सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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सुहृदी यांश्च पश्यन्ति व्याधितो वा स्वयं तथा । स्नेहाभ्यक्तशरीरस्तु करभग्यालगर्भैः ॥५५॥ वराहैर्महिषैर्वाऽपि यो यायाहक्षिणामुखः । रक्तान्बरधरा कृष्णा हसन्ती सुक्तमूर्धजा ॥५६॥ यं चाकर्षति बद्धवा स्त्री नृत्यन्ती दक्षिणामुखम् । अन्तावसायिभिर्यो वाऽऽकृष्यते दक्षिणामुखः ॥५७॥ परिष्वजेरन् यं वाऽपि प्रेताः प्रत्रजिता (न) स्तथा । मुहुराग्रायते यस्तु श्वापदैर्विकृताननैः ॥५८॥ पिवेनमधु च तैलं च यो वा पङ्कऽवसीद्वति । पङ्कप्रदिग्धगात्रो वा प्रनृत्येन प्रहसेत्तथा ॥५९॥ निरन्बरश्च यो रक्तं धारयेच्छिरसा घञ्जम् । यस्य वंशो नलो वाऽपि तालो वोरसि जायते ॥६०॥ यं वा मत्स्यो प्रसेद्यो वा जननी प्रविशेन्नरः । पर्वताग्रात् पतेद्यो वा श्वघ्नो वा तमसाऽऽवृते ॥६१॥ द्वियेत स्नोत्सा यो वा यो वा मौण्ड्यमवानुयात् । पराजीयेत बध्येत काकाचैर्वाऽभिभूम्यते ॥६२॥ पतनं तारकादीनां प्रणाशं दीपचतुषोः । यः पश्येद्देवतानां वा प्रकम्पमवनेस्तथा ॥६३॥ यस्य छिद्विधिरेको वा दशनाः प्रपतन्ति वा । शलमरी किंशुक् यूपं वलमीकं पारिभद्रकम् ॥६४॥ पुष्पाख्यं कोविदारं वा चित्तां वा योऽधिरोहति । कार्पासतैलपिण्याकलोहानि लवणं तिलान् ॥६५॥ लभेताइनीत वा पकमन्नं यश्च पिवेत् सुराम् ।
स्वस्थः स लभते व्याधिं व्याधितो मृत्युमुच्छति ॥६६॥
स्वप्न—
स्वप्नों से मरण एवं शुभ (जीवन) के लक्षण कहते हैं । जो रोगी स्वयं या जिस रोगी के मित्र निम्न स्वप्नों को देखते हैं—उसकी मृत्यु निश्चित है । शरीर पर स्नेह-तैल की मालिश किये, ऊँट के बच्चे साँप या गधे पर अथवा सुअर या भैंस पर चढ़कर दक्षिण दिशा की ओर जाता हो; लाल, या काले वस्त्र पहिनकर—हँसती हुई, सिर के बालों को बिखराये हुए, नाचती हुई—जिस रोगी को बाँधकर या खींचकर दक्षिण दिशा में ले जाती हुई स्त्री प्रतीत हो, अथवा अन्तावसायी (निषादस्त्री में चाण्डाल द्वारा शमशान में उत्पन्न पुत्र) द्वारा जो रोगी दक्षिण दिशा की ओर ले जाया जाता हो, जिसके साथ प्रेत एवं संन्यासी लोग आलिंगन करें, विकृत, मुखवाले कुत्ते जिसके शिर को सँघुते हों, शहद या तैल पीता हो, कीचड़ में नहाता हो, अङ्गों पर कीचड़ लपेट लिया हो, नाचे या हँसे, नङ्गा होकर सिर में लाल माला को धारण करे, जिसकी छाती पर बाँस या नल अथवा ताल वृक्ष उत्पन्न होता हो, जिसको मछलियाँ निगलें, जो कि अन्धकार युक्त गर्त्त में
गिरता हो, पर्वत की चोटी से गिरे, जिसका सिर मुँड जाये, जो मनुष्य माता के शरीर में घुसता हो, स्नोत्स वन गये हों, कौवे आदि पक्षियों से पराजित हो, मारा जाता हो या तिरस्कृत हो रहा हो, तारे चन्द्रमा आदि का गिरना, दीपक एवं आँख का नाश होना, जो देवताओं की प्रतिमाओं में या पृथिवी में कम्पन देखे, जिसे स्वप्न में वमन या विरेचन हो जाये, दांत गिर जायें, सिम्बल—ढाक—यूप (यज्ञ-पशु—बलि काष्ठ) वलमीक, पारिभद्र (नीम), कोविदार, (कचनार) ये वृक्ष फूल से लदे प्रतीत हों, जो चित्ता पर चढ़ा हो; कपास, तैल, पिण्याक (खली), लौह (लोहमय वस्तु), नमक, तिल इनको प्राप्त करे, या पक्के अन्न को खाये, मद्य का पान करे—इस प्रकार के स्वप्न यदि स्वस्थ व्यक्ति देखे तो वह रोगी होता है और यदि ऋण व्यक्ति इन स्वप्नों को देखता है तो मर जाता है ॥५४-६६॥ विफल स्वप्न—
यथास्वं प्रकृतिस्वप्नो विस्मृतो विहतस्तथा ।
चिन्ताकृतो दिबा हृद्यो भवन्त्यफलदास्तु ते ॥६७॥
अपनी प्रकृति के अनुकूल प्राकृतिक स्वप्न (वातप्रकृति का—संप्रम से चलना, पित्तप्रकृति का आग, विजली में प्रविष्ट होना, कफप्रकृति का—कमल, हंस, चक्रवाकों को देखना), विस्मृत (जो स्वप्न बहुत कुछ भूल गये), विहत (पहिले बुरा देखा और फिर अच्छा देखा), चिन्ता से उत्पन्न और दिन में देखे हुए स्वप्न फलरहित होते हैं ॥६७॥
ज्वरितानां शुना सख्यं कपिसख्यं तु शोषिणाम् ।
उन्मादे राक्षसैः प्रेतैरपस्मारे प्रवर्तनम् ॥६८॥
मेहातिसारिणां तोयपानं स्नेहस्य कुष्ठिताम् ।
गुल्मेषु, स्थावरोत्पत्तिः कोष्ठे मूर्धनि शिरोरुजि ॥६९॥
शङ्कुलीभक्षणं छर्घासध्वा खासपिपासयोः ।
हारिद्रं भोजनं वाऽपि यस्य स्यात् पाण्डुरोगिणः ॥७०॥
रक्तपिप्ती पिवेशस्तु शोणितं स विनश्यति ।
उत्तरतन्त्रं में पढ़े हुए रोगों के लिये अन्य स्वप्न—
ज्वरवाले पुरुषों की कुत्तों के साथ मैत्री, शोषरोगियों की बानरों के साथ मैत्री, उन्माद रोग में राक्षसों के साथ, अपस्मार में प्रेतों के साथ बैठना, प्रमेही एवं अतिसार-रोगियों का पानी पीना, कुष्ठरोगियों का स्नेह पान करना, गुल्मरोगियों के ऊँट में तथा शिरोरोग में शिर में वृक्ष की उत्पत्ति, छिद्वि रोग में (चने-तिल से बनी शङ्कुली) पूरी खाना, श्वास एवं तृष्णा रोगी का मार्ग में जाना, पाण्डुरोगी का हल्दी युक्त भोजन खाना और रक्तपित्त रोगी का रक्त को स्वप्न में पीना—इन स्वप्नोंवाला नष्ट हो जाता है ॥६८-७०॥
१. कहा भी है—
“अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः ।
सौम्यं स्वप्ने पुमान् पश्येत्—तस्य विद्यात् शुभं फलम् ॥”