भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २६ ]

के अपने पक्ष में (कापालिक का कापाली, ब्रह्मचारी आदि) हों तो चिकित्साकार्य में सफलता मिलती है। और यदि वे अपने पक्ष में विपरीत हों (कापालिक का ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारी का कापालिक) तो दूत चिकित्साकर्म में विपरीत होते हैं। नपुंसक, स्त्री, बहुत से दूत और जो अनेक दूत एक ही अभिप्राय से न आयें, परस्पर निन्दा करते हुए, गंधे या ऊंट की सवारी पर चढ़कर, या एक-दूसरे के पीछे लगातार पंक्ति बनाकर—जो दूत वैद्य के समीप आते हैं, वे सब निन्दित हैं ॥

पाशदण्डायुधधराः पाण्डुरेतरवाससः ॥७॥

आर्द्रजीर्णोपसन्ध्यैकमलिनोद्भवस्तवाससः ॥

न्युनाधिकान्ना उद्भिन्ना विकृता रौद्ररूपिणः ॥८॥

पाश (पशुओं को बाँधनेवाले रज्जु), दण्ड (दण्डा), आयुध (खड्ग, शक्ति आदि) को धारण किये, काले पीले-लाल वस्त्र धारण किये हुए, आर्द्र (गीले), जीर्ण (पुराने), अपसन्ध्य (दक्षिण कन्धे पर पड़ा अपसन्ध्य), मलिन (मैले), उद्भवस्त (फटे) वस्त्र पहिने, न्यून (हाथ आदि से हीन) या अधिक (इक्कीस अंगुलियाँ आदि) अंगोंवाले, उद्विग्न (घबराये), विकृत (काण्ड-लंगड़ा आदि) रौद्ररूप (भैरव आकृति) दूत निन्दित हैं ॥७,८॥

रूक्षनिष्ठुरवक्त्रारस्तवमङ्गल्यभिधायिनः ॥

रूक्ष (मैत्री रहित), निष्ठुर (कठार) वाणी एवं अमंगल-बचन बोलते हुए दूत अप्रशस्त हैं ॥

छिन्दन्तस्तृणकाष्ठानि स्मृशन्तो नासिकां स्तनम् ॥९॥

वक्षान्तानामिकाकेगनख रोमदशाशुशः ॥

स्रोतोवरोधदृगण्डमूर्धोरः कुक्षिपाणयः ॥१०॥

कपालोपलभस्मास्थितुषाङ्काराश्च ये ॥

विलिखन्तो मही किंचिन्मुखन्तो लोष्टभेदिनः ॥११॥

तैलकर्दमदिग्धाङ्गा रक्तस्रगनुलेपनाः ॥

फलं पक्मसारं वा गृहीत्वाऽन्यच्च तद्विधम् ॥१२॥

नखैर्वान्तरं वाऽपि करेण चरणं तथा ॥

उपानचर्महस्ता वा विकृतव्याधिपीडिताः ॥१३॥

वामोचारा रुदन्तश्च श्वासिनो विकृतेक्षणाः ॥

याभ्यां दिशि प्राञ्जल्यो विषमैकपदे स्थिताः ॥१४॥

वैद्यं य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गहिताः ॥

चेद्यार्थे—

तिनके या लकड़ियों को तोड़ते हुए, नासिका या स्तन को छूते हुए, वस्त्र के प्रान्त को—अनामिका को—केश-नख-रोम (शरीर के बाल), दशा (दीपक की बत्ती) का स्पर्श करते हुए, स्नोत (कान आदि छिद्रों का), अवरोध (स्कन्ध देश) १,

१ स्रोतोवरोध का अर्थ—'मार्ग को रोकना' भी है। यदि मार्ग को रोककर खड़े हों तो अशुभ है।

हृदय, गण्डस्थल, स्निग्ध, उर, कुक्षि, हाथों को, कमोल उपल (पाषाण), भस्म (जली लकड़ियों का क्षार), अस्थि (हड्डी), दुष और अंगारों का स्पर्श करते हुए, भूमि को कुरेदते हुए, हाथों से कुछ गिराते हुए तथा मिट्टी के ढेले को हाथों से फोड़ते हुए दूत निन्दित हैं—तैल या कीचड़ को अङ्गों पर लगाये हुए, लाल माला एवं लाल आलेप लगाये हुए, पके या सार रहित फल को या अन्य इसी प्रकार की वस्तु को हाथ में लेकर, नखों से नख के मध्य में, या हाथों से पाँवों को विदारण करते हुए, हाथ में जूता या चमड़ा लेकर अथवा गलित कुछ आदि विकृत रोग से पीड़ित, विपरीत व्यवहारवाले, रोते हुए, श्रमजनित श्वासयुक्त, विकृत आँखवाले (आँख में फुला हो), दक्षिण दिशा में अंजलि फैलाये हुए, निम्नोन्नत स्थान में सीधे खड़े हुए दूत—जो वैद्य के पास आते हैं, वे निन्दित हैं ॥

दक्षिणाभिमुखं देशे त्वशुचौ वा स्तानशनम् ॥

व्वलयन्तं पचन्तं वा क्रूरकर्मणि चोदातम् ॥१५॥

नग्नं भूमौ शयानं वा वेगोत्सर्गेषु वाऽशुचिम् ॥

प्रकीर्णकेशमभ्यक्तं स्विन्नं विकलवभेव वा ॥१६॥

वैद्यं य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गहिताः ॥

निम्न कार्य करते हुए वैद्य के पास जो दूत आते हैं—वे निन्दित हैं। यथा—वैद्य के दक्षिण दिशा में मुख किये होने पर, अपवित्र स्थान में, जलती हुई अग्नि को जलाते हुए, कुछ पाक करते हुए, क्रूर कर्म करने में तत्पर हुए, नग्नावस्था में भूमि पर शयन करते हुए, मूत्र-पुरीष के उत्सर्ग में, अपवित्र स्थिति में, विमुक्त केश की अवस्था में, तैल आदि मलने पर, प्रस्वेद सहित विह्वल (बेचैन) अवस्था में जो दूत वैद्य के पास आते हैं, वे निन्दित हैं ॥१५,१६॥

वद्यस्य पैन्ये देवे वा कार्ये चोत्पातदर्शने ॥१७॥

मध्याह्ने चाधोरात्रे वा सन्ध्ययोः कृतिकासु च ॥

आर्द्राक्ष्णामवामूलपूर्वासु भरणाेषु च ॥१८॥

वेला—वैद्य के पितृकार्य में प्रवृत्त होने पर, देवकार्य में तत्पर होने पर, उत्पन्न (भूमि, दिव्य-अन्तरिक्ष) के दर्शन में, मध्याह्न में, आधी रात के समय और सन्ध्याकाल में आये दूत निन्दित हैं।

नक्षत्र—कृतिका, आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, मूल, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपदा—पूर्वा फाल्गुनी में तथा भरणी नक्षत्री में आये दूत निन्दित हैं ॥१७,१८॥

चतुर्थ्यां वा नवम्यां वा षष्ठ्यां सन्धिदिनेषु च ॥

वैद्यं य उपसर्पन्ति दूतास्ते चापि गहिताः ॥१९॥

तिथि—चतुर्थी, नवमी, षष्ठी, देव-प्रेत कार्यों में, सन्ध्याकाल में, वैद्य के पास जो दूत आते हैं, वे निन्दित हैं ॥१९॥