भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २६ ]

आदि धातु) में ही शल्य शब्द व्यवहृत होता है। क्योंकि—इन धातुओं का उपयोग हिंसा कार्य के लिए होता है, इनकी चोट दुर्घा होती है, या सूक्ष्ममुख होने से भी दूर से ही प्रयुक्त करने के द्वारा कार्यसिद्ध होने से बाण ही शल्य पद के लिये विशेष करके गिना है। यह शर-दो प्रकार का है। यथा एक-कर्णी (कर्णवान् बडिंश के समान—कांटों से युक्त मुखवाला) और दूसरा—शूल्क (चिकना)। ये दो प्रकार के बाण प्रायः नाना प्रकार के बूखों के पत्र फलों के आकारवाले तथा सांप, मृग, पक्षी-इनके मुख के समान होते हैं। इस प्रकार से शल्यों की आकृतियाँ कह दीं ॥ ७ ॥

सर्वशल्यानां तु महतामणूनां वा पञ्चविधो गति-विशेष ऊर्ध्वमधोर्वाचीनस्तित्यगुजुरिति ॥ ८ ॥

सब प्रकार के छोटे-बड़े शल्यों की गति पाँच प्रकार की होती है। यथा—ऊपर, नीचे, अर्वाचीन, तिरछी और सीधी। अर्वाचीन का अर्थ विपर्यस्त रूप में शरीर में घुसना ॥ ८ ॥

तानि वेगक्षयात् प्रतिघाताद्वा त्वगादिषु व्रणवस्तुष्व-वतिष्ठन्ते, धमनीस्रोतोऽस्थिविवरपेशीप्रभृतिषु वा शरीरप्रदेशेषु ॥ ९ ॥

ये शल्य वेग में घट जाने से अथवा वेग के प्रतिघात (निवृत्ति) से—त्वचा, मांस, शिरा, स्नायु आदि व्रण वस्तु में रह जाते हैं। अथवा धमनीच्छिद्र, स्रोतों में या अस्थिविवर में, या पेशी (मांसलण्ड) आदि शरीरप्रदेशों में रुकते हैं ॥ ९ ॥

तत्र शल्यलक्षणमुच्यमानमुपधारय। तत् द्विविधं—सामान्य वैशेषिकं च। श्यावं पिडकाचित् शोफवेदानन्तं सुदुर्मुहुः शोणितास्वाणि बुदुबुदवदुन्नतं मृदुमांसं च व्रणं जानोयात् सशल्येऽयमांत, सामान्यमेतलक्षणमुक्तम्। वैशेषिकं तु-स्वगते विवर्णः शोफो भवत्यायतः कठिनश्च। मांसगते शाकाभि (ति) वृद्धिः शल्यमार्गानुपसरोहः पीडनासहिष्णुता चोषपाकौ च; पेश्यन्तरस्थेऽप्येतदेव चोषशोषवजं; सिरागते सिराधमानं सिराशूलं सिराशो-फश्च; स्नायुगते स्नायुजालोत्प्रेषणं संरभश्चोप्रा रूक्च, स्रोतोगते स्रोतसां स्वकर्म्मगुणहानिः, धमनीस्थे सफेन-रक्तमौर्यग्रनिलः सशब्दो निर्गच्छत्यङ्गमर्दः पिपासा-हृत्तासश्च, अस्थिगते विविधवेदनाप्रादुर्भावः शोफश्च, अस्थिविवरगतेऽस्थिपूर्णताऽस्थिनित्तोदः संहर्षो बलवांश्च; सन्धिगतेऽस्थिवन्चेष्टोपरमश्च, कोष्ठगत आटोपानाहौ मूत्रपुरीषाहारदर्शनं च व्रणमुखता, मर्मगते मर्मविद्रवच्छे-ष्टते। सूक्ष्मगतिषु शल्येष्वेतान्येव लक्षणान्यस्पष्टानि भवन्ति ॥ १० ॥

शल्य का लक्षण कहते हैं—शल्य के लक्षण दो प्रकार के हैं। एक सामान्य (साधारण) और दूसरे विशेष। इसमें

साधारण लक्षण—श्यावता (कालेपन), पिडिकाओं से व्याप्त, शोफ एवं वेदनावान्, बार बार रक्तस्राव होना, बुलबुले आना और मांस का कोमल होना, इन लक्षणों से व्रण को शल्य युक्त समझना चाहिए। ये सामान्य लक्षण हैं। विशेष लक्षण—

त्वचा में शल्य होने पर—रक्त का परिवर्त्तन, सूजन होती है, जो लम्बी (दीर्घाकार) एवं कठिन होती है। मांस में शल्य होने पर—शोफ का वृद्धि, शल्य मार्गों का न भरना, दवाने पर असहनशीलता, चोष (चूषण की प्रतीति) और पाक होता है। दो पेशियों के मध्य-मांस में शल्य के समान सब लक्षण होते हैं, परन्तु चोष और सूजन नहीं होती। शिरा में शल्य होने पर—सिरा में आधमान, शिरा में शूल और सिरा में सूजन होती है। स्नायु में शल्य होने पर—स्नायुसमूह ऊपर को उठ जाता है, सूजन और तीव्र वेदना होती है। स्रोतों में शल्य होने पर—स्रोतों के अपने कार्य एवं गुण नष्ट हो जाते हैं। धमनी में शल्य होने पर—स्नागमिश्चित् रक्त को बाहर निकालते समय वायु बाहर आती है, अङ्गमर्द, पिपासा और वमन की अभिरुचि होती है। अस्थि में शल्य होने पर—नाना प्रकार की वेदनायें उत्पन्न होती हैं और सूजन होती है। अस्थि-च्छिद्र में शल्य होने पर—अस्थि में पूर्णता और अस्थि में पीड़ा होती है, बेचैनी होती है, अथवा संघट होता है। सन्धि में शल्य होने पर—अस्थि के समान लक्षण और चेधाओं की हानि होती है। कोष्ठ में शल्य होने पर—आटोप (पीड़ा युक्त वायु का विश्लेष), आनाह (वात-मूत्रमल का अवरोध), और व्रण के मुख से मूत्रमल और आहार आता है। मर्म में शल्य होने पर—मर्म विद्र पुरुष के समान चेधा करता है। जिन शल्यों की गति सूक्ष्म होती है, उनमें ये ही लक्षण अस्पष्ट रहते हैं ॥ १० ॥

महान्त्यल्पानि वा शुद्धदेहानामनुलोमसन्निविष्टानि रोहन्ति, विशेषतः कण्ठस्रोतः सिरात्त्वकपेश्यस्थिविवरेषु दोषप्रकोपन्यायामाभिघाताजीर्णभ्यः प्रचलितानि पुनर्वा-धन्ते ॥ ११ ॥

वात आदि दोषों से अदूषित-शुद्ध शरीरवाले पुरुषों में-रोग के अनुकूल प्रविष्ट हुए छोटे या बड़े सब प्रकार के शल्य युक्त व्रण भर जाते हैं। खासकर—गला, स्रोतस, सिरा त्वचा पेशी एवं अस्थिच्छिद्रों में प्रविष्ट हुए शल्यों के व्रण भर जाते हैं। परन्तु दोष के प्रकोप से, व्यायाम से, चोट के लगने से, अजीर्ण से वे शल्य चलायमान होकर शरीर को पुनः पीड़ित करते हैं ॥ ११ ॥

तत्र, त्वकप्रनष्टे स्निग्धस्विन्नायां मून्माषयवगोधूम-गोमयभृदित्यां त्वचि यत्र संरम्भो वेदना वा भवति

१ कहीं २ पर—‘महान्ति’ के स्थान पर ‘मूहन्ति’ पाठ है।