सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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विशेष), अश्वष (मुख रोग), उपदंश, मांसकन्दी (कन्दकार-मांस) और अभिमांस-इनमें छेदन करना चाहिये ॥३,४॥
भेद्या विद्रध्योऽन्यत्र सर्वजाद् मन्थयन्त्रयः ॥४॥
आदितो ये विसर्पाश्च वृद्धयः सविदारिकाः ।
प्रमेहपिडकाः शोफः स्तनरोगोऽवमन्थकः ॥६॥
कुम्भीकाऽनुशयी नाड्यो वृन्दौ पुष्करिकाऽलजी ।
प्रायशः त्वद्रोगाश्च पुष्पटौ तालुदन्तजौ ॥७॥
तुण्डिकेरी गिलायुश्च पूर्व ये च प्रपाकिणः ।
वस्तिस्तथाऽऽमरीहेतोर्मेदोजां ये च केचन ॥८॥
निम्न रोगों में मेदन करना चाहिये । स्नान्निपातिक विद्रधि को छोड़कर शेष सब विद्रधियाँ, वात-पित्त-कफजन्य तीनों ग्रन्थियाँ, वात-पित्त-कफजन्य—प्रथम तीन विसर्प, सब वृद्धियाँ, विदारिका, प्रमेहपिडिका, व्रणशोफ, स्तनविद्रधि, अवमन्थक (शूकदोष में), कुम्भिका, अनुशयी, नाडीव्रण, वृन्द (एक वृन्द और द्वन्दकण्ठरोगों में), पुष्करिका, अलजी, प्रायः सब त्वद्रोग, तालुपुष्पट, दन्तपुष्पट, तुण्डिकेरी, गिलायु और मुखरोगों में कण्ठशाल्क आदि जो रोग पकनेवाले हैं, उनकी पच्यमानावस्था में ही, अशमरी के निकालने के लिये ही (वैसे-नहीं) वस्ति का और जो मेदोजन्य रोग हैं-उनमें मेदन करना चाहिये ॥५-८॥
लेख्याश्चतस्रो रोहिण्यः किलासमुपजिह्विका ।
मेदोजो दन्तवदभौ ग्रन्थिवर्त्तमाधिजिह्विका ॥९॥
अर्शासि मण्डलं मांसकन्दी मांसोन्नतिस्तथा ।
निम्न रोगों में लेखन करना चाहिये—वात-पित्त-कफ-रक्तजन्य चार रोहिणी, किलास, उपजिह्विका, दुष्टमेदजन्य ग्रन्थि आदि, दन्तवैदर्म, नेत्रग्रन्थि, नेत्रवर्त्त अधिजिह्विका, अर्श, मण्डल (कुष्ठ), मांसकन्दी और मांस की वृद्धि (व्रण आदि) में लेखन करना चाहिये ॥९॥
वेध्याः सिरा बहुविधा मूत्रवृद्धिं कोदरम् ॥१०॥
नाना प्रकार की सिराओं, मूत्रवृद्धि और जलोदर में वेधन करना चाहिये ॥१०॥
एष्या नाड्यः सगलयाश्च व्रणा उन्मागिणश्च ये नाडीव्रण, शल्ययुक्तव्रणों में, ऊपर-नीचे-तिरछे (विमार्ग) जानेवाले व्रणों में शलाका द्वारा एषण कार्य करना चाहिये ॥
आहार्याः शर्करास्तिस्रो दन्तकर्णमलोऽऽमरी ॥११॥
शल्यानि मूढगर्भाश्च वर्चश्च निचितं गुदे ।
निम्न रोगों में आहरण करना चाहिये । यथा—तीन शर्करायें (मूत्रशर्करा, पादशर्करा और दन्तशर्करा), दांत का मैल, कान का मैल, अशमरी, मूढगर्भ, शल्य, गुदा में संचित मल का आहरण करना चाहिये ॥११॥
ज्ञाग्या विद्रध्ययः पञ्च भवेयुः सर्वजाहते ॥१२॥
कुष्ठानि वायुः सरुजः शोफो यश्चैकदेशजः ।
पाल्यासयाः स्त्रीपदानि विषजुष्टं च शोणितम् ॥१३॥
अर्बुदानि विसर्पाश्च ग्रन्थयश्चादितश्च ते ।
त्रयरुयश्चोपदंशः स्तनरोगा विदारिका ॥१४॥
सु (शु) विरो गलशालूकं कण्टकाः कुमिदन्तकः ।
दन्तवेष्टः सोपकुशः शीतादो दन्तपुष्पटः ॥१५॥
पित्तासूककफजाश्चोष्टयाः क्षुद्ररोगाश्च भूयशः ।
निम्न रोगों में स्नावण (स्नाव) करना चाहिये । यथा—सन्निपात विद्रधि को छोड़कर शेष पाँचों विद्रधियाँ, कुष्ठ, पीड़ा के सहित वायु, एकदेशजन्य शोफ (अम्ल भोजन-निमित्त), पालि के रोग, स्त्रीपद, विषदूषित रक्त, अर्बुद, विसर्प, पूर्वोक्त (वात-पित्त-कफज) तीन ग्रन्थियाँ, तीन (वात, पित्त, कफजन्य) उपदंश, स्तनविद्रधि, विदारिका, शौषिर, गलशालूक, तालु-कण्टक, कुमिदन्त, दन्तवेष्ट, उपकुश, शीताद, दन्तपुष्पट, पित्त-रक्त एवं कफजन्य ओष्ठरोग एवं बहुत से त्वद्रोग स्नाव हैं ॥ जैसे कहा भी है—
“कर्मणा कश्चिदेकेन द्वाभ्यां कश्चित् त्रिमिस्तथा । विकारः साध्येत कश्चिच्चतुर्भिर्पि कर्मभिः ॥
सीन्या मेदःसमुत्थाश्च भिन्नाः सुलिखिता गदाः ॥१६॥ सद्योव्रणाश्च ये चैव चलसन्धिष्यपाश्रिताः ।
निम्न रोग सीने योग्य हैं—जो रोग मेदोजन्य हों, जो फटे गये हों और जिन रोगों में सम्पूर्ण रूप में लेखन कार्य हो चुका हो, चलसन्धि (movable हिलनेवाली) का आश्रय करके जो सद्योव्रण हों—उनको सीना चाहिये ॥१६॥
न क्षाराभिर्विषैर्जुष्टा न च मारुतवाहिनः ॥१७॥
नान्तलोहितशल्यार्शच
निम्न अवस्थाओं में सीना नहीं चाहिये—क्षौर या अग्नि अथवा विष से दूषित, मारुतवाही (फुफ्फुस आदि में) जिन में अन्दर दूषित रक्त या शल्य हों—उन व्रणों को नहीं सीना चाहिये ॥१७॥
तेषु सम्यग्निवशोधनम् ।
पांगुरोमनखादीनि चलमस्थि भवेच्च यत् ॥१८॥ अहतानि यतोऽमूनि पाचयेयुर्भ्रं व्रणम् ।
रुजश्च विविधाः कुर्पुस्तस्मादेतान् विशोधयेत् ॥१९॥
इनमें भली प्रकार से संशोधन करना चाहिये । क्यौकि-
व्रण में जो धूलि, बालै, नखै आदि वस्तुयें या हिलती हुई
अस्थि होती हैं, इनको यदि बाहर न निकाला जाये तो वे वस्तुयें व्रण को बहुत अधिक पका देती हैं । एवं नाना प्रकार
१ एक रोग में कई कार्य बताये हैं, यथा—अर्बुद में लेखन मेदन, छेदन आदि आवश्यकतानुसार हैं ।