सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ३१ ]
जायेगा। इसी प्रकार जिसका शरीर स्थूल या क्रुश रहसा हो जाता है, उसे भी मरणसन्त समझना चाहिये। कीचड़ मछली, वजा, तैल, घी की गन्ध या मरिच अथवा निर्मल दिव्य गन्ध जिनके शरीर में से आने लगती है, वे भी मरनेवाले हैं। जिनके माथे पर जूएँ फिरने लगेँ, जिसकी दी हुई बलि को कौए न खायें और जिसको कहीं भी शान्ति-मुख नहीं मिलता उसे (एक साल में) मरणसन्त समझना चाहिये। जिस पुरुष में परस्पर एक दूसरे के उपद्रवों के कारण ज्वर-अतिसार और रोगी का वल एवं मांस क्षीण हो गया हो-तो वह चिकित्सा के अयोग्य है। जिस क्षीण पुरुष की मूल एवं प्यास हृदय के प्रिय, मधुर एवं हितकारी खान-पान से भी नहीं शान्त होती, उसकी मृत्यु समीप में खड़ी समझनी चाहिये। जिस पुरुष को तीव्र प्रवाहिका, तीव्र शिरःशूल, तीव्र कोष्ठशूल, तीव्र पियासा हो एवं वल (उत्साह-शक्ति) क्षीण हो तो इन रोगियों का मृत्यु-काल आया समझना चाहिये ॥२२—२६॥
विषमैषोपचारणे कर्मभिश्च पुराकृतैः।
अनित्यत्वाच्च जन्तूनां जीवितं निधनं व्रजेत् ॥३०॥
मृत्यु का कारण—
विषमोपचार से (स्वाभाविक वल आदि भावों के विपरीत उपचार से), पूर्वजन्मकृत शरीरस्थापक कर्मों के क्षीण होने से, देहवारियों के अनित्य होने से जीवन का नाश होता है ॥३०॥
प्रेताः भूताः पिशाचाश्च रक्षासि विविधानि च ।
मरणाभिमुखं नित्यमुपसर्पन्ति मानवम् ॥३१॥
तानि भेषजवीर्याणि प्रतिध्वन्ति जिघासया ।
तस्मान्मोघाः क्रियाः सर्वा भवन्त्येव गतायुषाम् ॥३२॥
मरणसन्त रोगी के समीप प्रेत (डुर्गति प्राप्त प्राणी), भूत (यम के नौकर), पिशाच (मांस को खानेवाले), रावण आदि नाना प्रकार के बहुत से राक्षस आदि नित्य प्रति मारने की इच्छा से आते हैं। इसलिये ये औषधियों की शक्ति का नाश कर देते हैं, अतः सब प्रकार का चिकित्साकार्य निष्फल होता है। पहिले स्वयं कहा भी है—
“स स्थिरत्वान्महत्वाच्च धात्वनुक्रमणेन च ।
निहन्त्योषधवीर्याणि मंत्रान् दुष्टग्रहो यथा ॥” ३१, ३२ ॥
इति श्रीमुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने छायाविप्रतिपत्ति- नामैकत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥३१॥
१ चरक में इसी को इस प्रकार से स्पष्ट किया है— ज्वरातिसारी शोफान्ते, स्वययुर्वा तयोः क्षये । दुर्बलस्य विशेषेण, नरस्यान्ताय जायते ॥
द्वात्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातः स्वभावविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे 'स्वभाव विप्रतिपत्ति' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिये कहा था।
वि० मन्तव्य—स्वभाव अर्थात् स्वाभाविक वर्ण आदि की विप्रतिपत्ति अर्थात् परिवर्तन-बदल जाना। यह भी अरिष्ट होता है ॥१, २॥
स्वभावसिद्धान्तां शरीरैकदेशानामन्यभावित्वं मरणाय । तद्यथा—शुक्लानां कृष्णत्वं, कृष्णानां शुक्लता, रक्तानामन्यवर्णत्वं, स्थिराणां मृदुत्वं, मृदूनां स्थिरता, चलानामचलत्वम्, अचलानां चलता, पृथूनां संक्षिप्तत्वं, संक्षिप्तानां पृथुता, दीर्घाणां ह्रस्वत्वं, ह्रस्वानां दीर्घता, अपतनधर्मिणां पतनधर्मित्वं, पतनधर्मिणामपतनधर्मित्व- मकस्मात्, शैत्यौष्ण्यस्नेहधरोद्भयप्रस्तम्भवैषण्यीवसादनं चाङ्गानाम् ॥३॥
प्रकृति से प्रसिद्ध-शरीर के एक भाग में स्थित अवयवों का—दूसरे रूप में परिवर्तित होना मृत्यु के लिये होता है। यथा—श्वेत (दांत आदि का) वस्तुओं का काला होना, (काली आंख की पुतली या बाल) वस्तुओं का श्वेत होना, लाल (होठ आदि) वस्तुओं का अन्य रङ्ग होना, कठोर (कठोर—अस्थि आदि) वस्तुओं का कोमल होना, मृदु (मांस-शोणित आदि) वस्तुओं का कठोर होना, चल (सन्धियों में) स्थिरता, अचल वस्तुओं (नासा आदि) में चलत्व (गति), पृथु-विस्तीर्ण (उर आदि) वस्तुओं में संकुचितपन, संक्षिप्त संकुचित (आंख की कनीनिका आदि) वस्तुओं में विस्तार का होना, दीर्घ (जंघा आदि) वस्तुओं का छोटा होना, छोटी वस्तुओं (ग्रीवा विश्रन आदि) का लम्बा होना, अपतनशील (नखादि) वस्तुओं का गिरना, गिरनेवाली वस्तुओं का (मूत्र-पूरुष-पिशा-णक आदि का) न गिरना, अकस्मात्-उष्ण स्वभाववाले हाथ-पाँव में ठण्डक आ जाना, फूलकार आदि में उष्णता, नयनतार-कादि स्निग्ध वस्तुओं में रुक्षता, त्वचा आदि रुक्ष वस्तुओं में स्निग्धता, अंगों में प्रस्तम्भ (स्तम्भ), विवर्णता (रङ्ग-परिवर्तन), अवसाद (शिथिलता) होना मृत्यु के लक्षण हैं ॥३॥
स्वेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरैकदेशानामवलस्तोत्क्षिप्तप्र- न्तावक्षिप्तपतितविमुक्तनिर्गतान्तगुरुलघुत्वानि, प्रवालवर्ण- व्यङ्गप्रादुर्भावो वाऽप्यकस्मात्, सिराणां च दर्शनं ललाटे नासावर्शे वा पिडकोत्पत्तिः, ललाटे वा प्रभातकाले, स्वेद- नेत्ररोगाद्विना वाऽश्रुप्रवृत्तिः, गोमयचूर्णप्रकाशस्य वारजसी- दर्शनमुत्तमाङ्ग्रे, निलयनं वा कपोतकङ्कूकाकप्रभृतीनां मृत्रपुरोषवृद्धिमुझानानां, लक्ष्मणाशो वा मुखानानां