सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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यथास्वमेतानि विभावयेच्छ लिङ्गानि मर्मस्वभिताडितेषु ।
स्पर्शं न जानाति विपाण्डुवर्णा यो मांसमर्मण्यभिताडितः स्यात् ॥ ४० ॥
शिरादि मर्म के विङ्ग होने पर—ये ही पूर्वोक्त लक्षण (अपने-अपने) समझने चाहिए। मांस-मर्म के पीडित होने पर रोगी का स्पर्शज्ञान नष्ट हो जाता है और मांस का रङ्ग धूसरवर्ण हो जाता है ॥ ४० ॥
आत्मानमेवाथ जघन्यकारी शस्त्रेण यो हन्ति हि कर्म कुर्वन् ।
तमात्मवानात्महन् कुर्वेद्य विवर्जयेद्यायुरभीप्समानः ॥ ४१ ॥
जो गहिरा कर्म करनेवाला चिकित्सक-शस्त्र द्वारा छेदन आदि कर्म करता हुआ अपने ही किसी अवयव पर आघात कर बैठता है, उस आत्मघाती कुर्वेद्य (कुत्सित-निन्दित चिकित्सक) को—आयु-जीवन चाहनेवाला, आत्मवान् (मनस्वी) रोगी अवश्य त्याग देवे—उससे चिकित्सा न करावे ॥ ४१ ॥
तिर्यक् प्रणिहिते शस्त्रे दोषाः पूर्वमुदाहृताः । तस्मात् परिहरन् दोषान् कुर्याच्छ्लक्ष्मिपातनम् ॥ ४२ ॥
शस्त्र के तिर्यक् चलने पर अप्रोपहरणीय अध्याय में कहे—शिरा-स्नायु छेदन आदि दोष उत्पन्न होते हैं। इसलिये दोषों का परिहार करते हुए शस्त्र चलाना चाहिए। (दोष-मांस-कन्दी, अतिमात्र वेदना आदि) ॥
मातरं पितरं पुत्रान् बान्धवानपि चातुरः । अप्येतानभिशङ्कृत वैद्यो विश्वासर्मेत च ॥ ४३ ॥ विस्मृत्यात्मनाऽऽत्मानं न चैनं परिशङ्कृते ।
रोगी मनुष्य माता, पिता, पुत्र एवं सम्बन्धी जनों को भी शंका की दृष्टि से देखता है। परन्तु वैद्य में विश्वास करके अपने शरीर को उसे सौंप देता है, किसी प्रकार का भी सन्देह नहीं करता ॥ ४३ ॥
तस्मात् पुत्रचदेवैनं पालयेदातुरं भिषक् ॥ ४४ ॥ इसलिये वैद्य को चाहिए कि रोगी को पुत्र के समान रक्षा करे ॥ ४४ ॥
धर्माथौ कीर्तिमित्येवं सतां ग्रहणमुत्तमम् । प्राप्नुयात् स्वर्गवासं च हितमारभ्य कर्मणा ॥ ४५ ॥ इस रक्षा का फल—हितकारी कार्यों के करने से, धर्म, अर्थ, कीर्ति, सज्जनों से अत्यन्त सत्कार तथा स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥ ४५ ॥
कर्मणा कश्चिदुक्तेन द्वाभ्यां कश्चित् त्रिभिस्तथा । विकारः साध्यते काइचचतुर्भिरपि कर्मभिः ॥ ४६ ॥ कोई रोग एक (छेद्य या स्नेहन) कर्म से सिद्ध होता है, कोई दो कर्मों से, कोई तीन से, और कोई चार से सफल होता है ॥ ४६ ॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽष्टविंशद्विंशतिः प्रकरणे नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः
अथातः प्रनष्टशल्यविज्ञानोयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके अनन्तर 'प्रनष्टशल्य विज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था।
वि० मन्तव्य—जो शल्य दीखता नहीं उसको जानने का उपाय है जिस अध्याय में, उसको ॥ १, २ ॥
'शल' 'शूल' आशुगमने धातुः, तयोराराधस्य शल्यमिति रूपम् ॥ ३ ॥
'शल' और 'शूल' ये दो धातु शीघ्रगमन अर्थ में प्रयुक्त होती हैं, इनमें पहले से 'शल्य' शब्द बनता है ॥ ३ ॥
तद् द्विविधं शारीरमागन्तुकं च ॥ ४ ॥
शल्य दो प्रकार के हैं। यथा १—शारीरिक और २—आगन्तुक।
सर्वशरीराबाधकरं शल्यं, तद्विहोपदिश्यत इत्यतः शल्यशास्त्रम् ॥ ५ ॥
समूणं शरीर में जिससे पीड़ा होती है, वह शल्य और उसका इस समूण में व्याख्यान है, इसलिए इसको 'शल्यशाल' कहते हैं। यहाँ पर शरीर मन के साथ है। जैसा—चेष्टेन्द्रिया-शैश्रयः शरीरम्। न्याय० ॥ ५ ॥
तत्र शारीरं दन्तरोमनखादि-धातवोऽन्मला दोषाश्च दृष्टाः, आगन्तवपि शारीरशल्यव्यतिरेकेण यावन्तो भावा दुःखमुत्पादयन्ति ॥ ६ ॥
उनमें शारीरिक शल्य हैं, यथा-दुष्ट-विकृत-दन्त-रोम, नख, शमश्रु आदि, रसादि धातु, अन्न-मल (पुरीषकर्णमल आदि), और दूषित वात आदि दोष। आगन्तु—जितने पदार्थ (वृण, काष्ठ, पाषाण, लोह, लोष्ट आदि) दुःख उत्पन्न करते हैं, शारीरिक शल्य से प्रथम हैं वे सब आगन्तु शल्य हैं ॥ ६ ॥
अधिकारो हि लोहवेणुवृक्षतृणशृङ्गास्थिमयेषु, तत्रापि विशेषतो लोहवेधेव, विशसनाथौपपन्नत्वाङ्गोहस्य, लोहानामपि दुर्बोर्त्वादणुमुखत्वादुर्दूरप्रयोजनकरत्वाच्च शर एवाधिकृतः। स च द्विविधः कर्णा, शृङ्गश्च, प्रायेण विविधवृक्षपत्रपुष्पफलतुल्याकृतयो व्याख्याताः, न्याल-मुगपक्षिवक्त्रसहशश्च ॥ ७ ॥
शल्य के प्रसिद्ध भेद—लोह (स्वर्ण, लोह, चांदी आदि), बांस, वृक्ष, तृण, शृङ्ग अस्थि से बने पदार्थों में 'शल्य' शब्द प्रयुक्त होता है, इनमें भी विशेषकर (स्वर्ण-लोह-त्रपु-चांदी)
१ कोई आचार्य—'शल' धातु का अर्थ 'हिसा' मानते हैं, और कोई 'पीड़ा' अर्थ मानते हैं।