ २५ ॥

निम्न कारणों से रक्त कुपित होता है। पित्त प्रकोप के कारणों से एवं बार-बार द्रव, स्निग्ध, गुरु भोजनों के सेवन से, दिन में सोने से, क्रोध, आग, धूप, श्रम, चोट के लगने से, विरुद्ध भोजन, अध्यशन आदि कारणों से रक्त कुपित होता है ॥ २५ ॥

यस्माद्भक्तं विना दोषैर्न कदाचित् प्रकुप्यति ।

तस्मात्तस्य यथादोषं कालं विद्यात् प्रकोपणे ॥ २६ ॥

रक्त विना दोषों के—स्वतन्त्र रूप में कभी प्रकुपित नहीं होता। रक्त के प्रकोप में दोष के अनुसार समय समझना चाहिये। (वात से दूषित रक्त—वातप्रकोपकाल में कुपित होता है, पित्त के दूषित रक्त—पित्त प्रकोपकाल में, कफ से दूषित रक्त कफप्रकोपकाल में कुपित होता है) ॥ २६ ॥

तेषां प्रकोपात् कोष्ठतोदसंचरणाम्लिकापिपासापरिदाहाश्लेष्मद्वयोत्कलैदाश्च जायन्ते । तत्र द्वितीयः क्रियाकालः ॥ २७ ॥

इन दोषों के प्रकोप से कोष्ठ में पीड़ा, संचरण (परिभ्रमण-वायु के लक्षण), अम्लिका (अम्लोद्गार), पिपासा, परिदाह (जलन—पित्त के लक्षण), अन्न में विद्रेष, हृदयोत्कलैद (हृदलास—कफ के लक्षण) उत्पन्न होते हैं। यह दूसरा क्रियाकाल है ॥ २७ ॥

अत ऊर्ध्वं प्रसरं वदयामः—तेषामेभिरातङ्गविशेषैः प्रकुपितानां किण्वोदकपिष्टसमवाय इवोद्भितानां प्रसरो भवति। तेषां वायुर्गीतमस्त्वात् प्रसरणहेतुः सत्यप्यचैतन्ये। स हि रजोभूषिष्ठः, रजश्च प्रवर्तकं सर्वभावानाम्। यथा—महातुदकसंचयोऽतिबुद्धः सेतुमवदार्थापरेणोदकेन व्यामिश्रः सर्वतः प्रधावति, एवं दोषाः कदाचिदेकशो द्विशः समस्ताः शोणितसहिता वाऽनेकधा प्रसरन्ति। तद्यथा—वातः, पित्तः, श्लेष्मा, शोणितं, वातपित्ते, वातरुलेष्माणौ, पित्तश्लेष्माणौ, वातशोणिते, पित्तशोणिते, श्लेष्मशोणिते, वातपित्तशोणितानि, वातरुलेष्मशोणितानि, पित्तश्लेष्मशोणितानि, वातपित्तकफाः, वातपित्तकफशोणितानीति, एवं पञ्चदशाधा प्रसरन्ति ॥ २८ ॥

इसके आगे दोषों का प्रसार कहते हैं

जिस प्रकार किण्व (सुराबीज), पिष्ट (तण्डुलपिष्ट) और पानी के मिश्रण में एक रात रखने पर—उफान आता है उही

[ २० २१ ]

सुश्रुतसंहिता

८८

प्रकार उपर्युक्त कारणों से कुपित हुए दोषों का प्रसर होता है। अचेतन होने पर भी वायु ही इन सब में गति का कारण है, क्योंकि वायु में ही गति है। क्योंकि वायु ही रजोबहुल है, और रज ही सब पदार्थों का प्रवर्तक है। यथा—जिस प्रकार बहुत अधिक संचित हुआ पानी बन्ध को तोड़कर दूसरे पानी के साथ मिलकर चारों ओर दौड़ने लगता है, उसी प्रकार दोष कुपित होने पर एक दोष से, कभी दोषों से, कभी तीनों दोषों से और कभी रक्त से मिलकर अनेक रूप में फैलते हैं। यथा—वात, पित्त, श्लेष्मा, रक्त, वात-पित्त, वात-श्लेष्मा, पित्त-श्लेष्मा; वात-रक्त, पित्त-रक्त, कफ-रक्त, वात-पित्त-रक्त, वात-कफ-रक्त, पित्त-कफ-रक्त, वात-पित्त-कफ, वात-पित्त-कफ-रक्त, इस प्रकार से पन्द्रह रूप में शरीर में फैलते हैं। यह दोषों का प्रसर है ॥२८॥

कृत्स्नेऽर्धऽवयवे वाऽपि यत्राङ्गे कुपितो भ्रमम् । दोषो विकारं नभसि मेघवत्तत्र वर्षति ॥ २९ ॥ नात्यर्थं कुपितश्चापि लीनो भागेषु तिष्ठति । निऽप्रत्यनीकः कालेन हेतुमासाद्य कुप्यति ॥३०॥

शिर-वाहू-जङ्घा—आदि सम्पूर्ण या आधे अथवा एक भाग (चिबुक-पांव आदि अङ्ग) में बहुत अधिक प्रकुपित हुआ दोष उसी स्थान में विकार उत्पन्न करता है, जिस प्रकार आकाश में एक भाग में स्थित बादल उसी जगह वर्षा करता है; सब जगह नहीं करता। इसी प्रकार दोष जहाँ पर कुपित होते हैं, वही रोग पैदा करते हैं। बहुत अधिक संचित होने पर भी—प्रकोप कारणों के अल्प होने के कारण दोष सहसा विकार को उत्पन्न न करके मार्ग में छिपकर बैठ जाता है। यदि दोष की चिकित्सा न की जाये तो समयवश कारण (प्रकोपकारणों) को पाकर फिर कुपित हो जाता है। (यदा होते त्रयो निदानादिविधोषाः परस्परं नानुबन्धन्ति अथवा कालप्रकर्षाद् अवलीयांसोऽनुबन्धन्ति न तदा विकाराभिनिर्वृत्तिः। चिराद् वाऽप्यभिनिर्वर्तन्ते, तनवो वा भवन्ति। चरकः) ॥ २९ ३० ॥

तत्र वायोः पित्तस्थानगतस्य पित्तवत् प्रतीकारः, पित्तस्य च कफस्थानगतस्य कफवत्, कफस्य च वातस्थानगतस्य वातवत्, एष क्रियाविभागः ॥३१॥

पित्तस्थान में पहुँची वायु की पित्त के समान चिकित्सा है, और कफस्थान में पित्त के पहुँचने पर कफ के समान; और वातस्थान में पहुँचे कफ की—वायु के समान चिकित्सा है। यह चिकित्सा कार्य का विभाग है ॥ ३१ ॥

एवं प्रकुपितानां प्रसरतां वायोर्विमार्यगमनस्योपौ, ओषचोषपरिदाहयुमायनानि पित्तस्य अरोचकाविपाकाङ्गसादरुर्ध्वदिश्चेति श्लेष्मणो लिङ्गानि भवन्ति, तत्र तृतीयः क्रियाकालः ॥३२॥

इस प्रकार से प्रकुपित एवं प्रसरित वायु अपने स्वाभाविक मार्ग से अन्य मार्ग में जाने लगती है और दर्द के साथ पेट में विक्षोभ करती है। पित्त-ओष (उष्णमा), चोष (एक प्रदेश में दाह), सर्वत्र जलन, धूम-मिश्रित उद्गार करता है। कफ-अरुचि, अविपाक, अङ्गों में शिथिलता, वमन—ये लक्षण उत्पन्न करता है। यह तीसरा काल है ॥ ३२ ॥

अत ऊर्ध्वं स्थानसंश्रयं वदयामः। एवं प्रकुपिताः तांस्तान् शरीरप्रदेशानाम्गम्य तांस्तान् व्याधीन् जनयन्ति। ते यदोदरसन्निवेशं कुर्वन्ति तदा गुल्मविद्रध्युदराभिसङ्घा-नाहविस्फुचकातिसारप्रभृतीञ्जनयन्ति, बस्तिगताः प्रमेहा-इमरीमूत्राघातमूत्रदोषप्रभृतीन्, मेढ्रगता निरुद्धप्रकणोपदं-शशूकदोषप्रभृतीन्, गुदगता भगन्दराशःप्रभृतीन्, वृषण-गता वृद्धाः, ऊर्ध्वजन्त्रगतास्तूर्ध्वजान्, त्वञ्मांसजोणितस्थाः जुद्ररोगान्कुष्ठानि विसर्पाश्च, मेहोगता ग्रन्थयपच्यवृंदगल-गण्डालजीप्रभृतीन्, अस्थिगता विद्रध्यनुशयप्रभृतीन्, पादगता श्लोपदवातशोणितवातकण्टकप्रभृतीन्, सर्वाङ्ग-गता उवरसर्वाङ्गरोगप्रभृतीन्, तेषामेवमभिसन्निविष्टानां पूर्वस्प्रपादुर्भावः, तं प्रतिरोगं वदयामः। तत्रपूर्वरूपगतेषु चतुर्थः क्रियाकालः ॥ ३३ ॥

फैलते हुए दोषों का जहाँ संग होता है, वह कहते हैं—उपर्युक्त कारणों से कुपित दोष शरीर के उस उस प्रदेश में पहुँच वहाँ उन उन रोगों को करते हैं—वे दोष जब उदर में स्थान बनाते हैं तब गुल्म, विद्रधि, उदर, अग्निमान्द्य, आनाह विस्फुचिका आदि रोगों को उत्पन्न करते हैं। बस्ति में आश्रय बनाकर—प्रमेह, अश्मरी, मूत्राघात और मूत्रदोष आदि को, वृषण में पहुँचकर—वृद्धि रोग को, मेढ्र में पहुँचकर—निरुद्ध-प्रकण्ड, उपदंश, शूकरोग आदि को उत्पन्न करते हैं। गुदा में पहुँचकर भगन्दर, अर्श आदि को, जन्त्र के ऊपर (वक्ष-अंस-सन्धिजन्त्र) पहुँचकर जन्त्र के ऊपर के रोगों को, त्वचा-मांस एवं रक्त का आश्रय करके क्षुद्र रोगों को, कुष्ठ एवं विसर्प रोग को, मेढ्र का आश्रय लेकर—प्रन्थि, अपची, अर्बुद, गलगण्ड, अलजी आदि रोगों को, अस्थि का आश्रय लेकर—विद्रधि आदि को पाद का आश्रय लेकर—श्लोपद, वातरक्त, वातकण्टक आदि रोगों को, सम्पूर्ण अङ्गों का आश्रय लेकर—ज्वर

१ प्रकोपश्रीर प्रसरमे भेद—जमे हुए घी को आग पर गरम करने पर घी का हिलना मात्र दोषों का प्रकोप है। शरीर यदि घी अधिक गरम करने पर झग आकर बाहर गिरने लगता है, इसका नाम प्रसर है। इसी प्रकार कड़ाही में दूध को गरम करना है। कड़ाही में दूध उबलता रहे यह प्रकोप, उफनकर बाहर आये यह प्रसर है।

अ० २१ ]

१२

सूत्रस्थानम्

८६

एवं सर्वाङ्गात्-व्याधि को, उत्पन्न करते हैं। इन दोषों का अत्यर्थ सन्निवेश होने पर रोग के जो पूर्वरूप—लक्षण उत्पन्न होते हैं, उन लक्षणों को प्रत्येक रोग में यथास्थान कहेंगे। पूर्वरूप (भावि रोग के प्रारम्भिक लक्षण) के लक्षण प्रकट होने पर—चतुर्थ क्रियाकाल है ॥३३॥

अत ऊर्ध्वं व्याधेर्वर्शनां बद्ध्यामः—शोफार्बुदप्रस्थिवि-द्वधिविसर्पप्रभृतीनां प्रत्यक्षलक्षणता ज्वरातीसारप्रभृतीनां च। तत्र पञ्चमः क्रियाकालः ॥३४॥

इसके आगे रोग के दर्शन (ज्ञान) को कहते हैं। यथा—शोफ (स्वचा-मांस में दोष का एकत्रित होना), अर्बुद, प्रस्थि, विद्वधि, विसर्प आदि एवं ज्वर (सन्ताप लक्षण), अतिसार आदि रोगों के लक्षणों का स्पष्ट हो जाना यह-पञ्चम-(पाँचवाँ) क्रियाकाल है। व्याधि की विरुद्ध चिकित्सा करने का पाँचवाँ काल है ॥३४॥

अत ऊर्ध्वमेतेषामवदोषीनां व्रणभावमापन्नानां षष्ठः क्रियाकालः, ज्वरातिसारप्रभृतीनां च दीर्घकालानुबन्धः। तत्रापतिक्रियमाणेऽसाध्यतामुपयान्ति ॥३५॥

इसके आगे शोफ आदि के पककर फूट जाने पर तथा ज्वर, अतिसार आदि के दीर्घकाल पर्यन्त अनुबन्ध (लगा रहना) रहने पर छठा क्रिया काल है। इस समय चिकित्सा न करने पर वे रोग असाध्य हो जाते हैं ॥३५॥

भवति चात्र—

संचयं च प्रकोपं च प्रसरं स्थानसंश्रयम् ।

व्यक्ति भेदं च यो वेत्ति दोषाणां स भवेद्विषक् ॥३६॥

कहा भी है—

जो दोषों के संचयकाल को प्रकोपकाल को, प्रसरकाल को, स्थान-आश्रय को, व्यक्ति के भेदों (पूर्वरूप तथा रूप) को जानता है, वह वास्तव में वैद्य है ॥३६॥

संचयेऽपहृता दोषा लभन्ते नोत्तरा गतीः ।

ते तूत्तरासु गतिषु भवन्ति बलवत्तराः ॥३७॥

संचयकाल में ही यदि दोषों का अपहरण कर दिया जाये, तो अगली गतियों को प्राप्त नहीं करते। उत्तरोत्तर स्थिति में पहुँचकर दोष अधिक—अधिक बलवान् होते जाते हैं। (अपहरण विधि—बहुदोष में शोधन, मध्यमदोष में—लङ्घन-पाचन, अल्पदोष में संशमन किया करनी चाहिये) ॥३७॥

१ तत्र लङ्घनमल्पबलदोषाणां लङ्घनेन ह्यनिमास्तवृद्ध्या वातातपरीतमिवाल्पमुदकमल्पो दोषः प्रदोषमापद्यते। लङ्घनपाचने तु मध्यमबलदोषाणाम् । बहुदोषाणां पुनर्दोषावसेचनमेव कार्यम्—नह्यभिन्ने केदारसेतो प्लवलाप्रसोकोऽस्ति तद्वद् दोषावसेचनम् ॥

चरक० वि० अ० ३।४४।

सर्वैर्भावेऽिभिर्वाऽपि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः ।

संसर्गे कुपितः कुद्वं दोषं दोषोऽनुधावति ॥३८॥

तीन से अधिक सब भावों से (वायु के लिये रुक्ष आदि, पित्त के लिये उष्णिमा आदि, कफ के लिये स्निग्धत्व आदि), या तीन भावों के अथवा दो के या एक ही भाव के संसर्ग होने पर कुपित हुआ दोष, कुद्व हुए दोष के साथ लग जाता है। अनुबन्ध और अनुबन्ध रूप में मिल जाते हैं। प्रथम कुद्व हुए दोष को अनुबन्ध कहते हैं, और जो दोष साथ में मिलता है उसको अनुबन्ध कहते हैं। प्रधान व्यक्त लक्षणोंवाला रोग अनुबन्ध, दूसरा गौण—असङ्घता लक्षणवाला अनुबन्ध है ॥

संसर्गे यो गरीयान् स्यादुपक्रम्यः स वै भवेत् ।

शेषदोषाविरोधेन सन्निपाते तथैव च ॥३९॥

दोषों के परस्पर संसर्ग में जो दोष बलवान् हो, उसी दोष की चिकित्सा सब से प्रथम करनी चाहिये। चिकित्सा करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि शेष—दूसरे दोष के साथ इस चिकित्सा का विरोध न हो। यही विधि सन्निपात में (तीनों दोषों के मिलने पर) भी बरतनी चाहिये ॥

वृणोति यस्माद्दृढेऽपि व्रणवस्तु न नश्यति ।

आदेहधारणात्तस्माद् व्रण इत्युच्यते बुधैः ॥४०॥

व्रण शब्द की निरुक्ति—यह आच्छादन करता है (वृणोति) इसलिये व्रण है, भर जाने पर—अच्छा हो जाने पर भी व्रण का चिह्न नष्ट नहीं होता है, इसलिये व्रण कहते हैं। जब तक जीवन रहता है, तब तक व्रण (चिह्न) रहता है, इसलिये 'व्रण' कहा जाता है। (व्रण का लक्षण चिकित्सा में—'व्रण गात्रविचूर्णने' 'व्रणयतीति व्रणः' दिया है।) ॥४०॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणप्ररनाध्यायो

नामैकविंशोऽध्यायः ॥२१॥

—*:—

१ स्वतन्त्रो व्यक्ततिलगो यथोक्तसमुत्थानप्रशमो भवत्यनुबन्धः। तद्विपरीतलक्षणस्त्वनुबन्धः। अनुबन्ध्यात्तुल्यसमन्वित्तास्तत्र यदि दोषा भवन्ति तत् त्रिकं सन्निपातमाच्छत्ते, द्रव्यं वा संसर्गम्। अनुबन्ध्यानुबन्धविशेष-कृतस्तु बहुविधो दोषभेदः ॥

चरक० वि० अ० ६।११

२ श्रोघाणकर जी ने इसमें प्रधान और अप्रधान दोष का निर्णय माना है। उनका कहना है कि जब कुपित दोषों का संसर्ग होता है, तब तीन, दो या एक भाव से कुपित हुआ दोष सर्वभाव से कुपित हुए दोष में लीन हो जाता है, इस नियम के अपवाद भी हैं। यथा—अतिसार में 'त्रयाणां वा जयेत्पूर्वं यो भवेत् बलावत्तमः' कहा है, परन्तु ज्वर में 'कफस्यात्तानुपूर्व्यां वा सन्निपातज्वरं जयेत्।' इसी से अष्टांगसंग्रह में 'इतु सब मर्तों का संग्रह किया है। देखिये संग्रह सूत्र अ० २१।

६०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २२ ]

द्वारिंशतितमोऽध्यायः

अथातो व्रणस्त्रावविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥

इसके आगे 'व्रणस्त्रावविज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

त्वङ्मार्गसिरास्नायवस्थिसन्धिकोष्ठमर्माणित्यष्टौ व्रण-वस्तूनि । अत्र सर्वव्रणसन्निवेशः ॥३॥

त्वचा, मांस, सिरा, स्नायु, अस्थि, सन्धि, कोष्ठ और मर्म ये आठ व्रण के अधिष्ठान (स्थान) हैं। इन्हीं आठ स्थानों में सब प्रकार के व्रण उत्पन्न होते हैं। चरक में—त्वचा, सिरा, मांस, मेद, अस्थि, स्नायु, मर्म और अन्तराश्रय (कोष्ठ) ये आठ माने हैं।

वि० मन्तज्य—'व्रणवास्तूनि' पाठ भी है। अर्थ है—व्रण के वास्तु अर्थात् स्थान या घर। इस अध्याय में—व्रण के स्थान, आकार, साध्यत्व दोषकारण, दुष्ट (बुरे) व्रणों के लक्षण, स्त्राव स्थानमेद से स्त्राव, व्रण में होनेवाली वेदनाएँ और व्रणों के वर्ण कह दिये गये हैं ॥३॥

तत्र, आद्यैरुक्तस्तुसन्निवेशी त्वरभेदी व्रणः सूपचरः, शेषाः स्वयमविदीयमाणो दुरुपचराः ॥४॥

इनमें त्वचा में स्थित, त्वचा का मेदन करनेवाला व्रण सुखमध्य—भली प्रकार से स्वस्थ हो जाता है। शेष स्थानों में स्थित व्रण—जो स्वयं विदीर्ण नहीं होते हैं अतः कठिनाई से अच्छे होते हैं ॥४॥

तत्रायतश्चतुरसौ वृत्तबिपुटक इति व्रणाकृतिसमासः, शेषास्तु विकृताकृतयो दुरुपकमा भवन्ति ॥५॥

संक्षेप में व्रण की आकृतियाँ चार प्रकार की हैं—आयत (दीर्घ), चतुरस (चौकोर), वृत्त (गोल), बिपुटक (त्रिकोण), शेष (अर्द्ध चन्द्राकार-स्वस्तिक आदि) आकृतियाँ विकृत दूषित हैं, इसलिये कुच्छ्रुतमध्य हैं ॥५॥

सर्व एव व्रणाः क्षिप्रं संरोहन्त्यात्मवर्ता सुभिषरिभ-श्रोपक्रान्ताः, अनात्मवर्तामज्ञैश्रोपक्रान्ताः प्रदुष्यन्ति, प्रवृद्धत्वाशेषणाम् ॥६॥

पथ्य-आहार-विहार का सेवन करनेवाले जितेन्द्रिय पुरुषों के, उत्तम वैद्यों द्वारा चिकित्सा किये जाने पर—सब प्रकार के व्रण शीघ्र भर जाते हैं। अहिताहार-विहार करनेवाले अजितेन्द्रिय पुरुषों के—मूढ़ वैद्यों से चिकित्सा करने पर सब व्रण दूषित हो जाते हैं—क्योंकि इनमें दोष बहुत बढ़े होते हैं ॥६॥

तत्रातिसंयुतोऽतिविद्युतोऽतिकठिनोऽतिमृदुरक्तसन्धोऽव-सन्धोऽतिशीतोऽत्युष्णः कृष्णरक्तपीतशुष्कदादीनां वर्णानाम-

न्यतमव्रणो भैरवः पूतिपूयमांससिरास्नायुप्रभृतिभिः पूर्णः पूतिपूयास्त्राल्युन्मागर्गुत्सङ्गचमनोद्वादशैर्नग्नधोऽत्यर्थ वेदनावान् दाहपाकरागकण्डूशोफपिडकोपदुतोऽत्यर्थ दुष्टशोणितास्त्रावी दीर्घकालानुबन्धी चेति दुष्टव्रणलिगानि । तस्य दोषोच्छ्रायेण षट्त्वं त्रिभञ्ज्य यथास्वं प्रतीकारे प्रयतेतेति ॥

दुष्ट व्रण के लक्षण—अतिसंकुचित, अतिविस्तृत (पित्तरक्त से), अतिकठिन (वात से), अतिमृदु (कफ से), उत्तत मांस, हीन मांस, अति शीत, अति उष्ण, काला-पीला-सफेद इनमें से कोई एक रंग हो, भैरव (डरावने लक्षणोंवाला), सड़ी पूय, सड़े मांस, गली सिरा-स्नायु आदि से परिपूर्ण, सड़ी पूय बहती हो, उन्मागी (तिर्गंगामी) उत्संगी (ऊर्ध्वगति), अशोभन दर्शन, अशोभन गन्ध, अतिवेदनावान्, दाह-पाक-लालिमा-कण्डू-शोफ-पिडिका इन उपद्रवों से युक्त, दुष्ट रक्तस्त्राव करनेवाला, चिरकालीन, ये दूषित व्रण के लक्षण हैं। इस व्रण को दोषों की प्रधानता से छे भागों में (वर्त, पित्त, कफ, रक्त, सन्निर्गत और आगर्गुज) विभक्त करके दोषानुसार चिकित्सा करने का प्रयत्न करना चाहिये ॥७॥

अत ऊर्ध्वं सर्वस्त्रावान् वक्ष्यामः—तत्र घृष्टासु छिन्नासु वा त्वत्तु स्फोटे भिन्ने विदारिते वा सलिलप्रकाशो भवत्यास्त्रावः किंचिद्विस्तः पीतावभासश्च, मांसगतः सर्पिःप्रकाशः सान्द्रः श्वेतः पिच्छिलश्च, सिरागतः सद्यश्चिन्नासु सिरासु रक्तातप्रवृत्तिः पक्वासु च तोयनाडीभिरिव तोयागमनं पूयस्य आस्त्रावश्चात्र तनुर्विच्छिन्नः पिच्छिलोऽवलम्बी श्यावोऽवश्यायप्रतिमश्च, स्नायुगतः स्निग्धो घनः सिंघाणकप्रतिमः सरक्तश्च, अस्थिगतोऽस्थन्यभिहते स्फुटिते भिन्ने दोषावदारिते वा दोषभक्षितत्वादस्थि निःसारं शक्तिधौत-मिवाभाति, आस्त्रावश्चात्र मज्जभिन्नः सरुधिरः स्निग्धश्च, सन्धिगतः पीड्यमानो न प्रवर्तते, आकुञ्चनप्रसारणोन्मन-नविनमनप्रधावनोत्कासनप्रवाहपैश्च रुचति, आस्त्रावश्चात्र पिच्छिलोऽवलम्बी सरुधिरोन्मथितश्च, कोष्ठगतोऽसूक्ष्मत्रुपरीषपूयोदकानि श्रवति, मर्मगतस्तवगादिष्वव-रुद्धत्वान्नोच्यते। तत्र त्वगादिगतानामास्त्रावाणां यथाक्रमं पारुष्यश्यावावश्यायदधिमस्तुक्षारोदकमांसधावनपुलाकोदकसन्निभत्वानि मारुताद्भवन्ति, पित्ताद् गोमेदकगोमूत्र-भस्मगङ्गकषायोदकमाध्वीकतैलसन्निभत्वानि, पित्तवद्-क्तादतिविस्तृत्वं च, कफान्नवनीतकासीसमज्जपिष्टविल-नालिकेरोदकवराहवसासन्निभत्वानि, सन्निपातान्नालि-

१ कविराज हाराणचन्द्र जो ने—उत्पन्न (ऊपर को उठा), अवसन्न (नीचे को दबा), उन्मागी (ऊर्ध्वमुख), उत्संगी (कोटरवादी) यह अर्थ किया है।

अ० २२ ]

सूत्रस्थानम्

६१

केरोदकैर्वा रूकरसकाजिकप्रसादा रूकोदकप्रियङ्गुफलयुक्तमुद्गनयूषसवर्णत्वानोति ॥३॥

इसके आगे सुव प्रकार के खावों को कहते हैं—

आगन्तुज कारणवश त्वचा पर रगड़ लगने से या कट जाने से, अथवा अन्तःकारण से त्वचा के फटने से, ब्रण के विदीर्ण होने से पानी के समान पतला कुल आमगन्धि और पीले रंग का सा खाव होता है। सांसर्गत ब्रण का खाव-घी के समान , साद्ध (घना), रुचेत और पिच्छिल होता है। आगन्तुज कारण से शिरा के तुरन्त कट जाने से रक्त बहुत बहता है । शिरा के अन्तःकारण से पक होकर विदीर्ण होने पर पानी के समान पूय बहती है, खाव-पतला, थोड़ा थोड़ा, पिच्छिल, अवलम्बनशील (रुकनेवाला), काला-सा एवं ओस के कणों के समान बूंद-बूंद होता है। स्नायुगत ब्रणों का खाव स्निग्ध, घन, नासिका के मल के समान और रक्तमिश्रित होता है। अस्थिगत ब्रण में अस्थि पर चोट लगने से अस्थि फटती है, टूटती है। दोष के कारण अस्थि के विदीर्ण होने पर अस्थि साररहित हो जाती है-क्योंकि दोष के कारण अस्थि खाई जाती है। इसलिये अस्थि-सोप के समान, धुले वस्त्र के समान सफेद चमकती है। और अस्थि का खाव-मजा एवं रक्तमिश्रित, स्निग्ध होता है। सन्धिगु में खाव होने से दबाने से बाहर नहीं आता, परन्तु अङ्ग को सिकोड़ने फैलाने, ऊपर उठाने, नीचे करने, दौड़ने, खाँसने और प्रवाहण (खाँचने) से बाहर आता है। इसमें खाव का रंग-पिच्छिल, अवलम्बी (रुकनेवाला), झाग और पूयमिश्रित एवं कुछ रक्त, मथित (मथा सा) होता है। कोष्ठगत ब्रण में —रक्त, मूत्र, मल, पूय और जल रस बलेद (या पानी) क्षवित होता है। सर्गगत खाव का अन्तर्भाव त्वग आदि के खाव में ही हो जाता है, इसलिये अलग नहीं कहते।

इनमें त्वग आदि स्थानों के खाव वात आदि दोषों के क्रमानुसार निम्न हैं। यथा—

वायु के कारण —कठोरता, कालापन, ओस के समान बूंद, दधि, मस्तु, क्षारोदक, मांस के धोवन के समान, पुलाकोदक (गवेधुक के या धान की पुराली के पानी) के समान वायु से खाव होता है, पित्त के कारण खाव गोमेद के समान, गोमूत्र, शंख भस्म, कपायोदक के समान, माध्वीक (महुवे) के, तैल के समान होता है। रक्त के कारण खाव पित्त की भांति होता है और बहुत दुर्गन्ध युक्त होता है। कृफ के कारण मक्खन, कासीस, मज्जा के, पिष्ट (पीसे) तिल के-नारियल के पानी के, बराह की बछा के समान होता है। सन्निपात के कारण खाव नारियल के पानी, ककड़ी के रस के, काँजी के ऊपर के स्वच्छ भाग के, आरु (आरु), प्रियंगु के फल, यकृत और मूत्र के धूप के समान होता है ॥४॥

इलोकौ चात्र भवतः—

पक्वाशयादासाध्यस्तु पुलाकोदकसन्निभः।

क्षारोदकनिभः खावो वख्यो रक्ताशयात्स्ववन् ॥६॥

आमाशयात् कलायाम्भोनिभश्च त्रिकसन्निभः।

खावानेतान् परीक्ष्यादौ ततः कर्माचरेद् भिषक् ॥१०॥

दो श्लोक भी कहे हैं—

पुलाकोदक (पुराली के पानी) के समान-पक्वाशय से होने वाला खाव असाध्य है। और जो खाव रक्ताशय से—क्षारोदक के समान बहता है, वह भी असाध्य है। आमाशय से और त्रिक (कटि के अधोभाग) प्रदेश से जो खाव मटर के पानी के समान बहता है—वह भी असाध्य है। वैद्य को चाहिये कि पहिले इन खावों की परीक्षा करके फिर चिकित्सा कर्म में हाथ लगाये ॥६,१०॥

अत ऊर्ध्व सर्वत्रणवेदना वक्ष्यामः—तोदनभेदतताडनच्छेदनायमनमन्थनविच्छेपणचुमुचुमायननिर्देहनावभञ्जनस्फोटनविदारणोत्पाटनकम्पनविविधशूलविश्लेषणविकिरणस्तम्भनपूरणस्तम्भनस्वप्नानुच्छ्रान्ताङ्गिकाः संभवन्ति, अनिमित्तविविधवेदनाप्रादुर्भावो वा मुहुर्मुहुर्ब्रान्गच्छन्ति वेदनाविशेषास्तं वातिकमिति विद्यात्; ओषधोषपरिदाहपूमायनानि यत्र गात्रमङ्गारावकोणमिव पच्यते यत्र चोष्माभिर्वृद्धिः क्षते क्षारावसिकतवच्च वेदनाविशेषास्तं पैंतिकमिति विद्यात्, पित्तवृद्धकसमुत्थं जानीयात्, कण्डूर्गुरुत्वं सुमत्त्वमुपदेहात्स्ववेदनत्वं स्तम्भः शैत्यं च यत्र तं श्लैष्मिकमिति विद्यात्, यत्र सर्वार्सा वेदनानामुत्पत्तिस्तं सान्नप्रातिकमिति विद्यात् ॥११॥

इसके आगे सब ब्रणों की वेदना कहते हैं—

जिन ब्रणों में निम्न प्रकार की वेदना हो उनको वातिक ब्रण समझना चाहिये। यथा—सूई के समान चुभने की, भेदने (त्वचा आदि के फटने की), ताड़ने (दण्ड आदि से अभिह्वन की), छेदने (काटने की), आयमन (तानने की), मन्थन (मथने की), विच्छेपण (फेंकने की), चुमुचुमायन (राई या सरसों के लेप की भांति चुमुचुमाने की सी), निर्देहन वृद्धि से जलने की, अवभंजन (वायु से टूटने की), स्फोटन (फूटने की), विदारण (नख आदि से फाड़ने की), उत्पाटन (उखाड़ने की), कम्पन (काँपने की), विविध-शूल, विश्लेषण (नाना प्रकार की पीड़ाओं की), विकिरण (ब्रण के भिन्न २ अवयवों में वेदन), पूरण (भरना), स्तम्भन (स्तम्भता), स्वप्न (स्पर्शज्ञान को हानि), आकुचन (संकोच), अंकुशिका (खल्की-बालों का गिरना), विना कारण के नाना प्रकार की वेदनायें उत्पन्न होने लगती हैं, और बार बार जहाँ पर वेदनायें हों उस ब्रण को वातिक समझना चाहिये।

९२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २३ ]

जिन व्रणों में निम्न लक्षण हो उनको पैतिक समझना, यथा—ओष (एक देश में दाह), चोष (चूसने के समान पीड़ा), परिदाह (जलन), धूम्रायन (धूम्रप्रतीति), जिन में शरीर अङ्गारों से जलता-सा प्रतीत हो, जहाँ पर उष्णमा बढ़ी हो, क्षत में क्षार लगने के समान पीड़ा हो-उनको पैतिक व्रण समझना चाहिये पित्त के समान रक्तजन्य व्रणों को समझना चाहिये ।

जिन व्रणों में निम्न लक्षण हों उनको कृफजन्त्य व्रण समझना चाहिये । यथा—कण्डू (वाज), गुरुत्व (मारीपन), सुसर्व (स्पर्शशान का नाश), थोड़ी वेदना, स्तम्भ (जड़ता) और शीतलता हो, उसे श्लैष्मिक व्रण जानना चाहिये । और जिन व्रणों में सब प्रकार की वेदनायें उत्पन्न होती हों-उन व्रणों को सन्निपातजन्य समझना चाहिये ॥११॥

१ दूषितव्रण—

श्वेतोऽवसवर्त्ताऽतिस्थूलवर्त्ताऽतिपिच्चरः ।

नीलः श्याबोऽतिपिडको रक्तः कृष्णोऽतिपूतिकः ॥

रोप्यः कुम्भीमुखश्चेति प्रदुष्टा द्राक्ष दूणाः ॥

वृण के साव—

लसीकाजलप्यासगृहारिद्रारुणपिच्चराः ।

कषायनीलहरितस्निग्धरुक्षसितासिताः ॥

वृण के रूप—

कृत्योक्त्यस्तथा दुष्टोऽदुष्टो मर्मस्थितो न च ।

संवृतो दारुणस्नावी सबिषो विषमास्थितः ॥

उत्सङ्गचुत्सव एषां च वृणां विद्यात् विषय्यात् ।

इति नानात्वभेदेन निखता विशतिवृणाः ॥

वृण की गन्ध—

सपिस्तैलवसापूयरक्तश्यावाम्लपूतिकाः ।

वृणानां वृणगन्धश्चैरहो गन्धाः प्रकीर्तिताः ॥

दोषों से—

स्तम्भः कठिनसंस्पृशो मन्दस्नाबोऽतितीव्रूक् ।

तुद्यते स्फुरति श्याबो दूष्यो मारुतसंभवः ॥

तृष्णामोहज्वरस्वेददाहदुष्टघवदारुणः ।

वृणं पित्तकृतं विद्यात् गन्धैः स्नावेच्छ पूतिकैः ॥

बहुपिच्छो गुरुः स्निग्धो स्तिमितो मन्दवेदनः ।

पाण्डुवर्णोऽल्पखलेदः चिरकारी कृफवृणः ॥

साध्यासाध्य—

स्वडर्मासजः सुखे देशे तरुणस्यानुपद्रवः ।

धीमतोऽभिन्नः काले सुखसाध्यः स्मृतो व्रणः ॥

गुणैरन्यतमर्हिनः ततः कुच्छो वृणः स्मृतः ।

सर्वविहीनो विज्ञेयस्त्वसाध्यो निरपक्रमः ॥

चरक० चि० अ० २५ ।

अत ऊर्ध्व व्रणवर्णान् वद्यामः—भस्मकपोतास्थिवर्णः परुषोऽरुणः कृष्ण इति मारुतजस्य, नीलः पीतो हरितः श्यावः कृष्णो रक्तः पिङ्गलः इति रक्तपित्तसमुत्थयोः श्वेतः स्निग्धः पाण्डुरिति श्लेष्मजस्य, सर्ववर्णोपेतः सान्निपातिक इति ॥१२॥

इसके आगे व्रण के रङ्गों को कहते हैं । वायु के कारण व्रण का रङ्ग-भस्म (राख), कबूतर की अस्थि के समान, कठोर, लाल, काला, होता है । पित्त के कारण एवं रक्तजन्य व्रण का रङ्ग—नीला, पीला, हरा, काला, श्याव, लाल, कपिल, पिङ्गल (धूसर) होता है । कृफजन्त्य व्रण का रङ्ग—श्वेत, स्निग्ध, पाण्डु होता है । सन्निपातजन्य व्रण में सब दोषों के रङ्ग मिलते हैं ॥ भवति चात्र—

न केवलं व्रणेपूक्तो वेदनावर्णसंग्रहः ।

सर्वशोफविकारेषु व्रणवल्लक्षये द्विषक् ॥१३॥

कहा भी है—

यहाँ पर जो वेदना एवं वर्ण के विषय में कहा है, यह केवल व्रणों के लिये ही नहीं है, अपितु शोफजन्य सब रोगों में व्रण के समान ही (वेदना एवं वर्ण) वैद्य को समझना चाहिये ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्रणास्नावविज्ञानीयो नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥२२॥

त्रयोविंशतितमोऽध्यायः

अथातः कृत्याकृत्यविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे कृत्याकृत्य विधि (साध्यासाध्य विधि) नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

तत्र, वयःस्थानां दृढानां प्राणवतां सन्त्ववतां (आत्मवतां) च सुचिकित्स्या व्रणाः, एकस्मिन् वा पुरुषे यत्र तदगुणचतुष्टयं तस्य सुखसाधनीयतमाः । तत्र, वयःस्थानां प्रत्यग्रधातुत्वादाशु व्रणा रोहन्ति, दृढानां स्थिरबहुर्मासत्वाच्छस्त्रमवचार्यमाणं सिरास्तन्वाद्यदिविशेषमप्राप्नोति, प्राणवतां वेदनाभिघाताहारयन्त्रादिभिर्न रक्षानिरस्तृप्यते, सन्त्ववतां दारुणैरपि क्रियाविशेषैर्न व्यथा भवति, तस्मादेतेषां सुखसाधनीयतमाः ॥३॥

वयःस्थ (तरुण), दृढ (गूढ़-सिरा-स्निग्धवाले संहत शरीर), प्राणवान् (शक्तिशाली), और सन्त्ववान् (व्यसन में भी न घबरानेवाले) पुरुषों के व्रण सुगमता से चिकित्सा किये जाते हैं । अथवा यदि एक ही पुरुष में उपर्युक्त चारों गुण हों तो उसके व्रण अतिशय सुखसाध्य हैं । इनमें—तरुण पुरुषों में—धातु के नवीन होने से व्रण शीघ्र भरते हैं । दृढ पुरुषों में—मांस के स्थिर एवं बहुत होने से—चलाया हुआ शाख सिरा-स्तंभ आदि तक नहीं पहुँचता । शक्तिशाली पुरुषों में—वेदना,

अ० ३३ ]

सूत्रस्थानम्

६३

अभिघात अथवा आहार के नियमन से ग्लानि उत्पन्न नहीं होती। सत्त्वशाली पुरुषों में—दुःसह किया कर्मों से पीड़ा नहीं होती, इसलिये इन पुरुषों के ब्रण अतिशय सुखसाध्य हैं ॥ ३ ॥ त एव विपरीतगुणा बुद्धकृशालप्राणभोरुषु द्रष्टव्याः ॥४॥

ये ही ब्रण बुद्ध, कृश, अलप्राण एवं भौरू पुरुषों में विपरीत गुण होने से कुच्छसाध्य हो जाते हैं। एक गुण के अभाव में कुच्छतमसाध्य हैं ॥ ४ ॥

रिफ्कपायुप्रजननललाटगण्डौष्टपुष्कण्फलकोषोदरजत्रु- मुखाभ्यन्तरसंस्थाः सुखरोपणीया ब्रणाः ॥ ५ ॥

निम्न स्थानों के ब्रण सुखपूर्वक रोहण हो जाते हैं। यथा— रिफ्ग ( नितम्ब ), पायु ( गुदा ), प्रजनन ( गुह्यप्रदेश ), ललाट ( माथा ), गण्ड ( गण्डस्थल ), ओठ, पीठ, कान, फल- कोष ( अण्डकोष ), उदर, जत्रु ( अंस और वक्षः सन्धि ) और मुख के अन्दर स्थित ब्रण सुखसाध्य हैं ॥ ५ ॥

अक्षिदन्तनासापाङ्गश्रोत्रनाभिजठरसेवनौनितम्बपार्श्व- कुक्षिवक्षःकक्षास्तनसन्धिभागगताः सफेनपूररक्तानिलवा- हिनोऽन्तःशलयाश्च दुश्चिकित्स्याः, अधोभागाश्चोर्ध्वभाग- निर्वाहिणो, रोमान्तोपनखसमर्मजघास्थिसंश्रिताश्च, भगंद्- रमपि चान्तर्मुखं सेवनीकुटकास्थिसंश्रितम् ॥ ६ ॥

साध्य के भेद कुच्छसाध्य ब्रण—आँख, दन्तमूल, नासिका अपांग ( भू की कोर-प्राप्त ), श्रोत्र, नाभि, जठर, सेवनी, नितम्ब, पार्श्व, कुक्षि, वक्ष, कक्षा, स्तन, सन्धि भाग में स्थित ब्रण कष्टसाध्य हैं। जिन ब्रणों में से श्वाग युक्त पृथ रक्त, वायु का प्रवाह होता हो, एवं ब्रण के अन्दर शल्य हो तो ब्रण कष्टसाध्य है। अधोभागस्थित ब्रण जो कि ऊपर की ओर मुख किये हो ( ऊपर की ओर बढ़ रहे हों ), बालों की जड़ों में, नख के पास में, मर्म स्थान में, जङ्घास्थि ( पिण्डलियों की अस्थि ) में, अस्थिब्रण तथा गुदा के अन्दर मुख किया हुआ भगन्दर, इसी प्रकार से बनी ( Perinium ) के समीप कुटकास्थि ( श्रोणी- काण्डास्थि कटि की अस्थि ) में स्थित अन्तःभगन्दर रोग असाध्य है १।

वि० मन्तव्य—अधोभागाश्चोर्ध्वभागनिर्वाहिणो—अर्थात् वे अन्तर्विद्रधि जो नाभि से निचले अवयवों में उत्पन्न हों परन्तु मुखमार्ग से बहते हों वे। यथा—नाभेरुपरिजाः पक्वा यान्ति ऊर्ध्वं इतरे तु अधः। जीवति अधो निःस्रुतेषु, स्रुतेषु ऊर्ध्वं न जीवति ॥ सु० नि० अ० ६ श्लो० २४ ॥ ६ ॥

कुष्ठिनां विषजुष्टानां शोषिणां मधुमेहिताम्। ब्रणाः कुच्छेण सिध्यन्ति येषां चापि ब्रणे ब्रणाः ॥७॥

१ कहीं कहीं पर कुटकास्थि के स्थान में 'उपस्थ' पाठ है। उपस्थ मार्ग में मुखवाला भगन्दर रोग असाध्य है।

कुष्ठ रोगियों के, दूषी विषयुक्त रोगियों के, शोषरोगियों के, मधुमेही पुरुषों के और जिन पुरुषों के ब्रण में दूसरे ब्रण हों, उनके ब्रण कठिनाई से अच्छे होते हैं ॥ ७ ॥

अवपाटिकानिरुद्धप्रकाशस्त्रिरुद्धगुदजठराणि, ग्रन्थि- क्षतक्रमयः प्रतिशयायजाः कोष्ठजाश्च स्वग्दोषिणां प्रमेहिणां वा ये परिश्चतेषु दृश्यन्ते, शर्करा सिकतामेहो वातकुण्ड- लिकाऽष्टीला दन्तशर्करोपकुशः कण्ठशालूकं निष्कोपणदूषि- ताश्च दन्तवेष्टा विसर्पस्थिश्चतोरःक्षतब्रणग्रन्थिप्रभृतयश्च याप्याः ॥ ८ ॥

असाध्य भेद को ( याप्य ) कहते हैं—अवपाटिका, विरुद्ध- प्रकाश, सन्निरुद्ध गुद, सन्निरुद्ध जठर ( आंसू ), ग्रन्थि से उप- लक्षित क्षत में जब क्रमि हों, प्रतिशयायजन्म क्रमियाँ, कोष्ठजन्म क्रमियाँ, त्वचा के दोष या प्रमेहरोगियों के क्षतों में जो क्रमि दिखाई देते हैं, शर्करा (अश्मरी), सिकतामेह, वातकुण्डलिका, अष्टीला, दन्तशर्करा, उपकुश, कण्ठशालूक, दांतों के कुरेदने के लिये जो विषयुक्त काष्ठ प्रयुक्त होते हैं—उनसे दूषित दन्त- वेष्ट ( मसूड़े ), विसर्प, अस्थिक्षत, उरःक्षत, ब्रणग्रन्थि आदि में होनेवाले ब्रण याप्य हैं। अवपाटिका आदि रोगों में होनेवाले ब्रण याप्य हैं, रोग याप्य नहीं ॥ ८ ॥

साध्या याप्यत्वमायान्ति याप्याश्चासाध्यतां यथा। दन्तन्ति प्राणानसाध्यास्तु नराणामक्रियावताम् ॥ ९ ॥

क्रिया के न करने अथवा विरुद्ध क्रिया करने से साध्य रोग याप्य हो जाते हैं, याप्य रोग असाध्य हो जाते हैं। और असाध्य रोग प्राणों को शीघ्र नष्ट कर देते हैं। जैसा कहा है—

सन्ति ह्येवविधा रोगाः साध्या दारुणसंमताः। ये हन्युरनुपकान्ता मिथ्याचारेण वा पुनः ॥१०॥

यापनीयं विजानीयात् क्रिया धारयते तु यम्। क्रियायां तु निवृत्तायां सद्य एव विनश्यति ॥ १० ॥ प्राप्ता क्रियां धारयति याप्यव्याधितमातुरम्। प्रपतिष्यदिवगारं विष्कम्भः साधुयोजितः ॥ ११ ॥

याप्य का लक्षण—जिस रोगी पुरुष को चिकित्साक्रिया धारण करती है उसको 'याप्य' समझना चाहिए। चिकित्सा- क्रिया के हट जाने से पुरुष उस रोग से शीघ्र नष्ट हो जाता है। याप्य व्याधि से आक्रान्त रोगी को चिकित्सा-क्रिया बचाती है। जिस प्रकार कि गिरते हुए घर को भली प्रकार से लगाया स्तम्भ रोक देता है ॥ १०, ११ ॥

अत ऊर्ध्वमसाध्यात् वद्यामः—मांसपिंडवदुदगताः प्रसेकिनोऽन्तःपूर्यवेदनावन्तोऽश्वापानतदुदूचौष्टाः, केचित् कठिना गोश्रृंगवदुदगतमुदमांसप्ररोहाः, अपरे दुष्टरूधिरा- साविणस्तनुजीतपिच्छिडासाविणो वा मध्योन्नताः, केचिद- वसन्नशुषिरपर्यन्ताः शणतूलवम् स्तायुजाख्वन्तो दुर्दशेनाः,

६४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २३ ]

वसामेदोमज्जमस्तुलुङ्गसाविणश्च दोषसमुत्था पीतासित- मूत्रपुरोषवातवाहिनश्च कोष्ठस्थाः, त एवोभयतोभागव्रण- मुखेषु पूतरक्तनिर्वाहिणः, क्षीणमांसाणां च सर्वतोगतय- श्चाणुमुखा मांसवृद्धवृद्धवन्तः, सशब्दवातवाहिनश्च शिरःकण्ठस्थाः, क्षीणमांसाणां च पूयरक्तनिर्वाहिरौचका- विपाककासश्चासोपद्रवयुक्ताः, भिन्नं वा शिरःकपाले यत्र मस्तुलुङ्गदर्शनं त्रिदोषलिंगप्रादुर्भावःकासश्चासौ वा यस्येति ॥ १२ ॥

इसके आगे असाध्य रोगों को कहते हैं। मांसपिण्ड के ऊपर उठे, प्रसेकी (खाव बहुत), अन्दर पूय-वेदना युक्त, घोड़ी की योनि की भांति उल्लत मुखवाले (किनारोंवाले), कुछ कठिन गाय के सींग के समान ऊपर उठे मांसांकुरोंवाले, दूषित रक्तस्त्राव करनेवाले, पतला-शीतल-पिच्छल खाव बहाने-वाले, अथवा बीच से उल्लत या बीच से अन्दर को दवे, सन की रूई के समान-स्नायुजाल युक्त—देखने में बुरे, दोष के कारण—वसा मेद मज्जा मस्तुलुङ्ग (मस्तिष्क का द्रव भाग) का खाव करनेवाले, कोष्ठ में स्थित व्रणों में—पीला, काला, मूत्र, मल, वायु का खाव होने से, कोष्ठ स्थित व्रणों का मुख दोनों पार्श्वों में (ऊपर मुख की ओर और नीचे गुदा की ओर) हों, पूय-रक्त को क्षतित करनेवाले, चारों ओर गतिवाले—सूक्ष्म मुखवाले—मांस के समान बुलबुलेवाले, शिर एवं कण्ठ में स्थित व्रणों में से—शब्द के साथ वायु का खाव हो, क्षीण मांसवाले पुरुषों में पूय रक्त का खाव होता हो, एवं अरुचि, अविपाक, काष्ठ, श्वास—ये उपद्रव साथ में हों, शिर की खोपड़ी के फटने पर जब मस्तिष्क दीखने लगे या तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न हो जायें, काष्ठ-श्वास हो, तो व्रण असाध्य समझना चाहिये ॥

भवति चात्र—

वर्सा मेदोऽथ मज्जानं मस्तुलुङ्गं च यः स्रवेत् ।

आंगन्तुस्तु व्रणः सिध्येन्न सिध्येहोपसंभवः ॥ १३ ॥

असमापहिते देशे सिरासन्ध्यस्थिवर्जिते ।

विकारो योऽनुपर्यंतं तदसाध्यस्य लक्षणम् ॥ १४ ॥

कहीं भी है—

जिस आगन्तुज व्रण में से वसा, मेद, मज्जा अथवा मस्तु- लुङ्ग का खाव होता है, वह व्रण साध्य है। दोषजन्य व्रण इस प्रकार के खाव होने से असाध्य है शिरा-सन्धि एवं अस्थि से रहित, सर्भरहित प्रदेश में यदि विकार हो और वह चिकित्सा करने पर भी सब धातुओं में फैलता जाये, तो उसको असाध्य समझना चाहिए ॥ १३, १४ ॥

क्रमेणोपचर्य प्राप्य धातून्तुगतः शनैः ।

न शक्य उन्मूलयितुं वृद्धो वृद्ध इवामयः ॥ १५ ॥

स स्थिरत्वानमहत्त्वाच्च धात्वनुक्रमणेन च ।

निहन्त्यौषधवीर्याणि मन्त्रान् दुष्टग्रहो यथा ॥ १६ ॥

रोग धातुओं का सहारा लेकर धीरे २ वृद्धि को प्राप्त हुआ करता है। उस समय बढ़ने पर रोग (साध्य) जड़ से नहीं उखाड़ा जा सकता, जिस प्रकार बड़ा वृक्ष जड़ से नहीं उखाड़ा जा सकता। इसमें कारण—रोग की स्थिरता रोग के बढ़ जाने से और धातुओं का सहारा पकड़ने से रोग औषध के वीर्य को निष्फल कर देता है, जिस प्रकार दुष्टग्रह (स्कन्दापस्मार आदि) मन्त्र की शक्ति निष्फल कर देता है ॥ १५, १६ ॥

अतो यो विपरीतः स्यात् सुखसाध्यः स उच्यते ।

अवद्वमूलः लुपको यद्दुष्टपाटने सुखः ॥ १७ ॥

जो व्रण धातुओं में नहीं फैलता, वह सुखसाध्य है, क्योंकि इस व्रण की जड़ स्थिर नहीं होती। जिस प्रकार कि एक छोटा पौधा मूलके स्थिर न होने से सुगमता से उखाड़ा जा सकता है ॥ १७ ॥

त्रिभिदोर्षिरनाक्रान्तः श्याबौष्टः पिङ्कौसमः ।

अवेदनो निरास्त्रावो व्रणः शुद्ध इहोच्यते ॥ १८ ॥

शुद्ध व्रण का लक्षण—वात आदि दोषों से रहित (अथवा व्रण की आकृति—गन्ध वर्ण खाव-वेदनासे रहित, या शीत-उष्ण, मृदु-कठिन, संवृत-विवृत रहित), काले किनारोंवाला, पिङ्कौ (मांसांकुर), समतल, वेदनारहित, खाव से रहित व्रण को शुद्ध व्रण कहते हैं ॥ १८ ॥

कपोतवर्णप्रतिमा यस्यान्ताः क्लेदवर्जिताः ।

रूपेण स्थिराश्च पिटिकावन्तो रोहतीति तमादिशेत् ॥ १९ ॥

जिस व्रण के अन्तर्भाग (किनारे)—कबूतर के सहस्र धूसर वर्णवाले हों और क्लेद (सड़न-पन्छा) से रहित हों, स्थिर (स्थिरतायुक्त) हो और पिङ्किका (छोटी फुसियों) से युक्त—व्याप्त हों वह व्रण "भर रहा है—रोपित हो रहा है" समझा जाता है। जब व्रण उचित प्रकार से भर रहा होता है तब ये लक्षण होते हैं ॥ १९ ॥

रुठवस्मान्मप्रन्थिमशूनमरुजं व्रणम् ।

त्वक्स्वर्णं समतलं सम्यग्रूढं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥

सम्यक् रुठ के लक्षण—व्रण वस्तु भर जाये, किसी प्रकार की गाँठ या सूजन न हो, दर्द न हो, त्वचा के समान रङ्ग हो, व्रण समतल हो, उस व्रण को भली प्रकार से रोहण हुआ समझना चाहिये ॥ २० ॥

दोषप्रकोपाद्रयायामादभिधातादजीर्णतः ।

हर्षात् क्रोधाद् भयाद्वाऽपि व्रणो रुठोऽपि दीर्घते ॥ २१ ॥

दोष के प्रकोप से, व्यायाम से, चोट लगने से, अजीर्ण से,

अ० २४ ]

सूत्रस्थानम्

६५

अतिदृषं से, क्रोध से, भय से रोहण हुआ वृण भी पुनः फट जाता है ॥२१॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने कृत्याकृत्स्नविधिनाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३॥

चतुर्विंशतितमोऽध्यायः

अथातो व्याधिसमुद्देशीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'व्याधिसमुद्देशीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसाकि धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

द्विविधास्तु व्याधयः—शस्त्रसाध्याः, स्नेहादिक्रियासाध्याश्च । तत्र शस्त्रसाध्येषु स्नेहादिक्रिया न प्रतिष्यते, स्नेहादिक्रियासाध्येषु शस्त्रकर्म न क्रियते ॥३॥

विधि भेद से रोग दो प्रकार के हैं। एक—शस्त्रसाध्य और दूसरे स्नेह-स्वेदन आदि क्रियासाध्य। इन से शस्त्रसाध्य रोगों में स्नेहादि क्रियाओं का निषेध नहीं है। परन्तु स्नेहादिक्रियासाध्य रोगों में शस्त्रकर्म निषिद्ध है ॥३॥

अस्मिन् पुनः आख्ये सर्वतन्त्रसामान्यात्, सर्वेषां व्याधीनां यथाशुल्लमवरोधः क्रियते। प्रागभिहितं 'तदुःखसंयोगा व्याधयः' ( सू० अ० १ ) इति तच्च दुःखं त्रिविधम्—आध्यात्मिकम्, आधिभौतिकम्, आधिदैविकमिति । तत्तु समविधे व्याधावुपनिपतति । ते पुनः समविधा व्याधयः, तद्यथा—आदिबलप्रवृत्ताः, जन्मबलप्रवृत्ताः, दोषबलप्रवृत्ताः, संघातबलप्रवृत्ताः, कालबलप्रवृत्ताः, देवबलप्रवृत्ताः, स्वभावबलप्रवृत्ता इति ॥४॥

इस संश्रुततन्त्र में शालाक्य आदि सब तन्त्रों के सिद्धान्त से सब रोगों का संग्रह किया जाता है। पहिले कह चुके हैं कि शरीर-शरीरी (शरीर और मन) के साथ दुःख का संयोग होने से व्याधियाँ हैं। यह दुःख तीन प्रकार का है। यथा—आध्या-

१ स्नायुबलेदात् सिराबलेदात् गन्धीयत् क्रमिभक्षणत् । अस्थिभेदात् सशल्यत्वात् सविषत्वाच्च सर्पणात् ॥ नखकाष्ठप्रभेदाच्च चर्मलोमातिघट्टनात् । मिथ्याबन्धादतिस्नेहात् अतिभैषज्यकर्षणात् ॥ अजीर्णादतिभुक्ताच्च विरुद्धासारप्रभोजनात् । शोकात् क्रोधाद् दिवास्वप्नात् व्यायामान्वेषनात्तथा ॥ वृणा न प्रशमं यान्ति निष्क्रियत्वाच्च देहिनाम् ॥ चरक० ।

२ शरीरदोषप्रकोपे खलु शरीरमेवाभित्य प्रायशः त्रिविधमोष-घमिच्छन्ति—अन्तःपरिमाजन्, बहिःपरिमाजन्, शस्त्रप्रणिधा-नञ्चेति ।

त्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक। इस तीन प्रकार के दुःख का अन्तर्भाव सात प्रकार की व्याधियों में हो जाता है। सात प्रकार की व्याधियाँ, यथा—आदिबलप्रवृत्ता, जन्मबलप्रवृत्ता, दोषबलप्रवृत्ता, संघातबलप्रवृत्ता, कालबलप्रवृत्ता, देवबलप्रवृत्ता, स्वभावबलप्रवृत्ता ॥४॥

तत्र, आदिबलप्रवृत्ता ये शुक्रजोणितदोषान्वयाः कुष्ठाः शःप्रभृतयः तेषु द्विविधाः—मातृजाः, पितृजाश्च । जन्मबलप्रवृत्ता ये मातुरपचारात् पङ्कजात्यन्धवधिर-मूकमिनिमनवामनप्रभृतयो जायन्ते, तेषु द्विविधाः—रस-कृताः दौह्दापचारकृताश्च । दोषबलप्रवृत्ता ये आतङ्क-समुत्पन्ना मिथ्याहाराचारकृताश्च, तेषु द्विविधाः—आमाशयसमुत्थाः, पक्वाशयसमुत्थाश्च, पुनश्च द्विविधाः—शारीरा, मानसाश्च । त एते आध्यात्मिकाः ॥५॥

इनमें आदिबल प्रवृत्ता (दुष्टजोणितबलजता), जो कि दूषित शुक्र-आर्चव के दोष के कारण उत्पन्न होती है, यथा—कुष्ठ, अर्श आदि। ये भी दो प्रकार की हैं। एक—मातृजन्य और दूसरी—पितृजन्य। जन्मबल प्रवृत्ता जो कि माता के दूषित आहार-विहार के कारण उत्पन्न होती है। यथा—पंगुपन, अन्धत्व, बधिरत्व, मूकत्व, मिनिमन, वामन (नाट्य कद) आदि। ये भी दो प्रकार की हैं। एक—रसजन्य (गर्भिणी के आधार-रस से उत्पन्न) और दूसरी—दौह्दावस्था (देखिये शा० अ० ३ सू० १८ में २६) में किये गये अपचार के कारण उत्पन्न। दोषबलप्रवृत्ता—(रज-तम-शक्ति से उत्पन्न—तथा दोष की शक्ति से उत्पन्न रोग), ये मिथ्या-आहार-विहार के कारण उत्पन्न होते हैं। ये भी दो प्रकार के हैं, एक—आमाशय से उत्पन्न और दूसरी—पक्वाशय से उत्पन्न। फिर इनके दो भेद हैं—एक शारीरिक और दूसरे मानसिक। ये तीनों (आदिबल जन्मबल और दोषबल से प्रवृत्त) आध्यात्मिक (शरीरस्थ—वातादि—रजप्रभृति दोषजन्य होने से) हैं ॥५॥

संघातबलप्रवृत्ता य आगन्तवो दुर्बलस्य बलवद्भि-हात्, तेषु द्विविधाः—शस्त्रकृताः, व्यालकृताश्च । एते आधिभौतिकाः ॥६॥

संघातबल प्रवृत्ता (प्रहार शक्ति से उत्पन्न) ये आगन्तुज रोग हैं दुर्बल पुरुष का बलवान् के साथ लड़ाई करना। ये भी दो प्रकार के हैं। यथा—शस्त्रजन्य और व्याल—(सर्पादि) आदि से उत्पन्न। ये आधिभौतिक हैं ॥६॥

कालबलप्रवृत्ता ये शीतोष्णवातवर्षातपप्रभृतिनिमिताः, तेषु द्विविधाः—व्यापन्नतुक्रुताः, अग्यापन्नतुक्रुताश्च । देवबलप्रवृत्ता ये देवद्वेहादभिगतका अथर्वणकृता उप-

१ देखिये चरक विमान आठवें में—प्रकृतितश्च परीक्षेत् ।

६६

मुश्रुतसंहिता

[ अ० २४ ]

सर्गजाश्च, तेऽपि द्विविधाः—विद्युदशनिकृताः पिशाचादिकृताश्च, पुनश्च द्विविधाः—संसर्गजाः, आकस्मिकार्शच । स्वभावबलप्रवृत्ता ये ज्युषिपासाजाराभ्युत्पन्निद्रा-प्रभृतयः, तेऽपि द्विविधाः—कालजाः, अकालजाश्च, तत्र परिरक्षणकृताः कालजाः, अपरिरक्षणकृता अकालजाः । एते आधिदैविकाः । तत्र सर्वत्राध्यवरोधः ॥॥

कालबल प्रवृत्ता—जो कि शीत, उष्ण, वायु, वर्षा आदि के कारण उत्पन्न होते हैं । ये भी दो प्रकार के हैं । यथा—एक—व्यापन्नकृत (दूषित ऋतु के कारण उत्पन्न-जनपदध्वंस आदि रोग) दूसरे—अव्यापन्नकृत (अदूषित ऋतुजन्य) । दैवबल प्रवृत्ता (दैवशक्ति से उत्पन्न)—जो कि देवता, गुरु, सिद्ध पुरुषों के साथ द्रोह करने के या गुरुओं के अभिशाप से उत्पन्न या अथर्ववेदप्रणीत आभिचारिक मन्त्रों द्वारा उत्पन्न अथवा रुग्ण मनुष्य के समीप रहने से उपसर्ग द्वारा उत्पन्न संकामक ज्वर आदि । ये भी दो प्रकार के हैं । एक—विद्युत् जन्य और अशनिकृत (विद्युत्-लता के आकार में तिरछी-आग के समान गिरनेवाली, अशनि-मूसल के समान सीधी नीचे गिरनेवाली), दूसरा—पिशाचादिजन्य । ये (पिशाचादिजन्य) भी दो प्रकार के हैं । यथा—संसर्गजन्य (रोगी के पास रहने से), दूसरा—आकस्मिक (वैव-द्रोह आदि के कारण से उत्पन्न) । स्वभावबल प्रवृत्ता—भूज, प्यास, जरा, मृत्यु आदि (ये भी दो प्रकार के हैं) । यथा—कालजन्य और अकालजन्य । रक्षा करने पर भी जो रोग होते हैं, वे कालजन्य हैं । बिना रक्षा (प्रयत्न) करने पर जो होते हैं, वे—अकालजन्य हैं । ये आधिदैविक रोग हैं । इनमें सब रोगों का समावेश हो जाता है ॥७॥

सर्वेषां च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एव मूलं; तल्लिङ्गत्वाद् दृष्टफलत्वादागमाच्च । यथा हि कृत्स्नं विकारजातं विश्रूरूपेणावस्थितं सत्त्वरजस्तमांसिन व्यतिरिच्यन्ते, एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्रूरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वातपित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते । दोषधातुमल-संसर्गादायतनविशेषाभिमितश्चैषां विकल्पः । दोषदूषितेष्वत्यर्थं धातुषु संज्ञा—रसजोऽयं, शोणितजोऽयं, मांसजोऽयं, मेदोजोऽयं, अस्थिजोऽयं, मज्जजोऽयं, शुक्रजोऽयं व्याधिरिति ॥८॥

सब रोगों का मूल कारण वात-पित्त-कफ ही है । क्योंकि—तल्लिङ्गत्वात्, रोगों में—वातादि के लक्षण दिखाई देते हैं । दृष्टफलत्वात्, वातादिहर औषधियों से चिकित्सा करने पर—लाम होता देखा जाता है, आगमात्—शास्त्र से भी ज्ञात होता है कि वात आदि ही सब रोगों के कारण हैं । जिस प्रकार सम्पूर्ण (महद् आदि चौबीस तत्त्व) विकार समूह—जगत रूप में स्थित होते हुए भी—सत्त्व, रज, तम से पृथग् नहीं होता,

उसी प्रकार सब रोग भी वात-पित्त कफ से पृथग् नहीं जाते । दोष (वातादि), धातु, (रसादि), मल (मूत्रादि) के संयोग की भिन्नता से, स्थानभेद से और करणभेद से—रोग में भेद आ जाते हैं । दोषों द्वारा धातुओं के दूषित होने से रसादि की 'दूष्य' यह संज्ञा हो जाती है । दोषजन्य रोगों में—रसजन्य, रक्तजन्य, मांसजन्य, मेदोजन्य, अस्थिजन्य, मज्ज्जजन्य शुक्रजन्य—यह रोग है, ऐसा व्यवहार हो जाता है । जिस प्रकार—'धी से जल गया, लोहे से जल गया'—ऐसा कहने पर 'धी-में स्थित अग्नि से जल' ऐसा ज्ञात होता है, उसी प्रकार रक्तजन्य यह रोग है, ऐसा कहने पर समझना चाहिये कि रक्त को किसी दोष ने दूषित किया होगा ॥८॥

तत्र, अन्ताश्रद्धारोचकाविपाकाङ्क्षमर्दव्वरहलाससुरमि गौरवंहृत्पाण्डुरोगमाग्रापरोधकार्यवैरस्याङ्क्षसादाकालज-वलीपलितदर्शनप्रभृतयो रसदोषजा विकाराः, कुष्ठविसर्प-पिडकामशकनीलिकातिलकालकन्यच्छव्यन्नेन्द्रलुप्तप्लीहवि-द्विगुल्मवातशोणितार्गोऽबुंदाङ्क्षमर्दोऽसृग्द्ररक्तपित्तप्रभृति रक्तदोषजाः, गुदमुखमेदपाकाश्च, अधिमांसाबुंदागोऽधि-जिह्वापिजिह्वापकुशगलगुण्डिकालजीमांससंघातोऽष्टप्रकोपग-लगण्डगण्डमालाप्रभृतयो, मांसदोषजाः ग्रन्थिबुद्धिगलग-ण्डाबुंदमेदोजोऽष्टप्रकोपमधुमेहातिस्थौल्यातिस्वेदप्रभृतयो मे-दोदोषजाः, अधस्थ्यधिदन्तास्थितोदशूलकुनखप्रभृतयोऽ-स्थिदोषजाः, तमोदर्शनमूर्छाभ्रमपर्वशूलमूलारुर्जनमनेत्रा-भिष्यन्दप्रभृतयो मज्जदोषजाः, कलैड्याप्रहर्षशुक्राशमरीशु-क्रमेहशुक्रदोषादयश्च तद्दोषजाः, त्वरदोषाः सज्जोऽतिप्रवृ-त्तिरयथाप्रवृत्तिर्वेन्द्रियायतनदोषजाः इत्येष समास उक्तः, विस्तरं निमित्तानि चैषां प्रतिरोगं बध्यामः ॥९॥

अन्त में—द्वेष, अरुचि, अविपाक, अङ्गों का टूटना, ज्वर, हल्लास (वमन की इच्छा), वृत्ति (बिना भोजन के) भारीपन, हृदयरोग, पाण्डुरोग, माग्राओं की रूकावट, कुशता, मुख के स्वाद में परिवर्तन, अङ्गों में पीड़ा, बिना समय के चेहरे पर झुर्रियाँ आना—बालों का सफेद होना आदि रसजन्य विकार हैं । कुष्ठ, वीसर्प, पिडिका, मशक, नीलिका, तिलकालक, न्यच्छ, व्यंग, इन्द्रलुप्त, प्लीहा, विद्वधि, गुल्म, वात-रक्त, अर्श, अबुंद, अङ्गों का टूटना, रक्त-प्रदर, रक्तपित्त आदि रक्तदोषजन्य रोग हैं । गुदा का पाक, मुख का पाक, शिरन का पाक, अधिमांस, अबुंद, अर्श, अधिजिह्वा, उपजिह्वा, उपकुश, गलगुण्डिका, अलजी, मांससंघात, ओष्ठप्रकोप, गलगण्ड, गण्डमाला आदि मांसजन्य रोग हैं । ग्रन्थि, बुद्धि, गलगण्ड, मेदोजन्य अबुंद, ओष्ठप्रकोप, मधुमेह, अतिस्थूलता, अतिस्वेद—आदि मेद-दोषजन्य रोग हैं । अधिक अस्थि, अधिक दन्त, अस्थि में पीड़ा, शूल, कुनख आदि अस्थि दोषजन्य रोग हैं । आँखों के सामने अन्धेरा आना, मूर्छा, भ्रम, पर्वों में मोटी जड़ोंवाली फुसियों की

अ० २५ ]

१३

सूत्रस्थानम्

६७

उत्पत्ति, ऊरु और जह्ना, का मोटा एवं भारी होना, नेत्राभि- ध्यन्द आदि-मेददोषजन्य रोग हैं। क्लीवता, अप्रहर्य (मैथुन के विषय में अनिच्छा) शुक्राशमरी, शुक्रमेह और शुक्- जन्य दोष-शुक्रदोष से उत्पन्न होते हैं। त्वचा के दोष (कुष्ठ- आदि), कान नासिका-आँख में मल का अवरोध या मलों का अधिक आना, अथवा दूषित रूप में बाहर आना ये-मलस्थान- दोषजन्य हैं। इन्द्रियों की अपवृत्ति ( अपने कार्य में प्रवृत्त न होना) या मिथ्या रूप से प्रवृत्त होना-इन्द्रियस्थानजन्य विकार हैं।

यहाँ पर यह सब संक्षेप में कहा है। विस्तार से इनके कारणों को प्रत्येक रोग में कहेंगे ॥६॥

भवति चात्र—

कुपितानां हि दोषाणां शरीरे परिधावताम् ।

यत्र सङ्गः स्ववैगुण्याद्व्याधित्तत्रोपजायते ॥१०॥

कहा भी है—

प्रकुपित दोष जब शरीर में इधर उधर दौड़ने लगते हैं, उस समय क्षोतसों के विकार के कारण जिस स्थान पर ये दोष रुक जाते हैं, उसी स्थान पर रोग उत्पन्न हो जाता है ॥१०॥

भूयोऽत्र जिज्ञास्यं किं वातादीनां ज्वरादीनां च नित्यः संश्लेषः परिच्छेदो वा ? इति, यदि नित्यः संश्लेषः स्या- तर्हि नित्यातुराः सव एव प्राणिनः स्युः, अथाप्यन्यथा वातादीनां ज्वरादीनां च, 'अन्यत्र वर्तमानानामन्यत्र लिङ्गं न भवति' इति कृत्वा यदुच्यते वातादयो ज्वरा- दीनां मूलानीति तन्न । अत्रोच्यते—दोषान् प्रत्याख्याय ज्वरादयो न भवन्ति, अथ च न (नित्यः) संबन्धः, यथाहि विद्युद्वाताशनिवर्षाण्याकाशं प्रत्याख्याय न भवन्ति, सत्य- ण्याकाशं कदाचिन्न भवन्ति, अथ च निमित्ततस्तत एवो त्पत्तिरिति, तरङ्गबुद्धुदादयश्चोदकविशेषा इव, वाता- दीनां ज्वरादीनां च नाप्येवं संश्लेषो न परिच्छेदः शाश्व- तिकः, अथ च निमित्तत एवोत्पत्तिरिति ॥११॥

यहाँ पर एक बात जाननी है कि—क्या बात आदि दोषों का ज्वर आदि रोगों के साथ नित्य सम्बन्ध (समवाय) बना रहता है, या नहीं ? यदि इनका नित्यसम्बन्ध है (जिस प्रकार- चन्द्रमा और ज्योत्स्ना का), तो सब प्राणियों को सदा ही रोगी रहना चाहिये और यदि इनका परिच्छेद (पृथक्त्व) मानते हो (जैसा कि-घड़े और कुम्हार का, वस्त्र और जुलाहे में मानते हो) तो वातादि प्रकृतिवाले पुरुषों में ज्वर आदि रोग का या बात रोग का कोई लक्षण नहीं दीखता। अन्यत्र वर्तमान भावों के लक्षण अन्यत्र नहीं होते-इस नियम से बात आदि ज्वर आदि के कारण नहीं हैं। इसलिये जो ऊपर कहा कि बात आदि ज्वर आदि का कारण है, यह ठीक नहीं।

इसका उत्तर—ज्वर आदि रोग, दोषों का (बात आदि) परित्याग करके उत्पन्न नहीं होते। और न इनका नित्य सम्बन्ध है। जिस प्रकार विद्युत्, अशनि, वायु और वर्षा आकाश के बिना नहीं रह सकते, और आकाश के रहने पर भी कभी नहीं भी होते और कारणों से ये ही उत्पन्न हो जाते हैं। दूसरा उदा- हरण—पानी में उत्पन्न होनेवाली तरङ्ग एवं बुलबुले भी न तो सदा उत्पन्न रहते हैं और न सदा अनुत्पन्न रहते हैं, कारण से उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार से बात आदि दोषों का ज्वर आदि रोगों के साथ न तो नित्य संश्लेष (सम्बन्ध) ही है और न नित्य पृथक्त्व ही है। कारण से ही इनकी उत्पत्ति हो जाती है ॥११॥

भवति चात्र—

विकारपरिमाणं च संख्या चैषां पृथक् पृथक् ।

विस्तरेणोत्तरे तन्नै सर्वा बाधा च वद्यते ॥१२॥

विकार परिमाण (रोगों की समुदाय-संख्या), इन रोगों की पृथक् पृथक् संख्या (अट्टारह कुष्ठ, बीस प्रमेह आदि) सब प्रकार की बाधाएँ (रोग-ज्वर-अतिसार आदि)—विस्तार से उत्तर तन्न में कहेंगे ॥१२॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्याधिसमुद्देशीयो नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४॥

पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

अथातोऽष्टविधशस्त्रकर्मियमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'अष्टविध शस्त्रकर्मिय' अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था। (चरक में शस्त्रकर्म छे' कहे हैं—और एकस्थान पर नौ गिने हैं—यथा—छेदन, भेदन, व्यधन, दारण, लेखन, उत्पाटन, प्रच्छन, सीवन और एषण) ॥२॥

छेद्या भगन्दरां ग्रन्थिः श्लैष्मिकस्तिलकालकः ।

व्रणवत्सर्पबुद्धाल्यशंखभर्मीलोऽस्थिमांसगम् ॥३॥

शल्यं जतुमणिमांससंघातो गल्लशुण्डिका ।

स्नायुमांससिराकोथो वल्मीकं जतपोनकः ॥४॥

अधृषश्चोपदंशाश्च मांसकन्धधिमांसकः ।

निम्न रोग छेदन करने के योग्य हैं। यथा—भगन्दर, कफ- जन्य (आम) ग्रन्थि, तिलकालक (झुद्ररोगाधिकारस्थ), व्रणवत्स (किल्लन व्रणोष्ठ), अबु'द (सब), अर्श, चर्मकील, (मांसकुर), अस्थिगत शल्य, जतुमणि, मांससंघात, गल्लशुण्डिका, गलित स्नायु, गलितमांस, गलित सिरा, वल्मीक, शतपोनक (व्रण-

१ छे' शस्त्रकर्म यथा-पाटनं व्यधनं चैव छेदनं लेखनं तथा । पच्छनं सीवनं चैव षड्विधं शस्त्रकर्म तत् ॥

चरक चि० अ० २५

सुश्रुतसंहिता

[ ३० २५ ]

६८

विशेष), अश्वष (मुख रोग), उपदंश, मांसकन्दी (कन्दकार-मांस) और अभिमांस-इनमें छेदन करना चाहिये ॥३,४॥

भेद्या विद्रध्योऽन्यत्र सर्वजाद् मन्थयन्त्रयः ॥४॥

आदितो ये विसर्पाश्च वृद्धयः सविदारिकाः ।

प्रमेहपिडकाः शोफः स्तनरोगोऽवमन्थकः ॥६॥

कुम्भीकाऽनुशयी नाड्यो वृन्दौ पुष्करिकाऽलजी ।

प्रायशः त्वद्रोगाश्च पुष्पटौ तालुदन्तजौ ॥७॥

तुण्डिकेरी गिलायुश्च पूर्व ये च प्रपाकिणः ।

वस्तिस्तथाऽऽमरीहेतोर्मेदोजां ये च केचन ॥८॥

निम्न रोगों में मेदन करना चाहिये । स्नान्निपातिक विद्रधि को छोड़कर शेष सब विद्रधियाँ, वात-पित्त-कफजन्य तीनों ग्रन्थियाँ, वात-पित्त-कफजन्य—प्रथम तीन विसर्प, सब वृद्धियाँ, विदारिका, प्रमेहपिडिका, व्रणशोफ, स्तनविद्रधि, अवमन्थक (शूकदोष में), कुम्भिका, अनुशयी, नाडीव्रण, वृन्द (एक वृन्द और द्वन्दकण्ठरोगों में), पुष्करिका, अलजी, प्रायः सब त्वद्रोग, तालुपुष्पट, दन्तपुष्पट, तुण्डिकेरी, गिलायु और मुखरोगों में कण्ठशाल्क आदि जो रोग पकनेवाले हैं, उनकी पच्यमानावस्था में ही, अशमरी के निकालने के लिये ही (वैसे-नहीं) वस्ति का और जो मेदोजन्य रोग हैं-उनमें मेदन करना चाहिये ॥५-८॥

लेख्याश्चतस्रो रोहिण्यः किलासमुपजिह्विका ।

मेदोजो दन्तवदभौ ग्रन्थिवर्त्तमाधिजिह्विका ॥९॥

अर्शासि मण्डलं मांसकन्दी मांसोन्नतिस्तथा ।

निम्न रोगों में लेखन करना चाहिये—वात-पित्त-कफ-रक्तजन्य चार रोहिणी, किलास, उपजिह्विका, दुष्टमेदजन्य ग्रन्थि आदि, दन्तवैदर्म, नेत्रग्रन्थि, नेत्रवर्त्त अधिजिह्विका, अर्श, मण्डल (कुष्ठ), मांसकन्दी और मांस की वृद्धि (व्रण आदि) में लेखन करना चाहिये ॥९॥

वेध्याः सिरा बहुविधा मूत्रवृद्धिं कोदरम् ॥१०॥

नाना प्रकार की सिराओं, मूत्रवृद्धि और जलोदर में वेधन करना चाहिये ॥१०॥

एष्या नाड्यः सगलयाश्च व्रणा उन्मागिणश्च ये नाडीव्रण, शल्ययुक्तव्रणों में, ऊपर-नीचे-तिरछे (विमार्ग) जानेवाले व्रणों में शलाका द्वारा एषण कार्य करना चाहिये ॥

आहार्याः शर्करास्तिस्रो दन्तकर्णमलोऽऽमरी ॥११॥

शल्यानि मूढगर्भाश्च वर्चश्च निचितं गुदे ।

निम्न रोगों में आहरण करना चाहिये । यथा—तीन शर्करायें (मूत्रशर्करा, पादशर्करा और दन्तशर्करा), दांत का मैल, कान का मैल, अशमरी, मूढगर्भ, शल्य, गुदा में संचित मल का आहरण करना चाहिये ॥११॥

ज्ञाग्या विद्रध्ययः पञ्च भवेयुः सर्वजाहते ॥१२॥

कुष्ठानि वायुः सरुजः शोफो यश्चैकदेशजः ।

पाल्यासयाः स्त्रीपदानि विषजुष्टं च शोणितम् ॥१३॥

अर्बुदानि विसर्पाश्च ग्रन्थयश्चादितश्च ते ।

त्रयरुयश्चोपदंशः स्तनरोगा विदारिका ॥१४॥

सु (शु) विरो गलशालूकं कण्टकाः कुमिदन्तकः ।

दन्तवेष्टः सोपकुशः शीतादो दन्तपुष्पटः ॥१५॥

पित्तासूककफजाश्चोष्टयाः क्षुद्ररोगाश्च भूयशः ।

निम्न रोगों में स्नावण (स्नाव) करना चाहिये । यथा—सन्निपात विद्रधि को छोड़कर शेष पाँचों विद्रधियाँ, कुष्ठ, पीड़ा के सहित वायु, एकदेशजन्य शोफ (अम्ल भोजन-निमित्त), पालि के रोग, स्त्रीपद, विषदूषित रक्त, अर्बुद, विसर्प, पूर्वोक्त (वात-पित्त-कफज) तीन ग्रन्थियाँ, तीन (वात, पित्त, कफजन्य) उपदंश, स्तनविद्रधि, विदारिका, शौषिर, गलशालूक, तालु-कण्टक, कुमिदन्त, दन्तवेष्ट, उपकुश, शीताद, दन्तपुष्पट, पित्त-रक्त एवं कफजन्य ओष्ठरोग एवं बहुत से त्वद्रोग स्नाव हैं ॥ जैसे कहा भी है—

“कर्मणा कश्चिदेकेन द्वाभ्यां कश्चित् त्रिमिस्तथा । विकारः साध्येत कश्चिच्चतुर्भिर्पि कर्मभिः ॥

सीन्या मेदःसमुत्थाश्च भिन्नाः सुलिखिता गदाः ॥१६॥ सद्योव्रणाश्च ये चैव चलसन्धिष्यपाश्रिताः ।

निम्न रोग सीने योग्य हैं—जो रोग मेदोजन्य हों, जो फटे गये हों और जिन रोगों में सम्पूर्ण रूप में लेखन कार्य हो चुका हो, चलसन्धि (movable हिलनेवाली) का आश्रय करके जो सद्योव्रण हों—उनको सीना चाहिये ॥१६॥

न क्षाराभिर्विषैर्जुष्टा न च मारुतवाहिनः ॥१७॥

नान्तलोहितशल्यार्शच

निम्न अवस्थाओं में सीना नहीं चाहिये—क्षौर या अग्नि अथवा विष से दूषित, मारुतवाही (फुफ्फुस आदि में) जिन में अन्दर दूषित रक्त या शल्य हों—उन व्रणों को नहीं सीना चाहिये ॥१७॥

तेषु सम्यग्निवशोधनम् ।

पांगुरोमनखादीनि चलमस्थि भवेच्च यत् ॥१८॥ अहतानि यतोऽमूनि पाचयेयुर्भ्रं व्रणम् ।

रुजश्च विविधाः कुर्पुस्तस्मादेतान् विशोधयेत् ॥१९॥

इनमें भली प्रकार से संशोधन करना चाहिये । क्यौकि-

व्रण में जो धूलि, बालै, नखै आदि वस्तुयें या हिलती हुई

अस्थि होती हैं, इनको यदि बाहर न निकाला जाये तो वे वस्तुयें व्रण को बहुत अधिक पका देती हैं । एवं नाना प्रकार

१ एक रोग में कई कार्य बताये हैं, यथा—अर्बुद में लेखन मेदन, छेदन आदि आवश्यकतानुसार हैं ।

अं. २५ ]

सूत्रस्थानम्

८६

की तीन वेदनायें उपेक्ष करती हैं। इसलिये इन वस्तुओं का शोधन करना चाहिये ॥१६॥

ततो त्रणं समुन्नम्य स्थापयित्वा यथास्थितम् । सौन्धेत् सूक्ष्मेण सूत्रेण वल्केनारमन्तकस्य वा ॥२०॥ शणजक्षीमसूत्राभ्यां स्नात्वा बालेन वा पुनः । मूर्वागुड्घोतानेवां सौन्धेद्वेहितकं शनैः ॥२१॥

सीने की विधि—त्रण को ऊँचा उठाकर, यथास्थान में स्थित करके (किनारों को पास में मिलाकर), बारीक-धागे से अरमन्तक वृक्ष (अम्ल लोटक) वत्कल से, सन् के या रेशम के धागे से, स्नायु (Cat Cut) से अथवा बाल से सीना चाहिये (सीने से पूर्व इनको भी Asputic कर लेना चाहिये)। या मूर्वा, गिलोय की बेल के धागों से धीरे धीरे सीना चाहिये ॥२०, २१॥

सौन्धेद् गोफणिकां वाऽपि सौन्धेद्वा तुलसेवनीम् ।

ऋजुप्रन्थिमथो वाऽपि यथायोगमथापि वा ॥२२॥

सीना चार प्रकार का है। यथा—वेक्षितं, गोफणिका, तुलसेवनी, या ऋजु प्रन्थि१। अथवा जैसा उचित समझे, उसी प्रकार से सीना चाहिये ॥२२॥

देशेऽल्पमांसे सन्धौ च सूची वृत्ताङ्गुलद्वयम् ।

आयता त्र्यङ्कुला त्र्यस्त्रा मांसले चाऽपि पूजिता ॥२३॥

धनुर्वेका हिता सर्भफलकोशोदरोपरि ।

इत्येताश्चिविधाः सूचीस्तीक्ष्णाः सुसमाहिताः ॥२४॥

कारयेन्मालतीपुष्पवृत्ताप्रपरिषण्डलाः ।

नातिदूरे निकृष्टे वा सूचीकर्मणि पातयेत् ॥२५॥

१ वेलित का लक्षण—

“अल्पान्तरन्तु कुटिलं सौन्ध्यं बहु वेष्टनम् ।

यत्तद् वेलिततकं नाम शाखादी युज्यते बुधैः ॥”

गोफणिका लक्षण—

“पाटितं योजिगुदयोरन्तरं वा तथाविधम् ।

देशं स्पृश्वा यथायोगं पुनस्तच्छेदशंक्या ॥

नातिस्युले नातिसूक्ष्मे शलाके द्वे निपात्य च ।

तदा सक्तेन सूत्रेण संवेष्ट्य सेवनी कृता ॥

नाम्ना गोफणिका प्रोक्ता दुष्करा मन्दबुद्धिभिः ॥”

तुलसेवनी का लक्षण—

“पृथक् पृथक् तु सच्छिन्नं सौध्यं तुलसेवनी ।

या योज्या पक्षकोपादी ॥”

ऋजुप्रन्थि का लक्षण—

“पाश्चात् पाश्चान्तरं यावत् ऋजुसूचीं निपात्य च ।

संवेष्ट्याकृष्य सूत्रेण प्रन्थियैः सन्धित्वेत् ।

क्रियते स ऋजुप्रन्थिरोष्ठादिवु विधीयते ॥”

कबिराज हाराणचन्द्र जी की टीका से ।

दूराद् रुजो त्रणौष्ठस्य सन्निष्कृष्टेऽवलुच्छनम् ॥२६॥

सूई के भेद—सूईयाँ तीन प्रकार की हैं—यथा—अल्प मांस-वाले प्रदेशों में तथा सन्धियों में सीने के लिये सूई गोल्—दो अंगुल लम्बी होनी चाहिये। २—मांसल स्थानों के लिये तिकोनी तीन अंगुल लम्बी सूई उत्तम है। ३—मर्मस्थान, फलकोश (अण्ड-कोष) और उदर पर सीने के लिये धनुष के समान वक्राकार सूई प्रशस्त है। ये तीनों प्रकार की सूईयां आगे से खून तीक्ष्ण, सुगमता से पकड़ने योग्य होती चाहिये। मालती-पुष्प के समान इनका वृन्त तथा अप्रभाग गोल् होना चाहिये। सीवनकार्य में सूई को त्रणमुख से न तो बहुत दूर और न बहुत समीप रखवा में प्रविष्ट करना चाहिये। क्योंकि दूर में प्रविष्ट करने से त्रण के किनारे में दर्द होगा, पास में प्रविष्ट करने से त्रण का किनारा कट जायेगा।

वि० मन्तव्य—सूची का अप्र तीक्ष्ण होता है और उसके मूलभाग में धागा डालने के लिये छिद्र होता है। यद्यपि सूई में पृथक् वृन्त नहीं होता परन्तु, जहाँ से वह पकड़ी जाती है वह भाग “वृन्त” कहलाता है ॥२३-२६॥

अथ क्षौमपिचुच्छनं सुरस्युते प्रतिसारयेत् ।

प्रियङ्गवञ्जनयष्ट्याह्वरोधचूर्णैः समन्ततः ॥२७॥

शल्लकीफलचूर्णैर्वा क्षौमध्यामेन वा पुनः ।

ततो त्रणं यथायोगं बद्धवाऽऽचारिकमादिशेत् ॥२८॥

सीने के पश्चात् कृम-मली प्रकार से सीने के पश्चात् रेशम के वस्त्र से और रूई से ढाँप देना चाहिये। इसके ऊपर प्रियंगु (फूल प्रियंगु गावहला), रसांजनं, सुल्हंठी, लोहै (पठानी लोष) इनका चूर्ण अथवा शल्लकी फल (बीज) के चूर्ण को अथवा क्षौमध्याम (रेशम के वस्त्र की राख) से त्रण के चारों ओर प्रतिसारण कर देना चाहिये। इसके पश्चात् त्रण को यथाविधि बांधकर त्रणितोपासनीय अध्याय में कहे आहार विहार को बता देना चाहिये।

वि० मन्तव्य—यहाँ प्रतिसारण का तात्पर्य बुरकना है ॥

एतद्वष्टविधं कर्म समासेन प्रकीर्तितम् ।

चिकित्सितेषु कास्तन्यैन विस्तरस्तस्य वक्ष्यते ॥२९॥

यहाँ पर संक्षेप से आठ प्रकार का शस्त्रकर्म कह दिया है।

चिकित्सास्थान में सम्पूर्ण रूप से इसको विस्तार से कहेंगे ॥२९॥

हीनातिरिक्तं तिर्यक् च गात्रच्छेदनमात्मनः ।

एताश्चतस्रोऽष्टविधे कर्मणि व्यापदः स्मृताः ॥३०॥

आठ प्रकार के कर्मशास्त्र में चार प्रकार की व्यापद (दोष) हैं। यथा—हीनछेदन (आवश्यकता से सम छेदन करना), अतिरिक्त छेदन (अधिक छेदन करना), तिर्यक्छेदन (तिरछा छेदन), और अपने शरीर (अंगों) का छेदन करना-ये चार दोष हैं।