भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

स्वप्नानेवंविधान् दृष्ट्वा प्रातःकृत्वा यत्नवान् ॥७१॥ दधान्माशंसितान् लोहं विप्रैभ्यः काश्चनं तथा । जपेच्छापि शुभान् मन्त्रान् गायत्री त्रिपदां तथा ॥७२॥ दृष्ट्वा तु प्रथमे यामे स्वप्त्याद् ध्यात्वा पुनः शुभम् । जपेच्छाऽन्यतमं वेदं ब्रह्मचारी समाहितः ॥७३॥ न चावक्षीन कस्मैचिद् दृष्ट्वा स्वप्नमशोभनम् । देवतायतने चैव वसेद्वात्रित्रयं तथा । विप्रान् पृजयेन्नित्यं दुःस्वप्नान् प्रविमुच्यते ॥७४॥

इस प्रकार के स्वप्नों को देखकर प्रातःकाल उठकर प्रयत्न पूर्वक—ब्राह्मणों को—उड़द, तिल, लोह (धातु आदि), स्वर्ण आदि देना चाहिये। शुभ-मन्त्रों का जप करना चाहिये, त्रिपदा (तीन व्याहृतिवाली) गायत्री का जप करना चाहिये। रात्रि के प्रथम प्रहर में यदि दुःस्वप्न दिखाई दे तो शुभ बातों का ध्यान करके फिर सो जाना चाहिये। सविधान होकर ब्रह्मचारी रहकर किसी एक वेद (मंत्र) का जप करना चाहिये। अशुभ स्वप्न देखकर किसी से उसका जिकर नहीं करना चाहिये। तीन दिन तक मन्दिर में निवास करना चाहिये। नित्य ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार करने से अशुभ स्वप्नों के कुफल से मनुष्य बच जाता है ॥७१-७४॥

अत ऊर्ध्वं प्रवद्यामि प्रशस्तं स्वप्नदर्शनम् ।

देवान् द्विजान्गोत्रवभान् जीवतः सुहृदो नृपान् ॥७५॥

समिद्धसमि साधुंश्च निर्मलानि जलानि च ।

पश्येत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ॥७६॥

मांसं सत्स्थान् स्रजः श्वेता वासांसि च फलानि च ।

लभेत धनलाभाय व्याधेरपगमाय च ॥७७॥

महाप्राप्तादमफलवृक्षवराणपर्वनान् ।

आरोहेद् द्रव्यलाभाय व्याधेरपगमाय च ॥७८॥

नदीनदममुद्रांश्च लुभिनान् कलुषोदकान् ।

तरेत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ॥७९॥

उरगो वा जलौका वा भ्रमरो वाऽपि यं दशेत् ।

आरोग्यं निर्दिशेत्सम्यं धनलाभं च बुद्धिमान् ॥८०॥

एवं रूपान् शुभान् स्वप्नान् यः पश्येद्वाधिरो नरः ।

स दीर्घायुरिति ज्ञेयस्तस्मै कर्म समाचरेत् ॥-१॥

अथ शुभ स्वप्नों को कहते हैं। देवताओं को, ब्राह्मणों को, गाय बैल को (जीवित), मित्रों को, राजाओं को, प्रज्ज्वलत अग्नि को, साधुओं को, निर्मल जल का देखना कल्याण की प्राप्ति के लिये तथा रोगशान्ति के लिये होता है। मांस को, मछलियों को, श्वेत मालाओं को, वस्त्रों का तथा फलों को प्राप्त करना धनप्राप्ति एवं रोग की शान्ति के लिये है। बड़े भारी महल पर, फल युक्त वृक्षों पर, हाथी पर, पर्वत पर चढ़ना धन के लाभ के लिये और रोगशान्ति के लिये है। बड़े हुए (प्रचलित) नदी (गङ्गा आदि), नद (सिन्धु आदि) समुद्र को या मैले पानी को तैरना कल्याण के लिये या रोग की शान्ति के

लिये होता है। जिसको साँप या जोक अथवा भ्रमर काटे, उसे आरोग्य लाभ होता है और भूत लाभ होता है। रोगी मनुष्य यदि इस प्रकार के शुभ स्वप्नों को देखे—तो उसे दीर्घायु समझकर-चिकित्सा कर्म प्रारम्भ करना चाहिये ॥७५-८१॥ इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विपरीताविपरीतस्वप्न- निदर्शनीयो नामैकोनत्रिशत्तमोऽध्यायः ॥२६॥

त्रिशत्तमोऽध्यायः

अथातः पञ्चेन्द्रियार्थविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अथ 'पंचेन्द्रियार्थविप्रतिपत्ति' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।

त्रि० मन्तव्य—श्रोत्र, त्वग्, रसना, प्राण तथा चक्षु नामक ५ इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध तथा रूप नामक अर्थों—विषयों की विपरीत प्रतिगति—समझना। श्रोत्र आदि द्वारा—शब्द आदि का विपरीत ज्ञान भी अरिष्ट ही है ॥१,२॥

शरीरशीलव्योर्ध्वस्य प्रकृतेर्विकृतिर्भवेत् ।

तत्स्वरिष्टं समासेन, व्यासतस्तु निबोध मे ॥३॥

शरीर (पाञ्चभौतिक-प्राण काया), शील (मन के भाव या मन), इनकी प्रकृति (स्वभाविक धर्म) का विकृत (परिवर्तित) होना—संक्षेप में अरिष्ट होता है। विस्तार से आगे कहते हैं १।

शृणोति विविधान् शब्दान् यो द्विज्यानामभावतः ।

समुद्रपुरमेवानामसंपत्तौ च निःस्वनान् ॥४॥

तान् स्थनात्रावगृह्णाति मन्यते चान्यशब्दवत् ।

प्राश्यारण्यस्वनांश्चापि विपरीतान् शृणोति च ॥५॥

द्विषच्छब्देषु रमते सुहृच्छब्देषु कुप्यति ।

न शृणोति च योऽकस्मात् ब्रुवन्ति गतायुषम् ॥६॥

दिठ (किन्नर), सिद्ध, गन्धर्व आदि के अभाव में—नाना प्रकार के (गीत, जलप पाठ के) शब्दों को सुनता है।

१ कई आचार्य गरीर, शील और प्रकृति इन तीन को पृथक् मानते हैं। प्रकृति—छै प्रकार की है—जैसा चरक में कहा है। "प्रकृति-हि जातिप्रसक्ता च कुलप्रसक्ता च, देशानुपातिनी च कालानुपातिनी च वयोऽनुपातिनी च, प्रत्यात्मनियता च" जातिप्रसक्ता—मत्स्यादि जाति में स्वभावविशेष, कुलप्रसक्ता—ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने से तप-प्रियता आदि, देशानुपातिनी—लाट-कर्नाटक देशों में अपने व्यवहार—कालानुपातिनी—देहादि में दुर्दलता आदि, वयोऽनुपातिनी—वात्सल्य, सुकुमारता आदि बाल्यावस्था में। ये—शरीर, वचन और मन में मिश्रित मिश्र प्रकार के हैं। दूसरे आचार्य प्रकृति से वान-पित्त-कफ लेते हैं और कुछ आचार्य सत्व, रज और तम प्रकृति का ग्रहण करते हैं।