सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अं० ३५ ]
वि० मन्तव्य—गात्रच्छेदनं, चात्सनः—चिकित्सक का अपने ही अंगुली आदि किसी अवयव पर शास्त्राघात कर बैठना॥३०॥
अज्ञानलोभाहितवाक्ययोगभयप्रमोहैरपरैश्व भावैः। यदा प्रयुज्जीत भिषक्कुशब्दं तदा स शोषान् कुरुते विकारान्।
यदि वैद्य अज्ञान के कारण, लोभवश या अहित की दृष्टि से अथवा वाक्ययोग से (यह तो बच्चा है—इसमें जौ-मात्र शस्त्र लगाना चाहिये—ऐसे वचन से), भय से, शस्त्रकर्म में मोह आ जाने से, किसी अन्य प्रयोजन में व्यग्र होने से या इसी प्रकार के अन्य कारणों से, जब वैद्य शस्त्र को बुरी तरह (योद्धा) प्रयोग करता है, तब दोष अवशेष रह जाते हैं॥३१॥
तं क्षारशस्त्रान्निभिरौषधैश्च भूयोऽभिपुज्जानमयुक्तियुक्तम्। जिजीविषुर्दूरत एव वैद्यं विवर्जयेदुप्रविषाहितुल्यम्॥३२॥
जीवन की अभिलाषा करनेवाला रोगी-क्षार, शस्त्र, अनि अथवा औषध के अयुक्तियुक्त (विधिरहित) तथा बार-बार (असफल होने पर भी पुनः पुनः) प्रयोग करनेवाले वैद्य को-उप्रविषवाले सर्प के समान (समक्षकर) दूर से ही परित्याग कर देवे अर्थात् उससे चिकित्सा न करावे।
उक्त ४ व्यापदों में से यह हीन कर्म की व्यापद का वर्णन है। सू० ३३ में अतिकर्म की व्यापद का वर्णन है। श्लो० ४१ में गात्रच्छेदनं चात्सनः तथा श्लो० ४२ तिर्यक्च्छेदन का वर्णन है॥३२॥
तदेव युक्तं स्वेति मर्मसन्धीन्
हिस्यात् सिराः स्नायुमथास्थि चैव।
मुखं प्रयुक्तं पुरुषं क्षणं
प्राणैर्वियुज्ज्यादथवा कदाचित्॥३३॥
शस्त्र के अतियोग होने पर मर्म सन्धि, सिरा-स्नायु और अस्थि को हानि होती है। मूर्ख वैद्य से प्रयुक्त शस्त्र, कभी-कभी एक क्षण में पुरुष को प्राणों से पृथक् कर देता है॥३३॥
भ्रमः प्रलापः पतनं प्रमोहो
विचेष्टनं संलयनोष्णते च।
क्षस्ताङ्गता मूच्छन्तमूर्ध्ववात-
स्तोत्रा रजो वातकृताश्च तास्ताः॥३४॥
मांसोदकामं रंध्रं च गच्छेत्
सर्वेन्द्रियाथोपरमस्तथैव।
दशार्धसंख्येवपि विक्षतेषु
सामान्यतो मर्मसु लिङ्गयुक्तम्॥३५॥
शस्त्र के अतियोग से निम्न लक्षण होते हैं। यथा—भ्रम (चक्कर आना), प्रलाप (बक्वाद), पतन (गिरना), प्रमोह (चित्तनाश), विचेष्टन (हाथ-पाँव का चलना), संलयन (सुप्तावस्था में—बे मान रहना), उष्णता (शरीर का परितान), क्षस्तांगता (शरीर की शिथिलता), मूर्च्छा, ऊर्ध्ववात (श्वास),
वात जन्म पूर्वोक्त तीव्र वेदनायें (मन्यास्तम्भ आदि) होती हैं। मांस के धोवन के समान रक्त क्षति होता है, सब इंद्रियाँ अपने विषयों में निश्चेष्ट हो जाती हैं। ये मर्मसन्धि, सिरा, स्नायु और अस्थि इन पाँच के वर्णों के सामान्य लक्षण हैं, विशेष लक्षण आगे कहेंगे।
वि० मन्तव्य—दशार्धसंख्ये—दश से आधे अर्थात् ५ मर्म अधिष्ठान भेद से ५ प्रकार के हैं, यथा—१—मांस मर्म, २—सिरामर्म, ३—स्नायुमर्म, ४—अस्थिमर्म, ५—सन्धिमर्म। इन पर क्षत—आघात होने से भ्रम आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, हो सकते हैं॥३४,३५॥
सुरेन्द्रगोपप्रतिमं प्रभूतं
रक्तं खवेद्धे क्षततश्च वायुः।
करोति रोगान् विविधान् यथोक्ताः।
लिङ्गन्तासु भिन्नास्वथवा सिरासु॥३६॥
सर्मविद्ध सिरा आदि के लक्षण—
सिरा के विधने पर—व्रण में से वीर्यहूटी के समान रंग का, बहुत-सा रक्त बहता है। वायु नाना प्रकार के रोग (शिरोरोग, अधिमन्थ आदि) उत्पन्न करती है, सिराओं के छिन्न या भिन्न होने पर भी ये विकार होते हैं॥३६॥
कौट्यं शरीरावयवावसादः
क्रियास्वशक्तिस्तुमुला रुजश्च।
चिराद् व्रणो रोहति यस्य चापि
तं स्नायुविद्धं मनुजं व्यवस्येत॥३७॥
स्नायु के विद्ध होने पर—मनुष्य कुबड़ा हो जाता है, शरीर के अवयव अपने काम में असमर्थ हो जाते हैं, क्रियाओं में अशक्ति, तीव्र वेदना, व्रण देर में भरता है॥३७॥
शोफातिवृद्धिस्तुमुला रुजश्च
बलक्षयः पर्वसु भेदशोफौ।
क्षतेषु सन्धिष्वचलाचलेषु
स्यात् सन्धिकर्मोपरतिश्च लिङ्गम्॥३८॥
सन्धि के विद्ध होने पर—सूजन बहुत बढ़ जाता है, तीव्र वेदना होती है, बल का ह्रास, सन्धियों का सूजन तथा सन्धियाँ टूटती प्रतीत होती हैं। सन्धि का कार्य रुक जाता है, ये लक्षण चलसन्धि और अचलसन्धि—दोनों के क्षतों के हैं॥३८॥
चोरा रजो यस्य निशादिनेषु
सर्वास्ववस्थासु न ज्ञान्तिरस्ति।
तृष्णाङ्गसादौ स्वयथुश्च रुक् च
तमस्थिविद्धं मनुजं व्यवस्येत॥३९॥
अस्थि के विद्ध होने पर—रात-दिन तीव्र (भरणात्) वेदना रहती है। किसी भी अवस्था में ज्ञान्ति नहीं पड़ती। प्यास, अङ्गों में पीड़ा, शोथ और रुक्षता (रक्त-द्वै) रहती है॥३९॥