सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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अथर्ववेद को जाननेवाले व्यक्ति कहते हैं कि मृत्यु एक सौ एक हैं, वहाँ एक कालमृत्यु है, शेष सौ मृत्यु आगन्तुज (अकाल) मृत्यु हैं ॥ १ ॥
वि० मन्तव्य—१०१ प्राणियों में किसी एक प्राणी की कालमृत्यु होती है और १०० प्राणियों की रोग, विष, दुर्घटना तथा आत्महत्या आदि से मृत्यु हो जाती है, यथा—गाड़ी—कोई पुरानी होकर टूटती है तो कोई अन्यान्यकारणों से ( बाह्य बाहक दोष से अथवा मार्ग दोष आदि से ) पुरानी होने के पूर्व ही टूट जाती है। शरीर भी एक प्रकार की गाड़ी है। अकाल मृत्यु का अच्छा नाम है अपमृत्यु। शत का अर्थ भी केवल सौ नहीं, अपितु सैकड़ों-असंख्य है ॥ ६ ॥
दोषागन्तुजमृत्युभ्यो रसमन्त्रविगारदौ ।
रक्षेतो नृपतिं नित्यं यत्नौ वैद्यपुरोहितौ ॥ ७ ॥
रसशास्त्र ( Chemistry रसायनशास्त्र ) चतुर वैद्य एवं मन्त्रशास्त्र में दक्ष पुरोहित दोषों ( वातादि ) से एवं आगन्तुज ( विष चोट ) आदि मृत्युओं से राजा की यत्न पूर्वक रक्षा करें।
ब्रह्मा वेदाङ्गमष्टाङ्गमायुर्वेदमभाषत ।
पुरोहितमते तस्माद्वर्तत भिषगात्मवान् ॥ ८ ॥
वैद्य—वेदों के उपांग आयुर्वेद को पढ़ता है, और पुरोहित वेदों को पढ़ता है। ब्रह्मा ने वेदों के उपांग-अष्टांगवाले
१—मृत्यु दो प्रकार की हैं—एक कालमृत्यु और दूसरी अकालमृत्यु। क्योंकि दोनों प्रकार के वचन मिलते हैं। यथा—कालमृत्यु के पक्ष में—
(१) नाकाले त्रियते कश्चित् नास्ति मृत्युरकालजः ।
यो यस्मिन् त्रियते काले मृत्युकालः स तस्य हि ॥
(२) नाकाले त्रियते कश्चिद् किद्धः शरशतैरपि ।
कालप्राप्तस्य कोन्तेय ! वज्रायन्ते तृणात्यपि ॥
अकालमृत्यु के पक्ष में—
(१) यथा वर्षमकाले च यथा पुष्पं यथा फलम् ।
यथा स्याद् दोपनिर्वाणमकाले मरणं तथा ॥
(२) जलमनिर्वाणं शस्त्रं स्त्रियो राजकुलाणि च ।
अकालमृत्युयो ह्येते तेष्यो बिभ्यति पण्डिताः ॥
(३) कालः सुरैरपि वञ्चयितुं न शक्यो
वश्ये विधानमपमृत्युविनाशनाय ।
मृत्युर्भविष्यति कथंचन नापमृत्यु-
न्यर्थोस्तदा चरकसुश्रुतवानभटाद्याः ॥
(४) विषववातादिभिर्यद्द्वं दीपो वत्योर्विसंयुतः ।
निवस्यिते क्षणाहेहो तथैवागन्तुमृत्युभिः ॥
जिस प्रकार तेल और बत्ती से युक्त दीपक भी वायु के प्रबल श्वांकों से बुझ जाता है, उसी प्रकार आगन्तुज मृत्युओं के कारण मनुष्य मृत हो जाता है।
आयुर्वेद को कहा था—वैद्य उसको पढ़ता है। इसलिये बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि सदा पुरोहित की आज्ञा-सम्मति में रहकर कार्य करें, पुरोहित—वैद्य से श्रेष्ठ है।
वि० मन्तव्य—परन्तु वैद्य स्वयं भी आत्मवान् रहे अर्थात् अपने को प्रशस्त बनाये रहे, अपने विचार आदि का दृढ़ता-पूर्वक उपयोग-प्रयोग करता रहे। पुरोहित दैवव्यपाश्रय है और वैद्य युक्तिव्यपाश्रय होकर चिकित्सा तत्परता से करता रहे ॥ १ ॥
संकरः सर्ववर्णानां प्रणागो धर्मकर्मणाम् ।
प्रजातामपि चोच्छित्तिर्नृपत्यसन्हेतुतः ॥ ९ ॥
राजा के व्यसनों में फँसने के कारण—ब्राह्मण आदि वर्णों का संकर ( एकत्व ) उत्पन्न होता है सब ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ आदि आश्रम नष्ट हो जाते हैं सब ब्राह्मण आदि सब वर्णों के धर्मकार्य बिगड़ जाते हैं, प्रजाओं के-कृषि-पशुपालन-वाणिज्य आदि कार्यों का नाश हो जाता है।
वि० मन्तव्य—राजा मद्यपान आदि व्यसनों से स्वयं सत्त्वावजय ( मन पर विजय ) से अपनी रक्षा करता रहे ॥
पुरुषाणां नृपाणां च केवलं तुल्यमूर्तिता ।
आज्ञा त्यागः क्षमा धैर्यं विक्रमश्चाप्यमानुषः ॥ १० ॥
तस्माद्वैवमिवाभीर्दणं वाङ्मनःकमभिः शुभैः ।
चिन्तयेन्नृपतिं वैद्यः श्रेयांसीच्छन् विचक्षणः ॥ ११ ॥
राजाओं एवं अन्य पुरुषों में केवल आकृति की समानता होती है। राजाओं में—आज्ञा, त्याग, क्षमा, धैर्य और विक्रम ये दैवीगुण रहते दैवीगुण रहते हैं। इसलिये बुद्धिमान् वैद्य को चाहिए कि कल्याण की इच्छा से शुभ वाणी, शुभ मन एवं शुभ कार्यों से देवता के समान-सदा राजा की विन्ता करें ॥
स्कन्धावारे च महति राजगोहोदानन्तरम् ।
भवेत्सन्निहितो वैद्यः सर्वोपकरणान्वितः ॥ १२ ॥
तत्रस्थमेनं ध्वजवृक्षशःस्थ्यातिसमुच्छ्रितम् ।
उपसपेन्त्यमोहेन विषशल्यामयार्दिताः ॥ १३ ॥
स्वतन्त्रकुशलोऽन्येषु शास्त्रार्थेऽवबहिष्कृतः ।
वैद्यो ध्वज इवाभाति नृपतद्विषपूजितः ॥ १४ ॥
बड़े स्कन्धावार ( शिविर—सेनानिवेश ) में राजनिवास के समीप ही, शास्त्र, शार एवं औषध आदि उपकरणों से युक्त वैद्य का निवास हो। वहाँ पर ध्वज के समान यश एवं स्थाति से युक्त ( सर्वजनविदित ) रहते हुए वैद्य के पास, भूले भटके बिना विषपीड़ित ( जल्मी या घायल ) तथा रोगपीड़ित ( रोगी ) जन पहुँच जाते हैं। जो चिकित्सक—आयुर्वेद में कुशल ( निपुण ) होता है और ज्योतिष-कर्मकाण्ड आदि का भी थोड़ा बहुत जानकारी ( ज्ञाता ) होता है और राजा तथा चिकित्सकों द्वारा सम्मानित होता है वह वैद्य ध्वज ( राष्ट्रीय ध्वज ) के समान शोभा पाता है—दूर से दिखाई पड़ता है। फलतः सब कुलिया उसके पास जा सकते हैं ॥ १२-१४ ॥