सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३३ ]
नक्षत्र उल्का, अशनि द्वारा नष्ट होता है, जिसकी होरा (जन्म-राशि) उल्का-अशनि-तेजःपुञ्ज से नष्ट होता हो, या घर, स्त्री, शून्या, आसन, यान, वाहन, मणि, रत्न, उपकरणों (घट-पिठर आदि) के निन्दित लक्षणोंका प्रादुर्भाव होते हों वह असाध्य है वि० मन्तव्य—निन्दित लक्षणोंवाले—यह द्वारा आदि के प्रभाव से भी स्वामी की मृत्यु हो जाती है ॥ ४ ॥
भवन्ति चात्र—
चिकित्स्यमानः सम्यक् च विकारो योऽभिवर्धते ।
प्रक्षीणबलमांसस्य लक्षणं तद् गतायुषः ॥ ५ ॥
निवर्तते महाव्याधिः सहसा यस्य देहिनः ।
न चाहारफलं यस्य दृश्यते स विनश्यति ॥ ६ ॥
कहा भी है—
जो रोग भली प्रकार चिकित्सा करने पर भी बढ़ता ही जाता हो, रोगी का बल (उत्साह) और मांस निरन्तर क्षीण हो रहा हो तो वे लक्षण मरणासन्न रोगी के हैं, जिस पुरुष के महारोग (वातव्याधि, प्रमेह आदि आठ) सहसा अच्छे हो जाते हैं, और भोजन का कुछ भी फल शरीर में दिखाई न देता हो तो वह मनुष्य नष्ट हो जाता है ॥ ५, ६ ॥
एतान्यरिष्टरूपाणि सम्यग् बुध्यते यो भिषक् ।
साध्यासाध्यपरीक्षाणां स राज्ञः संमतो भवेत् ॥ ७ ॥
जो वैद्य अरिष्ट लक्षणों को भली प्रकार से जानता है, वह साथ असाध्य रोग की परीक्षा में राजा से प्रशंसित होता है—राजा इसकी सराहना करते हैं ।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में वर्णित अरिष्टों को सम्यक् जानने के लिये—वा० शा० अ० ५ तथा चरक इन्द्रिय स्थान समस्त देहिये ॥ ७ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने स्वभावविप्रतिपत्ति- नाम द्राक्षिशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
भार्या च निवर्त धर्मः कर्म चायो व्ययस्तथा ॥’
१. अनिष्ट-निमित्त—
घर का गुम्बज गिरना, स्त्रियों का पशु आदि करना, हंसती-गाती चार-पाँच कन्याओं का युगपत् पैदा होना, खट्वा और आसन का सहसा गिरना-नष्ट होना, यान की ध्वजा पर कोई आदि का गिरना, वाहन (पशु आदि) का रोना, मणिरत्न आदिका निष्प्रभ होना ।
विस्तार के लिये—महाभारत के भीष्म-विराट पर्व देखने चाहिए ।
“नीललोहितपीतश्च भवत्यनिर्हुतो द्विजैः ।
वामाच्छिदुं धृणन्श्च मुञ्चन् वै दारुणं स्वनम् ॥”
त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातोऽवारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब ‘अवारणीय’ नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था । आयु-वैद में असाध्य रोगों की पहिचान चार प्रकार की बताई है । यथा—काल, स्वभाव, रिष्ट और उपद्रव । इनमें काल-स्वभाव का संक्षेप में वर्णन करके भी आगे करेंगे, रिष्ट लक्षण कह दिये, अतः अब उपद्रवों के लक्षणों को कहते हैं ।
वि० मन्तव्य—जिन उपद्रव-लक्षणों के उत्पन्न होने पर मृत्यु का निवारण (निरोध) नहीं किया जा सकता ॥ १, २ ॥
उपद्रवैस्तु ये जुष्टा व्याधयो यान्त्यवार्थताम् ।
रसायनाद्विना वत्स ! तान् श्रृण्वेकमना मम ॥ ३ ॥
हे वत्स सुश्रुत ! उपद्रवों से युक्त जो रोग रसायन के बिना स्वस्थ नहीं होते उन रोगों का नामसंकीर्त्तन एकमन से सुनो ।
वि० मन्तव्य—केवल रसायन सेवन से जिनका निवारण (निराकरण या निरोध) हो सकता है । केवल व्याधि विपरीत चिकित्सा से निवारण नहीं होता । रसायन सेवन से प्रशस्त-विशुद्ध रस, रक्त एवं मांस आदि घातुओं का लाभ (उत्पत्ति एवं वृद्धि) होता है, फलतः बल लाभ होता है “बलाधिष्ठानम् आरोग्यम्” के अनुसार आरोग्य लाभ हो जाता है । और रस अर्थात् पारदवाले औषध भी रसायन कहे जाते हैं । उनके लिये रस-शास्त्रों में कहा है कि अन्य सब औषधियाँ साथ रोगों में लाभ करती हैं, परन्तु—‘असाध्येष्वपि दातव्यो रसोऽतः श्रेष्ठ उच्यते ।’ पारद का प्रयोग असाध्य रोगों पर भी किया जा सकता है, अतः वह अन्य औषधियों से श्रेष्ठ है । यथा—सन्निपात ज्वर में विहित मांसरस, शोथ में दुग्ध, ग्रहणी रोग में तक्र, दधि एवं दूध, यक्ष्मा में अजामांस आदि का प्रयोग और साथमें मकरध्वज, स्वर्ण पर्पटी आदि पर्पटी, तथा वसन्त मालती आदि का प्रयोग ॥ ३ ॥
वातव्याधिः प्रमेहश्च कुष्ठमशो भगन्दरम् ।
अश्मरी मूढगर्भश्च तथैवोदरमष्टमम् ॥ ४ ॥
१. उपद्रव का लक्षण—
यः पूर्वोत्पन्नं व्याधिं जघन्यकालजातो व्याधिर्लपयुजति स तन्मूल एवोपद्रवसंज्ञः ॥
२. उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजो रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणुर्वा रोगोत्पश्चाज्जायत इति उपद्रवसंज्ञः ।