सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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समुद्र, (नगर), मेघों के अभाव में भी इनके शब्दों को सुनता है, समुद्र, पुर—या मेघों के होने पर इनके शब्द को नहीं सुनता अथवा नहीं पहिचानता ( दूसरा शब्द समझता है ), ग्राम्य पशुओं के शब्द को अरण्य के पशुओं का शब्द मानता है, अरण्य के शब्द ग्राम्य पशुओं का शब्द मानता है, मित्र के शब्दों से द्वेष करता है, द्वेषी के शब्दों से प्रीति करता है, और कारण के बिना शब्द को जो नहीं सुनता—उस रोगी को आयु समाप्त हुई समझनी चाहिये। ( सुदृष्ट-शब्देषु तथा द्विषत्कृद्वेषु—के अर्थ—मित्रों के बचनों पर अविश्वास, शत्रु के बचनों पर विश्वास भी है ) ॥४-६॥
यस्तूष्णमिव गृह्णाति शीतमुष्णं च शीतवत्।
संजातशीतपिडको यश्च दाहेन पीड्यते ॥७॥
उष्णगात्रोऽतिमात्रं च यः शीतेन प्रवेपते।
प्रहारान्नाभिजानाति योऽङ्गच्छेदमथापि वा ॥८॥
जो रोगी शीतल वस्तुओं को उष्ण पदार्थों की भाँति, उष्ण पदार्थों को शीतल पदार्थों की भाँति ग्रहण करता है, जिसके शरीर में कफजन्य शीत पिडिकाओं के होने पर दाह होता हो, शरीर के अत्यन्त उष्ण होने पर भी जो शीत से काँप रहा हो, जो रोगी आघात को या अंग के काटने को नहीं जानता, वह रोगी असाम्य है ॥७,८॥
पाशुनेवाक्कीर्णानि यश्च मात्राणि मन्यते।
वर्णान्यता वा रात्र्यो वा यस्य गात्रे भवन्ति हि ॥९॥
जो रोगी यह समझे कि उसके अङ्ग धूल से व्याप्त हैं।
शरीर का रंग परिवर्तित हो गया, जिसके शरीर पर राजि (रेखायें) उत्पन्न हो जायें उसका बचना असम्भव है।
वि० मन्तव्य—सन्निपात आदि में देखा जाता है कि रोगी अपने शरीर को झाड़ता है ॥९॥
स्नातानुलिप्तं यं चापि भजन्ते नीलमक्षिकाः।
सुगन्धिवाडति योऽकस्मात् ज्वलन्ति गतायुषम् ॥१०॥
स्नान करने तथा चन्दन आदि का लेप करने पर भी जिसके शरीर पर मक्खियाँ आकर बैठें अथवा चन्दन कपूर आदि के लेप के बिना भी या सुगन्धि तैल के अभ्यङ्ग आदि के बिना भी जिसका शरीर सुगन्धित हो जाय उसको गतायुः ( मरनेवाला ) कहते हैं। “अत्यधरसिकं कार्यं कालपक्वस्य मक्षिकाः। अपि स्नातानुलिप्तस्य भृशमायान्ति सर्वशः” ॥१०॥
विपरीतेन गृह्णाति रसान् यश्चोपयोजितान्।
उपयुक्ताः क्रमाद्यस्य रसा दोषाभिबुद्धये ॥११॥
यस्य दोषानिन्साम्यं च कुर्यमिध्योपयोजिताः।
यो वा रसान् संवेत्ति गतासु तं प्रचक्षते ॥१२॥
जो रोगी सेवित रसों का विपरीत रूप में ग्रहण करता है ( मधुर रसों को अम्ल, अम्ल को मधुर ), और क्रमपूर्वक खाये
हुए रस ( पूर्वं मधुरमश्नोयात्—पश्चादरलं—इत्यादि क्रम ) जिसमें दोषों को बढ़ायें, मिथ्यारूप से सेवित रस जिस पुरुष के दोषों को एवं अग्नि को समान करते हैं; और जो रसों को मली प्रकार नहीं पहिचानता, उसे मरा हुआ समझना चाहिये ॥११,१२॥
सुगन्धं वेत्ति दुर्गन्धं दुगन्धस्य सुगन्धिताम्।
गृह्णीते वाऽन्यथा गन्धं आन्ते दीपे च नीरुजः ॥१३॥
यो वा गन्धं न जानाति गतासु तं विनिर्दिशेत्।
जो मनुष्य सुगन्ध को दुर्गन्ध, दुर्गन्ध को सुगन्ध समझता है, अथवा वास्तविक गन्ध को नहीं पहिचानता, दीपक बुझने के समय पीनस आदि नासारीगों से रहित होने पर भी जिसको गन्ध नहीं आती, उस पुरुष को गतायुष समझना चाहिये।
वि० मन्तव्य—रसों आदि के तैल का दीपक बुझता है तब विशेष प्रकार की गन्ध आती है, जो इसका अनुभव नहीं करता ‘दीपगन्धं न जिघ्रति’ वा० शा० अ० ५ ॥१३॥
द्वन्द्वायुष्णहिमादीनि कालावस्था दिशस्तथा ॥१४॥
विपरीतेन गृह्णाति भावानन्यार्थच यो नरः।
जो मनुष्य कष्ट देनेवाले द्रव्यों को-शीत-उष्ण आदि को, काल की अवस्था को ( प्रातः सार्य आदि को ), दिशाओं को (पूर्व-पश्चिम को), एवं अन्य पदार्थों को—द्रव्य-गुण-कर्मों को विपरीत रूप में ग्रहण करता है, वह मर जाता है ॥१४॥
दिवा व्योतौपि यश्चापि उल्लितानीव पश्यति ॥१५॥
रात्रौ सूर्यं उल्लन्तं वा दिवा वा चन्द्रवर्चसम्।
अमेवोपल्लवे यश्च अक्रचापतडिदगुणान् ॥१६॥
तडिस्त्वतोऽसतान् यो वा निमेल गगने घनान्।
विमानयान्प्रासादयैश्च संकुलमन्वरम् ॥१७॥
यश्चानिलं मूर्तिमन्तमन्तरिक्षं च पश्यति।
धूमनीहारवासोभिरावृतामिव मेदिनीम् ॥१८॥
प्रदीप्तमिव लोकं च या वा प्लुतमिवाम्भसा।
भूमिमष्टापदाकारो लेखाभियैश्च पश्यति ॥१९॥
न पश्यति सनक्षत्रां यश्च देवोमरुन्धतोम्।
ध्रुवमाकाशगङ्गां वा तं वदन्ति गतायुषम् ॥२०॥
व्योत्स्नतादृशोणतोयेषु छायां यश्च न पश्यति।
पश्यत्येकाङ्क्षहीनां वा विकृतां वाऽन्यसत्त्वजाम् ॥२१॥
श्रकाककङ्कगुग्ध्राणां प्रतानां यक्षरक्षसाम्।
पिशाचोरगनगानां भूतानां विकृतामपि ॥२२॥
१. दिश-शब्द से कई आचार्य मानस-स्पर्श मानते हैं। कहा भी है—स्पर्श दो प्रकार हैं—एक स्पर्शेन्द्रिय ब्राह्म और दूसरा मानस। “स्पर्शेन्द्रियसंस्पर्शः स्पर्शो मानस एव च।”