सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुक्तसंहिता
[ अ० ३५ ]
श्वामशूलपिपासात् क्षीणं ज्वरनिपीडितम् ।
विशेषेण नरं वृद्धमतीसारो विनाशयेत् ॥१९॥
श्वास, शूल, पिपासा, साँस से क्षीण, ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को अतिसार एवं प्रवाहिका (पेचिश) नष्ट कर देते हैं ॥
शुक्लाश्रमन्तद्वेष्टारमूर्ध्वश्वसनपिपीडितम् ।
कृन्म्लेण बहु मेहनन् यद्ममा हन्तीह मानवम् ॥२०॥
औंखें श्वेत हो गईं हों, भोजन में द्वेष हो, ऊर्ध्वश्वस से पीड़ित हो, कष्टपूर्वक मात्रा में बहुत मूत्र का क्षरण करता हो (अतिशय मूत्र उत्पन्न होने से—मांस-रक्त का क्षय होता है) वह रोगी यद्ममा रोग से मरता है ॥२०॥
श्वामशूलपिपासान्तविद्वेषप्रन्थिमुद्गतः ।
भवन्ति दुर्बलत्वं च गुलिमनो मृत्युमेघतः ॥२१॥
गुल्म रोग से मरनेवाले रोगी में—श्वास, शूल, प्यास, भोजन में द्वेष, गुल्म का सहसा लीन हो जाना, तथा दुर्बलत्व उत्पन्न हो जाता है ॥२१॥
आधमात् बद्धनिष्कन्दं छिद्रिहिक्कातुडन्वितम् ।
रुजाश्वससमाविष्टं विद्रविनोजयेन्तरम् ॥२२॥
आधमान से युक्त, मल मूत्र-पूय आदि का अवरोध, वमन, हिचकी, प्यास, श्वासरोग से पीड़ित व्यक्ति को विद्रवि (अन्त-विद्रवि) नष्ट कर देती है ॥२२॥
पाण्डुदन्तनखो यश्च पाण्डुनेत्रश्च मानवः ।
पाण्डुसंधातदशीं च पाण्डुरोगी विनश्यति ॥२३॥
जिस पाण्डुरोगी के दाँत नख पीले पड़ गये हों, औंखें पीली हो गईं हों, सब द्रव्य श्वेत-पीले दिखाई देते हों, वह पाण्डुरोगी नष्ट हो जाता है ॥२३॥
लोहितं छद्वैयधस्तु बहुशो लोहितेक्षणः ।
रक्तानां च दिशां द्रष्टा रक्तपिप्ती विनश्यति ॥२४॥
जो रक्तपिप्ति रोगी बार-बार रक्त का वमन करता है, जिस की औंखें लाल हो गईं हों, दिशाओं में चारों ओर लाल-लाल ही रक्त देखता हो, वह रक्तपिप्ति रोगी नष्ट हो जाता है ॥२४॥
अवाङ्मुखस्तून्मुखो वा क्षीणमांसबलो नरः ।
जागरिण्णुरसदेहमुन्मादेन विनश्यति ॥२५॥
जिस उन्माद रोगी का मुख सदा नीचे रहता है, अथवा सदा ऊपर उठा रहता हो, मांस एवं शक्ति (उत्साह) क्षीण हो गई हो, निरन्तर जागता रहता हो, वह उन्मादरोगी निःसन्देह नष्ट होता है ॥२५॥
बहुगोऽपस्मरन्तं तु प्रक्षोणं चलितभुवम् ।
नेत्राभ्यां च विकृवाणमपस्मारो विनागयेत् ॥२६॥
जिस रोगी को बार-बार अपस्मार का वेग आता है, मांस एवं शक्ति क्षीण हो जाये, भ्रवें तिरछी हो जायें, औंखों से
तिरछा (विकृत रूप) देखता हो, वह अपस्मारी मर जाता है ॥ इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽवार्णयो नाम त्रयविंशतिसप्तमोऽध्यायः ॥३३॥
चतुर्द्विंशतिसप्तमोऽध्यायः
अथातो युक्तसेनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥३१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥३२॥
इसके आगे 'युक्तसेनीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने शुश्रुत के लिये कहा था ॥
वि० मन्तव्य—'युक्ता-सजीकृता सेना येन स युक्तमन्तव्यं हि तो युक्तसेनीयः तम्' अर्थात् जब सेना को तैयार करके राजा या सेनापति विजय के लिये चलता है तब उसकी रक्षा के जो उपाय करने चाहिये वे इस अध्याय में कहे हैं। सेना के साथ चिकित्सकों का रहना आवश्यक है ॥१,२॥
नृपतेर्युक्तसेनस्य परानभिजिगीषतः ।
भिषजा रक्षणं कार्यं यथा तदुपदेद्यते ॥३॥
विजिगीषुः सहामात्यैर्यात्रायुक्तः प्रयत्नतः ।
रक्षितव्यो विशेषेण विषादेव नराधिपः ॥४॥
चतुरङ्ग बलवाले राजा की, शत्रुओं को पराजित करने के लिये जाते समय जिस प्रकार से वैद्य की रक्षा करनी चाहिये वह कहते हैं। जीतने की इच्छा से अमात्य आदि पुरुषों के साथ राजा जब यात्रा करता है, तब वैद्य को चाहिये कि प्रयत्नपूर्वक आगन्तुक मृत्युओं से, खासकर—स्थान पर जङ्गल एवं कृत्रिम विषों से इनकी रक्षा करे ॥३,४॥
पन्थानमुदकं छायां भक्तं यवसमिन्धनम् ।
दूषयन्त्यरयस्तच्छ जानीयाच्छोध्यते तथा ॥५॥
तस्य लिङ्गं चिकित्सा च कल्पस्थाने प्रवद्व्यते ।
शत्रु लोग रास्तों (घोड़े आदि के) को, पानी को, छाया को, भक्त (भोजन) को, यवस (घोड़े आदि के तृण आदि) को, हन्धन को दूषित कर देते हैं, इस लिये वैद्य को चाहिये कि इनकी परीक्षा करके शोधन करे। इसके लक्षण और चिकित्सा को कल्पस्थान में कहेंगे ॥५॥
एकोत्तरं मृत्युशतमथर्वाणः प्रचक्षते ॥६॥
तत्रैकः कालमयुक्तः शेषा आगन्तवः स्मृताः ।
१ 'युक्तसेनीय'—सेना—चतुरंग बल, जिसकी सेना संग्राम के लिये नियुक्त है, ऐसे राजा की रक्षा का उपाय कहते हैं। क्योंकि आगे कल्पस्थान में कहेंगे कि "राज्ञोऽरिदो रोपवः प्रमादाव इत्यादि। शत्रु के देश में शत्रु तृण-धूल-पानी-वायु को दूषित कर देते हैं। अतः वैद्य को चाहिये इनसे राजा की रक्षा करे।