भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३१ ]

यो वा मयूरकण्ठाभं विभूषं वह्निमोक्षते ।

आतुरस्य भवेन्मृत्युः स्वस्थो व्याधिमवाप्नुयात् ॥२३॥

दिन के समय तारे आदि ज्योतियों को जलता हुआ जो देखता है, रात्रि में जलते हुए सूर्य को, दिन में चमकते हुए चन्द्रमा के तेज को, बादलों के न होने पर—इन्द्रवज्रपुष, बिजली आदि को, निर्मल आकाश में बिजली को या घने काले बादलों को, आकाश को विमान, यान अथवा महलों से व्याप्त देखे और जो वायु एवं आकाश को मूर्तिमान देखता हो, पृथ्वी को—ध्रुवै—नीहार, एवं वस्त्र से आवृत जो देखता है, लोक को ग्रीष्म के बिना भी जलते हुए देखे, पानी में डूबते हुए लोक को देखे, अष्टापद (खेलने का खिलौना) आकारवाली रेखाओं से व्याप्त भूमि को जो देखे, सप्तर्षि तारों के साथ साथ अरुण्यती नक्षत्र को जो नहीं देखता, ध्रुव तारे को, आकाश गङ्गा को जो व्यक्ति नहीं देखते वे मरणासन हैं । ज्योस्त्रा, आदर्श (शीशे) और धूप में, पानी में जो रोगी अपनी छाया (प्रतिबिम्ब) को नहीं देखता, अथवा छाया को एक अङ्ग से हीन, या विकृतावस्था में या अन्य प्राणी की छाया को देखता है, कुत्ता, काक (कोवा), कङ्क (श्वेतचन्द्रश्वेतचरण१), गृध्र पक्षियों की, प्रेतों की, यक्षराक्षस की, पिशाच व साँप की, नागों की तथा देवयानियों की विकृत छाया को जो आदर्श आदि में देखते हैं, धूम्ररहित आग जो मोर के कण्ठ के समान देखता है, वह रोगी मर जाता है और स्वस्थ व्यक्ति रुग्ण हो जाता है ।

वि० मन्तव्य—इसके लिये देखिये वाग्भट शा० अ० १५—२३

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने पञ्चैन्द्रियार्थविप्रति-

पत्तिर्नाम त्रिगोऽध्यायः ॥३०॥

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातश्छायाविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'छाया विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था । 'छाया वर्ण' को दर्शाती है, और प्रभा वर्ण को प्रकाशित करती है ॥१,२॥

श्यावा लोहितिका नीला पीतिका वाऽपि मानवम् ।

अभिद्वन्ति यं छायाः स परासुरसंशयम् ॥३॥

१ 'कङ्कः स्यात् कङ्कमल्लाक्षो वाणपक्षाहृष्यकः ।

लोहपुष्पो दीर्घपाटः पक्षाघः पाण्डुवर्णभाक् ॥'

'सप्तर्षीणां समीपस्थां यो न पश्यत्यरुघतीम् ।

संवत्सरान्ते जन्तुः स पश्यत्येव महत्तमः ॥'

१ प्रभा और छाया में अन्तर है यथा—

श्याव (काली), लोहितिका (लाल), नीला (नीली), पीतिका (पीली) छाया जिस पुरुष में सद्गुण उत्पन्न हो जाती है, उसको मरणासन समझना चाहिये । 'नाऽच्छायो नाऽप्रभः कश्चिद् विरोधाश्चिद्द्वयन्ति हि । नृणां शुभाशुभोत्पत्तिं काले छायाः प्रभाश्रयाः' ॥३॥

हीरपकमते यस्य प्रभास्मृतिघृतिश्चियः ।

अकस्माद्यं भजन्ते वा स गतासुरसंशयम् ॥४॥

जिस पुरुष में से लज्जा चली जाती है, और प्रभा, धृति (नियतात्मिका बुद्धि), स्मृति (स्मरण) और श्री (कमनीयता) उपदेश आदि कारणों के बिना ही उत्पन्न हो जाती हैं, वह निश्चय से मरेगा ॥४॥

यस्याधरौघ्रः पतितः क्षिप्तश्चोर्ध्वं तथोत्तरः ।

उभौ वा जाम्बवाभासौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥५॥

आरक्ता दशना यस्य श्यावा वा स्युः पतन्ति वा ।

खञ्जनप्रतिमा वाऽपि तं गतायुषमादिशेत् ॥६॥

कृष्णा स्तब्धाऽवलिम्ना वा जिह्वा शून्ता च यस्य वै ।

कर्कशा वा भवेद्यस्य सोऽचिराद्विजहात्यसून् ॥७॥

कुटिला स्फुटिता वाऽपि शुष्का वा यस्य नासिका ।

अवस्फुरंजति मग्ना वा न स जीवति मानवः ॥८॥

संक्षिप्ते विषमे स्तब्धे रक्ते स्रस्ते च लोचने ।

स्यातां वा प्रसृते यस्य स गतायुर्नरो ध्रुवम् ॥९॥

केशाः सीमन्तिनो यस्य संक्षिप्ते विनते ध्रुवौ ।

लुन्तन्ति चाक्षिपद्माणि सोऽचिराद्याति मृत्यवे ॥१०॥

जिस पुरुष का निचला ओठ लटक जाय, ऊपर का चढ़-उठ जाये, अथवा दोनों ओठ जामुन के फल के समान काले हो जायें, उसका बचना कठिन है । जिस रोगी के दाँत लाल या काले पड़ जायें, अथवा गिर जायें, या खञ्जन पक्षी के गले के समान नीले पड़ जायें 'उसे मरा समझना चाहिये । जिस रोगी की जीभ काली पड़ जाये, जड़ हो जाये, अवलिम् (प्रमेह आदि में जैसे थूक से लिस्सी) हो—वह शीघ्र ही प्राणों को छोड़ देता है । जिस रोगी की नासिका कुटिल (टेढ़ी) हो जाये, स्फुटिता (फैल जाये), शुष्क हो जाये, या अवस्फुरित (शब्द करने लगे) या मग्ना (बैठ जाये) वह रोगी नहीं बचता । जिस पुरुष की आँखें रक्तकुन्ति हो जायें, ऊँची-नीची हो जायें, निश्चल-गतिरहित हो

'वर्णमाक्रामती छाया, प्रभा वर्णप्रकाशिनोः ।

आसन्ना लक्ष्यते छाया, प्रभा दूराच्च लक्ष्यते ॥'

वर्ण चार प्रकार के हैं—गौर, कृष्ण, श्याम और गौरश्याम । प्रभा सात प्रकार को है—रक्ता, पीता, सिता, श्यावा, हरिता, पाण्डुरा और असिता । छाया पाँच प्रकार की है—स्निग्धा, विमला, रूचा, मलिना, संक्षिप्ता ।