सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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उत्पत्ति, ऊरु और जह्ना, का मोटा एवं भारी होना, नेत्राभि- ध्यन्द आदि-मेददोषजन्य रोग हैं। क्लीवता, अप्रहर्य (मैथुन के विषय में अनिच्छा) शुक्राशमरी, शुक्रमेह और शुक्- जन्य दोष-शुक्रदोष से उत्पन्न होते हैं। त्वचा के दोष (कुष्ठ- आदि), कान नासिका-आँख में मल का अवरोध या मलों का अधिक आना, अथवा दूषित रूप में बाहर आना ये-मलस्थान- दोषजन्य हैं। इन्द्रियों की अपवृत्ति ( अपने कार्य में प्रवृत्त न होना) या मिथ्या रूप से प्रवृत्त होना-इन्द्रियस्थानजन्य विकार हैं।
यहाँ पर यह सब संक्षेप में कहा है। विस्तार से इनके कारणों को प्रत्येक रोग में कहेंगे ॥६॥
भवति चात्र—
कुपितानां हि दोषाणां शरीरे परिधावताम् ।
यत्र सङ्गः स्ववैगुण्याद्व्याधित्तत्रोपजायते ॥१०॥
कहा भी है—
प्रकुपित दोष जब शरीर में इधर उधर दौड़ने लगते हैं, उस समय क्षोतसों के विकार के कारण जिस स्थान पर ये दोष रुक जाते हैं, उसी स्थान पर रोग उत्पन्न हो जाता है ॥१०॥
भूयोऽत्र जिज्ञास्यं किं वातादीनां ज्वरादीनां च नित्यः संश्लेषः परिच्छेदो वा ? इति, यदि नित्यः संश्लेषः स्या- तर्हि नित्यातुराः सव एव प्राणिनः स्युः, अथाप्यन्यथा वातादीनां ज्वरादीनां च, 'अन्यत्र वर्तमानानामन्यत्र लिङ्गं न भवति' इति कृत्वा यदुच्यते वातादयो ज्वरा- दीनां मूलानीति तन्न । अत्रोच्यते—दोषान् प्रत्याख्याय ज्वरादयो न भवन्ति, अथ च न (नित्यः) संबन्धः, यथाहि विद्युद्वाताशनिवर्षाण्याकाशं प्रत्याख्याय न भवन्ति, सत्य- ण्याकाशं कदाचिन्न भवन्ति, अथ च निमित्ततस्तत एवो त्पत्तिरिति, तरङ्गबुद्धुदादयश्चोदकविशेषा इव, वाता- दीनां ज्वरादीनां च नाप्येवं संश्लेषो न परिच्छेदः शाश्व- तिकः, अथ च निमित्तत एवोत्पत्तिरिति ॥११॥
यहाँ पर एक बात जाननी है कि—क्या बात आदि दोषों का ज्वर आदि रोगों के साथ नित्य सम्बन्ध (समवाय) बना रहता है, या नहीं ? यदि इनका नित्यसम्बन्ध है (जिस प्रकार- चन्द्रमा और ज्योत्स्ना का), तो सब प्राणियों को सदा ही रोगी रहना चाहिये और यदि इनका परिच्छेद (पृथक्त्व) मानते हो (जैसा कि-घड़े और कुम्हार का, वस्त्र और जुलाहे में मानते हो) तो वातादि प्रकृतिवाले पुरुषों में ज्वर आदि रोग का या बात रोग का कोई लक्षण नहीं दीखता। अन्यत्र वर्तमान भावों के लक्षण अन्यत्र नहीं होते-इस नियम से बात आदि ज्वर आदि के कारण नहीं हैं। इसलिये जो ऊपर कहा कि बात आदि ज्वर आदि का कारण है, यह ठीक नहीं।
इसका उत्तर—ज्वर आदि रोग, दोषों का (बात आदि) परित्याग करके उत्पन्न नहीं होते। और न इनका नित्य सम्बन्ध है। जिस प्रकार विद्युत्, अशनि, वायु और वर्षा आकाश के बिना नहीं रह सकते, और आकाश के रहने पर भी कभी नहीं भी होते और कारणों से ये ही उत्पन्न हो जाते हैं। दूसरा उदा- हरण—पानी में उत्पन्न होनेवाली तरङ्ग एवं बुलबुले भी न तो सदा उत्पन्न रहते हैं और न सदा अनुत्पन्न रहते हैं, कारण से उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार से बात आदि दोषों का ज्वर आदि रोगों के साथ न तो नित्य संश्लेष (सम्बन्ध) ही है और न नित्य पृथक्त्व ही है। कारण से ही इनकी उत्पत्ति हो जाती है ॥११॥
भवति चात्र—
विकारपरिमाणं च संख्या चैषां पृथक् पृथक् ।
विस्तरेणोत्तरे तन्नै सर्वा बाधा च वद्यते ॥१२॥
विकार परिमाण (रोगों की समुदाय-संख्या), इन रोगों की पृथक् पृथक् संख्या (अट्टारह कुष्ठ, बीस प्रमेह आदि) सब प्रकार की बाधाएँ (रोग-ज्वर-अतिसार आदि)—विस्तार से उत्तर तन्न में कहेंगे ॥१२॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने व्याधिसमुद्देशीयो नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४॥
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः
अथातोऽष्टविधशस्त्रकर्मियमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे 'अष्टविध शस्त्रकर्मिय' अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था। (चरक में शस्त्रकर्म छे' कहे हैं—और एकस्थान पर नौ गिने हैं—यथा—छेदन, भेदन, व्यधन, दारण, लेखन, उत्पाटन, प्रच्छन, सीवन और एषण) ॥२॥
छेद्या भगन्दरां ग्रन्थिः श्लैष्मिकस्तिलकालकः ।
व्रणवत्सर्पबुद्धाल्यशंखभर्मीलोऽस्थिमांसगम् ॥३॥
शल्यं जतुमणिमांससंघातो गल्लशुण्डिका ।
स्नायुमांससिराकोथो वल्मीकं जतपोनकः ॥४॥
अधृषश्चोपदंशाश्च मांसकन्धधिमांसकः ।
निम्न रोग छेदन करने के योग्य हैं। यथा—भगन्दर, कफ- जन्य (आम) ग्रन्थि, तिलकालक (झुद्ररोगाधिकारस्थ), व्रणवत्स (किल्लन व्रणोष्ठ), अबु'द (सब), अर्श, चर्मकील, (मांसकुर), अस्थिगत शल्य, जतुमणि, मांससंघात, गल्लशुण्डिका, गलित स्नायु, गलितमांस, गलित सिरा, वल्मीक, शतपोनक (व्रण-
१ छे' शस्त्रकर्म यथा-पाटनं व्यधनं चैव छेदनं लेखनं तथा । पच्छनं सीवनं चैव षड्विधं शस्त्रकर्म तत् ॥
चरक चि० अ० २५