सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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स्तनमूलहृदयोः सु च शूलोत्पत्तयः, मध्ये शूनत्वमन्तेषु परिन्लायित्वं विपर्ययो वा, तथाऽर्धाग्रे श्वयथुः शोषोऽङ्गपक्षयोर्वा, नष्टहीनविकलविकृतस्वरता वा, विवर्ण-पुष्पप्रादुर्भावो वा दन्तमुखनखशरीरेषु, यस्य वाऽप्यु कम्पुरोपवेतांसि निमज्जन्ति, यस्य वा दृष्टिमण्डले भिन्नविकृतानि रूपाण्यालोक्यन्ते, स्नेहाभ्यक्तकेआङ्ग इव यो भाति, यश्च दुर्बलो भक्तृक्षेपातिसाराभ्यां पीड्यते, कासमानश्च तृष्णाभिभूतः, क्षीणश्छर्दिभक्तृक्षेपयुक्तः सफेन-पूथरुधिरोद्वामी हतस्वरः शूलाभिपन्नश्च मनुष्यः, शूनकर-चरणवदनः क्षीणोऽन्नद्वेपी क्षस्तपिण्डकांसपाणिपादो ज्वर-कासाभिभूतः, यस्तु पूर्वाह्ने मुक्तमपराह्ने छर्दयत्यविदग्ध-मतिसार्यते वा स श्वासान्निष्यते, बस्तवद्विलपन यश्च भूमौ पतति क्षस्तमुष्कः, स्तब्धमेद्वो भ्रमन्म्रीवः प्रनष्टमेह-नश्च मनुष्यः, प्राणिवशुष्यमाणहृदय आर्द्रशरीरः, यश्च लोष्ट लोष्टेनाभिहन्ति काष्ठं काष्ठेन, तृणानि वा छिन्नन्ति, अधरोष्ठं दग्धति, उत्तरोष्ठं वा लेहि, आलुञ्चति वा कर्णो केग्राश्च, देवद्विजगुरुसुहृद्वैयांश्च द्रेष्टि, यस्य वक्रानुव-क्रगा ग्रहा गर्हितस्थानगताः पीडयन्ति जन्मक्षं वा, यस्यो-ल्लाग्निभ्यामभिहन्त्यते होरा वा, गृह्दारगयनासनवाहन-मणिग्लोपकरणगर्हितलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावो वेति ॥ ४ ॥
शरीर के अङ्गों का अपने स्वाभाविक स्थान से अवच्छस्त ( नीचे आना भू आदि का ), उक्षिप्त ( आँख आदि का ऊपर चढ़ना ), भ्रान्त ( आँख आदि का भ्रमण ), अवक्षिप्त ( तिरछा होना ), पतित ( शिरःश्रीवा आदि का गिरना ), विषुक्त ( सन्धि आदि का मोक्ष ), निर्गत ( जीभ-आँख का बाहर निकल आना ), अन्तर्गत ( आँख का अन्दर धँसना ), गुरु ( आँख पलकों का भारी होना ), लघुता ( बाहु-जंघा का हल्का होना ), या अचानक प्रवाल मूंगे के समान रङ्ग-वाले व्यञ्जनों का उत्पन्न होना मृत्यु का सूचक है । * अकस्मात् ललाट में सिरायेँ दीखने लगेँ, नासावंश में सहसा पिङ्का का उत्पन्न होना, प्रभातकाल में माथे पर पहीना आना, बिना नेत्र-रोग के आँखों से आँसू बहेँ, जिसके सिर पर गोबर के चूर्ण के समान प्रकाश अथवा गोबर के चूर्ण के समान धूल दिखाई देती है, जिसके सिर पर कबूतर, कोआ, कंक आदि पक्षी बैठें,
१ चरक में भी कहा है— धमनीनाममूर्ध्नि जाळमत्यर्थशोभनम् । ललाटे दश्यते यस्य षड्भिर्मासैर्मरिष्यति ॥ विम्बोविदुमवर्णाभि शक्रगोपप्रभाऽपि वा । नासावंशे भवेद् यस्य पिङ्का न स सिध्यति ॥ यस्य गोमयचूर्णार्धं चूर्ण मूर्द्धति जायते । सस्नेहै श्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम् ॥
भोजन न करने पर मूत्र-पुरीष की वृद्धि हो, भोजन करने पर मूत्र पुरीष में ह्रास हो, स्तनमूल-हृदय और उर में शूल उत्पन्न हो, शरीर के मध्य भाग में सूजन हो, हाथ-पाँव में शुष्कता, आधे शरीर में सूजन, आधे में शुष्कता, पक्षादं में ग्लान्ता, स्वर का नष्ट होना, स्वर का निर्बल होना, स्वर का विकल होना ( भर्गई आवाज ), स्वर का स्वाभाविक रूप में न रहना, दांत-मुख-नख एवं शरीर में विवर्णता एवं पुष्प का उत्पन्न होना, जिस रोगी का कफ, मल एवं शुक्र पानी में द्रव जाता है, जिस रोगी के दृष्टिमण्डल में नाना प्रकार के गाय, मैस आदि अथवा विकृत ( तीन सिर, तीन मुजा या एक हाथ आदि ) रूप दिखाई देते हैं, बिना तेल के सिर एवं शरीर तेल से चिकना प्रतीत हो, जो दुर्बल व्यक्ति अन्न-द्वेष तथा अतिसार से पीड़ित हो, खांसेते हुए तृष्णा से पीड़ित हो जावे, क्षीण हो, यदि वमन, भोजन में द्वेष हो, क्षाग मिश्रित रक्त का वमन करनेवाला, निर्बलस्वर एवं शूल से पीड़ित मनुष्य, हाथ-पाँव सूज गये हों—क्षीण, अन्न द्वेष करनेवाला, पिण्डलियाँ—कन्धे पाँव हाथ थक गये हों तथा ज्वर एवं कास से पीड़ित मनुष्य मर जाता है, जो कि पूर्वाह्ने में खाये भोजन का अपराह्न में वमन कर देता है, बिना पचा भोजन जिसका अतिसार में बाहर आता है, ये असाध्य हैं । ज्वर एवं कास से पीड़ित व्यक्ति श्वास रोग से मरता है ।
कसाई से मारा गया वकरा जिस प्रकार भूमि पर गिरते समय शब्द करता है, उस प्रकार का शब्द करनेवाला मनुष्य असा-य है । जिसके अण्डकोष स्थान से स्खलित हो जायें या जिसका शिरन स्तब्ध हो, जिसकी श्रीवा गिर गई अथवा जिसका शिरन अन्दर को घुस गया, वह मनुष्य असाध्य है ।
स्तन एवं लेप आदि करने पर जिस मनुष्य का शरीर तो गीला हो और हृदय-प्रथम शुष्क होने लगता है, वह ( पन्द्रह दिन में ) मर जाता है और जो पुरुष मिट्टी के ढेले से मिट्टी के ढेले को, लकड़ी से लकड़ी को मारता है, तिनकों को तोड़ता रहता है, निचले ओठ को काटता रहता है, ऊपर के ओठ को चाटता है, कानों को या बालों को खींचता रहता है; देवता-ब्राह्मण, गुरु, मित्र एवं वैद्य से जो द्वेष रखता है वह एक साल में मर जाता है । जिसके ग्रह पूर्वभुक्त राशि पर पुनः आ जाते हैं—वे वक्र ग्रह होते हैं, वक्र एवं अनुवक्र ग्रह जिस पुरुष के गर्हित स्थान पर आकर पीड़ा उत्पन्न करते हैं * । जिसके जन्म-
१. ग्रह-गति— “वक्रानुवक्रा कुटिला मन्दा मन्दतरा समा । तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधा गतिः ॥” १२ स्थान भावों के नाम— “लग्नं धनं सोदरश्च बन्धुः पुत्रो रिपुस्तथा ।