सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मूर्तस्थानम्
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जायें, लाल हो जायें—सस्त (नीचे गिर जायें अथोदृष्टि हो जाये) हो जाती हैं—उस मनुष्य को निश्चित रूप में गतायुष समझना चाहिये। जिस पुरुष के बाल सीमन्तवाले (मौग-बाल दो भागों में विभक्त) हो जाते हैं, जिस पुरुष की भुजें संकुचित एवं झुक जाती हैं, आँख की पलकों के बालों को जो नोचता है— वह शीघ्र ही मर जाता है ॥५—१०॥
नाहूरत्यन्नमास्यस्थं न धारयति यः शिरः ।
एकाग्रदृष्टिर्मुदात्मा सद्यः प्राणान् जहाति सः ॥११॥
बलवान् दुर्बलो वाऽपि संमोहं योऽधिगच्छति ।
उत्थाप्यमानो बहुशस्तं पक्षं भिषगादिशेत् ॥१२॥
उत्तानः सर्वदा शैते पादौ विकुरुते च यः ।
विप्रसारणशीलो वा न स जीवति मानवः ॥१३॥
शैतपादकरोच्छवासश्छिन्नोच्छवासश्च यो भवेत् ।
काकोच्छवासश्च यो मत्यस्तं धीरः परिवर्जयेत् ॥१४॥
निद्रा न छिद्यते यस्य यो वा जागर्ति सवेदा ।
मुहोद्धा वक्तुकामश्च प्रत्याख्येयः स जानता ॥५॥
उत्तरीष्टं च यो लिह्यादुत्कारांश्च करोति यः
प्रेतैर्वा भाषते सार्धं प्रेतरूपं समादिशेत् ॥१६॥
जो मनुष्य मुख में स्थित अन्न को नहीं निगलता, जो शिर को सीधा धारण नहीं करता (गर्दन गिरी रहती है), जिसकी दृष्टि स्थिर हो (पुतली इधर-उधर फिरे नहीं, वह मुदात्मा (जड़ रूपी मनुष्य) शीघ्र ही (उसी दिन) मर जाता है। जो बलवान् या दुर्बल मनुष्य बार-बार मूर्च्छित होता है, उठने पर (चेतन करने पर) भी फिर मूर्च्छित हो जाता है— उसकी आयु पूर्ण समझनी चाहिये (वह सात दिन में मर जाता है)। जो सदा पीठ के भार चित्त खोता हो, पाँवों को फैलाता-सिकोड़ता रहता हो, और पाँव को पसारनेवाला मनुष्य देर तक नहीं जीता। जिस रोगी के हाथ-पाँव और श्वास ये तीनों ठण्डे हो जायें, जो रक्त रक्तकर ऊंचा श्वास (गहरा) लेता है या जो कौवे के समान मुख फैलाकर श्वास लेता है, उसका त्याग कर देना चाहिये। जिसकी नींद ही समाप्त नहीं होती अथवा जो सदा जागता रहता है, बोलने के समय जिसको मूर्च्छा आ जाती है, उसे असाध्य समझना चाहिये। जो पुरुष ऊपर के ओठ को चाटता है, जिसको बार-बार उद्गार (डकार) आते हों, जो प्रेतों के साथ बात-चीत करता हो, उसको प्रेतरूप समझना चाहिये ॥११-१६॥
खेभ्यः सरोमकूपेभ्यो यस्य रक्तं प्रवर्तते ।
पुरुषस्याविषार्तस्य सद्यो जह्यात् स जीवितम् ॥१७॥
वाताघ्नौला तु हृदये यस्योर्ध्वमनुयायिनी ।
रुजात्रविद्वेषकरो स परासुरसंशयम् ॥१८॥
अनन्योपद्रवकृतः शोफः पादसमुत्थितः ।
पुरुषं हन्ति, नारीं तु मुखजो, गृह्यजो द्रयम् ॥१९॥
अतिसारो ज्वरो हिक्का छविः शूताण्डमेदता ।
श्रासिनः कासिनो वाऽपि यस्य तं क्षीणमादिशेत् ॥२०॥
स्वेदो दाहश्च बलवान् हिक्का श्रासश्च मानवम् ।
बलवन्तमपि प्राणैर्विगुञ्जन्ति न संशयः ॥२१॥
विष विकार के बिना जिस पुरुष के ऊपर-नीचे के सब छिद्रों से, सब रोमकूपों से रक्त बहता है, वह शीघ्र ही प्राणों का त्याग कर देता है। जिस पुरुष में ऊपर को चढ़नेवाली वायु ऊपर आकर हृदय में शिला के समान बन जाती है, जिससे पीड़ा एवं अन्न में विद्वेष उत्पन्न होता है, वह निश्चित रूप में मरनेवाला है१। शोफजन्म उपद्रवों (श्रास, पिपासा, दुर्बलता आदि) से शोफ पाँवों में उत्पन्न होकर पुरुष को नष्ट करता है, चेहरे पर शोफ होकर खी को मारता है, गृह्य भाग में उत्पन्न होने से खी-पुरुष दोनों को मारता है। श्रास या कास रोगी को जब अतिसार, ज्वर, हिक्की, वमन, अण्डकोष तथा विश्रुत में सृजन हो जाती है, तब उसको क्षीण-मरा समझना चाहिये। बलवान् पुरुष को भी जब प्रभूत, स्वेद, तीव्र दाह, हिक्की, श्रास उत्पन्न हो जाये, वह निश्चय से प्राणों से विमुक्त होगा (तीन रात में मर जायेगा) ॥१७-२१॥
इयावा जिह्वा भवेद्यस्य सन्धं चाक्षि निमज्जति ।
मुखं च जायते पूति यस्य तं परिवर्जयेत् ॥२२॥
वक्रत्रमापूर्यतेऽश्रूणां स्विद्यतश्चरणानुभौ ।
चक्षुश्चाकुलतां याति यमराष्टं गर्मिष्यतः ॥२३॥
अतिमात्रं लघूनि स्युर्गोत्राणि गुरुकाणि वा ।
यस्याक्स्मात् स विज्ञेयो गन्ता वैवस्वतलयम् ॥२४॥
पङ्कमत्स्यवसातैलघुतगन्धाश्च ये नराः ।
मृष्ट गन्धांश्च ये यान्ति गन्तारस्ते यमालयम् ॥२५॥
यूका ललाटमायान्ति बलि नाशन्ति वायसाः ।
येषां चापि रतिर्नास्ति यातारस्ते यमालयम् ॥२६॥
ज्वरातिसारशोफाः स्युयस्यान्योन्यावसादितः ।
श्रक्षीणबलमांसस्य नासो शक्यश्चिकित्सितुम् ॥२७॥
क्षीणस्य यस्य क्षुत्तुष्णे हृद्योर्मिष्टैर्हितस्था ।
न श्राभ्यतोऽन्तपातैश्च तस्य मृत्युरूपस्थितः ॥२८॥
प्रवाहिका शिरःशूलं काष्ठशूलं च दारुणम् ।
पिपासा बलहानिश्च तस्य मृत्युरूपस्थितः ॥२९॥
जिस पुरुष को जीम काली पङ्क जाये, जिसकी बाँईं आँख बैठ जाये, और जिसके मुख से दुर्गन्ध आने लगे, वह असाध्य है। जिसका चेहरा आँसुओं से भर जाता है, दोनों पाँव पसीने से तर हो जाते हैं, जिसकी आँखें व्याकुल रहती हैं, वह मरा समझना चाहिये। जिस पुरुष का शरीर एकदम से लघु (हल्का) या भारी हो जाता है, वह शीघ्र ही यमराज के यहाँ
१ 'वाताच्छी' शब्द से यहाँ पर वातव्याधि में कहा रोग समझना चाहिये। वायु ही शिला के समा बन जाती है।