भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

६४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २३ ]

वसामेदोमज्जमस्तुलुङ्गसाविणश्च दोषसमुत्था पीतासित- मूत्रपुरोषवातवाहिनश्च कोष्ठस्थाः, त एवोभयतोभागव्रण- मुखेषु पूतरक्तनिर्वाहिणः, क्षीणमांसाणां च सर्वतोगतय- श्चाणुमुखा मांसवृद्धवृद्धवन्तः, सशब्दवातवाहिनश्च शिरःकण्ठस्थाः, क्षीणमांसाणां च पूयरक्तनिर्वाहिरौचका- विपाककासश्चासोपद्रवयुक्ताः, भिन्नं वा शिरःकपाले यत्र मस्तुलुङ्गदर्शनं त्रिदोषलिंगप्रादुर्भावःकासश्चासौ वा यस्येति ॥ १२ ॥

इसके आगे असाध्य रोगों को कहते हैं। मांसपिण्ड के ऊपर उठे, प्रसेकी (खाव बहुत), अन्दर पूय-वेदना युक्त, घोड़ी की योनि की भांति उल्लत मुखवाले (किनारोंवाले), कुछ कठिन गाय के सींग के समान ऊपर उठे मांसांकुरोंवाले, दूषित रक्तस्त्राव करनेवाले, पतला-शीतल-पिच्छल खाव बहाने-वाले, अथवा बीच से उल्लत या बीच से अन्दर को दवे, सन की रूई के समान-स्नायुजाल युक्त—देखने में बुरे, दोष के कारण—वसा मेद मज्जा मस्तुलुङ्ग (मस्तिष्क का द्रव भाग) का खाव करनेवाले, कोष्ठ में स्थित व्रणों में—पीला, काला, मूत्र, मल, वायु का खाव होने से, कोष्ठ स्थित व्रणों का मुख दोनों पार्श्वों में (ऊपर मुख की ओर और नीचे गुदा की ओर) हों, पूय-रक्त को क्षतित करनेवाले, चारों ओर गतिवाले—सूक्ष्म मुखवाले—मांस के समान बुलबुलेवाले, शिर एवं कण्ठ में स्थित व्रणों में से—शब्द के साथ वायु का खाव हो, क्षीण मांसवाले पुरुषों में पूय रक्त का खाव होता हो, एवं अरुचि, अविपाक, काष्ठ, श्वास—ये उपद्रव साथ में हों, शिर की खोपड़ी के फटने पर जब मस्तिष्क दीखने लगे या तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न हो जायें, काष्ठ-श्वास हो, तो व्रण असाध्य समझना चाहिये ॥

भवति चात्र—

वर्सा मेदोऽथ मज्जानं मस्तुलुङ्गं च यः स्रवेत् ।

आंगन्तुस्तु व्रणः सिध्येन्न सिध्येहोपसंभवः ॥ १३ ॥

असमापहिते देशे सिरासन्ध्यस्थिवर्जिते ।

विकारो योऽनुपर्यंतं तदसाध्यस्य लक्षणम् ॥ १४ ॥

कहीं भी है—

जिस आगन्तुज व्रण में से वसा, मेद, मज्जा अथवा मस्तु- लुङ्ग का खाव होता है, वह व्रण साध्य है। दोषजन्य व्रण इस प्रकार के खाव होने से असाध्य है शिरा-सन्धि एवं अस्थि से रहित, सर्भरहित प्रदेश में यदि विकार हो और वह चिकित्सा करने पर भी सब धातुओं में फैलता जाये, तो उसको असाध्य समझना चाहिए ॥ १३, १४ ॥

क्रमेणोपचर्य प्राप्य धातून्तुगतः शनैः ।

न शक्य उन्मूलयितुं वृद्धो वृद्ध इवामयः ॥ १५ ॥

स स्थिरत्वानमहत्त्वाच्च धात्वनुक्रमणेन च ।

निहन्त्यौषधवीर्याणि मन्त्रान् दुष्टग्रहो यथा ॥ १६ ॥

रोग धातुओं का सहारा लेकर धीरे २ वृद्धि को प्राप्त हुआ करता है। उस समय बढ़ने पर रोग (साध्य) जड़ से नहीं उखाड़ा जा सकता, जिस प्रकार बड़ा वृक्ष जड़ से नहीं उखाड़ा जा सकता। इसमें कारण—रोग की स्थिरता रोग के बढ़ जाने से और धातुओं का सहारा पकड़ने से रोग औषध के वीर्य को निष्फल कर देता है, जिस प्रकार दुष्टग्रह (स्कन्दापस्मार आदि) मन्त्र की शक्ति निष्फल कर देता है ॥ १५, १६ ॥

अतो यो विपरीतः स्यात् सुखसाध्यः स उच्यते ।

अवद्वमूलः लुपको यद्दुष्टपाटने सुखः ॥ १७ ॥

जो व्रण धातुओं में नहीं फैलता, वह सुखसाध्य है, क्योंकि इस व्रण की जड़ स्थिर नहीं होती। जिस प्रकार कि एक छोटा पौधा मूलके स्थिर न होने से सुगमता से उखाड़ा जा सकता है ॥ १७ ॥

त्रिभिदोर्षिरनाक्रान्तः श्याबौष्टः पिङ्कौसमः ।

अवेदनो निरास्त्रावो व्रणः शुद्ध इहोच्यते ॥ १८ ॥

शुद्ध व्रण का लक्षण—वात आदि दोषों से रहित (अथवा व्रण की आकृति—गन्ध वर्ण खाव-वेदनासे रहित, या शीत-उष्ण, मृदु-कठिन, संवृत-विवृत रहित), काले किनारोंवाला, पिङ्कौ (मांसांकुर), समतल, वेदनारहित, खाव से रहित व्रण को शुद्ध व्रण कहते हैं ॥ १८ ॥

कपोतवर्णप्रतिमा यस्यान्ताः क्लेदवर्जिताः ।

रूपेण स्थिराश्च पिटिकावन्तो रोहतीति तमादिशेत् ॥ १९ ॥

जिस व्रण के अन्तर्भाग (किनारे)—कबूतर के सहस्र धूसर वर्णवाले हों और क्लेद (सड़न-पन्छा) से रहित हों, स्थिर (स्थिरतायुक्त) हो और पिङ्किका (छोटी फुसियों) से युक्त—व्याप्त हों वह व्रण "भर रहा है—रोपित हो रहा है" समझा जाता है। जब व्रण उचित प्रकार से भर रहा होता है तब ये लक्षण होते हैं ॥ १९ ॥

रुठवस्मान्मप्रन्थिमशूनमरुजं व्रणम् ।

त्वक्स्वर्णं समतलं सम्यग्रूढं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥

सम्यक् रुठ के लक्षण—व्रण वस्तु भर जाये, किसी प्रकार की गाँठ या सूजन न हो, दर्द न हो, त्वचा के समान रङ्ग हो, व्रण समतल हो, उस व्रण को भली प्रकार से रोहण हुआ समझना चाहिये ॥ २० ॥

दोषप्रकोपाद्रयायामादभिधातादजीर्णतः ।

हर्षात् क्रोधाद् भयाद्वाऽपि व्रणो रुठोऽपि दीर्घते ॥ २१ ॥

दोष के प्रकोप से, व्यायाम से, चोट लगने से, अजीर्ण से,

सुश्रुत संहिता · पृष्ठ 142, कुल 872 में से · BharatKosha