भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २६ ]

का वाम पार्श्व में होना और क्षीलिंग पक्षियों का दक्षिण पार्श्व में होना श्रेष्ठ है। कुत्ते और गीढ़ का दक्षिण से वाम दिशा में जाना उत्तम है। नकुल और चाण पक्षी का वाम दिशा में जाना श्रेष्ठ है। शचक, सर्प, भास एवं उल्लू का किसी भी पार्श्व में होना उत्तम नहीं। गोधा या कुकलासिका ( किरला ) की आवाज या दर्शन दोनों बुरे हैं। इसी प्रकार निन्दित दूतों के समान गुणवाले पुरुषों का दर्शन भी बुरा है। कुलस्थी, तिल, कपास, तुष, पाषाण, भस्म, ( राख ), अङ्गारे, तैल, कीचड़ से भरे या प्रसन्ना-नामक मद्य को छोड़कर शेष मद्यों से या रक्त से या सरसों से भरा पात्र मिलना निन्दित है। शव के साथ ले जाई जाती हुई लकड़ियाँ, सूखे ढाकों का रास्ते में मिलना ( या शुष्क शब्द से-तृण आदि का भी ), पतित अन्तःस्थ ( चाण्डाल आदि), दोन, अन्धे या शत्रुओं का मार्ग में मिलना उत्तम नहीं है ॥ २७-४० ॥

शुद्धः जीतोऽनुकूलश्च सुगन्धिश्चाग्निलः शुभः ।

खरोण्योऽतिष्ठगन्धश्च प्रतिलोमश्च गहितः ॥ ४१ ॥

कोमल, शीतल और अनुकूल, सुगन्धित वायु शुभकारी है।

खर, उष्ण, प्रतिलोक और बुरी गन्धवाली वायु निन्दित है ॥

प्रन्ध्यवृदादिषु सदा छेदशब्दस्तु पूजितः ।

विदध्युदरगुल्मेषु भेदशब्दस्तथैव च ॥ ४२ ॥

रक्तपित्तातिसारेषु रुद्रशब्दः प्रशस्यते ।

एवं व्याधि विशेषेण निमित्तमुपधारयेत् ॥ ४३ ॥

तथैवाक्रुष्टहाकष्टमाक्रन्दरुदितस्वनाः ।

छर्घा वातपुरीषाणां शब्दो वै गर्दभोष्टयोः ॥ ४४ ॥

प्रतिषिद्धं तथा मर्दनं लुप्तं स्वखलितमाहतम् ।

दौर्सेनस्य च वैद्यस्य यात्रायां न प्रशस्यते ॥ ४५ ॥

प्रवेशेऽप्येतदुद्देशादवैद्यं च यथाऽऽतुरे ।

प्रतिहारं गृहे चास्य पुनरेतन्न गण्यते ॥ ४६ ॥

केशभस्मास्थिकाष्टाशमत्पुष्पाणोऽकण्टकाः ।

खट्बोधर्वपादा मद्यापो वसा तैलं तिलास्तृणम् ॥ ४७ ॥

नपुंसकव्यङ्गभग्ननग्नमुण्डासिताम्बराः ।

प्रस्थाने वा प्रवेशे वा नेष्यन्ते दर्शनं गताः ॥ ४८ ॥

भाण्डानां संकरस्थानां स्थानात् संचरणं तथा ।

निश्वातोत्पातनं भङ्गः पतनं निर्गमस्तथा ॥ ४९ ॥

वैद्यासनावसादो वा रोगी वा स्यादधोमुखः ।

वैद्यं संभाषमाणोऽङ्गं कुञ्चयमास्तरणानि वा ॥ ५० ॥

प्रमुच्याद्वा धुनीयाद्वा करी पृष्ठं शिरस्तथा ।

हस्तं चाक्रुष्य वैद्यस्य न्यसेच्छिरसि चोरसि ॥ ५१ ॥

यो वैद्यमुन्मुखः परयन्तुन्माष्टि स्वाङ्गमातुरः ।

न स सिध्याति वैद्यो वा गृहे यस्य न पूज्यते ॥ ५२ ॥

भवने पूज्यते वाऽपि यस्य वैद्यः स सिध्याति ।

शुभं शुभेषु दूतादिष्वशुभं ह्यशुभेषु च ॥ ५३ ॥

आतुरस्य ध्रुवं तस्माद्, दूतादीन् लक्ष्येद्विषक् ।

ग्रन्थि, अर्बुद आदि में सदा छेद शब्द सुनाई देना उत्तम है। विद्रधि, उदर एवं गुल्मों में भेदन शब्द, रक्तपित्त और अतिसार में रुद्र शब्द प्रशस्त है। इस प्रकार से रोग विशेष में शुभ—अशुभ लक्षणों का निश्चय करना चाहिये, ( शर्करा रोग में आहरण शब्द उत्तम है )। इसी प्रकार आक्रुष्ट ( जोर से चिल्लाना ), हा कष्ट, आक्रन्द ( जोर से रोना ), रुदित ( रोने ) का शब्द, छिदि रोग में, वायु-मल का शब्द, गर्दभ या ऊंट का स्वर निन्दित है। भग्न ( टूने ) का, लुप्त ( खींच ) का, स्वखलित ( स्वलन-गिरने ) का, आहत ( चोट लगने ) का शब्द, वैद्य के मन की बेचैनी यात्रा में प्रशस्त नहीं है। इन दूतादि के लक्षणों को प्रवेशकाल में, रोगी को देखने के समय एवं द्वार भाग में समझ लेना चाहिये, इसलिये पुनः इनको नहीं कहा जाता। वाल, भस्म, अस्थि, काष्ठ, पत्थर, तुष, कपास, कँटे, खाट—चारपाई उल्टी हुई ( पाये ऊपर को ), मद्यपायी, वसा, तैल, तिल, तृण, नपुंसक, हीनाङ्ग, भग्नशरीर, नग्न, खिर मुंडाये, काले वस्त्र पहिने हुए—इन वस्तुओं का दर्शन घर से प्रस्थान करने में या रोगी के घर में प्रवेश करने के समय उत्तम नहीं है। भण्डार में रखे पात्रों का नीचे गिरना, भूमि का खोदना, उखाड़ना, मोड़ना, गिराना या निकलना, वैद्य के आसन का टूट जाना, रोगी नीचे की ओर मुख किये रहे, वैद्य के साथ वातचीत करते हुए—अङ्गों को, दिवार को, बिछीने को रगड़ता हुआ रहे, हाथों को—सिर को या पीठ को हिलाये, वैद्य के हाथ को खींचकर अपने सिर या छाती पर रखे, जो रोगी वैद्य के सामने मुख उठाकर पूछे या अपने अङ्गों को साफ करे, और जिस घर में वैद्य का स्तकर नहीं होता, वह रोगी नहीं बचता। जिस रोगी के घर में वैद्य का आदर होता है, वह रोगी बचता है। शुभ दूतों में रोगी का शुभ होता है, अशुभ दूतों में रोगी का अशुभ होता है। इसलिये वैद्य को चाहिये कि दूत आदि की परीक्षा निश्चय रूप में करे ॥

वि० मन्तव्य—ग्रन्थि आदि की चिकित्सा करने जाते समय यदि मोंग में किसी के मुख से छेद वाचक शब्द 'काट डालो' 'काट दिया' आदि सुनाई पड़े तो अच्छा है। इस प्रकार विद्रधि आदि के लिये भेद-वाचक शब्द 'काड़ दो' आदि तथा रक्तपित्त एवं अतिसार आदि के लिये 'रोधवाचक' 'रोक दिया—बन्द कर दो' आदि शब्द शुभ हैं ॥ ४२-५३ ॥

स्वप्नान्तः प्रवद्यामि मरणाय शुभाय च ॥ ५४ ॥

१—चरक में भी कहा है। यथा—

आतुरस्य गृहे यस्य भिद्यन्ते वा पतन्ति वा ।

अतिमात्रमत्राणि दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥

प्रवेशपूर्णकम्पानि म् दूनीजफलसपिषाम् ।

वृषाह्वाणरत्नानां देवतानाञ्च निर्गतिम् ॥