भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २८ ]

भिन्न भिन्न यन्त्रों से शल्य को बाहर निकाले। कर्णवाले शल्य या जो अन्य शल्य कठिनाई से बाहर निकलते हैं, उनको सावधानी से एवं युक्तिपूर्वक बाहर निकाले। यदि इन उपर्युक्त उपायों से शल्य बाहर न निकलता हो, तो वैद्य को चाहिये कि अपनी चतुर बुद्धि द्वारा अनुक्त यन्त्रों की सहायता से बारह निकाले। क्योंकि यदि शल्य बाहर नहीं निकलता तो सूजन, पाक, तीव्र-वेदना, बेचैनी और मृत्यु उत्पन्न कर देता है। इसलिये यत्नपूर्वक शल्य को बाहर निकालना चाहिये ॥२३-२६॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने शल्यपापनयनीयो नाम सप्तविंशतितमोऽध्यायः ॥२७॥

अष्टाविंशतितमोऽध्यायः

अथातो विपरीताविपरीतव्रणविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'विपरीत अविपरीत व्रणविज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

फलानिजलवृष्टीनां पुष्पधूमाम्बुदा यथा ।

ख्यापयन्ति भविष्यत्वं तथा रिष्टानि पञ्चताम् ॥३॥

जिस प्रकार फूल—फल के, धूम—अग्नि के, मेघ-जलवृष्टि के भविष्य को बता देते हैं, उसी प्रकार रिष्ट (जिन लक्षणों के प्रकट होने पर मृत्यु निश्चित है—उन लक्षणों को रिष्ट कहते हैं) लक्षण मृत्यु को बता देते हैं ।

वि० मन्तव्य—मृत्यु सूचक लक्षण या लक्षणों का नाम 'रिष्ट' तथा 'अरिष्ट' है ॥३॥

तानि सौहृद्यात् प्रमादाद्वा तथैवाशु न्यतिक्रामात् ।

गृह्यन्ते नोदतान्यज्ज्ञैर्मुमूर्धोर्न त्वसंभवात् ॥४॥

मुमूर्धु (मरनेवाले) प्राणी के रिष्ट लक्षण उत्पन्न होते हैं, पर मूर्खों द्वारा वे—सूक्ष्म होने से अथवा व्यक्त लक्षण भी प्रमाद से (स्थान न देने से), अथवा शीघ्र ही लुप्त हो जाने से जाने नहीं जाते, यह नहीं कि रिष्ट लक्षणों की उत्पत्ति ही नहीं हुई। तात्पर्य यह है कि मृत्यु के पूर्व रिष्ट लक्षण उत्पन्न अवश्य होते हैं, मले ही किसी के ध्यान में आवे अथवा न आवे। अरिष्ट शास्त्र का कथन है कि मृत्यु के पूर्व अरिष्ट लक्षण अवश्य उत्पन्न होते हैं ॥४॥

ध्रुवं तु मरणं रिष्टे ब्राह्मणैस्तत् किलामलैः ।

रसायनतपोजप्युत्तपरैर्वा निवार्यते ॥५॥

रिष्ट लक्षणों की उत्पत्ति होने पर मृत्यु अवश्य होती है,

परन्तु कभी २—राग—द्वेष रहित ब्राह्मणों द्वारा अथवा रसायन सेवन में, तप तथा जप में तत्पर रहने से मृत्यु का निवारण—(रोक थाम) किया जा सकता है ॥५॥

नक्षत्रपीडा बहुधा यथा काले विपच्यते ।

तथैवारिष्टपाकं च व्रुवते बहुवो जनाः ॥६॥

जिस प्रकार से सूर्य-चन्द्र आदि नक्षत्रों का फल बहुत समय पीछे होता है, उसी प्रकार से रिष्ट लक्षणों का फल कालान्तर में होता है, ऐसा बहुत विद्वानों का मत है ॥६॥

असिद्धिमाप्नुयास्त्रिके प्रतिकुर्वन् गतायुषः ।

अतोऽरिष्टानि यत्नेन लक्षयेत् कुशलो भिषक् ॥७॥

जिस व्यक्ति की आयु चली गई ऐसे पुरुष की चिकित्सा करने से वैद्य को लोक में असफलता (धर्म, अर्थ, काम की हानि) होती है। इसलिये कुशल वैद्य को चाहिये कि यत्नपूर्वक रिष्ट लक्षणों की परीक्षा करे ॥७॥

गन्धवर्णरसादीनां विशेषाणां स्वभावतः ।

वैकृतं यत् तदाचष्टे व्रणिनः पक्वलक्षणम् ॥८॥

जब व्रणी पुरुष के गन्ध, वर्ण, रस आदि पंचेन्द्रियों के स्वाभाविक (प्राकृत) विषयों में परिवर्तन (विकृति) आ जाये, तब व्रणी पुरुष-पक गया—अतः गिरने (मरने) वाला है, ऐसा कहना चाहिये। क्योंकि पकने के पश्चात् गिरने की ही अवस्था आती है ॥ ८ ॥

कटुस्तीक्ष्णश्च विस्त्रश्च गन्धस्तु पवनादिभिः ।

लोहगन्धं तु रक्तैन व्यामिश्रः सात्त्विकः ॥९॥

लाजातसीतैलसमाः किंचिद्विस्त्राश्च गन्धतः ।

ज्ञेयाः प्रकृतिगन्धाः स्युरतोऽन्यद् गन्धवैकृतम् ॥१०॥

प्राकृतिक गन्ध—कटुगन्ध—वायु से, तीक्ष्ण गन्ध पित्त से, विस्त्र गन्ध-कफ से, लोह की गन्ध-रक्त से तीनों की सम्मिलित गन्ध-सत्त्वपात से, लाज गन्ध—वातपित्त से, अलसी के तेल की गन्ध-वातकफ से, और कुछ कुछ विस्त्र (आमगन्ध) गन्ध-पित्त-कफ से होती है—ये स्वाभाविक गन्ध हैं ॥९,१०॥

मद्यागुर्वोऽयसुमनःपद्मचन्दनचम्पकैः

सगन्धा दिव्यगन्धारश्च मुमुर्षुणां व्रणाः स्मृताः ॥११॥

श्ववाजिम्पिकध्वाङ्क्षपूतवल्लूरमत्कुणैः ।

सगन्धाः पङ्कगन्धारश्च भूमिगन्धारश्च गहिताः ॥१२॥

इन प्राकृत गन्धों से दूसरी सब गन्ध-वैकृत समझनी चाहिये। यथा-मद्य, अगुरु, घी, जाति (चमेली), कमल, चन्दन और चम्पा के समान गन्ध, एवं दिव्य (उत्तम) गन्ध, मरणासन्न पुरुषों के व्रणों

१ "होरायां नवमे सूर्यः सप्तमे च शनैश्चरः ।

एकादशे गुरुः शुक्रो मासमेकं न जीवति ॥

अशुभं लनसम्प्राप्तं षष्ठाष्टमे निशाकरः ।

शनैश्चरो हि बन्धुस्थो द्विमासे मृत्युमच्छति ॥"