भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अं. २५ ]

सूत्रस्थानम्

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की तीन वेदनायें उपेक्ष करती हैं। इसलिये इन वस्तुओं का शोधन करना चाहिये ॥१६॥

ततो त्रणं समुन्नम्य स्थापयित्वा यथास्थितम् । सौन्धेत् सूक्ष्मेण सूत्रेण वल्केनारमन्तकस्य वा ॥२०॥ शणजक्षीमसूत्राभ्यां स्नात्वा बालेन वा पुनः । मूर्वागुड्घोतानेवां सौन्धेद्वेहितकं शनैः ॥२१॥

सीने की विधि—त्रण को ऊँचा उठाकर, यथास्थान में स्थित करके (किनारों को पास में मिलाकर), बारीक-धागे से अरमन्तक वृक्ष (अम्ल लोटक) वत्कल से, सन् के या रेशम के धागे से, स्नायु (Cat Cut) से अथवा बाल से सीना चाहिये (सीने से पूर्व इनको भी Asputic कर लेना चाहिये)। या मूर्वा, गिलोय की बेल के धागों से धीरे धीरे सीना चाहिये ॥२०, २१॥

सौन्धेद् गोफणिकां वाऽपि सौन्धेद्वा तुलसेवनीम् ।

ऋजुप्रन्थिमथो वाऽपि यथायोगमथापि वा ॥२२॥

सीना चार प्रकार का है। यथा—वेक्षितं, गोफणिका, तुलसेवनी, या ऋजु प्रन्थि१। अथवा जैसा उचित समझे, उसी प्रकार से सीना चाहिये ॥२२॥

देशेऽल्पमांसे सन्धौ च सूची वृत्ताङ्गुलद्वयम् ।

आयता त्र्यङ्कुला त्र्यस्त्रा मांसले चाऽपि पूजिता ॥२३॥

धनुर्वेका हिता सर्भफलकोशोदरोपरि ।

इत्येताश्चिविधाः सूचीस्तीक्ष्णाः सुसमाहिताः ॥२४॥

कारयेन्मालतीपुष्पवृत्ताप्रपरिषण्डलाः ।

नातिदूरे निकृष्टे वा सूचीकर्मणि पातयेत् ॥२५॥

१ वेलित का लक्षण—

“अल्पान्तरन्तु कुटिलं सौन्ध्यं बहु वेष्टनम् ।

यत्तद् वेलिततकं नाम शाखादी युज्यते बुधैः ॥”

गोफणिका लक्षण—

“पाटितं योजिगुदयोरन्तरं वा तथाविधम् ।

देशं स्पृश्वा यथायोगं पुनस्तच्छेदशंक्या ॥

नातिस्युले नातिसूक्ष्मे शलाके द्वे निपात्य च ।

तदा सक्तेन सूत्रेण संवेष्ट्य सेवनी कृता ॥

नाम्ना गोफणिका प्रोक्ता दुष्करा मन्दबुद्धिभिः ॥”

तुलसेवनी का लक्षण—

“पृथक् पृथक् तु सच्छिन्नं सौध्यं तुलसेवनी ।

या योज्या पक्षकोपादी ॥”

ऋजुप्रन्थि का लक्षण—

“पाश्चात् पाश्चान्तरं यावत् ऋजुसूचीं निपात्य च ।

संवेष्ट्याकृष्य सूत्रेण प्रन्थियैः सन्धित्वेत् ।

क्रियते स ऋजुप्रन्थिरोष्ठादिवु विधीयते ॥”

कबिराज हाराणचन्द्र जी की टीका से ।

दूराद् रुजो त्रणौष्ठस्य सन्निष्कृष्टेऽवलुच्छनम् ॥२६॥

सूई के भेद—सूईयाँ तीन प्रकार की हैं—यथा—अल्प मांस-वाले प्रदेशों में तथा सन्धियों में सीने के लिये सूई गोल्—दो अंगुल लम्बी होनी चाहिये। २—मांसल स्थानों के लिये तिकोनी तीन अंगुल लम्बी सूई उत्तम है। ३—मर्मस्थान, फलकोश (अण्ड-कोष) और उदर पर सीने के लिये धनुष के समान वक्राकार सूई प्रशस्त है। ये तीनों प्रकार की सूईयां आगे से खून तीक्ष्ण, सुगमता से पकड़ने योग्य होती चाहिये। मालती-पुष्प के समान इनका वृन्त तथा अप्रभाग गोल् होना चाहिये। सीवनकार्य में सूई को त्रणमुख से न तो बहुत दूर और न बहुत समीप रखवा में प्रविष्ट करना चाहिये। क्योंकि दूर में प्रविष्ट करने से त्रण के किनारे में दर्द होगा, पास में प्रविष्ट करने से त्रण का किनारा कट जायेगा।

वि० मन्तव्य—सूची का अप्र तीक्ष्ण होता है और उसके मूलभाग में धागा डालने के लिये छिद्र होता है। यद्यपि सूई में पृथक् वृन्त नहीं होता परन्तु, जहाँ से वह पकड़ी जाती है वह भाग “वृन्त” कहलाता है ॥२३-२६॥

अथ क्षौमपिचुच्छनं सुरस्युते प्रतिसारयेत् ।

प्रियङ्गवञ्जनयष्ट्याह्वरोधचूर्णैः समन्ततः ॥२७॥

शल्लकीफलचूर्णैर्वा क्षौमध्यामेन वा पुनः ।

ततो त्रणं यथायोगं बद्धवाऽऽचारिकमादिशेत् ॥२८॥

सीने के पश्चात् कृम-मली प्रकार से सीने के पश्चात् रेशम के वस्त्र से और रूई से ढाँप देना चाहिये। इसके ऊपर प्रियंगु (फूल प्रियंगु गावहला), रसांजनं, सुल्हंठी, लोहै (पठानी लोष) इनका चूर्ण अथवा शल्लकी फल (बीज) के चूर्ण को अथवा क्षौमध्याम (रेशम के वस्त्र की राख) से त्रण के चारों ओर प्रतिसारण कर देना चाहिये। इसके पश्चात् त्रण को यथाविधि बांधकर त्रणितोपासनीय अध्याय में कहे आहार विहार को बता देना चाहिये।

वि० मन्तव्य—यहाँ प्रतिसारण का तात्पर्य बुरकना है ॥

एतद्वष्टविधं कर्म समासेन प्रकीर्तितम् ।

चिकित्सितेषु कास्तन्यैन विस्तरस्तस्य वक्ष्यते ॥२९॥

यहाँ पर संक्षेप से आठ प्रकार का शस्त्रकर्म कह दिया है।

चिकित्सास्थान में सम्पूर्ण रूप से इसको विस्तार से कहेंगे ॥२९॥

हीनातिरिक्तं तिर्यक् च गात्रच्छेदनमात्मनः ।

एताश्चतस्रोऽष्टविधे कर्मणि व्यापदः स्मृताः ॥३०॥

आठ प्रकार के कर्मशास्त्र में चार प्रकार की व्यापद (दोष) हैं। यथा—हीनछेदन (आवश्यकता से सम छेदन करना), अतिरिक्त छेदन (अधिक छेदन करना), तिर्यक्छेदन (तिरछा छेदन), और अपने शरीर (अंगों) का छेदन करना-ये चार दोष हैं।

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