भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144

६६

मुश्रुतसंहिता

[ अ० २४ ]

सर्गजाश्च, तेऽपि द्विविधाः—विद्युदशनिकृताः पिशाचादिकृताश्च, पुनश्च द्विविधाः—संसर्गजाः, आकस्मिकार्शच । स्वभावबलप्रवृत्ता ये ज्युषिपासाजाराभ्युत्पन्निद्रा-प्रभृतयः, तेऽपि द्विविधाः—कालजाः, अकालजाश्च, तत्र परिरक्षणकृताः कालजाः, अपरिरक्षणकृता अकालजाः । एते आधिदैविकाः । तत्र सर्वत्राध्यवरोधः ॥॥

कालबल प्रवृत्ता—जो कि शीत, उष्ण, वायु, वर्षा आदि के कारण उत्पन्न होते हैं । ये भी दो प्रकार के हैं । यथा—एक—व्यापन्नकृत (दूषित ऋतु के कारण उत्पन्न-जनपदध्वंस आदि रोग) दूसरे—अव्यापन्नकृत (अदूषित ऋतुजन्य) । दैवबल प्रवृत्ता (दैवशक्ति से उत्पन्न)—जो कि देवता, गुरु, सिद्ध पुरुषों के साथ द्रोह करने के या गुरुओं के अभिशाप से उत्पन्न या अथर्ववेदप्रणीत आभिचारिक मन्त्रों द्वारा उत्पन्न अथवा रुग्ण मनुष्य के समीप रहने से उपसर्ग द्वारा उत्पन्न संकामक ज्वर आदि । ये भी दो प्रकार के हैं । एक—विद्युत् जन्य और अशनिकृत (विद्युत्-लता के आकार में तिरछी-आग के समान गिरनेवाली, अशनि-मूसल के समान सीधी नीचे गिरनेवाली), दूसरा—पिशाचादिजन्य । ये (पिशाचादिजन्य) भी दो प्रकार के हैं । यथा—संसर्गजन्य (रोगी के पास रहने से), दूसरा—आकस्मिक (वैव-द्रोह आदि के कारण से उत्पन्न) । स्वभावबल प्रवृत्ता—भूज, प्यास, जरा, मृत्यु आदि (ये भी दो प्रकार के हैं) । यथा—कालजन्य और अकालजन्य । रक्षा करने पर भी जो रोग होते हैं, वे कालजन्य हैं । बिना रक्षा (प्रयत्न) करने पर जो होते हैं, वे—अकालजन्य हैं । ये आधिदैविक रोग हैं । इनमें सब रोगों का समावेश हो जाता है ॥७॥

सर्वेषां च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एव मूलं; तल्लिङ्गत्वाद् दृष्टफलत्वादागमाच्च । यथा हि कृत्स्नं विकारजातं विश्रूरूपेणावस्थितं सत्त्वरजस्तमांसिन व्यतिरिच्यन्ते, एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्रूरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वातपित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते । दोषधातुमल-संसर्गादायतनविशेषाभिमितश्चैषां विकल्पः । दोषदूषितेष्वत्यर्थं धातुषु संज्ञा—रसजोऽयं, शोणितजोऽयं, मांसजोऽयं, मेदोजोऽयं, अस्थिजोऽयं, मज्जजोऽयं, शुक्रजोऽयं व्याधिरिति ॥८॥

सब रोगों का मूल कारण वात-पित्त-कफ ही है । क्योंकि—तल्लिङ्गत्वात्, रोगों में—वातादि के लक्षण दिखाई देते हैं । दृष्टफलत्वात्, वातादिहर औषधियों से चिकित्सा करने पर—लाम होता देखा जाता है, आगमात्—शास्त्र से भी ज्ञात होता है कि वात आदि ही सब रोगों के कारण हैं । जिस प्रकार सम्पूर्ण (महद् आदि चौबीस तत्त्व) विकार समूह—जगत रूप में स्थित होते हुए भी—सत्त्व, रज, तम से पृथग् नहीं होता,

उसी प्रकार सब रोग भी वात-पित्त कफ से पृथग् नहीं जाते । दोष (वातादि), धातु, (रसादि), मल (मूत्रादि) के संयोग की भिन्नता से, स्थानभेद से और करणभेद से—रोग में भेद आ जाते हैं । दोषों द्वारा धातुओं के दूषित होने से रसादि की 'दूष्य' यह संज्ञा हो जाती है । दोषजन्य रोगों में—रसजन्य, रक्तजन्य, मांसजन्य, मेदोजन्य, अस्थिजन्य, मज्ज्जजन्य शुक्रजन्य—यह रोग है, ऐसा व्यवहार हो जाता है । जिस प्रकार—'धी से जल गया, लोहे से जल गया'—ऐसा कहने पर 'धी-में स्थित अग्नि से जल' ऐसा ज्ञात होता है, उसी प्रकार रक्तजन्य यह रोग है, ऐसा कहने पर समझना चाहिये कि रक्त को किसी दोष ने दूषित किया होगा ॥८॥

तत्र, अन्ताश्रद्धारोचकाविपाकाङ्क्षमर्दव्वरहलाससुरमि गौरवंहृत्पाण्डुरोगमाग्रापरोधकार्यवैरस्याङ्क्षसादाकालज-वलीपलितदर्शनप्रभृतयो रसदोषजा विकाराः, कुष्ठविसर्प-पिडकामशकनीलिकातिलकालकन्यच्छव्यन्नेन्द्रलुप्तप्लीहवि-द्विगुल्मवातशोणितार्गोऽबुंदाङ्क्षमर्दोऽसृग्द्ररक्तपित्तप्रभृति रक्तदोषजाः, गुदमुखमेदपाकाश्च, अधिमांसाबुंदागोऽधि-जिह्वापिजिह्वापकुशगलगुण्डिकालजीमांससंघातोऽष्टप्रकोपग-लगण्डगण्डमालाप्रभृतयो, मांसदोषजाः ग्रन्थिबुद्धिगलग-ण्डाबुंदमेदोजोऽष्टप्रकोपमधुमेहातिस्थौल्यातिस्वेदप्रभृतयो मे-दोदोषजाः, अधस्थ्यधिदन्तास्थितोदशूलकुनखप्रभृतयोऽ-स्थिदोषजाः, तमोदर्शनमूर्छाभ्रमपर्वशूलमूलारुर्जनमनेत्रा-भिष्यन्दप्रभृतयो मज्जदोषजाः, कलैड्याप्रहर्षशुक्राशमरीशु-क्रमेहशुक्रदोषादयश्च तद्दोषजाः, त्वरदोषाः सज्जोऽतिप्रवृ-त्तिरयथाप्रवृत्तिर्वेन्द्रियायतनदोषजाः इत्येष समास उक्तः, विस्तरं निमित्तानि चैषां प्रतिरोगं बध्यामः ॥९॥

अन्त में—द्वेष, अरुचि, अविपाक, अङ्गों का टूटना, ज्वर, हल्लास (वमन की इच्छा), वृत्ति (बिना भोजन के) भारीपन, हृदयरोग, पाण्डुरोग, माग्राओं की रूकावट, कुशता, मुख के स्वाद में परिवर्तन, अङ्गों में पीड़ा, बिना समय के चेहरे पर झुर्रियाँ आना—बालों का सफेद होना आदि रसजन्य विकार हैं । कुष्ठ, वीसर्प, पिडिका, मशक, नीलिका, तिलकालक, न्यच्छ, व्यंग, इन्द्रलुप्त, प्लीहा, विद्वधि, गुल्म, वात-रक्त, अर्श, अबुंद, अङ्गों का टूटना, रक्त-प्रदर, रक्तपित्त आदि रक्तदोषजन्य रोग हैं । गुदा का पाक, मुख का पाक, शिरन का पाक, अधिमांस, अबुंद, अर्श, अधिजिह्वा, उपजिह्वा, उपकुश, गलगुण्डिका, अलजी, मांससंघात, ओष्ठप्रकोप, गलगण्ड, गण्डमाला आदि मांसजन्य रोग हैं । ग्रन्थि, बुद्धि, गलगण्ड, मेदोजन्य अबुंद, ओष्ठप्रकोप, मधुमेह, अतिस्थूलता, अतिस्वेद—आदि मेद-दोषजन्य रोग हैं । अधिक अस्थि, अधिक दन्त, अस्थि में पीड़ा, शूल, कुनख आदि अस्थि दोषजन्य रोग हैं । आँखों के सामने अन्धेरा आना, मूर्छा, भ्रम, पर्वों में मोटी जड़ोंवाली फुसियों की

सुश्रुत संहिता · पृष्ठ 144, कुल 872 में से · BharatKosha