भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

अ० २६ ]

सूत्रस्थानम्

१११

स्विन्ताभितमा मध्याह्ने वलनस्य समीपतः । गहिताः पित्तरोगेषु दूना वैद्यमुपागताः ॥२०॥ त एव कफरोगेषु कर्मेसिद्धिकराः स्मृताः । एतेन शेषं व्याख्यातं बुद्ध्या संविभजेत्तु तत् ॥२१॥ रक्तपित्तातिसारेषु प्रमेहेषु तथैव च । प्रगस्तो जलरोधेषु दूतवैद्यसमागमः ॥२२॥

आग के समीप बैठने से उत्पन्न स्वेदवाले दूत मध्याह्ने के समय जब वैद्य के पास आते हैं, तब पित्तरोगों में निन्दित होते हैं। ये ही दूत जब कफरोगों में आते हैं, तो चिकित्सा में सफलता करते हैं। इस प्रकार वातरोगों में शीत-वायु आदि निन्दित हैं। इस तरह शेष (वात) को समझकर विभाग करना चाहिये। रक्तपित्त, अतिसार, प्रमेह रोगों में जो दूत—पानी के अवरोध (बान्ध) के समीप वैद्य के पास पहुँचते हैं, वे प्रशस्त हैं। इसी प्रकार शेष—(उदावर्त्तमूत्रकृच्छ्र आदि में जलवेग का दर्शन आदि) लक्षण प्रशस्त गिनने चाहिये ॥२०-२२॥

विज्ञायैवं विभागं तु शेषं बुध्येत पण्डितः । शुक्लवासाः शुचिगौरः श्यामो वा प्रियदर्शनः ॥२३॥ स्वस्यां जातौ स्वगोत्रो वा दूतः कार्यकरः स्मृतः । गोयानेनागतस्तुष्टः पादाभ्यां शुभचेष्टितः ॥२४॥ स्मृतिमान् विधिकालज्ञः स्वतन्त्रः प्रतिपत्तिमान् । अलङ्कृतो मङ्गलवान् दूतः कार्यकरः स्मृतः ॥२५॥ स्वस्थं प्राङ्मुखमासानं समे देशे शुचौ शुचिम् । उपसर्पति यो वैद्यं स च कार्यकरः स्मृतः ॥२६॥

श्वेत वस्त्र धारण किये, पवित्र—गौरवर्ण या श्यामवर्ण, मनोहर दर्शनवाला, अपनी (रोगी की) जाति या अपने गोत्र में उत्पन्न दूत चिकित्साकार्य में उत्तम है। वृषभ युक्त (घोड़े आदि प्रशस्त पशु पर) यान पर चढ़कर आया, प्रसन्नचित्त, पैदल चढ़कर आया, उत्तम चेष्टाओं से युक्त, स्मृतियुक्त, विधि एवं काल को जाननेवाला, स्वतन्त्र, उत्तम प्रतिभावाला, शोभन वेश से भूषित, मंगलकारी दूत कार्य को सफल करनेवाला होता है। स्वस्थ, पूर्व दिशा की ओर मुख किये—बैठे, समान एवं पवित्र देश में, पवित्रवास्था में वैद्य के समीप जो दूत आते हैं, वे कार्य करनेवाले होते हैं ॥२३-२६॥

मांसोदकुम्भातपत्रविप्रवारणगोवृषाः । शुक्लवर्णाश्च पूज्यन्ते प्रस्थाने दर्शनं गताः ॥२७॥ स्त्री पुत्रिणी सबत्सा गौर्वर्धमानमलंकृता । कन्या मत्स्याः फलं चामं स्वस्तिकं मोदका दधि ॥२८॥ हिरण्यक्षतपात्रं वा रत्नानि सुमनो नृपः । अप्रशान्तोऽनलो वाजी हंसश्चाषः शिखी तथा ॥२९॥ ब्रह्मदुन्दुभिजीमृतशङ्खवेणुरथस्वनाः । सिंहगोवृषनादारच ह्ये (हे) पित्तं गजघृंहितम् ॥३०॥ शस्तं हंसरुतं नृणां कौशिकं चैव वामतः । प्रस्थाने यायिनः श्रेष्ठा वाचरुच हृदयङ्गमाः ॥३१॥ पत्रपुष्पफलोपेतान् सखीरात्रीरुजो दुमान् । आश्रिता वा नभोवेरुमध्वजतोरणवेदिकाः ॥३२॥

दिक्षु शान्तासु वक्तारो मधुरं प्रष्टोऽनुगाः । वामा वा दक्षिणा वाऽपि शकुनाः कर्मेसिद्धये ॥३३॥ शुष्केऽन्ननिहतेऽपत्रे वल्लीनद्धे सकण्टके । वृक्षेऽथवाऽरुमभस्मास्थिविटुषाङ्कारपांशुषु ॥३४॥ चैत्यवल्मीकविषमस्थिता दीप्तस्वरस्वराः । पुरतो दिक्षु दीप्रासु वक्तारो नार्थसाधकाः ॥३५॥ पुत्रामानः खगा वामाः कौसंज्ञा दक्षिणाः शुभाः । दक्षिणाद्वागमनं प्रशस्तं श्रृशृगालयोः । वामं नकुलचाषाणां नोभयं शरासर्पयेः ॥३६॥ भासकौशिकयोश्चैत्र न प्रशस्तं किलोभयम् । दर्शनं वा रुतं वाऽपि न गोधाकृच्छ्रासयोः ॥३७॥ दूतैरनिष्टेस्तुर्यानामशस्तं दर्शनं नृणाम् । कुलस्थतिलकार्पासतुषपाषाणभस्मनाम् ॥३८॥ पात्रं नेष्टं तथाऽङ्कारातैलकर्दमपूरितम् । प्रसन्नोत्तरमद्यानां पूर्णं वा रक्तसर्पयेः ॥३९॥ शवकाष्ठपलाशानां शुष्काणां पथि सङ्गमाः । नेष्यन्ते पतितान्तस्थदीनान्धरिपवस्थता ॥४०॥ शुभ-अशुभ-शकुनो को कहते हैं—

मांस (सद्यःक्षत—कच्चा मांस), उदकुम्भ—पानी का घड़ा—(रोगी के घर में घुसते समय भरा हुआ घड़ा, रोगी के घर से निकलते समय खाली घड़ा), आतपत्र (छाता), विप्र (ब्राह्मण), वारण (हाथी), गाय, वृषभ (बैल), और श्वेत वर्ण—(श्वेत फूल, दधि, अक्षत, मोती आदि) वस्तुयें रोगी के दर्शन के लिये प्रस्थान करते समय मिलना उत्तम है। पुत्र के साथ स्त्री, बछड़े के साथ गाय, अलंकृत यौवनावस्था में पहुँचती कन्या, मछलियाँ, कच्चा फल, स्वस्तिक (माला या स्वस्तिक चिह्न), मोदक, दही, स्वर्ण, अक्षत (लाजा वा यव) चावल से भरा पात्र, रत्न (माणिक्य आदि), सुमन—फूल, राजा, प्रज्वलित अग्नि, घोड़ा, हंस, चाष, मोर ब्रह्म (वेद), दुन्दुभि (नगाड़ा), जीमूत (बादल), शङ्ख, वेणु (बांस) और रथ की ध्वनि का होना, शेर, गाय और बैल की आवाज घोड़ा तथा हाथी का आनन्द से चिघाड़ना, हंस का शब्द तथा उलू का वामपार्श्व में बोलना, राजभवन में जानेवाले वैद्य के लिये श्रेष्ठ हैं। हृदय को प्रिय लगनेवाली वाणियों का सुनना भी उत्तम है। पत्ते-फल-फल एवं दूधवाले वृक्षों पर आश्रित, या आकाश-घर-ध्वजा, तोरण-बेदी पर बैठे, अथवा शान्त दिशाओं में मधुर वाणी को बोलते हुए, पीछे या साथ २ अथवा वाम या दक्षिण दिशा में चलनेवाले पक्षी कार्य में सफलता देते हैं। शुष्क या बिजली से जले पत्तोंवाले, बैल चड़े हुए, काँटोंवाले वृक्ष पर या पत्थर, राख, अस्थि, मल, तुष, अङ्गारे या घूल, चैत्य, वल्मीक या विषम स्थान पर बैठे, तेज-ऊँची खर-कंकश स्वर बोलनेवाले, सामने आते हुये या जलती हुई दिशाओं में बोलनेवाले पक्षी कार्यमें असफलता बताते हैं। पुरुषलिंगवाले पक्षियों