भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० २४ ]

सूत्रस्थानम्

६५

अतिदृषं से, क्रोध से, भय से रोहण हुआ वृण भी पुनः फट जाता है ॥२१॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने कृत्याकृत्स्नविधिनाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३॥

चतुर्विंशतितमोऽध्यायः

अथातो व्याधिसमुद्देशीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'व्याधिसमुद्देशीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसाकि धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

द्विविधास्तु व्याधयः—शस्त्रसाध्याः, स्नेहादिक्रियासाध्याश्च । तत्र शस्त्रसाध्येषु स्नेहादिक्रिया न प्रतिष्यते, स्नेहादिक्रियासाध्येषु शस्त्रकर्म न क्रियते ॥३॥

विधि भेद से रोग दो प्रकार के हैं। एक—शस्त्रसाध्य और दूसरे स्नेह-स्वेदन आदि क्रियासाध्य। इन से शस्त्रसाध्य रोगों में स्नेहादि क्रियाओं का निषेध नहीं है। परन्तु स्नेहादिक्रियासाध्य रोगों में शस्त्रकर्म निषिद्ध है ॥३॥

अस्मिन् पुनः आख्ये सर्वतन्त्रसामान्यात्, सर्वेषां व्याधीनां यथाशुल्लमवरोधः क्रियते। प्रागभिहितं 'तदुःखसंयोगा व्याधयः' ( सू० अ० १ ) इति तच्च दुःखं त्रिविधम्—आध्यात्मिकम्, आधिभौतिकम्, आधिदैविकमिति । तत्तु समविधे व्याधावुपनिपतति । ते पुनः समविधा व्याधयः, तद्यथा—आदिबलप्रवृत्ताः, जन्मबलप्रवृत्ताः, दोषबलप्रवृत्ताः, संघातबलप्रवृत्ताः, कालबलप्रवृत्ताः, देवबलप्रवृत्ताः, स्वभावबलप्रवृत्ता इति ॥४॥

इस संश्रुततन्त्र में शालाक्य आदि सब तन्त्रों के सिद्धान्त से सब रोगों का संग्रह किया जाता है। पहिले कह चुके हैं कि शरीर-शरीरी (शरीर और मन) के साथ दुःख का संयोग होने से व्याधियाँ हैं। यह दुःख तीन प्रकार का है। यथा—आध्या-

१ स्नायुबलेदात् सिराबलेदात् गन्धीयत् क्रमिभक्षणत् । अस्थिभेदात् सशल्यत्वात् सविषत्वाच्च सर्पणात् ॥ नखकाष्ठप्रभेदाच्च चर्मलोमातिघट्टनात् । मिथ्याबन्धादतिस्नेहात् अतिभैषज्यकर्षणात् ॥ अजीर्णादतिभुक्ताच्च विरुद्धासारप्रभोजनात् । शोकात् क्रोधाद् दिवास्वप्नात् व्यायामान्वेषनात्तथा ॥ वृणा न प्रशमं यान्ति निष्क्रियत्वाच्च देहिनाम् ॥ चरक० ।

२ शरीरदोषप्रकोपे खलु शरीरमेवाभित्य प्रायशः त्रिविधमोष-घमिच्छन्ति—अन्तःपरिमाजन्, बहिःपरिमाजन्, शस्त्रप्रणिधा-नञ्चेति ।

त्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक। इस तीन प्रकार के दुःख का अन्तर्भाव सात प्रकार की व्याधियों में हो जाता है। सात प्रकार की व्याधियाँ, यथा—आदिबलप्रवृत्ता, जन्मबलप्रवृत्ता, दोषबलप्रवृत्ता, संघातबलप्रवृत्ता, कालबलप्रवृत्ता, देवबलप्रवृत्ता, स्वभावबलप्रवृत्ता ॥४॥

तत्र, आदिबलप्रवृत्ता ये शुक्रजोणितदोषान्वयाः कुष्ठाः शःप्रभृतयः तेषु द्विविधाः—मातृजाः, पितृजाश्च । जन्मबलप्रवृत्ता ये मातुरपचारात् पङ्कजात्यन्धवधिर-मूकमिनिमनवामनप्रभृतयो जायन्ते, तेषु द्विविधाः—रस-कृताः दौह्दापचारकृताश्च । दोषबलप्रवृत्ता ये आतङ्क-समुत्पन्ना मिथ्याहाराचारकृताश्च, तेषु द्विविधाः—आमाशयसमुत्थाः, पक्वाशयसमुत्थाश्च, पुनश्च द्विविधाः—शारीरा, मानसाश्च । त एते आध्यात्मिकाः ॥५॥

इनमें आदिबल प्रवृत्ता (दुष्टजोणितबलजता), जो कि दूषित शुक्र-आर्चव के दोष के कारण उत्पन्न होती है, यथा—कुष्ठ, अर्श आदि। ये भी दो प्रकार की हैं। एक—मातृजन्य और दूसरी—पितृजन्य। जन्मबल प्रवृत्ता जो कि माता के दूषित आहार-विहार के कारण उत्पन्न होती है। यथा—पंगुपन, अन्धत्व, बधिरत्व, मूकत्व, मिनिमन, वामन (नाट्य कद) आदि। ये भी दो प्रकार की हैं। एक—रसजन्य (गर्भिणी के आधार-रस से उत्पन्न) और दूसरी—दौह्दावस्था (देखिये शा० अ० ३ सू० १८ में २६) में किये गये अपचार के कारण उत्पन्न। दोषबलप्रवृत्ता—(रज-तम-शक्ति से उत्पन्न—तथा दोष की शक्ति से उत्पन्न रोग), ये मिथ्या-आहार-विहार के कारण उत्पन्न होते हैं। ये भी दो प्रकार के हैं, एक—आमाशय से उत्पन्न और दूसरी—पक्वाशय से उत्पन्न। फिर इनके दो भेद हैं—एक शारीरिक और दूसरे मानसिक। ये तीनों (आदिबल जन्मबल और दोषबल से प्रवृत्त) आध्यात्मिक (शरीरस्थ—वातादि—रजप्रभृति दोषजन्य होने से) हैं ॥५॥

संघातबलप्रवृत्ता य आगन्तवो दुर्बलस्य बलवद्भि-हात्, तेषु द्विविधाः—शस्त्रकृताः, व्यालकृताश्च । एते आधिभौतिकाः ॥६॥

संघातबल प्रवृत्ता (प्रहार शक्ति से उत्पन्न) ये आगन्तुज रोग हैं दुर्बल पुरुष का बलवान् के साथ लड़ाई करना। ये भी दो प्रकार के हैं। यथा—शस्त्रजन्य और व्याल—(सर्पादि) आदि से उत्पन्न। ये आधिभौतिक हैं ॥६॥

कालबलप्रवृत्ता ये शीतोष्णवातवर्षातपप्रभृतिनिमिताः, तेषु द्विविधाः—व्यापन्नतुक्रुताः, अग्यापन्नतुक्रुताश्च । देवबलप्रवृत्ता ये देवद्वेहादभिगतका अथर्वणकृता उप-

१ देखिये चरक विमान आठवें में—प्रकृतितश्च परीक्षेत् ।