भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० २३ ]

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सूत्रस्थानम्

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अष्टावेते प्रकृत्यैव दुश्चिकित्स्या महागदाः ।

वातव्याधि, प्रमेह, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, अश्मरी, मूढगर्भ और उदर ये—आठ महा रोग हैं। ये आठों रोग प्रकृति से ही कष्टसाध्य हैं ॥४॥

प्राणमांसक्षयः शोषस्त्रुष्णा च्छर्दिवर्नरस्तथा ॥५॥

अतीसारश्च मूच्छर्वा च हिक्का श्वासस्तथैव च ।

एतैरुपद्रवैर्जुष्टान् सर्वानेव विवर्जयेत् ॥६॥

प्राण एवं मांस से क्षीण रोगी को जब श्वास, तृष्णा, शोष, वमन, ज्वर, मूच्छर्वा, अतिसार, अथवा हिक्का रोग होता है, अथवा इनमें से कोई तीन रोग उपद्रव रूप हों तो—सफलता चाहनेवाले वैद्य को चाहिये कि इनका परित्याग कर दे ॥५,६॥

शूनं सुमस्वचं भरणं कम्पाधमाननिपीडितम् ।

नरं रुजार्तमन्तश्च वातव्याधिर्विनाशयेत् ॥७॥

वातव्याधि में—शोथादि उपद्रवयुक्त पुरुष को वातव्याधि नष्ट कर देती है। इसी प्रकार—सुप्त त्वचा (स्पर्श-ज्ञानशून्य) भ्रम (बायु के कारण टूटे), कम्प एवं आधमान से पीड़ित, गर्भार वेदना से व्याकुल पुरुष को वातव्याधि नष्ट कर देती है ॥

यथोक्तोपद्रवाविष्टमतिप्रसृतमेव वा ।

पिडकापीडितं गाढं प्रमेहो हन्ति मानवम् ॥८॥

यथोक्त उपद्रवों (कफ-जन्म मेहों में—मक्षिका उपसर्पण, पित्तजन्म में—वृषणावदारण, वातजन्म में हृदग्रह आदि) से युक्त, तथा-प्रतिदिन मूत्र का अतिस्राव करनेवाला शराविका-कच्छपिका आदि पिडकाओं से विशेष रूप में पीड़ित मनुष्य प्रमेहरोग से मरता है। उपद्रव-तृष्णातीसारज्वरदाहदौर्बल्या-रोचकाविपाकाः ॥८॥

प्रभिन्नप्रसृताङ्गं च रक्तनेत्रं हयस्वरम् ।

पञ्चकर्मगुणातीतं कुष्ठं हन्तीह कुष्ठिनम् ॥९॥

प्रभिन्न (विदीर्ण अङ्गोंवाले), प्रसृत (जिन अङ्गों से स्नाव बहता हो), लाल आँखोंवाले, जिसका स्वर नष्ट हो गया हो, जिस कुष्ठ रोगी में—वमन, विरेचन, रक्तावसेचन और शिरो-विरेचन—ये पंचकर्म फल न करें (अथवा—पंचम धातु अस्थि में स्थित कुष्ठ पर जब संशोधन, संशमन, गुग्गुलु आदि चिकित्सा लाभ नहीं करती) तो रोगी को कुष्ठ रोग नष्ट करता है ॥९॥

तृष्णारोचकशुलार्तमतिप्रसृतशोणितम् ।

शोफातीसारसंयुक्तमर्गोव्याधिर्विनाशयेत् ॥१०॥

अर्शरोग—तृष्णा, अरुचि तथा शूल से पीड़ित तथा जिसका रक्त बहुत बहता हो, शोफ एवं अतिसार से युक्त रोगी को अर्श रोग नष्ट करता है ॥१०॥

वातमूत्रपुरोषाणि क्रमयः शुक्रमेव च ।

भगन्दरात् प्रस्वन्नति यस्य तं परिवर्जयेत् ॥११॥

जिस भगन्दर रोगी के भगन्दर से वायु-मूत्र-मल-कृमि एवं शुक्र बहता है, वह रोगी नष्ट हो जाता है ॥११॥

प्रशूननाभिवृषणं रुद्धमूत्रं रुगन्वितम् ।

अश्मरी क्षपयत्याशु सिकता शर्करान्विता ॥१२॥

जिस रोगी की नाभि एवं वृषण सूज गये हों, मूत्र के रुकने से तीव्र वेदना हो रही हो, उसको सिकतामेह, शर्करारोग एवं अश्मरीरोग नष्ट कर देता है। (कई इसका अर्थ—शर्करा से मिश्रित बालुका के समान अश्मरी रोग नष्ट करते हैं) ॥१२॥

गर्भकोषपरासङ्को मक्कल्लो योनिसंवृतिः ।

हन्यात् क्षिप्रं मूढगर्भं यथोक्ताश्चाप्युपद्रवाः ॥१३॥

मूढगर्भ रोग में—गर्भाशय का जोर से बन्द हो जाना (या गर्भाशय का स्थान भ्रंश होकर बन्द होना), मक्कल्ल—(गर्भाशय में—प्रसवोत्तर-रक्त के रुक जाने से उत्पन्न वेदनायें), और योनि का संकुचित होना तथा मूढगर्भ में कहे कास-आक्षेप-श्वास आदि उपद्रवों का होना स्त्री को मार देता है ॥

पार्श्वभङ्गान्निविद्धेषोफातीसारपीडितम् ।

विरिक्तं पुर्यमाणं च वर्जयेदुदरादितम् ॥१४॥

उदररोग से पीड़ित रोगी को यदि पार्श्व भंग (पखवाड़ों का टूटना), भोजन में द्वेष, सूजन, अतिसार हो तथा विरेचन-द्रव्यों से बार बार रक्त होने पर भी फिर उदर भर जाता हो तो वह उदररोगी असाध्य है ॥१४॥

यस्ताम्यति विस्मञ्च श्रेते निपतितोऽपि वा ।

श्रीतादितोऽन्तरुणश्च ज्वरेण ज्ञियते नरः ॥१५॥

यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि संघातशूलवान् ।

नित्यं वक्त्रेण चोच्छूस्यात् ज्वरो हन्ति मानवम् ॥१६॥

हिक्काश्वासपिपासात् मूढं विभ्रान्तलोचनम् ।

संततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षपयति ज्वरः ॥१७॥

आविलाक्षं प्रताम्यन्तं निद्रायुक्तमतीव च ।

क्षीणशोणितमांसं च नरं नाजयति ज्वरः ॥१८॥

ज्वर—जो रोगी बार-बार मूर्च्छित हो जाता है, संसारहित हो जाता है, गिरते समय संसारहित हो जाता है, बाहर शीत से पीड़ित और अन्दर से उष्ण, इस प्रकार का रोगी ज्वर से मरता है। जिसके शरीर पर रोमांच होता हो, आँखें लाल हों, हृदय में तीव्र वेदना (पत्थर की चोट के समान) होती हो, मुख को ऊँचा उठाकर खोलकर श्वास लेता हो—वह रोगी ज्वर से मरता है। हिककी-श्वास तथा पिपासा से पीड़ित मूढ (मोह युक्त), जिसके नेत्र लगातार इधर-उधर चलते-फिरते हैं (अस्थिर दृष्टि), निरन्तर ऊर्ध्वश्वास लेनेवाले रोगी को ज्वर तत्क्षण मार देता है। जिस रोगी की आँखें गवराई हों, मोहयुक्त रहता हो, रात दिन नींद में पड़ा रहता हो, रक्त और मांस क्षीण हो गया हो—ऐसे रोगी को ज्वर नष्ट कर देता है ॥