भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अं० २७ ]

सूत्रस्थानम्

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आदि की शलाका-की (अग्नि में) गरम करके, रोगी के गले में प्रविष्ट करके, लाख आदि को उससे पकड़कर-शीतल जल से सिंचन करके, स्थिर होने पर बाहर निकाल लेना चाहिये ।

वि० मन्तव्य—ताम्र की अग्नितप्त शलाका लाख में घँस जाती है, शीतल जल के सिंचन से शीतल होकर शलाका में लाख सट जाती है, शलाका के साथ बाहर आ जाती है ॥१७॥

अजातुषं तु जतुमधूच्छिष्टप्रलिप्तया शलाकया पूर्व-कल्पनेत्येके ॥१८॥

यदि लाख आदि वस्तु न हो तो, शलाका पर मोम या लाख लगाकर आग में गरम करके, पूर्व की भाँति गले में प्रविष्ट करके वस्तु निकालनी चाहिये । गरम लाख के साथ वह वस्तु निष्पन्न जायेगी ॥१८॥

अस्थिशल्यसन्ध्यद्व्रा तिर्यककण्ठासक्तमवेक्ष्य केगोण्डुकं दृढैकदीर्घसूत्रबद्धं द्रवमकोपहितं पाययेदाकण्ठात् पूर्ण-कोष्ठं च वामयेत्, वमतश्च शल्यैकदेशसक्तं ज्ञात्वा सूत्रं सहसा स्वाक्षिपेत्; मृदुना वा दन्तधावनकूर्चकेनापहरत् प्रणुदेद्वाऽन्तः । क्षतकण्ठाया च मधुसर्पिषां लेढुं प्रयच्छेत त्रिफलाचूर्णं वा मधुशर्कराविभिन्म ॥१९॥

अस्थिशल्य (मछली का शल्य आदि) या अन्य इसी प्रकार का शल्य जब गले में तिरछा फँस जाये, तब बालों से बनी कूर्ची के एक पार्श्व में दृढ़ सूत्र बांधकर रोगी को गले तक द्रव भोजन के साथ पिला देना चाहिये । पेट भर जाने पर रोगी को वमन कराना चाहिये । वमन करते समन शल्य को एक देश में फँसा समझकर धागे को जोर से सहसा बाहर खींचना चाहिये, इससे शल्य बाहर आ जायेगा । मृदुशल्य को करञ्ज आदि दातन की कूर्ची से अटकाकर निकालना चाहिए । शल्य बाहर न निकले तो इसको अन्दर की ओर धकेल देना चाहिए । यदि गले में व्रण हो जाये तो रोगी को घी और शहद अथवा मधु एवं शर्करा के साथ त्रिफला का चूर्ण चाटने के लिये देना चाहिए ॥१९॥

उदकपूर्णादिरमवाक्शिरसमवपीडयेद् धुनीयाद्वाभयेद् वा भस्मरागौ वा निखनेदामुखात् ॥२०॥

पानी में डूबने आदि से जब जल पेट में भर जाये तब रोगी का शिर नीचे की ओर करके दबाना चाहिये । उदर को हिलाना चाहिये, वमन कराना चाहिये । मुखपर्यन्त राख में प्रविष्ट करना चाहिये । नासिका श्वास के लिये खुली रहनी चाहिये ।

वि० मन्तव्य—गले तक राख में दबाने से पानी सूख जाता है । देखा गया है कि पाँव एवं उदर के शोथ भी उक्त विधि से उत्तर जाते हैं । उलटा करने से उदर का पानी गल र कर के निकल जाता है ॥२०॥

प्रासशल्ये तु कण्ठासक्ते निःगङ्गमनवबुद्धं स्कन्धे मुष्टिनाऽभिहन्त्यात्, स्नेहं मद्यं पानीयं वा पाययेत् ॥२१॥

यदि गुप्तशल्य (भोजन का प्रास) कण्ठ में फँस जाय तो दूसरा मानव-निःशंक होकर बतलाए बिना ही ग्रीवा के पिछली ओर मुक्का से प्रहार करे । इस प्रकार प्रास शल्य बाहर निकल जाता है । यदि गले में फँसा हो तो द्रव घृत अथवा तैल अथवा मद्य अथवा जल पिला देवे । कण्ठ—श्वास मार्ग का नाम है और गल आहार मार्ग का नाम है । ग्रीवा में दोनों मार्ग आगे पीछे स्थित हैं । श्वास मार्ग में प्रास अथवा जल आदि द्रव पदार्थ जाने पर स्वतः भी बाहर आ जाता है और शल्य निकल जाता है । ये भी शल्य ही कहे जाते हैं, क्योंकि मनस् एव शरीर को वाधा पहुँचानेवाला कोई भाव शल्य कहलाता है ॥

बाहुरञ्जुलतापाशैः कण्ठपीडनाद् वायुः प्रकुपितः स्लेष्माणं कोपयित्वा घ्रोतो निरुणुद्धि, ठालाखावं फेतागमनं संज्ञानाशं चापादयति, तमभ्यञ्ज्य संस्वेद्य शिराविरेचनं तस्मै तीक्ष्णं विदध्याद्दसं च वातघ्नं दद्यादिति ॥२२॥

बाहु, रस्सी या लता द्वारा गला घांटने पर (गला दबाने पर) वायु कुपित होकर कफ को कुपित करके खातों को रोक देती है । इससे—मुख में ठालाखाव, खाग का आना, सज्जानाश उत्पन्न होता है । चिकित्सारोगी को तैल आदि से मालिश करके, स्वेदन देकर, तीक्ष्ण शिराविरेचन देना चाहिये । वातनाशक मांसरस देना चाहिये ।

वि० मन्तव्य—उक्त कारणों से कण्ठश्वास मार्ग का पीड़न होने पर श्वासवाही मार्ग पर शोथ हो जाने से अवरोध हो जाता है । पाश आदि निकाल देने पर भी उक्त लक्षण हो जाते हैं और उक्त उपचार करने पर जीवन बच जाता है और यदि कण्ठ घुटने पर मृत्यु ही हो गई हो तो..... ॥२२॥

भवन्ति चात्र—

शल्योक्तुर्विशेषांश्च स्थानान्यावेक्ष्य बुद्धिमान् । तथा यन्त्रप्रथक्त्वं च सम्यक् शल्यमथाहरेत् ॥२३॥ कर्णवन्ति तु शल्यानि दुःखाहायार्णि यानि च । आददीत भिषक् तस्मात्तानि युक्त्या समाहितः ॥२४॥ एतैरुपायैः शल्यं तु नैव नित्योत्थते यदि । मत्स्या निपुणया वैद्यो यन्त्रयोगैश्च निर्हरेत् ॥२५॥ शोथपाकौ रुजश्चोप्राः कुर्याच्छल्यसनाहृतम् । वैकल्प्यं मरणं चापि तस्माद्यत्नाद्विनिर्हरेत् ॥२६॥ बुद्धिमान् वैद्य को चाहिए कि विशेष आकृति शल्यों को, शल्य के स्थानों (आंख, कान, नासिका आदि) को देखकर—

१ इनकी चिकित्सा के लिये—लेखक की त्यागवैद्यक पुस्तक या Medical-jurisprudence देखिये ।