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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३१ ]

यो वा मयूरकण्ठाभं विभूषं वह्निमोक्षते ।

आतुरस्य भवेन्मृत्युः स्वस्थो व्याधिमवाप्नुयात् ॥२३॥

दिन के समय तारे आदि ज्योतियों को जलता हुआ जो देखता है, रात्रि में जलते हुए सूर्य को, दिन में चमकते हुए चन्द्रमा के तेज को, बादलों के न होने पर—इन्द्रवज्रपुष, बिजली आदि को, निर्मल आकाश में बिजली को या घने काले बादलों को, आकाश को विमान, यान अथवा महलों से व्याप्त देखे और जो वायु एवं आकाश को मूर्तिमान देखता हो, पृथ्वी को—ध्रुवै—नीहार, एवं वस्त्र से आवृत जो देखता है, लोक को ग्रीष्म के बिना भी जलते हुए देखे, पानी में डूबते हुए लोक को देखे, अष्टापद (खेलने का खिलौना) आकारवाली रेखाओं से व्याप्त भूमि को जो देखे, सप्तर्षि तारों के साथ साथ अरुण्यती नक्षत्र को जो नहीं देखता, ध्रुव तारे को, आकाश गङ्गा को जो व्यक्ति नहीं देखते वे मरणासन हैं । ज्योस्त्रा, आदर्श (शीशे) और धूप में, पानी में जो रोगी अपनी छाया (प्रतिबिम्ब) को नहीं देखता, अथवा छाया को एक अङ्ग से हीन, या विकृतावस्था में या अन्य प्राणी की छाया को देखता है, कुत्ता, काक (कोवा), कङ्क (श्वेतचन्द्रश्वेतचरण१), गृध्र पक्षियों की, प्रेतों की, यक्षराक्षस की, पिशाच व साँप की, नागों की तथा देवयानियों की विकृत छाया को जो आदर्श आदि में देखते हैं, धूम्ररहित आग जो मोर के कण्ठ के समान देखता है, वह रोगी मर जाता है और स्वस्थ व्यक्ति रुग्ण हो जाता है ।

वि० मन्तव्य—इसके लिये देखिये वाग्भट शा० अ० १५—२३

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने पञ्चैन्द्रियार्थविप्रति-

पत्तिर्नाम त्रिगोऽध्यायः ॥३०॥

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातश्छायाविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'छाया विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था । 'छाया वर्ण' को दर्शाती है, और प्रभा वर्ण को प्रकाशित करती है ॥१,२॥

श्यावा लोहितिका नीला पीतिका वाऽपि मानवम् ।

अभिद्वन्ति यं छायाः स परासुरसंशयम् ॥३॥

१ 'कङ्कः स्यात् कङ्कमल्लाक्षो वाणपक्षाहृष्यकः ।

लोहपुष्पो दीर्घपाटः पक्षाघः पाण्डुवर्णभाक् ॥'

'सप्तर्षीणां समीपस्थां यो न पश्यत्यरुघतीम् ।

संवत्सरान्ते जन्तुः स पश्यत्येव महत्तमः ॥'

१ प्रभा और छाया में अन्तर है यथा—

श्याव (काली), लोहितिका (लाल), नीला (नीली), पीतिका (पीली) छाया जिस पुरुष में सद्गुण उत्पन्न हो जाती है, उसको मरणासन समझना चाहिये । 'नाऽच्छायो नाऽप्रभः कश्चिद् विरोधाश्चिद्द्वयन्ति हि । नृणां शुभाशुभोत्पत्तिं काले छायाः प्रभाश्रयाः' ॥३॥

हीरपकमते यस्य प्रभास्मृतिघृतिश्चियः ।

अकस्माद्यं भजन्ते वा स गतासुरसंशयम् ॥४॥

जिस पुरुष में से लज्जा चली जाती है, और प्रभा, धृति (नियतात्मिका बुद्धि), स्मृति (स्मरण) और श्री (कमनीयता) उपदेश आदि कारणों के बिना ही उत्पन्न हो जाती हैं, वह निश्चय से मरेगा ॥४॥

यस्याधरौघ्रः पतितः क्षिप्तश्चोर्ध्वं तथोत्तरः ।

उभौ वा जाम्बवाभासौ दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥५॥

आरक्ता दशना यस्य श्यावा वा स्युः पतन्ति वा ।

खञ्जनप्रतिमा वाऽपि तं गतायुषमादिशेत् ॥६॥

कृष्णा स्तब्धाऽवलिम्ना वा जिह्वा शून्ता च यस्य वै ।

कर्कशा वा भवेद्यस्य सोऽचिराद्विजहात्यसून् ॥७॥

कुटिला स्फुटिता वाऽपि शुष्का वा यस्य नासिका ।

अवस्फुरंजति मग्ना वा न स जीवति मानवः ॥८॥

संक्षिप्ते विषमे स्तब्धे रक्ते स्रस्ते च लोचने ।

स्यातां वा प्रसृते यस्य स गतायुर्नरो ध्रुवम् ॥९॥

केशाः सीमन्तिनो यस्य संक्षिप्ते विनते ध्रुवौ ।

लुन्तन्ति चाक्षिपद्माणि सोऽचिराद्याति मृत्यवे ॥१०॥

जिस पुरुष का निचला ओठ लटक जाय, ऊपर का चढ़-उठ जाये, अथवा दोनों ओठ जामुन के फल के समान काले हो जायें, उसका बचना कठिन है । जिस रोगी के दाँत लाल या काले पड़ जायें, अथवा गिर जायें, या खञ्जन पक्षी के गले के समान नीले पड़ जायें 'उसे मरा समझना चाहिये । जिस रोगी की जीभ काली पड़ जाये, जड़ हो जाये, अवलिम् (प्रमेह आदि में जैसे थूक से लिस्सी) हो—वह शीघ्र ही प्राणों को छोड़ देता है । जिस रोगी की नासिका कुटिल (टेढ़ी) हो जाये, स्फुटिता (फैल जाये), शुष्क हो जाये, या अवस्फुरित (शब्द करने लगे) या मग्ना (बैठ जाये) वह रोगी नहीं बचता । जिस पुरुष की आँखें रक्तकुन्ति हो जायें, ऊँची-नीची हो जायें, निश्चल-गतिरहित हो

'वर्णमाक्रामती छाया, प्रभा वर्णप्रकाशिनोः ।

आसन्ना लक्ष्यते छाया, प्रभा दूराच्च लक्ष्यते ॥'

वर्ण चार प्रकार के हैं—गौर, कृष्ण, श्याम और गौरश्याम । प्रभा सात प्रकार को है—रक्ता, पीता, सिता, श्यावा, हरिता, पाण्डुरा और असिता । छाया पाँच प्रकार की है—स्निग्धा, विमला, रूचा, मलिना, संक्षिप्ता ।

अ० ३१ ]

मूर्तस्थानम्

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जायें, लाल हो जायें—सस्त (नीचे गिर जायें अथोदृष्टि हो जाये) हो जाती हैं—उस मनुष्य को निश्चित रूप में गतायुष समझना चाहिये। जिस पुरुष के बाल सीमन्तवाले (मौग-बाल दो भागों में विभक्त) हो जाते हैं, जिस पुरुष की भुजें संकुचित एवं झुक जाती हैं, आँख की पलकों के बालों को जो नोचता है— वह शीघ्र ही मर जाता है ॥५—१०॥

नाहूरत्यन्नमास्यस्थं न धारयति यः शिरः ।

एकाग्रदृष्टिर्मुदात्मा सद्यः प्राणान् जहाति सः ॥११॥

बलवान् दुर्बलो वाऽपि संमोहं योऽधिगच्छति ।

उत्थाप्यमानो बहुशस्तं पक्षं भिषगादिशेत् ॥१२॥

उत्तानः सर्वदा शैते पादौ विकुरुते च यः ।

विप्रसारणशीलो वा न स जीवति मानवः ॥१३॥

शैतपादकरोच्छवासश्छिन्नोच्छवासश्च यो भवेत् ।

काकोच्छवासश्च यो मत्यस्तं धीरः परिवर्जयेत् ॥१४॥

निद्रा न छिद्यते यस्य यो वा जागर्ति सवेदा ।

मुहोद्धा वक्तुकामश्च प्रत्याख्येयः स जानता ॥५॥

उत्तरीष्टं च यो लिह्यादुत्कारांश्च करोति यः

प्रेतैर्वा भाषते सार्धं प्रेतरूपं समादिशेत् ॥१६॥

जो मनुष्य मुख में स्थित अन्न को नहीं निगलता, जो शिर को सीधा धारण नहीं करता (गर्दन गिरी रहती है), जिसकी दृष्टि स्थिर हो (पुतली इधर-उधर फिरे नहीं, वह मुदात्मा (जड़ रूपी मनुष्य) शीघ्र ही (उसी दिन) मर जाता है। जो बलवान् या दुर्बल मनुष्य बार-बार मूर्च्छित होता है, उठने पर (चेतन करने पर) भी फिर मूर्च्छित हो जाता है— उसकी आयु पूर्ण समझनी चाहिये (वह सात दिन में मर जाता है)। जो सदा पीठ के भार चित्त खोता हो, पाँवों को फैलाता-सिकोड़ता रहता हो, और पाँव को पसारनेवाला मनुष्य देर तक नहीं जीता। जिस रोगी के हाथ-पाँव और श्वास ये तीनों ठण्डे हो जायें, जो रक्त रक्तकर ऊंचा श्वास (गहरा) लेता है या जो कौवे के समान मुख फैलाकर श्वास लेता है, उसका त्याग कर देना चाहिये। जिसकी नींद ही समाप्त नहीं होती अथवा जो सदा जागता रहता है, बोलने के समय जिसको मूर्च्छा आ जाती है, उसे असाध्य समझना चाहिये। जो पुरुष ऊपर के ओठ को चाटता है, जिसको बार-बार उद्गार (डकार) आते हों, जो प्रेतों के साथ बात-चीत करता हो, उसको प्रेतरूप समझना चाहिये ॥११-१६॥

खेभ्यः सरोमकूपेभ्यो यस्य रक्तं प्रवर्तते ।

पुरुषस्याविषार्तस्य सद्यो जह्यात् स जीवितम् ॥१७॥

वाताघ्नौला तु हृदये यस्योर्ध्वमनुयायिनी ।

रुजात्रविद्वेषकरो स परासुरसंशयम् ॥१८॥

अनन्योपद्रवकृतः शोफः पादसमुत्थितः ।

पुरुषं हन्ति, नारीं तु मुखजो, गृह्यजो द्रयम् ॥१९॥

अतिसारो ज्वरो हिक्का छविः शूताण्डमेदता ।

श्रासिनः कासिनो वाऽपि यस्य तं क्षीणमादिशेत् ॥२०॥

स्वेदो दाहश्च बलवान् हिक्का श्रासश्च मानवम् ।

बलवन्तमपि प्राणैर्विगुञ्जन्ति न संशयः ॥२१॥

विष विकार के बिना जिस पुरुष के ऊपर-नीचे के सब छिद्रों से, सब रोमकूपों से रक्त बहता है, वह शीघ्र ही प्राणों का त्याग कर देता है। जिस पुरुष में ऊपर को चढ़नेवाली वायु ऊपर आकर हृदय में शिला के समान बन जाती है, जिससे पीड़ा एवं अन्न में विद्वेष उत्पन्न होता है, वह निश्चित रूप में मरनेवाला है१। शोफजन्म उपद्रवों (श्रास, पिपासा, दुर्बलता आदि) से शोफ पाँवों में उत्पन्न होकर पुरुष को नष्ट करता है, चेहरे पर शोफ होकर खी को मारता है, गृह्य भाग में उत्पन्न होने से खी-पुरुष दोनों को मारता है। श्रास या कास रोगी को जब अतिसार, ज्वर, हिक्की, वमन, अण्डकोष तथा विश्रुत में सृजन हो जाती है, तब उसको क्षीण-मरा समझना चाहिये। बलवान् पुरुष को भी जब प्रभूत, स्वेद, तीव्र दाह, हिक्की, श्रास उत्पन्न हो जाये, वह निश्चय से प्राणों से विमुक्त होगा (तीन रात में मर जायेगा) ॥१७-२१॥

इयावा जिह्वा भवेद्यस्य सन्धं चाक्षि निमज्जति ।

मुखं च जायते पूति यस्य तं परिवर्जयेत् ॥२२॥

वक्रत्रमापूर्यतेऽश्रूणां स्विद्यतश्चरणानुभौ ।

चक्षुश्चाकुलतां याति यमराष्टं गर्मिष्यतः ॥२३॥

अतिमात्रं लघूनि स्युर्गोत्राणि गुरुकाणि वा ।

यस्याक्स्मात् स विज्ञेयो गन्ता वैवस्वतलयम् ॥२४॥

पङ्कमत्स्यवसातैलघुतगन्धाश्च ये नराः ।

मृष्ट गन्धांश्च ये यान्ति गन्तारस्ते यमालयम् ॥२५॥

यूका ललाटमायान्ति बलि नाशन्ति वायसाः ।

येषां चापि रतिर्नास्ति यातारस्ते यमालयम् ॥२६॥

ज्वरातिसारशोफाः स्युयस्यान्योन्यावसादितः ।

श्रक्षीणबलमांसस्य नासो शक्यश्चिकित्सितुम् ॥२७॥

क्षीणस्य यस्य क्षुत्तुष्णे हृद्योर्मिष्टैर्हितस्था ।

न श्राभ्यतोऽन्तपातैश्च तस्य मृत्युरूपस्थितः ॥२८॥

प्रवाहिका शिरःशूलं काष्ठशूलं च दारुणम् ।

पिपासा बलहानिश्च तस्य मृत्युरूपस्थितः ॥२९॥

जिस पुरुष को जीम काली पङ्क जाये, जिसकी बाँईं आँख बैठ जाये, और जिसके मुख से दुर्गन्ध आने लगे, वह असाध्य है। जिसका चेहरा आँसुओं से भर जाता है, दोनों पाँव पसीने से तर हो जाते हैं, जिसकी आँखें व्याकुल रहती हैं, वह मरा समझना चाहिये। जिस पुरुष का शरीर एकदम से लघु (हल्का) या भारी हो जाता है, वह शीघ्र ही यमराज के यहाँ

१ 'वाताच्छी' शब्द से यहाँ पर वातव्याधि में कहा रोग समझना चाहिये। वायु ही शिला के समा बन जाती है।

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० ३१ ]

जायेगा। इसी प्रकार जिसका शरीर स्थूल या क्रुश रहसा हो जाता है, उसे भी मरणसन्त समझना चाहिये। कीचड़ मछली, वजा, तैल, घी की गन्ध या मरिच अथवा निर्मल दिव्य गन्ध जिनके शरीर में से आने लगती है, वे भी मरनेवाले हैं। जिनके माथे पर जूएँ फिरने लगेँ, जिसकी दी हुई बलि को कौए न खायें और जिसको कहीं भी शान्ति-मुख नहीं मिलता उसे (एक साल में) मरणसन्त समझना चाहिये। जिस पुरुष में परस्पर एक दूसरे के उपद्रवों के कारण ज्वर-अतिसार और रोगी का वल एवं मांस क्षीण हो गया हो-तो वह चिकित्सा के अयोग्य है। जिस क्षीण पुरुष की मूल एवं प्यास हृदय के प्रिय, मधुर एवं हितकारी खान-पान से भी नहीं शान्त होती, उसकी मृत्यु समीप में खड़ी समझनी चाहिये। जिस पुरुष को तीव्र प्रवाहिका, तीव्र शिरःशूल, तीव्र कोष्ठशूल, तीव्र पियासा हो एवं वल (उत्साह-शक्ति) क्षीण हो तो इन रोगियों का मृत्यु-काल आया समझना चाहिये ॥२२—२६॥

विषमैषोपचारणे कर्मभिश्च पुराकृतैः।

अनित्यत्वाच्च जन्तूनां जीवितं निधनं व्रजेत् ॥३०॥

मृत्यु का कारण—

विषमोपचार से (स्वाभाविक वल आदि भावों के विपरीत उपचार से), पूर्वजन्मकृत शरीरस्थापक कर्मों के क्षीण होने से, देहवारियों के अनित्य होने से जीवन का नाश होता है ॥३०॥

प्रेताः भूताः पिशाचाश्च रक्षासि विविधानि च ।

मरणाभिमुखं नित्यमुपसर्पन्ति मानवम् ॥३१॥

तानि भेषजवीर्याणि प्रतिध्वन्ति जिघासया ।

तस्मान्मोघाः क्रियाः सर्वा भवन्त्येव गतायुषाम् ॥३२॥

मरणसन्त रोगी के समीप प्रेत (डुर्गति प्राप्त प्राणी), भूत (यम के नौकर), पिशाच (मांस को खानेवाले), रावण आदि नाना प्रकार के बहुत से राक्षस आदि नित्य प्रति मारने की इच्छा से आते हैं। इसलिये ये औषधियों की शक्ति का नाश कर देते हैं, अतः सब प्रकार का चिकित्साकार्य निष्फल होता है। पहिले स्वयं कहा भी है—

“स स्थिरत्वान्महत्वाच्च धात्वनुक्रमणेन च ।

निहन्त्योषधवीर्याणि मंत्रान् दुष्टग्रहो यथा ॥” ३१, ३२ ॥

इति श्रीमुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने छायाविप्रतिपत्ति- नामैकत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥३१॥

१ चरक में इसी को इस प्रकार से स्पष्ट किया है— ज्वरातिसारी शोफान्ते, स्वययुर्वा तयोः क्षये । दुर्बलस्य विशेषेण, नरस्यान्ताय जायते ॥

द्वात्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातः स्वभावविप्रतिपत्तिमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'स्वभाव विप्रतिपत्ति' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिये कहा था।

वि० मन्तव्य—स्वभाव अर्थात् स्वाभाविक वर्ण आदि की विप्रतिपत्ति अर्थात् परिवर्तन-बदल जाना। यह भी अरिष्ट होता है ॥१, २॥

स्वभावसिद्धान्तां शरीरैकदेशानामन्यभावित्वं मरणाय । तद्यथा—शुक्लानां कृष्णत्वं, कृष्णानां शुक्लता, रक्तानामन्यवर्णत्वं, स्थिराणां मृदुत्वं, मृदूनां स्थिरता, चलानामचलत्वम्, अचलानां चलता, पृथूनां संक्षिप्तत्वं, संक्षिप्तानां पृथुता, दीर्घाणां ह्रस्वत्वं, ह्रस्वानां दीर्घता, अपतनधर्मिणां पतनधर्मित्वं, पतनधर्मिणामपतनधर्मित्व- मकस्मात्, शैत्यौष्ण्यस्नेहधरोद्भयप्रस्तम्भवैषण्यीवसादनं चाङ्गानाम् ॥३॥

प्रकृति से प्रसिद्ध-शरीर के एक भाग में स्थित अवयवों का—दूसरे रूप में परिवर्तित होना मृत्यु के लिये होता है। यथा—श्वेत (दांत आदि का) वस्तुओं का काला होना, (काली आंख की पुतली या बाल) वस्तुओं का श्वेत होना, लाल (होठ आदि) वस्तुओं का अन्य रङ्ग होना, कठोर (कठोर—अस्थि आदि) वस्तुओं का कोमल होना, मृदु (मांस-शोणित आदि) वस्तुओं का कठोर होना, चल (सन्धियों में) स्थिरता, अचल वस्तुओं (नासा आदि) में चलत्व (गति), पृथु-विस्तीर्ण (उर आदि) वस्तुओं में संकुचितपन, संक्षिप्त संकुचित (आंख की कनीनिका आदि) वस्तुओं में विस्तार का होना, दीर्घ (जंघा आदि) वस्तुओं का छोटा होना, छोटी वस्तुओं (ग्रीवा विश्रन आदि) का लम्बा होना, अपतनशील (नखादि) वस्तुओं का गिरना, गिरनेवाली वस्तुओं का (मूत्र-पूरुष-पिशा-णक आदि का) न गिरना, अकस्मात्-उष्ण स्वभाववाले हाथ-पाँव में ठण्डक आ जाना, फूलकार आदि में उष्णता, नयनतार-कादि स्निग्ध वस्तुओं में रुक्षता, त्वचा आदि रुक्ष वस्तुओं में स्निग्धता, अंगों में प्रस्तम्भ (स्तम्भ), विवर्णता (रङ्ग-परिवर्तन), अवसाद (शिथिलता) होना मृत्यु के लक्षण हैं ॥३॥

स्वेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरैकदेशानामवलस्तोत्क्षिप्तप्र- न्तावक्षिप्तपतितविमुक्तनिर्गतान्तगुरुलघुत्वानि, प्रवालवर्ण- व्यङ्गप्रादुर्भावो वाऽप्यकस्मात्, सिराणां च दर्शनं ललाटे नासावर्शे वा पिडकोत्पत्तिः, ललाटे वा प्रभातकाले, स्वेद- नेत्ररोगाद्विना वाऽश्रुप्रवृत्तिः, गोमयचूर्णप्रकाशस्य वारजसी- दर्शनमुत्तमाङ्ग्रे, निलयनं वा कपोतकङ्कूकाकप्रभृतीनां मृत्रपुरोषवृद्धिमुझानानां, लक्ष्मणाशो वा मुखानानां

७३२ ]

सूत्रस्थानम्

११९

स्तनमूलहृदयोः सु च शूलोत्पत्तयः, मध्ये शूनत्वमन्तेषु परिन्लायित्वं विपर्ययो वा, तथाऽर्धाग्रे श्वयथुः शोषोऽङ्गपक्षयोर्वा, नष्टहीनविकलविकृतस्वरता वा, विवर्ण-पुष्पप्रादुर्भावो वा दन्तमुखनखशरीरेषु, यस्य वाऽप्यु कम्पुरोपवेतांसि निमज्जन्ति, यस्य वा दृष्टिमण्डले भिन्नविकृतानि रूपाण्यालोक्यन्ते, स्नेहाभ्यक्तकेआङ्ग इव यो भाति, यश्च दुर्बलो भक्तृक्षेपातिसाराभ्यां पीड्यते, कासमानश्च तृष्णाभिभूतः, क्षीणश्छर्दिभक्तृक्षेपयुक्तः सफेन-पूथरुधिरोद्वामी हतस्वरः शूलाभिपन्नश्च मनुष्यः, शूनकर-चरणवदनः क्षीणोऽन्नद्वेपी क्षस्तपिण्डकांसपाणिपादो ज्वर-कासाभिभूतः, यस्तु पूर्वाह्ने मुक्तमपराह्ने छर्दयत्यविदग्ध-मतिसार्यते वा स श्वासान्निष्यते, बस्तवद्विलपन यश्च भूमौ पतति क्षस्तमुष्कः, स्तब्धमेद्वो भ्रमन्म्रीवः प्रनष्टमेह-नश्च मनुष्यः, प्राणिवशुष्यमाणहृदय आर्द्रशरीरः, यश्च लोष्ट लोष्टेनाभिहन्ति काष्ठं काष्ठेन, तृणानि वा छिन्नन्ति, अधरोष्ठं दग्धति, उत्तरोष्ठं वा लेहि, आलुञ्चति वा कर्णो केग्राश्च, देवद्विजगुरुसुहृद्वैयांश्च द्रेष्टि, यस्य वक्रानुव-क्रगा ग्रहा गर्हितस्थानगताः पीडयन्ति जन्मक्षं वा, यस्यो-ल्लाग्निभ्यामभिहन्त्यते होरा वा, गृह्दारगयनासनवाहन-मणिग्लोपकरणगर्हितलक्षणनिमित्तप्रादुर्भावो वेति ॥ ४ ॥

शरीर के अङ्गों का अपने स्वाभाविक स्थान से अवच्छस्त ( नीचे आना भू आदि का ), उक्षिप्त ( आँख आदि का ऊपर चढ़ना ), भ्रान्त ( आँख आदि का भ्रमण ), अवक्षिप्त ( तिरछा होना ), पतित ( शिरःश्रीवा आदि का गिरना ), विषुक्त ( सन्धि आदि का मोक्ष ), निर्गत ( जीभ-आँख का बाहर निकल आना ), अन्तर्गत ( आँख का अन्दर धँसना ), गुरु ( आँख पलकों का भारी होना ), लघुता ( बाहु-जंघा का हल्का होना ), या अचानक प्रवाल मूंगे के समान रङ्ग-वाले व्यञ्जनों का उत्पन्न होना मृत्यु का सूचक है । * अकस्मात् ललाट में सिरायेँ दीखने लगेँ, नासावंश में सहसा पिङ्का का उत्पन्न होना, प्रभातकाल में माथे पर पहीना आना, बिना नेत्र-रोग के आँखों से आँसू बहेँ, जिसके सिर पर गोबर के चूर्ण के समान प्रकाश अथवा गोबर के चूर्ण के समान धूल दिखाई देती है, जिसके सिर पर कबूतर, कोआ, कंक आदि पक्षी बैठें,

१ चरक में भी कहा है— धमनीनाममूर्ध्नि जाळमत्यर्थशोभनम् । ललाटे दश्यते यस्य षड्भिर्मासैर्मरिष्यति ॥ विम्बोविदुमवर्णाभि शक्रगोपप्रभाऽपि वा । नासावंशे भवेद् यस्य पिङ्का न स सिध्यति ॥ यस्य गोमयचूर्णार्धं चूर्ण मूर्द्धति जायते । सस्नेहै श्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम् ॥

भोजन न करने पर मूत्र-पुरीष की वृद्धि हो, भोजन करने पर मूत्र पुरीष में ह्रास हो, स्तनमूल-हृदय और उर में शूल उत्पन्न हो, शरीर के मध्य भाग में सूजन हो, हाथ-पाँव में शुष्कता, आधे शरीर में सूजन, आधे में शुष्कता, पक्षादं में ग्लान्ता, स्वर का नष्ट होना, स्वर का निर्बल होना, स्वर का विकल होना ( भर्गई आवाज ), स्वर का स्वाभाविक रूप में न रहना, दांत-मुख-नख एवं शरीर में विवर्णता एवं पुष्प का उत्पन्न होना, जिस रोगी का कफ, मल एवं शुक्र पानी में द्रव जाता है, जिस रोगी के दृष्टिमण्डल में नाना प्रकार के गाय, मैस आदि अथवा विकृत ( तीन सिर, तीन मुजा या एक हाथ आदि ) रूप दिखाई देते हैं, बिना तेल के सिर एवं शरीर तेल से चिकना प्रतीत हो, जो दुर्बल व्यक्ति अन्न-द्वेष तथा अतिसार से पीड़ित हो, खांसेते हुए तृष्णा से पीड़ित हो जावे, क्षीण हो, यदि वमन, भोजन में द्वेष हो, क्षाग मिश्रित रक्त का वमन करनेवाला, निर्बलस्वर एवं शूल से पीड़ित मनुष्य, हाथ-पाँव सूज गये हों—क्षीण, अन्न द्वेष करनेवाला, पिण्डलियाँ—कन्धे पाँव हाथ थक गये हों तथा ज्वर एवं कास से पीड़ित मनुष्य मर जाता है, जो कि पूर्वाह्ने में खाये भोजन का अपराह्न में वमन कर देता है, बिना पचा भोजन जिसका अतिसार में बाहर आता है, ये असाध्य हैं । ज्वर एवं कास से पीड़ित व्यक्ति श्वास रोग से मरता है ।

कसाई से मारा गया वकरा जिस प्रकार भूमि पर गिरते समय शब्द करता है, उस प्रकार का शब्द करनेवाला मनुष्य असा-य है । जिसके अण्डकोष स्थान से स्खलित हो जायें या जिसका शिरन स्तब्ध हो, जिसकी श्रीवा गिर गई अथवा जिसका शिरन अन्दर को घुस गया, वह मनुष्य असाध्य है ।

स्तन एवं लेप आदि करने पर जिस मनुष्य का शरीर तो गीला हो और हृदय-प्रथम शुष्क होने लगता है, वह ( पन्द्रह दिन में ) मर जाता है और जो पुरुष मिट्टी के ढेले से मिट्टी के ढेले को, लकड़ी से लकड़ी को मारता है, तिनकों को तोड़ता रहता है, निचले ओठ को काटता रहता है, ऊपर के ओठ को चाटता है, कानों को या बालों को खींचता रहता है; देवता-ब्राह्मण, गुरु, मित्र एवं वैद्य से जो द्वेष रखता है वह एक साल में मर जाता है । जिसके ग्रह पूर्वभुक्त राशि पर पुनः आ जाते हैं—वे वक्र ग्रह होते हैं, वक्र एवं अनुवक्र ग्रह जिस पुरुष के गर्हित स्थान पर आकर पीड़ा उत्पन्न करते हैं * । जिसके जन्म-

१. ग्रह-गति— “वक्रानुवक्रा कुटिला मन्दा मन्दतरा समा । तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधा गतिः ॥” १२ स्थान भावों के नाम— “लग्नं धनं सोदरश्च बन्धुः पुत्रो रिपुस्तथा ।

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३३ ]

नक्षत्र उल्का, अशनि द्वारा नष्ट होता है, जिसकी होरा (जन्म-राशि) उल्का-अशनि-तेजःपुञ्ज से नष्ट होता हो, या घर, स्त्री, शून्या, आसन, यान, वाहन, मणि, रत्न, उपकरणों (घट-पिठर आदि) के निन्दित लक्षणोंका प्रादुर्भाव होते हों वह असाध्य है वि० मन्तव्य—निन्दित लक्षणोंवाले—यह द्वारा आदि के प्रभाव से भी स्वामी की मृत्यु हो जाती है ॥ ४ ॥

भवन्ति चात्र—

चिकित्स्यमानः सम्यक् च विकारो योऽभिवर्धते ।

प्रक्षीणबलमांसस्य लक्षणं तद् गतायुषः ॥ ५ ॥

निवर्तते महाव्याधिः सहसा यस्य देहिनः ।

न चाहारफलं यस्य दृश्यते स विनश्यति ॥ ६ ॥

कहा भी है—

जो रोग भली प्रकार चिकित्सा करने पर भी बढ़ता ही जाता हो, रोगी का बल (उत्साह) और मांस निरन्तर क्षीण हो रहा हो तो वे लक्षण मरणासन्न रोगी के हैं, जिस पुरुष के महारोग (वातव्याधि, प्रमेह आदि आठ) सहसा अच्छे हो जाते हैं, और भोजन का कुछ भी फल शरीर में दिखाई न देता हो तो वह मनुष्य नष्ट हो जाता है ॥ ५, ६ ॥

एतान्यरिष्टरूपाणि सम्यग् बुध्यते यो भिषक् ।

साध्यासाध्यपरीक्षाणां स राज्ञः संमतो भवेत् ॥ ७ ॥

जो वैद्य अरिष्ट लक्षणों को भली प्रकार से जानता है, वह साथ असाध्य रोग की परीक्षा में राजा से प्रशंसित होता है—राजा इसकी सराहना करते हैं ।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में वर्णित अरिष्टों को सम्यक् जानने के लिये—वा० शा० अ० ५ तथा चरक इन्द्रिय स्थान समस्त देहिये ॥ ७ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने स्वभावविप्रतिपत्ति- नाम द्राक्षिशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥

भार्या च निवर्त धर्मः कर्म चायो व्ययस्तथा ॥’

१. अनिष्ट-निमित्त—

घर का गुम्बज गिरना, स्त्रियों का पशु आदि करना, हंसती-गाती चार-पाँच कन्याओं का युगपत् पैदा होना, खट्वा और आसन का सहसा गिरना-नष्ट होना, यान की ध्वजा पर कोई आदि का गिरना, वाहन (पशु आदि) का रोना, मणिरत्न आदिका निष्प्रभ होना ।

विस्तार के लिये—महाभारत के भीष्म-विराट पर्व देखने चाहिए ।

“नीललोहितपीतश्च भवत्यनिर्हुतो द्विजैः ।

वामाच्छिदुं धृणन्श्च मुञ्चन् वै दारुणं स्वनम् ॥”

त्रयस्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातोऽवारणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

अब ‘अवारणीय’ नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था । आयु-वैद में असाध्य रोगों की पहिचान चार प्रकार की बताई है । यथा—काल, स्वभाव, रिष्ट और उपद्रव । इनमें काल-स्वभाव का संक्षेप में वर्णन करके भी आगे करेंगे, रिष्ट लक्षण कह दिये, अतः अब उपद्रवों के लक्षणों को कहते हैं ।

वि० मन्तव्य—जिन उपद्रव-लक्षणों के उत्पन्न होने पर मृत्यु का निवारण (निरोध) नहीं किया जा सकता ॥ १, २ ॥

उपद्रवैस्तु ये जुष्टा व्याधयो यान्त्यवार्थताम् ।

रसायनाद्विना वत्स ! तान् श्रृण्वेकमना मम ॥ ३ ॥

हे वत्स सुश्रुत ! उपद्रवों से युक्त जो रोग रसायन के बिना स्वस्थ नहीं होते उन रोगों का नामसंकीर्त्तन एकमन से सुनो ।

वि० मन्तव्य—केवल रसायन सेवन से जिनका निवारण (निराकरण या निरोध) हो सकता है । केवल व्याधि विपरीत चिकित्सा से निवारण नहीं होता । रसायन सेवन से प्रशस्त-विशुद्ध रस, रक्त एवं मांस आदि घातुओं का लाभ (उत्पत्ति एवं वृद्धि) होता है, फलतः बल लाभ होता है “बलाधिष्ठानम् आरोग्यम्” के अनुसार आरोग्य लाभ हो जाता है । और रस अर्थात् पारदवाले औषध भी रसायन कहे जाते हैं । उनके लिये रस-शास्त्रों में कहा है कि अन्य सब औषधियाँ साथ रोगों में लाभ करती हैं, परन्तु—‘असाध्येष्वपि दातव्यो रसोऽतः श्रेष्ठ उच्यते ।’ पारद का प्रयोग असाध्य रोगों पर भी किया जा सकता है, अतः वह अन्य औषधियों से श्रेष्ठ है । यथा—सन्निपात ज्वर में विहित मांसरस, शोथ में दुग्ध, ग्रहणी रोग में तक्र, दधि एवं दूध, यक्ष्मा में अजामांस आदि का प्रयोग और साथमें मकरध्वज, स्वर्ण पर्पटी आदि पर्पटी, तथा वसन्त मालती आदि का प्रयोग ॥ ३ ॥

वातव्याधिः प्रमेहश्च कुष्ठमशो भगन्दरम् ।

अश्मरी मूढगर्भश्च तथैवोदरमष्टमम् ॥ ४ ॥

१. उपद्रव का लक्षण—

यः पूर्वोत्पन्नं व्याधिं जघन्यकालजातो व्याधिर्लपयुजति स तन्मूल एवोपद्रवसंज्ञः ॥

२. उपद्रवस्तु खलु रोगोत्तरकालजो रोगाश्रयो रोग एव स्थूलोऽणुर्वा रोगोत्पश्चाज्जायत इति उपद्रवसंज्ञः ।

अ० २३ ]

१६

सूत्रस्थानम्

१२६

अष्टावेते प्रकृत्यैव दुश्चिकित्स्या महागदाः ।

वातव्याधि, प्रमेह, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, अश्मरी, मूढगर्भ और उदर ये—आठ महा रोग हैं। ये आठों रोग प्रकृति से ही कष्टसाध्य हैं ॥४॥

प्राणमांसक्षयः शोषस्त्रुष्णा च्छर्दिवर्नरस्तथा ॥५॥

अतीसारश्च मूच्छर्वा च हिक्का श्वासस्तथैव च ।

एतैरुपद्रवैर्जुष्टान् सर्वानेव विवर्जयेत् ॥६॥

प्राण एवं मांस से क्षीण रोगी को जब श्वास, तृष्णा, शोष, वमन, ज्वर, मूच्छर्वा, अतिसार, अथवा हिक्का रोग होता है, अथवा इनमें से कोई तीन रोग उपद्रव रूप हों तो—सफलता चाहनेवाले वैद्य को चाहिये कि इनका परित्याग कर दे ॥५,६॥

शूनं सुमस्वचं भरणं कम्पाधमाननिपीडितम् ।

नरं रुजार्तमन्तश्च वातव्याधिर्विनाशयेत् ॥७॥

वातव्याधि में—शोथादि उपद्रवयुक्त पुरुष को वातव्याधि नष्ट कर देती है। इसी प्रकार—सुप्त त्वचा (स्पर्श-ज्ञानशून्य) भ्रम (बायु के कारण टूटे), कम्प एवं आधमान से पीड़ित, गर्भार वेदना से व्याकुल पुरुष को वातव्याधि नष्ट कर देती है ॥

यथोक्तोपद्रवाविष्टमतिप्रसृतमेव वा ।

पिडकापीडितं गाढं प्रमेहो हन्ति मानवम् ॥८॥

यथोक्त उपद्रवों (कफ-जन्म मेहों में—मक्षिका उपसर्पण, पित्तजन्म में—वृषणावदारण, वातजन्म में हृदग्रह आदि) से युक्त, तथा-प्रतिदिन मूत्र का अतिस्राव करनेवाला शराविका-कच्छपिका आदि पिडकाओं से विशेष रूप में पीड़ित मनुष्य प्रमेहरोग से मरता है। उपद्रव-तृष्णातीसारज्वरदाहदौर्बल्या-रोचकाविपाकाः ॥८॥

प्रभिन्नप्रसृताङ्गं च रक्तनेत्रं हयस्वरम् ।

पञ्चकर्मगुणातीतं कुष्ठं हन्तीह कुष्ठिनम् ॥९॥

प्रभिन्न (विदीर्ण अङ्गोंवाले), प्रसृत (जिन अङ्गों से स्नाव बहता हो), लाल आँखोंवाले, जिसका स्वर नष्ट हो गया हो, जिस कुष्ठ रोगी में—वमन, विरेचन, रक्तावसेचन और शिरो-विरेचन—ये पंचकर्म फल न करें (अथवा—पंचम धातु अस्थि में स्थित कुष्ठ पर जब संशोधन, संशमन, गुग्गुलु आदि चिकित्सा लाभ नहीं करती) तो रोगी को कुष्ठ रोग नष्ट करता है ॥९॥

तृष्णारोचकशुलार्तमतिप्रसृतशोणितम् ।

शोफातीसारसंयुक्तमर्गोव्याधिर्विनाशयेत् ॥१०॥

अर्शरोग—तृष्णा, अरुचि तथा शूल से पीड़ित तथा जिसका रक्त बहुत बहता हो, शोफ एवं अतिसार से युक्त रोगी को अर्श रोग नष्ट करता है ॥१०॥

वातमूत्रपुरोषाणि क्रमयः शुक्रमेव च ।

भगन्दरात् प्रस्वन्नति यस्य तं परिवर्जयेत् ॥११॥

जिस भगन्दर रोगी के भगन्दर से वायु-मूत्र-मल-कृमि एवं शुक्र बहता है, वह रोगी नष्ट हो जाता है ॥११॥

प्रशूननाभिवृषणं रुद्धमूत्रं रुगन्वितम् ।

अश्मरी क्षपयत्याशु सिकता शर्करान्विता ॥१२॥

जिस रोगी की नाभि एवं वृषण सूज गये हों, मूत्र के रुकने से तीव्र वेदना हो रही हो, उसको सिकतामेह, शर्करारोग एवं अश्मरीरोग नष्ट कर देता है। (कई इसका अर्थ—शर्करा से मिश्रित बालुका के समान अश्मरी रोग नष्ट करते हैं) ॥१२॥

गर्भकोषपरासङ्को मक्कल्लो योनिसंवृतिः ।

हन्यात् क्षिप्रं मूढगर्भं यथोक्ताश्चाप्युपद्रवाः ॥१३॥

मूढगर्भ रोग में—गर्भाशय का जोर से बन्द हो जाना (या गर्भाशय का स्थान भ्रंश होकर बन्द होना), मक्कल्ल—(गर्भाशय में—प्रसवोत्तर-रक्त के रुक जाने से उत्पन्न वेदनायें), और योनि का संकुचित होना तथा मूढगर्भ में कहे कास-आक्षेप-श्वास आदि उपद्रवों का होना स्त्री को मार देता है ॥

पार्श्वभङ्गान्निविद्धेषोफातीसारपीडितम् ।

विरिक्तं पुर्यमाणं च वर्जयेदुदरादितम् ॥१४॥

उदररोग से पीड़ित रोगी को यदि पार्श्व भंग (पखवाड़ों का टूटना), भोजन में द्वेष, सूजन, अतिसार हो तथा विरेचन-द्रव्यों से बार बार रक्त होने पर भी फिर उदर भर जाता हो तो वह उदररोगी असाध्य है ॥१४॥

यस्ताम्यति विस्मञ्च श्रेते निपतितोऽपि वा ।

श्रीतादितोऽन्तरुणश्च ज्वरेण ज्ञियते नरः ॥१५॥

यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि संघातशूलवान् ।

नित्यं वक्त्रेण चोच्छूस्यात् ज्वरो हन्ति मानवम् ॥१६॥

हिक्काश्वासपिपासात् मूढं विभ्रान्तलोचनम् ।

संततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षपयति ज्वरः ॥१७॥

आविलाक्षं प्रताम्यन्तं निद्रायुक्तमतीव च ।

क्षीणशोणितमांसं च नरं नाजयति ज्वरः ॥१८॥

ज्वर—जो रोगी बार-बार मूर्च्छित हो जाता है, संसारहित हो जाता है, गिरते समय संसारहित हो जाता है, बाहर शीत से पीड़ित और अन्दर से उष्ण, इस प्रकार का रोगी ज्वर से मरता है। जिसके शरीर पर रोमांच होता हो, आँखें लाल हों, हृदय में तीव्र वेदना (पत्थर की चोट के समान) होती हो, मुख को ऊँचा उठाकर खोलकर श्वास लेता हो—वह रोगी ज्वर से मरता है। हिककी-श्वास तथा पिपासा से पीड़ित मूढ (मोह युक्त), जिसके नेत्र लगातार इधर-उधर चलते-फिरते हैं (अस्थिर दृष्टि), निरन्तर ऊर्ध्वश्वास लेनेवाले रोगी को ज्वर तत्क्षण मार देता है। जिस रोगी की आँखें गवराई हों, मोहयुक्त रहता हो, रात दिन नींद में पड़ा रहता हो, रक्त और मांस क्षीण हो गया हो—ऐसे रोगी को ज्वर नष्ट कर देता है ॥

१२२

मुक्तसंहिता

[ अ० ३५ ]

श्वामशूलपिपासात् क्षीणं ज्वरनिपीडितम् ।

विशेषेण नरं वृद्धमतीसारो विनाशयेत् ॥१९॥

श्वास, शूल, पिपासा, साँस से क्षीण, ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को अतिसार एवं प्रवाहिका (पेचिश) नष्ट कर देते हैं ॥

शुक्लाश्रमन्तद्वेष्टारमूर्ध्वश्वसनपिपीडितम् ।

कृन्म्लेण बहु मेहनन् यद्ममा हन्तीह मानवम् ॥२०॥

औंखें श्वेत हो गईं हों, भोजन में द्वेष हो, ऊर्ध्वश्वस से पीड़ित हो, कष्टपूर्वक मात्रा में बहुत मूत्र का क्षरण करता हो (अतिशय मूत्र उत्पन्न होने से—मांस-रक्त का क्षय होता है) वह रोगी यद्ममा रोग से मरता है ॥२०॥

श्वामशूलपिपासान्तविद्वेषप्रन्थिमुद्गतः ।

भवन्ति दुर्बलत्वं च गुलिमनो मृत्युमेघतः ॥२१॥

गुल्म रोग से मरनेवाले रोगी में—श्वास, शूल, प्यास, भोजन में द्वेष, गुल्म का सहसा लीन हो जाना, तथा दुर्बलत्व उत्पन्न हो जाता है ॥२१॥

आधमात् बद्धनिष्कन्दं छिद्रिहिक्कातुडन्वितम् ।

रुजाश्वससमाविष्टं विद्रविनोजयेन्तरम् ॥२२॥

आधमान से युक्त, मल मूत्र-पूय आदि का अवरोध, वमन, हिचकी, प्यास, श्वासरोग से पीड़ित व्यक्ति को विद्रवि (अन्त-विद्रवि) नष्ट कर देती है ॥२२॥

पाण्डुदन्तनखो यश्च पाण्डुनेत्रश्च मानवः ।

पाण्डुसंधातदशीं च पाण्डुरोगी विनश्यति ॥२३॥

जिस पाण्डुरोगी के दाँत नख पीले पड़ गये हों, औंखें पीली हो गईं हों, सब द्रव्य श्वेत-पीले दिखाई देते हों, वह पाण्डुरोगी नष्ट हो जाता है ॥२३॥

लोहितं छद्वैयधस्तु बहुशो लोहितेक्षणः ।

रक्तानां च दिशां द्रष्टा रक्तपिप्ती विनश्यति ॥२४॥

जो रक्तपिप्ति रोगी बार-बार रक्त का वमन करता है, जिस की औंखें लाल हो गईं हों, दिशाओं में चारों ओर लाल-लाल ही रक्त देखता हो, वह रक्तपिप्ति रोगी नष्ट हो जाता है ॥२४॥

अवाङ्मुखस्तून्मुखो वा क्षीणमांसबलो नरः ।

जागरिण्णुरसदेहमुन्मादेन विनश्यति ॥२५॥

जिस उन्माद रोगी का मुख सदा नीचे रहता है, अथवा सदा ऊपर उठा रहता हो, मांस एवं शक्ति (उत्साह) क्षीण हो गई हो, निरन्तर जागता रहता हो, वह उन्मादरोगी निःसन्देह नष्ट होता है ॥२५॥

बहुगोऽपस्मरन्तं तु प्रक्षोणं चलितभुवम् ।

नेत्राभ्यां च विकृवाणमपस्मारो विनागयेत् ॥२६॥

जिस रोगी को बार-बार अपस्मार का वेग आता है, मांस एवं शक्ति क्षीण हो जाये, भ्रवें तिरछी हो जायें, औंखों से

तिरछा (विकृत रूप) देखता हो, वह अपस्मारी मर जाता है ॥ इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थानेऽवार्णयो नाम त्रयविंशतिसप्तमोऽध्यायः ॥३३॥

चतुर्द्विंशतिसप्तमोऽध्यायः

अथातो युक्तसेनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥३१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥३२॥

इसके आगे 'युक्तसेनीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने शुश्रुत के लिये कहा था ॥

वि० मन्तव्य—'युक्ता-सजीकृता सेना येन स युक्तमन्तव्यं हि तो युक्तसेनीयः तम्' अर्थात् जब सेना को तैयार करके राजा या सेनापति विजय के लिये चलता है तब उसकी रक्षा के जो उपाय करने चाहिये वे इस अध्याय में कहे हैं। सेना के साथ चिकित्सकों का रहना आवश्यक है ॥१,२॥

नृपतेर्युक्तसेनस्य परानभिजिगीषतः ।

भिषजा रक्षणं कार्यं यथा तदुपदेद्यते ॥३॥

विजिगीषुः सहामात्यैर्यात्रायुक्तः प्रयत्नतः ।

रक्षितव्यो विशेषेण विषादेव नराधिपः ॥४॥

चतुरङ्ग बलवाले राजा की, शत्रुओं को पराजित करने के लिये जाते समय जिस प्रकार से वैद्य की रक्षा करनी चाहिये वह कहते हैं। जीतने की इच्छा से अमात्य आदि पुरुषों के साथ राजा जब यात्रा करता है, तब वैद्य को चाहिये कि प्रयत्नपूर्वक आगन्तुक मृत्युओं से, खासकर—स्थान पर जङ्गल एवं कृत्रिम विषों से इनकी रक्षा करे ॥३,४॥

पन्थानमुदकं छायां भक्तं यवसमिन्धनम् ।

दूषयन्त्यरयस्तच्छ जानीयाच्छोध्यते तथा ॥५॥

तस्य लिङ्गं चिकित्सा च कल्पस्थाने प्रवद्व्यते ।

शत्रु लोग रास्तों (घोड़े आदि के) को, पानी को, छाया को, भक्त (भोजन) को, यवस (घोड़े आदि के तृण आदि) को, हन्धन को दूषित कर देते हैं, इस लिये वैद्य को चाहिये कि इनकी परीक्षा करके शोधन करे। इसके लक्षण और चिकित्सा को कल्पस्थान में कहेंगे ॥५॥

एकोत्तरं मृत्युशतमथर्वाणः प्रचक्षते ॥६॥

तत्रैकः कालमयुक्तः शेषा आगन्तवः स्मृताः ।

१ 'युक्तसेनीय'—सेना—चतुरंग बल, जिसकी सेना संग्राम के लिये नियुक्त है, ऐसे राजा की रक्षा का उपाय कहते हैं। क्योंकि आगे कल्पस्थान में कहेंगे कि "राज्ञोऽरिदो रोपवः प्रमादाव इत्यादि। शत्रु के देश में शत्रु तृण-धूल-पानी-वायु को दूषित कर देते हैं। अतः वैद्य को चाहिये इनसे राजा की रक्षा करे।

अ० १४ ]

सूत्रस्थानम्

१२३

अथर्ववेद को जाननेवाले व्यक्ति कहते हैं कि मृत्यु एक सौ एक हैं, वहाँ एक कालमृत्यु है, शेष सौ मृत्यु आगन्तुज (अकाल) मृत्यु हैं ॥ १ ॥

वि० मन्तव्य—१०१ प्राणियों में किसी एक प्राणी की कालमृत्यु होती है और १०० प्राणियों की रोग, विष, दुर्घटना तथा आत्महत्या आदि से मृत्यु हो जाती है, यथा—गाड़ी—कोई पुरानी होकर टूटती है तो कोई अन्यान्यकारणों से ( बाह्य बाहक दोष से अथवा मार्ग दोष आदि से ) पुरानी होने के पूर्व ही टूट जाती है। शरीर भी एक प्रकार की गाड़ी है। अकाल मृत्यु का अच्छा नाम है अपमृत्यु। शत का अर्थ भी केवल सौ नहीं, अपितु सैकड़ों-असंख्य है ॥ ६ ॥

दोषागन्तुजमृत्युभ्यो रसमन्त्रविगारदौ ।

रक्षेतो नृपतिं नित्यं यत्नौ वैद्यपुरोहितौ ॥ ७ ॥

रसशास्त्र ( Chemistry रसायनशास्त्र ) चतुर वैद्य एवं मन्त्रशास्त्र में दक्ष पुरोहित दोषों ( वातादि ) से एवं आगन्तुज ( विष चोट ) आदि मृत्युओं से राजा की यत्न पूर्वक रक्षा करें।

ब्रह्मा वेदाङ्गमष्टाङ्गमायुर्वेदमभाषत ।

पुरोहितमते तस्माद्वर्तत भिषगात्मवान् ॥ ८ ॥

वैद्य—वेदों के उपांग आयुर्वेद को पढ़ता है, और पुरोहित वेदों को पढ़ता है। ब्रह्मा ने वेदों के उपांग-अष्टांगवाले

१—मृत्यु दो प्रकार की हैं—एक कालमृत्यु और दूसरी अकालमृत्यु। क्योंकि दोनों प्रकार के वचन मिलते हैं। यथा—कालमृत्यु के पक्ष में—

(१) नाकाले त्रियते कश्चित् नास्ति मृत्युरकालजः ।

यो यस्मिन् त्रियते काले मृत्युकालः स तस्य हि ॥

(२) नाकाले त्रियते कश्चिद् किद्धः शरशतैरपि ।

कालप्राप्तस्य कोन्तेय ! वज्रायन्ते तृणात्यपि ॥

अकालमृत्यु के पक्ष में—

(१) यथा वर्षमकाले च यथा पुष्पं यथा फलम् ।

यथा स्याद् दोपनिर्वाणमकाले मरणं तथा ॥

(२) जलमनिर्वाणं शस्त्रं स्त्रियो राजकुलाणि च ।

अकालमृत्युयो ह्येते तेष्यो बिभ्यति पण्डिताः ॥

(३) कालः सुरैरपि वञ्चयितुं न शक्यो

वश्ये विधानमपमृत्युविनाशनाय ।

मृत्युर्भविष्यति कथंचन नापमृत्यु-

न्यर्थोस्तदा चरकसुश्रुतवानभटाद्याः ॥

(४) विषववातादिभिर्यद्द्वं दीपो वत्योर्विसंयुतः ।

निवस्यिते क्षणाहेहो तथैवागन्तुमृत्युभिः ॥

जिस प्रकार तेल और बत्ती से युक्त दीपक भी वायु के प्रबल श्वांकों से बुझ जाता है, उसी प्रकार आगन्तुज मृत्युओं के कारण मनुष्य मृत हो जाता है।

आयुर्वेद को कहा था—वैद्य उसको पढ़ता है। इसलिये बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि सदा पुरोहित की आज्ञा-सम्मति में रहकर कार्य करें, पुरोहित—वैद्य से श्रेष्ठ है।

वि० मन्तव्य—परन्तु वैद्य स्वयं भी आत्मवान् रहे अर्थात् अपने को प्रशस्त बनाये रहे, अपने विचार आदि का दृढ़ता-पूर्वक उपयोग-प्रयोग करता रहे। पुरोहित दैवव्यपाश्रय है और वैद्य युक्तिव्यपाश्रय होकर चिकित्सा तत्परता से करता रहे ॥ १ ॥

संकरः सर्ववर्णानां प्रणागो धर्मकर्मणाम् ।

प्रजातामपि चोच्छित्तिर्नृपत्यसन्हेतुतः ॥ ९ ॥

राजा के व्यसनों में फँसने के कारण—ब्राह्मण आदि वर्णों का संकर ( एकत्व ) उत्पन्न होता है सब ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ आदि आश्रम नष्ट हो जाते हैं सब ब्राह्मण आदि सब वर्णों के धर्मकार्य बिगड़ जाते हैं, प्रजाओं के-कृषि-पशुपालन-वाणिज्य आदि कार्यों का नाश हो जाता है।

वि० मन्तव्य—राजा मद्यपान आदि व्यसनों से स्वयं सत्त्वावजय ( मन पर विजय ) से अपनी रक्षा करता रहे ॥

पुरुषाणां नृपाणां च केवलं तुल्यमूर्तिता ।

आज्ञा त्यागः क्षमा धैर्यं विक्रमश्चाप्यमानुषः ॥ १० ॥

तस्माद्वैवमिवाभीर्दणं वाङ्मनःकमभिः शुभैः ।

चिन्तयेन्नृपतिं वैद्यः श्रेयांसीच्छन् विचक्षणः ॥ ११ ॥

राजाओं एवं अन्य पुरुषों में केवल आकृति की समानता होती है। राजाओं में—आज्ञा, त्याग, क्षमा, धैर्य और विक्रम ये दैवीगुण रहते दैवीगुण रहते हैं। इसलिये बुद्धिमान् वैद्य को चाहिए कि कल्याण की इच्छा से शुभ वाणी, शुभ मन एवं शुभ कार्यों से देवता के समान-सदा राजा की विन्ता करें ॥

स्कन्धावारे च महति राजगोहोदानन्तरम् ।

भवेत्सन्निहितो वैद्यः सर्वोपकरणान्वितः ॥ १२ ॥

तत्रस्थमेनं ध्वजवृक्षशःस्थ्यातिसमुच्छ्रितम् ।

उपसपेन्त्यमोहेन विषशल्यामयार्दिताः ॥ १३ ॥

स्वतन्त्रकुशलोऽन्येषु शास्त्रार्थेऽवबहिष्कृतः ।

वैद्यो ध्वज इवाभाति नृपतद्विषपूजितः ॥ १४ ॥

बड़े स्कन्धावार ( शिविर—सेनानिवेश ) में राजनिवास के समीप ही, शास्त्र, शार एवं औषध आदि उपकरणों से युक्त वैद्य का निवास हो। वहाँ पर ध्वज के समान यश एवं स्थाति से युक्त ( सर्वजनविदित ) रहते हुए वैद्य के पास, भूले भटके बिना विषपीड़ित ( जल्मी या घायल ) तथा रोगपीड़ित ( रोगी ) जन पहुँच जाते हैं। जो चिकित्सक—आयुर्वेद में कुशल ( निपुण ) होता है और ज्योतिष-कर्मकाण्ड आदि का भी थोड़ा बहुत जानकारी ( ज्ञाता ) होता है और राजा तथा चिकित्सकों द्वारा सम्मानित होता है वह वैद्य ध्वज ( राष्ट्रीय ध्वज ) के समान शोभा पाता है—दूर से दिखाई पड़ता है। फलतः सब कुलिया उसके पास जा सकते हैं ॥ १२-१४ ॥

११४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३५ ]

वैद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भेषजं परिचारकः । एते पादाश्चिकित्सायाः कर्मसाधनहेतवः ॥ १५ ॥ गुणवद्भिः पादैश्चतुर्थो गुणवान् भिषक् । व्याधिसत्त्वेन कालेन महान्तमपि साधयेत् ॥ १६ ॥ चिकित्सा के चार पाद हैं—१—वैद्य, २—रोगी, ३— औषध ( एवं उपकरण ) तथा ४—परिचारक । यह चारों चिकित्सा की सफलता के हेतु ( कारण ) हैं ।

निम्नलिखित गुणों से युक्त रोगी, औषध तथा परिचारक के साथ साथ निम्नलिखित गुणों से युक्त चौथा पाद अर्थात् वैद्य बड़े से बड़े रोग को भी थोड़े समय में सिद्ध कर लेता है— नष्ट कर देता है ॥ १५, १६ ॥

वैद्यहीनाश्चयः पादा गुणवन्तोऽप्यप्यर्थकाः ।

उद्गातृहोतृब्रह्मणो यथाऽध्वर्युं विनाऽध्वरे ॥ १७ ॥

वैद्य के बिना तीनों पाद गुणवान् होने पर भी निरर्थक होते हैं, जिस प्रकार यज्ञ में यजुर्वेद-अध्यायी, अध्वर्यु उपाध्याय के बिना-उद्गाता, ब्रह्मा और होता तीनों व्यर्थ होते हैं ॥ १७ ॥

वैद्यस्तु गुणवानेकस्तरायेदातुरं सदा ।

एवंप्रतिरैर्होति कर्णधार इवाम्भसि ॥ १८ ॥

एक गुणवान् वैद्य सदा रोगियों को रोगरूपी समुद्र के पार पहुँचा देता है । जिस प्रकार नौका का नेता चप्टु चलानेवाले पुरुषों के बिना भी नाव को समुद्र के किनारे ले जाता है ॥ १८ ॥

तत्त्वाधिगतआस्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयंकृती ।

लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः ॥ १९ ॥

प्रत्युत्पन्नमतिर्धर्मान् व्यवसायी विशारदः ।

सत्यधर्मपरो यश्च स भिषक् पाद उच्यते ॥ २० ॥

वैद्य के गुण—ठीक प्रकार शास्त्र पढ़ा हुआ, एवं ठीक प्रकार से शास्त्र का अर्थ समझा हुआ, छेदन स्नेहन आदि कर्मों को देखा तथा स्वयं किया हुआ, छेदन आदि शस्त्र- कार्यों में दक्ष हाथवाला, बाह्य एवं अन्दर से पवित्र ( रज्जु तम रहित ), शूर ( विवाद रहित ), अग्रोपहरणीय अध्याय में वर्णित साज-सामान सहित, प्रत्युत्पन्नमति ( उत्तम प्रतिभा-सक्ष वाला ), बुद्धिमान् व्यवसायी ( उत्साही-न ध्वरानेवाला ), विशारद ( पण्डित ), सत्यनिष्ठ, धर्मपरायण होना—ये वैद्य के गुण हैं ॥ १९, २० ॥

आयुष्मान् सत्त्ववान् साध्यो द्रव्यवान् आत्मवानपि ।

आस्तिको वैद्यवाक्यस्थो व्याधितः पाद उच्यते ॥ २१ ॥

रोगी मनुष्य के गुण-आयुष्मान् ( दीर्घायु ), सत्त्ववान् ( क्लेश सहनेवाला ), साध्य ( साध्य रोग से पीड़ित ), द्रव्यवान् ( धनी ), आत्मवान् ( अलोकुप-जितेन्द्रिय ), आस्तिक ( पर- लोक में, दान-यज्ञ में विश्वास रखनेवाला ), वैद्य के वचनों को माननेवाला-रोगी उत्तम है ॥ २१ ॥

प्रग्रस्तदेगसंभूतं प्रग्रस्तेऽहनि चोद्भुतम् ।

युक्तमात्रं मनस्कान्तं गन्धवर्णरसान्वितम् ॥ २२ ॥

दोषघ्नमग्गलानिकरमडिकारि विपर्यये ।

समीक्ष्य दत्तं काले च भेषजं पाद उच्यते ॥ २३ ॥

भेषज के गुण—उत्तम देश में उत्पन्न, प्रशस्त दिन में उखाड़ी गई, युक्तमात्र ( युक्तप्रमाण ), मन के प्रिय, गन्ध-वर्ण- रस से युक्त, दोषों को नष्ट करनेवाली, ग्लानि न उत्पन्न करने- वाली, विपरीत पड़ने पर भी स्वरूप विकार करनेवाली या विकार न करनेवाली, देशकाल आदि की विवेचना करके रोगी को समय पर दी गई औषध गुणकारी होती है ॥ २२, २३ ॥

स्निग्धोऽजुगुप्तुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे ।

वैद्यवाच्यकृदश्रान्तः पादः परिचरः स्मृतः ॥ २४ ॥

परिचारक के गुण—स्निग्ध ( प्रीतियुक्त ), अजुगुप्तु ( लोभ एवं निन्दा रहित ), बलवान्, रोगी की रक्षा करने में संलग्न, वैद्य के वचन को बिना किसी ऊहापोह के माननेवाला, खेदरहित परिचारक प्रशस्त हैं ॥ २४ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने युक्तसेनीयो नाम

चतुर्लिशत्तमोऽध्यायः ॥ २४ ॥

पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथात आतुरोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके आगे 'आतुरोपक्रमणीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥

आतुरोपक्रममाणेन भिषजाऽऽयुरादिवैव परीक्षित- व्यम ; सत्यायुषि व्याध्यूत्वनितवयोदेहबलसत्त्वसात्त्व- प्रकृतिभेषजदेशान् परीक्षेत् ॥ ३ ॥

रोगी की चिकित्सा करने से पूर्व वैद्य को रोगी की आयु की परीक्षा करनी चाहिये । आयु के शेष होने पर तो, व्याधि ( साथ असाध्य भेद से ), मृत्यु, अग्नि, वय, देह, बल, सत्त्व, सात्त्व, प्रकृति, भेषज, देश आदि की परीक्षा करनी चाहिये ॥

तत्र महापाणिपादपाश्चैपृष्ठस्तनाप्रदर्शनवदनस्कन्ध- ललाटं दीर्घाङ्कुलिपर्वोङ्गासप्रेक्षणबाहुं, विस्तीर्णभ्रस्तानन्त- रोरस्कं हृत्स्वजघामेद्वयोर्व, गम्भीरसत्त्वस्वरनाभिम्, अनु- चैर्बद्धस्तनम्, उपचितमहारोमशकर्णं, पश्चान्मस्तिकं, स्नातानुलिप्तं मूर्धातुपूर्वं विशुद्ध्यमाणशरीरं पश्चात् विशुद्ध्यमाणहृदयं पुरुषं जानीयाद्दीर्घायुः खल्वयमिति । तमेकान्तेनोपक्रमेत् । एभिर्लक्षणैर्विपरितैरत्यायुः, मिश्रैर्भ- ध्यमायुरिति ॥ ४ ॥

निम्न लक्षणोंवाला पुरुष दीर्घायु होता है—विशाल हाथ-पाँववाला, विशाल पाश्ववाला, विशाल पीठ वाला,

अ० ३५ ]

सूत्रस्थानम्

३१५

विशाल स्तन, विशाल अग्रवाले—दशनोंवाला, विशाल चेहरा, विशाल स्कन्ध, 'विशाल ललाटवाला, दीर्घ-अंगुलियोंवाला, दीर्घ उच्छ्वास (श्वास), दीर्घ आँखोंवाला, दीर्घबाहु, विस्तीर्णभू, विस्तीर्णस्तनान्तर, विस्तीर्णवक्षःस्थल, ह्रस्व जंघा, ह्रस्वमेदु और ह्रस्वग्रीवा, गम्भीरसत्त्व (सत्त्व का प्राचुर्य), गम्भीरस्वर, गम्भीरनाभि, कुछ उठे निबिड़स्तन, मांस से भरे महान्-लोमवाले कर्ण, शिर के पिछले भाग में मस्तिष्क उन्नत होना, स्नान के पश्चात् चन्दन आदि का लेप करने पर पहिले माथे से प्रारम्भ होकर समस्त शरीर का लेप शुष्क हो, पीछे हृदय का लेप शुष्क होता हो, इन लक्षणोंवाले पुरुष को समझना चाहिये कि वह 'दीर्घायु' है। इस प्रकार के मनुष्य की बिना किसी सन्देह के (स्थिरचित्त से) चिन्तित करना चाहिये। इन लक्षणों से विपरीत लक्षणोंवाले पुरुष को 'स्वर्लगायु' समझना चाहिये। मिले जुले लक्षणोंवाले को 'मध्यमायु' समझना चाहिये ॥४॥

भवति चात्र—

गूढसन्धिपरिगन्तुः संहृताङ्गः स्थिरेन्द्रियः ।

उत्तरोत्तरसुचेतः यः स दीर्घायुश्च्यते ॥५॥

गर्भोत् प्रभृत्यरोगो यः शनैः समुपचीयते ।

शरीरज्ज्ञानविज्ञानैः स दीर्घायुः समासतः ॥६॥

जिस पुरुष की सन्धि, शिरा और स्नायु गूढ़ (छिपी) हैं, गठीले अंगोंवाला, अचलेन्द्रिय, उत्तरोत्तर सुचेत (पाँव की अंगुलियों प्रथमचेत, जंघा और जानु दूसरा चेत, इस प्रकार से सिर दसवाँ चेत है, ये सब एक से एक अच्छा हो) वह पुरुष दीर्घायु होता है। जो पुरुष गर्भावस्था से ही नीरोग है, जिसमें शरीर, ज्ञान (तत्त्वावबोध), विज्ञान (चित्रकर्म कौशल) गुण धीरे-धीरे बढ़ते हैं, वह संक्षेप में दीर्घायु होता है।

वि० मन्तव्य—उत्तरोत्तर सुचेत—उत्तरोत्तर दीर्घायुवालों के वंश में उत्पन्न—जिसके माँ-बाप, दादा-दादी, नाना-नानी आदि पूर्वज दीर्घायु रहे हों वह। उत्तरोत्तर सुष्ठु है चेत—उत्पत्ति स्थान जिसका वह ॥५,६॥

मध्यमस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे ।

अधस्तादक्ष्योर्ग्यस्य लेखाः स्युर्न्यक्तमायताः ॥७॥

द्वे वा तिस्रोऽधिक वाऽपि पादौ कर्णौ च मांसलौ ।

नासाग्रमूर्ध्वं च भवेदूर्ध्वं लेखाश्च पृष्ठतः ॥८॥

यस्य स्युस्तस्य परममायुर्भवति सप्रतिः ।

१ कविराज हाराणचन्द्र जी ने 'उत्तरोत्तर सुचेत' का अर्थ—कौमारवस्था से यौवनावस्था—यौवनावस्था से तरुणवस्था—इस प्रकार उत्तरोत्तर श्रेष्ठता गिनी है। ज्ञान-विज्ञान शरीर का धीरे २ बढ़ना श्रेष्ठ है। क्योंकि—

“व्यञ्जनादि शुभा विद्या मेदोमेधादयो दश ।

अल्पे वयसि यस्तैतस्य स जीवतु कदाचन ॥”

मध्यमायु पुरुष के लक्षण कहते हैं—जिसकी आँखों के नीचे दो या तीन अथवा इससे अधिक लम्बी रेखायें स्पष्ट होती हैं, पाँव एवं कान मांस से भरे होते हैं, नासा का अग्रभाग ऊपर को उन्नत हो, पीठ में ऊपर को रेखायें हों, तो इस प्रकार के पुरुष को मध्यमायु समझना चाहिये। इसकी आयु सत्तर वर्ष से ऊपर नहीं होती ॥७,८॥

जघन्यस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे ॥९॥

हृश्चानि यस्य पर्वाणि सुमहच्छ्वापि मेहनम् ।

तथोरस्थवलीढानि न च स्यात्पृष्ठमायतम् ॥१०॥

ऊर्ध्वं च श्रवणौ स्थानान्नासा चोच्चा शरीरिणः ।

हसतो जल्पतो वाऽपि दन्तमांसं प्रहश्यते ।

प्रेक्ष्यते यश्च विभ्रान्तं स जीवेत्पञ्चविंशतिम् ॥११॥

इसके आगे जघन्य आयु के लक्षणों को कहते हैं। अंगुलियों के पर्व छोटे हों और शिरन बड़ा हो वक्षःस्थल अन्दर को दबा हो। पीठ विशाल न हो, जिसके कान अपने स्थान से ऊँचाई पर हों तथा नासिका भी ऊँचाई पर होती है, हंसते बात करते समय जिस पुरुष के मसड़े दिखाई देते हैं, जो कि चञ्चल हृदि से इधर उधर देखता है, वह ह्रस्व आयु, अधिक से अधिक २५ वर्ष तक जीता है ॥९-११॥

अथ पुनरायुषो विज्ञानार्थमङ्गप्रत्यङ्गप्रमाणसारानुपदेद्यामः । तत्राङ्गान्यन्तराधिस्वस्थिबाहुशिर्वासि, तदवयवाः प्रत्यङ्गानि। तत्र, स्वेरङ्गुलेः पदाङ्गुष्ठप्रदेशिन्यौ द्वाभ्यंगुलायते; प्रदेशिन्यास्तु मध्यमानामिकाकनिष्ठिका यथोत्तरं पञ्चमभागहीनाः; चतुरङ्गुलायते पञ्चाङ्गुलविस्तृते प्रपदपादतले; पञ्चचतुरङ्गुलायतविस्तृता पाणिः; चतुर्दशाङ्गुलायतः पादः; चतुर्दशाङ्गुलपरिणाहानि पादगुल्फजंघाजानुमध्यानि; अष्टदशाङ्गुला जङ्घा, जानुपरिघाच्च द्वात्रिंशदङ्गुलम्, एते पञ्चाङ्गुलः; जङ्घायामसमावृत्तः द्वयङ्गुलानि वृषणचिनुकदग्धननासापुटभागकर्णमूलध्रुनयनान्तराणि; चतुरङ्गुलानि मेहनवदनान्तरनासाकर्णललाटप्रौबोच्छ्रायहृद्यन्तराणि; द्वादशाङ्गुलानि भगविस्तारमेहननाभिहृदयग्रीवास्तनान्तरमुखायामसणि-बन्ध-प्रकोष्ठस्थौल्यानि; इन्द्रबस्तिपरिणाहसपीठकूर्परान्तरायासः षोडशाङ्गुलः; चतुर्विंशत्यङ्गुलो हस्तः; द्वात्रिंशदङ्गुलपरिमाणौ मुजौ, द्वात्रिंशत्परिणाहावृत्तः, मणिबन्धकूर्परान्तरं षोडशाङ्गुलं, तत्तं षट्चतुरङ्गुलायामविस्तारम्, अङ्गुष्ठमूलप्रदेशिनीश्रवणापाङ्गान्तरमध्यमाङ्गुल्यौ पञ्चचंगुले,

१ 'अश्वयोः' शब्द का अर्थ डल्हण ने अक्षकास्थि किया है। अक्षकास्थि के तोचे रेखायें यह अर्थ उतना संगत नहीं।

२ 'अवलीढानि' शब्दका अर्थ डल्हण ने आवर्तमेद (प्रतिलोम-अनुलोम) किया है।

१२६

सुश्रुतसंहिता

[अ० ३५]

अर्धपञ्चांगुले प्रदेशिन्यनामिके, सार्धत्र्यंगुलौ कनिष्ठाङ्गुलो, चतुर्विंशतिविस्तारपरिणाहं मुखग्रीवं, त्रिभागंगुलविस्तारा नासापुटमर्यादा, नयनत्रिभागपरिणाहा तारका, नवमस्तारकांगो दृष्टिः, केशान्तमस्तकान्तमेकादशंगुलं, मस्तकादवटुकेशान्तो दशंगुलः, कर्णवटवन्तरं चतुर्दशंगुलं, पुरुषोरःप्रमाणविस्तीर्णो स्त्रीश्रोणिः, अष्टादशंगुलविस्तारसुरः, तत्प्रमाणं पुरुषस्य कटी, सर्वशमंगुलगतं पुरुषायाम इति ॥१२॥

इसके आगे आयु के विज्ञान के लिये अङ्गप्रत्यंगों का ज्ञान, प्रमाण, एवं सारी को कहते हैं। अङ्ग-अन्तराधि—(मध्यकाय या धड़), दोनों बाहु एवं दोनों जंघा और सिर ये ६ अङ्ग हैं। इन अङ्गों के अवयवों को प्रत्यङ्ग कहते हैं। इन प्रत्यङ्गों में—पांव का अंगूठा एवं पांव की प्रदेशिनी अंगुलि—दो अंगुल लम्बी (अपनी अंगुलियों से), प्रदेशिनी से मध्यमांगुलि १।५ भाग, मध्यमांगुलि से अनामिका १।५ भाग, अनामिका से कनिष्ठिका १।५ भाग छोटी; पांव का तलुवा चार अंगुल लम्बा और पाँच अंगुल चौड़ा, पार्णि (एड़ी) पाँच अंगुल लम्बी चार अंगुल चौड़ी; पाँव चौदह अंगुल लम्बा, पाँवगुरुफ, जंघा एवं जानु का मध्य स्थान चौदह अंगुल गोल, जंघा अठारह अंगुल लम्बी घुटने के ऊपर बत्तीस अंगुल—इस प्रकार से कुल पचास अंगुल, जंघा के समान दीर्घ ऊरु, अण्डकोष, टोडी, दांत, नासापुट (नयने), कर्णमूल और कानों तथा भौं एवं नेत्र का अन्तर दो अंगुल, अनुत्तेजित शिरन, खुला मुख नाक, कान-ललाट ग्रीवा, आँखों का मध्य भाग चार अंगुल, योनिच्छिद्र की गहराई बारह अंगुल (हस्तिनी जाति की स्त्री में); मेहननाभि का अन्तर, हृदय एवं ग्रीवा का अन्तर, दोनों स्तनों का अन्तर, चेहरे की लम्बाई, मणिबन्ध (कलाई) की गोलाई, प्रकोष्ठ भाग बारह अंगुल, इन्द्रवस्ति (जंघा का मध्य भाग) की गोलाई, अंसपीठ एवं कोहनी कामध य भाग सोलह अंगुल, लम्बाई तथा गोलाई हाथ चौबीस अंगुल, सुजायें बत्तीस अंगुल, ऊरु बत्तीस अंगुल गोलाई में, मणिबन्ध और कोहनी के बीच का अन्तर सोलह अंगुल, हाथ का तलुवा छै अंगुल लम्बा और चार अंगुल चौड़ा, अंगुष्ठ एवं प्रदेशिनी का अन्तर, कान और नेत्र कोणों का अन्तर और मध्यमांगुलि पाँच अंगुल, प्रदेशिनी और अनामिका ४। अंगुल, कनिष्ठा और अंगुष्ठ—साढ़े तीन अंगुल, मुख की लम्बाई चार अंगुल और ग्रीवा की गोलाई बीस अंगुल, नासापुट की मर्यादा १।३ अंगुल, आँख की कृष्ण मण्डल या तारक-आँख का १।३ भाग, दृष्टि—तारक का १।६ भाग, बालों की जड़, शङ्ख प्रदेश के एवं मस्तक (चोटी) के स्थान के बीच का भाग ग्यारह अंगुल, मस्तक से ग्रीवा के बालों की जड़ का मध्यभाग दस अंगुल, कान एवं

ग्रीवा के पिछले भाग का अन्तर चौदह अंगुल, पुरुष के उरु के बराबर (बारह अंगुल) स्त्री का श्रोणिफलक, स्त्री का उरुः स्थल अठारह अंगुल चौड़ा, पुरुष की कटि अठारह अंगुल, पुरुष की सम्पूर्ण लम्बाई एक सौ बीस अंगुल है।

वि० मन्तव्य—मेहन-पुरुष के स्वामाविक लिंग का बाह्यभाग। नाभि और हृदय का अन्तर १२ अंगुल। चतुर्विंशति-अंगुलो हस्तः—कूपर से मध्यमांगुलि के अन्त तक २४ अंगुल लम्बा हस्त—हाथ। नयन.....दृष्टिः—नेत्र गोलक (नयनबुद्धिद) का तिहाई भाग तारक (कृष्णमण्डल) हो, और तारक का नौवाँ भाग दृष्टि हो। उत्तर तन्त्र अ० १ के श्लोक १३ के अनुसार मण्डल का सातवाँ भाग दृष्टि होती है। तात्पर्य है दीर्घायु की दृष्टि नौवाँ भाग और अन्यो की सातवाँ भाग होती है। या सर्वसाधारण की सातवाँ भाग होती है। आयत (लम्बा) आयाम (लम्बाई), परिणाह तथा परिच्छेप (मोटाई), गोलाई या घेरा, विस्तार (चौड़ाई)। अन्तर (दूरी) ॥१२॥

भवन्ति चात्र श्लोकाः—

पञ्चविंशे ततो वर्षं पुमान् नारी तु षोडशे।

समत्वागतवीर्यो तौ जानीयात् कुण्डलो भिषक् ॥१३॥

यह उपर्युक्त प्रमाण युवावस्था में ही होता है, थोड़ी आयु में नहीं। क्योंकि—पञ्चवीस वर्ष में पुरुष और सोलह वर्ष की आयु में स्त्री, रसादि धातुओं से परिपूर्ण होते हैं। यह बात कुशल वैद्य को मली प्रकार जान लेनी चाहिये ॥१३॥

देहः स्वेरङ्गुलैरेष यथावदनुकीर्तितः।

युक्तः प्रमाणेनानेन पुमान् वा यदि वाङ्मना ॥१४॥

दीर्घमायुरवाप्नोति वित्तं च महद्दृच्छति।

मध्यमं मध्यमैरायुर्वित्तं हीनैस्तथाऽवरम् ॥१५॥

शरीर का यह उपर्युक्त मान—मनुष्य की अपनी ही अंगुलियों से समझना चाहिये। यदि इस परिमाण से पुरुष या स्त्री युक्त हो तो वह दीर्घायु एवं बहुत धन को प्राप्त करता है। मध्यम लक्षणोंवाला पुरुष मध्यमायु, मध्यमवित्त प्राप्त करता है, हीन लक्षणोंवाला, हीन आयु और हीन वित्त प्राप्त करता है ॥१४, १५॥

अथ सारान् वक्ष्यामः—स्मृतिभक्तिप्रज्ञाशौचशौर्योपेतं कल्याणामिनिवेशं सत्त्वसारं विद्यात्; स्तिग्धसंहतः श्वेतोस्थिदन्तनखं बहुलकामप्रजं शुकेण; अक्रुशमुत्तमबलं स्तिग्धगम्भीरस्वरं सौभाग्योपपन्नं महानेत्रं च मञ्जः।

१ कहा भी है—

“वर्षेऽथ पंचविंशे नरः समन्वितबलः षोडशे नारी।

अर्हति मानोन्मानं जीवितभागे क्षुत्तु वा ॥”

अ० ३५ ]

सूत्रस्थानम्

१२७

महाजिरः स्कन्धं दृढदन्तहन्वस्थिनखमस्थिभिः; स्निग्धमूत्र-स्वेदस्वरं बृहच्छरीरमायासासहिष्णुं मेदसा; अछिद्रागत्रं गूढस्थिसन्धिं मांसोपचितं च मांसेन; स्निग्धताघ्ननख-नयनतालुजिह्वाष्टपणिपादतलं रक्तेन; सुप्रसन्नमुदुत्वप्रो-माणं त्वकदारं विद्यादिति । एषां पूर्व पूर्वं प्रधानमायुः सौभाग्ययोरिति ॥ १६ ॥

इसके आगे सारों को कहते हैं—सत्त्वसार—स्मृति (स्मरण), भक्ति (श्रद्धा), प्रज्ञा (बुद्धि), शौच (पवित्रता), शौर्य (सब कार्यों में अनालस्थ) से युक्त, कल्याण विषय में तत्पर (यत्नपर) को सत्त्वसार समझना चाहिये। स्निग्ध—परस्पर मिले एवं श्वेत अस्थि, दांत एवं नखों से युक्त, बहुत काम युक्त, बहुत प्रजायुक्त मनुष्य शुक्लसार युक्त होता है। स्थूल, उत्तुमबलयुक्त, स्निग्ध एवं गम्भीर स्वरयुक्त-सौभाग्ययुक्त, विशाल नेत्रवाला पुरुष मज्जासारवाला होता है, महान् स्वर, महान् स्कन्ध; मजबूत दांतों, हन्वस्थि, नखवाला, अस्थिसार, स्निग्ध मूत्र, स्वेद एवं स्वरवाला, बड़े शरीरवाला, परिश्रम को न सहन करनेवाला मेद से युक्त होता है। कहीं शरीर दबा (छिद्रयुक्त) न हो, अस्थि एवं सन्धियाँ गूढ़ हों, मांस से भरा शरीर मांससारवाला है। आँख, नख, तालु, जिह्वा, ओठ, हाथ, पाँव के तालुओं का लाल एवं चिकना होना रक्तसार का लक्षण है। त्वचा एवं रोमों का स्वच्छ एवं कोमल होना त्वचा का सार है। इनमें पूर्व-पूर्व सार (त्वचा से रक्तसार, रक्त से मांस-सार इस प्रकार से) आयु एवं कल्याण के लिये मुख्य है।

वि० मन्तव्य—सारों की व्याख्या चरक वि० अ० ८ में बहुत विशद एवं स्पष्ट है। पाठक अवश्य देखें। वहाँ यह भी लिखा है कि—सब (आठों) सारों से युक्त मानव-अत्यन्त बलवान्, महान्, कलेश सहनेवाला, सभी कार्यों को करने में अपने को समर्थ समझनेवाला, भले कार्यों में तत्पर, स्थिर एवं प्रथित शरीरवाला, सुन्दर एवं सावधान गतिवाला, अनुनाद युक्त, स्निग्ध, गम्भीर एवं महान् स्वरवाला, सुख, ऐश्वर्य, सुखभोग तथा सम्मान का भागी (भोक्ता) होता है और उसका बुढ़ापा मन्द (थोड़ा) तथा रोग भी मन्द होता है अपने समान गुणवाली सन्तान (पुत्र पौत्र आदि) वाला होता है तथा चिरजीवी होता है। उक्त सत्त्व (मनसु) आदि सार देखकर आयु का बहुत कुछ पता लग जाता है। सार का अर्थ है स्थिर अंश, जैसे काष्ठ में मध्य काष्ठ सार होता है उक्त सत्त्व आदि जितने अधिक उत्कृष्ट होते हैं उनके अनुसार वे सार कहे जाते हैं, यथा प्रबल सत्त्ववाला “सत्त्वसार” प्रबल शुक्लवाला “शुक्लसार” आदि-आदि ॥ १६ ॥

विशेषतोऽङ्गप्रत्यङ्गप्रमाणान्दथ सारतः । परीत्यायुः सुनिपुणो भिषक् सिध्यति कर्मसु ॥ १७ ॥ अङ्ग-प्रत्यङ्गों के प्रमाण द्वारा तथा सार द्वारा आयु की परीक्षा करके जो वैद्य चिकित्सा कर्म करता है, वह कार्य में सफल होता है।

वि० मन्तव्य—चरक ने एङ्गी (पार्श्व) के पश्चात्-भाग से शिर के शिक्षा स्थान पर्यन्त उचित परिमाणवाले मानव की लम्बाई ८४ अंगुल मानी है और वह उचित भी है, क्योंकि ३॥ हाथ-८४ अंगुल का पुरुष माना जाता है। १ हाथ २४ अंगुल का और ३॥ हाथ-८४ अंगुल का होता है और सुश्रुत ने—पाँव की मध्यमा—अंगुली से ऊपर को बाहु उठाये पुरुष की लम्बाई १२० अंगुलमानी है, जिसको “पुरुषा” कहते हैं, वह भी उचित ही है, क्योंकि १४ अंगुल का पाँव (पाद) होता है और ऊपर हाथ उठाने से ३० ३० अंगुल लम्बाई बढ़ जाती है। परन्तु—सुश्रुत ने-पार्श्व में १, मेहन नाभि के अन्तर में २ और शिर के मान में ५ अङ्गुल अधिक माने हैं। यदि ४४ में से ८ निकाल दें तो ३६ रह जाते हैं और यदि १२० में से ३६ निकाल दें तो ८४ रह जाते हैं और चरक में एकवाक्य और पाया जाता है वह है—“तत् आयामविस्तारसमं समुच्यते” अर्थात् वह शरीर आयाम (लम्बाई-दैर्घ्य) में तथा विस्तार (चौड़ाई बाहु पंखारे) में सम-समान सम-समीचीन उच्यते कहा जाता है। इस प्रकार ६६ अङ्गुल = ४ हाथ (६ फूट) लम्बा शरीर भी समीचीन-उत्तम होता है। हमारा विचार है कि चरक ने ८४ तथा ६६ अङ्गुल की अथवा इसके बीच की लम्बाई उत्तम मानी है। इस लम्बाई के युवक सेना एवं पुलिस में भर्ती भी किये जाते हैं और सुडौल भी होते हैं, यद्यत् उनके अवयवों का विस्तार भी उक्त प्रकार से सम्पन्न हो। पुरुषा शब्द का प्रयोग-पुरुषा भर गहरा पानी है तथा यह वृक्ष पुरुषा भर लम्बा है आदि-वाक्यों में किया जाता है। श्रीवामभट्ट ने शा० स्था० अ० ३ श्लो० ११२ में—स्वं स्वं हस्तत्रयं साद्वं वपुः पात्रं सुखायुषः।’ लिखा अर्थात् ३॥ हाथ लम्बा शरीर सुख आयु का पात्र होता है। इस प्रकार चरक में ८४ एवं ६६, सुश्रुत में १२० तथा वामभट्ट में ८४ अङ्गुल की लम्बाई उत्तम मानी है ॥ १७ ॥

व्याधि विशेषे वास्तु प्रागभिहिताः, सर्वं एवेते त्रिविधाः-साध्याः, याप्याः, प्रत्याख्येयाश्च । तत्रैतान् भूयश्चिधा परी-क्षेत् किमयमौपसर्गिकः; प्राक्केवलः, अन्यलक्षण इति । तत्र, औपसर्गिको नाम यः पूर्वोत्पन्नं व्याधं जघन्यकाल-जातो व्याधिरूपसृजति, तन्मूल एवोपद्रवसंज्ञः; प्राक्केवलो नाम यः प्रागेवोत्पन्नो व्याधिरूपरूपोऽनुपद्रवश्च; अन्य-लक्षणो नाम यो भविष्यद्वाद्याख्यापकः, स पूर्वरूपसंज्ञः।

१२८

‘मुश्रुतसंहिता’

[ अ० ३५ ]

तत्र सोपद्रवमन्योन्याविरोधेनोपक्रमेत, बलवन्तमुपद्रव वा; प्राक्केवलं यथास्वं प्रतिकुर्वीत; अन्यलक्षणं त्वादिन्याधी प्रयतेत ॥ १८ ॥

व्याधिसमुद्देशीय अध्याय में रोगों के विषय में प्रथम कह चुके हैं कि सब रोग तीन प्रकार के हैं, यथा-साध्य, याप्य और प्रत्याख्येय (असाध्य), इन तीनों की फिर तीन प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये। क्या यह रोग उपसर्ग-(उपद्रव) जन्म है, अथवा प्राक्केवल है, या अन्य लक्षण (किसी भावि रोगों का लक्षण रूप है) इनमें औपसर्गिक रोग-पूर्व उत्पन्न रोग के साथ में पीछे से दूसरा रोग उत्पन्न होकर प्रथमरोग के साथ मिल जाता है। उस दूसरे रोग को ‘औपसर्गिक रोग’ या उपद्रव कहते हैं। और जो रोग पूर्व ही उत्पन्न हो जाता है, एवं पूर्वरूप (भावि रोग के लक्षणों से) रहित तथा उपद्रवों से रहित होता है, उसे ‘प्राक्केवल’ व्याधि कहते हैं। और जो लक्षण भावि में उत्पन्न होनेवाले रोग के लक्षणों को वतलाता है, उनको ‘पूर्वरूप’ कहते हैं, (ज्वर आदि रोग अपने पूर्वरूप लक्षणों से युक्त होते हैं)।

इनमें उपद्रवों से युक्त मूलव्याधि को दोनों के विरोधी चिकित्सा द्वारा शान्त करना चाहिये। अथवा-बलवान् उपद्रव की प्रथम चिकित्सा करनी चाहिए। प्राक्केवल रोग की आत्मीय चिकित्सा करनी चाहिए। पूर्वरूप व्याधि में, प्रथम से ही (ज्वर के पूर्वरूप स्पष्ट होने पर घृत का पान), पूर्वरूप अवस्था में ही चिकित्सा करनी चाहिये।

वि० मन्तव्य—प्राक्केवल व्याधि को ‘मुख्यव्याधि’ प्रधान व्याधि, अनुवन्ध्य कहते हैं। यह रोग वह अवस्था है जब पूर्वरूप नामक लक्षण समाप्त हो जाते हैं और कोई उपद्रव नामक लक्षण उत्पन्न नहीं हुए होते हैं, केवल मुख्य रोग ही विद्यमान होता है। इसे स्वतन्त्र व्याधि, मूलव्याधि तथा लघु व्याधि भी कहते हैं। पूर्वरूप-मुख्य व्याधि के पूर्व उत्पन्न होते हैं, उनमें से कुछ व्याधि के व्यक्त हो जानेपर शान्त हो जाते हैं और कुछ रह जाते हैं अथवा तीव्र हो जाते हैं और उपद्रव मुख्य व्याधि की विद्यमानता में अथवा उसके शान्त हो जाने पर उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १८ ॥

भवति चात्र—

नास्ति रोगो विना दोषैर्यस्मात्तस्माद्विचक्षणः।

अनुक्तमपि दोषाणां लिङ्गैर्याधिसुपाचरेत् ॥ १९ ॥

कहा भी है—

चूंकि दोषों के बिना (वातादि के बिना) कोई रोग उत्पन्न नहीं होता, इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि न कहे हुए रोग की भी दोषों के लक्षणों से चिकित्सा करे।

वि० मन्तव्य—यदि रोग का शास्त्रानुसार नामकरण न कर

सको तो केवल दोषों के लक्षणों के अनुसार चिकित्सा करते रहो। क्योंकि-चरक के शब्दों में-विकारनामाऽकुशलो न जिह्वीयात् कदाचन। नहि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति श्रुवा स्थितिः ॥ च० सू० अ० १८ श्लो० ५१। वही बात आदि दोष-कारण भेद से तथा स्थानविशेष में जाने से भिन्न २ रोगों को उत्पन्न करते हैं, अतः रोग के कारण एवं स्थान आदि का विचार करके उचित चिकित्सा करे ॥ १९ ॥

प्रागभिहिता श्रुतवः ॥ २० ॥

ऋतु-परीक्षा प्रथम कह चुके हैं ॥ २० ॥

शीते शीतप्रतीकारमुष्णे चोष्णनिवारणम्।

कृत्वा कुर्यात् क्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ॥ २१ ॥

शीत ऋतु में—शीत के विपरीत उष्णवस्था को उत्पन्न करके, उष्णकाल में—उष्णवस्था के विपरीत शीतवस्था उत्पन्न करके (एवं वृष्टिकाल में वृष्टि के विपरीत अवस्था उत्पन्न करके) अग्निकर्म आदि क्रियायें करनी चाहिये। क्रियाकाल का उल्लंघन कभी भी नहीं करना चाहिए ॥ २१ ॥ अप्राप्ते वा क्रियाकाले प्राप्ते वा न कृता क्रिया।

क्रिया हीनाऽतिरिक्ता वा साध्येष्वपि न सिध्यति २२ क्रियाकाल के उपस्थित न होने पर (आमज्वर में औषध देना) क्रिया करने से, या क्रियाकाल के उपस्थित होने पर क्रिया न करने से साध्य रोग भी नष्ट नहीं होता। बहुदोष में हीन क्रिया व्यर्थ होती है, अल्पदोष में—अतिरिक्तक्रिया (तीव्र क्रिया) रोगी का नाश करती है, इसी प्रकार से मिथ्या क्रिया व्यर्थ है ॥ २२ ॥

या ह्युदोर्णं शमयति नान्यं व्याधिं करोति च।

सा क्रिया, न तु या व्याधिं हरत्यन्यमुदीरयेत् ॥ २३ ॥

जो क्रिया उत्कट रोग का शमन करती है, परन्तु अन्यरोग को उत्पन्न नहीं करती, उसका नाम क्रिया है। जो रोग का नाश करे, परन्तु दूसरे रोग को उत्पन्न कर देती है—(स्थौल्यापकर्षण में अपतर्पण से यक्ष्म—वातादि रोग) उसका नाम क्रिया नहीं है ॥ २३ ॥

प्रागभिहितोऽग्निरन्नस्य पाचकः। स चतुर्विधो भवति दोषानभिपन्नएकः, विक्रियामापन्नस्त्रि विधो भवति-विषमो वातेन, तीक्ष्णः पित्तेन, मन्दः श्लेष्मणा, चतुर्थः समः सर्वसाम्यादिति। तत्र, यो यथाकालमुपयुक्तमन्नं सम्यक् पचति स समः, समैदोषैः यः कदाचित् सम्यक् पचति, कदाचिदधमानशुलोदावर्तात्सिारजठरगौरवान्नक्रूजजनम् बाहणानि कृत्वा विषमः, यः प्रभूतमप्युपयुक्तमन्नमाशु पचति स तादृशः, स एवाभिर्वर्धमानोऽत्यनिरित्याभाष्यते; स सुदुर्मुह्यः प्रभूतमप्युपयुक्तमन्नमाशुतर पचति; पाकान्ते च गलतास्त्वोष्णोषाद्वाहसंतापाञ्जनयति, यस्तवल्पमप्यु-

अ० ३५ ] १७

सूत्रस्थानम्

१२६

युक्तमुदरशिरोगौरवकासश्वासप्रसेकच्छदिंगात्रसद्दानानि कृत्वा महता कालेन पचति, स मन्दः ॥२५॥

व्रणप्रश्नीय अध्याय में प्रथम कहा है कि—अग्नि अन्न का पाचक है। यहाँ एक अग्नि दोषों से आयुक्त रहने पर एक प्रकार की है। दोषों से युक्त होने पर विकृतावस्था में तीन प्रकार की है। यथा—वायु के कारण विषम, पित्त के कारण तीक्ष्ण, कफ के कारण मन्द, तीनों धातुओं के समान होने से सम होती है। इन्हीं में जो अग्नि ठीक समय पर खाये अन्न को भली प्रकार से पचाती है, वह सम अग्नि है, यह तीनों दोषों के समान होने से होती है। जो अग्नि कभी तो भली प्रकार पचाती है और कभी-आधमान, शुल्क, उदवाचत्, अतिसार, पेट में भारीपन, अन्नों में गड़गड़ाहट, प्रवाहण (कुन्थन) उत्पन्न करके पचाती है, वह विषम है। जो अग्नि बहुत अधिक मात्रा में खाये अन्न को भी शीघ्र पचा देती है, वह तीक्ष्ण है। यही तीक्ष्णाग्नि बढ़कर अत्यग्नि कहाती है। यह अत्यग्नि बार-बार अधिक मात्रा में खाये अन्न को बहुत जल्दी पचा देती है, पचाने के पश्चात् गले, तालु, ओठ में शोष, जलन और संताप उत्पन्न करती है। जो अग्नि थोड़ी सी मात्रा में खाये अन्न को भी-उदर, खिर में भारीपन, कास, श्वास, लालाखाव, वमन, अङ्गों की शिथिलता करके बहुत समय पीछे पकाती है, वह मन्द अग्नि है।

वि० मन्तव्य—अत्यग्नि का दूसरा नाम 'भस्मक' है। दोषाडनविषम अग्नि का ही नाम 'सम' या 'समाग्नि' है ॥ विषमो वातजान् रोगास्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तजान्। करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान् कफसंभवान् ॥२५॥

विषमाग्नि वातजन्य रोगों को, तीक्ष्णाग्नि पित्तजन्य रोगों को, मन्दाग्नि कफजन्य रोगों को उत्पन्न करती है ॥२५॥

तत्र, समे परिरक्षणं कुर्वीत; विषमे स्निग्धामल्लवणैः क्रियाविशेषैः प्रतिकुर्वीत, तीक्ष्णे मधुरस्निग्धशीतैर्विरेकैश्च, एवमेवात्यग्नी, विशेषेण माहिषैश्च क्षीरदधिर्सर्पिभिः, मन्दे कटुतिक्तकषायैर्वमनैश्च ॥२६॥

इनमें समाग्नि की रक्षा करनी चाहिये। तीक्ष्णाग्नि की—स्निग्ध, अम्ल एवं लवण क्रियाओं से- तीक्ष्णाग्नि एवं अत्यग्नि की—मधुर, स्निग्ध, क्षीतवीर्य एवं विरेचनों द्वारा, खासकर अत्यग्नि में—भैंस का दही, घी एवं दूध देना चाहिये। मन्दाग्नि

१ वात आदि प्रकृतिवाले पुरुषों में वात आदि दोषों से युक्त होती है। इसलिये विषम, तीक्ष्ण, मंद ये तीन भेद हैं। अग्नि यद्यपि ईश्वर है, तो भी पूर्व-जन्मकृत कर्मों के कारण इस अग्नि में विषम, तीक्ष्ण, मन्द-दोष होते हैं। अथवा पित्त के दोष से अग्नि में भी दोष आ जाता है।

की कटु, तिक्त-कषाय एवं वमनों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥२६॥

जाठरो भगवानग्निरीश्वरोऽत्रस्य पाचकः।

सौन्दर्याद्वसानाददानो विवेकतु नैव गक्यते ॥२७॥

जाठराग्नि-भगवान् (महात्म्यवान्) ईश्वर (आठ प्रकार के ऐश्वर्य्य युक्त, अग्निमादि ऐश्वर्य्याश्ली), अन्न का पाचक है। मधुर आदि रसों को परिपाक के लिये ग्रहण करती हुई भी यह अग्नि सूक्ष्म होने के कारण जानी नहीं जा सकती।

वि० मन्तव्य—ईश्वर—आत्मा के समान जीवन का हेतु है, क्योंकि अग्नि के ही कारण-आयु है और अग्नि शान्त होने पर मर जाता है और समाग्नि रहने पर नीरोग रहकर चिरकाल तक जीता है। ईदृशु वरः (ईश्वरः) जीवन का सामर्थ्य देनेवाले अन्य कफ वात आदि में श्रेष्ठ है। अथवा ईश्वर-सामर्थ्याश्ली (सम) अग्नि ही भगवान् है ॥२७॥

प्राणापानसमानैस्तु सर्वतः पवनैस्त्रिभिः।

ध्यामते पालयते चापि स्वां स्वां गतिमवस्थितैः ॥२८॥

प्राण अपान एवं समान ये तीन प्रकार की वायुएँ, अपने अपने स्थानों में रहती हुई अपनी अपनी क्रियाशक्ति से इस अग्नि को प्रज्वलित करती हैं और पालती हैं। फूँक से जिस प्रकार अग्नि तीव्र होती है उसी प्रकार इन वायुओं द्वारा अग्नि भी देदीप्यमान होती है ॥२८॥

वयस्तु त्रिविधं—बाल्यं, मध्यं, वृद्धमिति। तत्रोन्नपोडशवर्षीया बालाः। ते त्रिविधाः—क्षीरपाः, क्षीरान्नदाः, अन्नदा इति। तेषु संवत्सरपराः क्षीरपाः, द्विसंवत्सरपराः क्षीरान्नदाः, परतोऽन्नदा इति। षोडशसप्तत्योन्नतरे मध्यं वयः। तस्य विकल्पो—वृद्धिः, यौवनं, संपूर्णता, परिहाणिरिति। तत्र, आविशतेवृद्धिः, आविश्रतो यौवनम्, आचत्वारिंशतः सर्वथा त्विन्द्रियबलवीर्यसंपूर्णता, अत ऊर्ध्वसोषत्वपरिहाणियां त्वं समतिरिति। सप्ततेरूर्ध्वं क्षीयमाणधात्विन्द्रियबलवीर्योत्साहमहन्मन्यहन्ति वलीपलितखा-लित्यजुष्टं कासश्वासप्रभृतिभिरुद्वैरभिमूयमानं सर्व-क्रियास्वसमर्थ जीर्णोत्तमिवाभिवृष्टमवसोदन्तं वृद्धमाचक्षते ॥२९॥

वय तीन प्रकार की है। यथा—बाल्य, मध्य और वृद्धावस्था। इनमें सोलह वर्ष की आयु से कम आयु के बालक होते हैं। ये बालक भी तीन प्रकार के हैं, १-क्षीर पीनेवाले, २-दूध और अन्न खानेवाले, ३-अन्न खानेवाले। इनमें एक साल की आयु तक दूध पीनेवाले, दो साल के दूध एवं अन्न खानेवाले, इससे बड़ी उमर के बच्चे अन्न खानेवाले हैं। सोलह और सत्तर वर्ष के बीच की आयु मध्यम आयु है। इस मध्यम आयु के भेद वृद्धि, यौवन, संपूर्णता और हानि हैं। इनमें

१२०

सुश्रुतसंहिता

[ ३०-३५ ]

बीस वर्ष तक वृद्धि, तीस साल तक यौवन, चालीस तक सब घातु इन्द्रियाँ बल-वीर्य में सम्पूर्णता रखती हैं, इसके आगे सत्तर वर्ष तक धीरे-धीरे कमी क्षीणता आरम्भ हो जाती है। सत्तर वर्ष के आगे-घातु, इन्द्रिय, बल, वीर्य, उत्साह में दिन प्रति-दिन क्षीणता प्रारम्भ हो जाती है, शरीर में बलियाँ पड़ जाती हैं, सिर के बाल श्वेत हो जाते हैं, बाल गिरने लगते हैं, कास श्वास आदि रोगों से पीड़ित होकर सम्पूर्ण क्रियाओं में अस-मर्थता आ जाती है, इस अवस्था को वृद्धावस्था कहते हैं। जिस प्रकार पुराना घर बरसात आदि से गिर रहा होता है, वही अवस्था इस समय शरीर की होती है ॥२६॥

तत्रोत्तरोत्तरासु व्योवस्थासूत्रोत्तरा भेषजमात्रा-विशेषा भवन्ति, ऋते च परिहाणेः, तत्राद्यापेक्षया प्रति-कुर्वीत ॥३०॥

सत्तर वर्ष के ऊपर की आयु को छोड़कर, जिस प्रकार उत्तरोत्तर आयु बढ़ती जाती है, उसी प्रकार औषध की मात्रा भी उत्कृष्ट (बढ़ती) हो जाती है। इस वृद्धावस्था में बाल्या-वस्था के समान औषधमात्रा देनी चाहिये ॥३०॥

भवन्ति चान्न—

वाले विवर्धते इलेषमा मध्यमे पित्तमेव तु।

भूयिष्ठं वर्धते वायुर्बुद्धे तद्वादय योजयेत् ॥३१॥

कहा भी है—

बाल्यावस्था में कफ बहुत बढ़ता है, मध्यमावस्था में पित्त, वृद्धावस्था में वायु विशेष रूप से बढ़ती है, इसलिये इनका विचार करके औषध देनी चाहिये ॥३१॥

अग्निक्षारविरकेस्तु बालवृद्धौ विवर्जयेत्।

तत्साध्येषु विकारेषु मृद्धौ कुर्यात् क्रियां ज्ञानैः ॥३२॥

बालक एवं वृद्ध पुरुषों में अग्नि, क्षार एवं विरेचन कर्म नहीं करने चाहिये। यदि इन कार्यों से साध्य रोगों में क्रिया करनी पड़े तो कोमल रूप में करनी चाहिये। यथा—दारण कार्य में—कपोत गीध की विष्टा, क्षार कर्म में आवाप-प्रतिवाप हीन मृदु क्षार, विरेचन में अमल्लास आदि मृदु द्रव्य, अग्नि-कर्म अजाशक्तु से करना चाहिये ॥३२॥

देहः स्थूलः क्रुशो, मध्य इति प्रागुपदिष्टः ॥३३॥

१ मात्रा विवेचन—

‘प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भेषजरक्तिना।

अवलेह्या तु कर्तव्या मधुचौरसिताघृतैः ॥

एकैकां वर्धयेत्तावद यावत्सवत्सरो भवेत्।

तदुद्ध्वं माषवृद्धिः स्यात् यावत्पोडशकाद्विकाः ॥

षोडशान्वात्ततस्तूढ्वं यावदासप्ततैरिति।

एवमेव विभागोऽयं तदुद्ध्वं बालवक्रिया ॥”

देहपरीक्षा—शरीर स्थूल, क्रुश, मध्य, तीन प्रकार का है, यह पहिले कह चुके हैं ॥३३॥

कर्शयेद् बृंहयेत्वापि सना स्थूलकुरु शौरौ।

रक्षणं वैद्य मध्यस्य कुर्वीत सततं भिषक् ॥३४॥

स्थूल शरीर का कर्षण और क्रुश पुरुष का बृंहण सदा करना चाहिये। मध्यम शरीर की रक्षा निरन्तर वैद्य को करनी चाहिये ॥३४॥

बलमभिहितगुणं, दौर्बल्यं तु स्वभाबदोषजरादिभि-रवेक्षितव्यम्। यस्माद्बलवतः सर्वक्रियाप्रवृत्तिस्तस्माद्बलमेव प्रधानमधिकरणनाम् ॥३५॥

बल के गुण कह चुके हैं। दुर्बलता की स्वभाव (माता-पिता के शुक्र शोणित से), दोष (वातादि), वृद्धावस्था आदि से परीक्षा करनी चाहिये चूंकि बल के कारण से ही सब क्रियाओं में प्रवृत्ति होती है, इसलिये क्रियाओं को धारण करनेवालों में बल ही सब से प्रधान है ॥३५॥

केचित् क्रुशाः प्राणवन्तः स्थूलाश्चालपबला नराः।

तस्मात् स्थिरत्वं व्यायामैर्बलं वैद्यः प्रतर्कयेत् ॥३६॥

कई शरीर से क्रुश व्यक्ति प्राणवान् होते हैं और कई स्थूल व्यक्ति अल्पबलवाले होते हैं। इसलिये वैद्य को चाहिए कि स्थिरस्वरूपी बल व्यायाम आदि कार्यों से जानें ॥३६॥

सन्त्वं तु न्यसनाभ्युदयक्रियादिस्थानेन्यविकलवकरम् ॥३७॥ सन्त्ववान् सहते सर्वं संस्तभ्यात्मानमात्मना।

राजसः स्तभ्यमानोऽन्यः सहते नैव तामसः ॥३८॥

सत्त्व (मनोबल)—दुःख एवं सुख में कार्य भार आदि तथा छेदन भेदन आदि के स्थानों-अवसरों में ग्लानि या हर्ष का उत्पन्न न होना सत्त्व बल है। यह बल तीन प्रकार का है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। इनमें—जो मनुष्य अपने मन को स्वयं हृद बनावकर सब कुछ सहन करना है, वह सात्त्विक बलवाला है। और जो दूसरे मनुष्यों से हृद किया जाता है, वह राजस बलवाला है। और जो किसी प्रकार हृद नहीं होता, धैर्य धारण नहीं करता, वह तामसिक बलवाला है। यथा चरक में—सत्त्वमुच्यते मनः। तच्छरीरस्य तंत्रकामात्मसंयोगात्। तत् त्रिविधं बलभेदेन-प्रवरं, मध्यमम्, अवरं चेति ॥

सात्स्यानि तु देशकालजात्युतुरोगव्यायामोदकदिवास्वप्नरसप्रभृतीनि प्रकृतिविरुद्धान्यपि यान्यबाधकराणि भवन्ति ॥३९॥

जो देश, काल, जन्य, श्रुतु, रोग, व्यायाम, जल, दिवास्वप्न तथा मधुर आदि—प्रकृति के विरुद्ध होने पर भी कोई कष्ट नहीं देते वे “सात्त्व्य” कहे जाते हैं ॥ यही

१ विस्तार के लिये चरक विमान ४०-८।११-१९ में देखिये।

२ सात्त्व्य के लिये चरक विमान स्थान आँठवां अध्याय देखिये।

अ० ३५ ]

सूत्रस्थानम्

१३१

चरक ने भी कहा है कि—“सात्त्व्यं नाम तत् यत् सातत्येन उत्पद्यमानं उपशेते” अर्थात् जो आहार विहार निरन्तर या बहुत काल तक सेवन करने से “उपशय” हो जाते हैं वह “सात्त्व्य” कहे जाते हैं। सात्त्व्यार्थो हि उपशयार्थः—अर्थात् सात्त्व्य का अर्थ—तात्पर्य ही उपशय का अर्थ है। उदाहरणार्थ—अनूपदेश अनारोग्यकर होता है, परन्तु वहाँ अधिक समय तक निवास करने से कोई कष्ट नहीं होता, दूध एवं खिचड़ी एक साथ खाने से आमविष उत्पन्न हो जाता है। परन्तु—सी० पी० के निवासी खाते हैं तो कोई हानि नहीं होती, दिवास्वप्न निषिद्ध है—हानि कर भी है, परन्तु जो सदा दिन में सोते हैं उनको कोई हानि नहीं होती आदि २। रोग भी सात्त्व्य हो जाते हैं, यथा पुराने व्रण एवं श्वास कास आदि और रुजाकर भाव का नाम रोग है या शल्य है, परन्तु ऐसे शल्य नहीं निकाले जाते जो कष्ट नहीं देते, यथा—सोना आदि के सूक्ष्म शल्य देखिये—इसी स्थान का अ० २६ श्लो० २०, २१। ३६॥

योरसः कल्पते यस्य सुखायैव निषेवितः।

व्यायामजातमन्यद्वा तत् सात्त्व्यमिति निर्दिशेत् ॥४०॥

जोरस (आहार) अथवा व्यायाम (विहार) तथा अन्य (औषध) निन्तर सेवन करने पर सुखदायक ही हो जाता है वह सब “सात्त्व्य” कहलाता है ॥४०॥

प्रकृति भेषजं चोपरिष्टाद्व्यायामः ॥४१॥

प्रकृति शरीरस्थान और भेषज का वर्णन आगे करेंगे ॥

देशस्त्वानूपो जाङ्गलः साधारण इति । तत्र, बहूद-कनिन्मोन्नतनदीवर्षगहनो मृदुशीतानिलो बहुमहापर्वतवृक्षो मृदुसुकुमारोपचितशरीरमनुष्यप्रायः कफवातरागभूषिष्ट-श्रानूपः; आकाशसमः प्रविरलालयकण्टकिवृक्षप्रायोऽल्प-वर्षप्रसन्नवणोदपानोदकप्राय उष्णदारुणवातः प्रविरलालय-शैलः स्थिरकृशशरीरमनुष्यप्रायो वातपित्तरोगभूषिष्टश्रजाङ्गलः; उभयदेशलक्षणः साधारण इति ॥४२॥

देश तीन प्रकार का है। यथा—आनूप, जांगल और साधारण, इनमें जिस देश में बहुत पानी हो, बहुत नीची-ऊँची जगह हो, बहुत नदियाँ हों, बहुत वर्षा पड़ती हो, वन हो, मृदु एवं शीतल वायु बहती हो, बहुत एवं बड़े-बड़े पर्वत एवं वृक्ष हों, जिस देश के मनुष्य कोमल सुकुमार अङ्गोंवाले हों, जहाँ पर कफ एवं वायु के रोग प्रायः करके होते हों, वह देश आनूप है। जो देश आकाश से समान नीची-ऊँची जगह से रहित, थोड़े एवं काटेवाले बिल्वरे-वृक्षों से युक्त, जहाँ पर बरसात नदी झरने आदि पानी के साधन कम हों, जहाँ पर गरम-कठोर वायु चलती हो, बिल्व-छोटे पहाड़ हों, जहाँ के मनुष्य स्थिर-कृश शरीरवाले हों, जहाँ पर वायु एवं पित्त के रोग प्रायः

करके होते हैं, वह जांगल देश है। जिस देश में दोनों देशों के लक्षण होते हैं, वह साधारण देश है ॥४२॥

भवन्ति चात्र—

समाः साधारणे यस्माच्छोतवर्षोष्ममार्कताः।

दोषाणां समता जन्तोस्तस्मात्साधारणो मतः ॥४३॥

कहा भी है—

चूँकि शीत, बरसात, गरमी और वायु, ये वस्तुएँ साधारण देश में समान ही रहती हैं, एवं मनुष्य के दोषों में भी समानता रहती है, इसलिये इसको साधारण देश कहते हैं ॥४३॥

न तथा बलवन्तः स्युजंलजा वा स्थलाहृताः।

स्वदेशे निचिता दोषा अन्यस्मिन् कोपमागताः ॥४४॥

उचिते वर्तमानस्य नास्ति देशकृतं भयम्।

आहारस्वप्नचेष्टादौ तद्देशस्य गुणे सति ॥४५॥

जिस प्रकार जलजन्य पशु (कङ्कुवे आदि) स्थल में आकर उतने बलवान् नहीं रहते, या स्थलजन्य गाय आदि जल में जाकर उतने बलशाली नहीं रहते इसी प्रकार अपने देश में संचित दोष—अपने प्रतिकूल गुणवाले देश में जाकर कुपित होने से उतने बलशाली नहीं रहते। यथा आनूप देश में संचित कफ जांगल देश में जाने पर यदि कुपित होता है तो देशजन्य कोई भय नहीं। परन्तु यदि आनूप देश में संचित कफ जांगल देश में दिवा-स्वप्न आदि करने से कुपित होता है तो भय है। ठीक प्रकार से रहने पर भी जब देशजन्य कोप होता है तो भय नहीं। यद्यपि आहार, स्वप्न, चेष्टा आदि—उस देश के गुण—उचित रूप में हों तो भय नहीं होता ॥४४, ४५॥

देशप्रकृतिसात्त्व्युर्विपरीतोऽविरोधितयः।

संपत्तौ भिषगादीनां बलसत्त्वायुषां तथा ॥४६॥

केवलः समदेशाग्नेः सुखसाध्यतमो गदः।

अतोऽन्यथा त्वसाध्यः स्यात्कृच्छ्रो व्यामिश्रलक्षणः ॥

सुखसाध्य रोग—देशविपरीत (जांगल देश में कफरोग), प्रकृतिविपरीत (पित्तप्रकृति मनुष्य को कफरोग), सात्त्व्यविपरीत (कटुसात्त्व्य को कफरोगोत्पत्ति), ऋतुविपरीत (शरद् ऋतु में वातजन्य) रोग होना, नवीन रोग की अवस्था में भिषग, रोगी, भेषज, परिचारक गुणवान् होने पर, बल-सत्त्व, एवं वायु आदि की भी सम्पत्ति में, केवल एक दोष से उत्पन्न, समान-कायामिन पुरुष में रोग सुखसाध्य होता है। इनसे विपरीत अवस्थाओं में रोग असाध्य है। जिस रोग में साध्य एवं असाध्य के लक्षण मिले रहते हैं, वह कष्टसाध्य है ॥४६, ४७॥

१ अपवाद—

“ज्वरे तु ह्युदोषत्वं प्रमेहो तुल्यहृष्यता।

रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥”

११२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३६ ]

क्रियायास्तु गुणात्माभे क्रियामन्यां प्रयोजयेत् ।

पूर्वस्यां शान्तवेगायां न क्रियासंकरो हितः ॥४८॥

एक क्रिया के प्रयुक्त करने से यदि पाँच छे दिन तक कुछ लाभ नहीं दीखता, तो दूसरी क्रिया प्रयुक्त करनी चाहिये। प्रथम क्रिया के शान्त होने पर दूसरी क्रिया करनी चाहिये। क्रिया-संकर (दोनों क्रियाओं का एक साथ होना) करना उत्तम नहीं। एक ही काल में दो विरोधी क्रियाओं को करना क्रिया-संकर है ॥४८॥

गुणात्माभेऽपि सपदि यदि सैव क्रिया हिता ।

कर्तव्यैव तदा न्याधिः कृच्छ्रासाध्यतमो यदि ॥४९॥

यदि रोग कष्टसाध्य हो तो क्रिया के लाभ (गुण) न होने पर भी, यदि वही क्रिया हितकारी हो तो जल्दी में उसे बदल नहीं देना चाहिये, अपितु उसी को कुछ अधिक समय तक चालू रखना चाहिये ॥४९॥

य एवमेन विधिमेकरूपं विभर्ति कालादिवशेन धीमान् ।

स मृत्युपाग्राह्यगतो गदौघाद्विच्छनति भेषज्यपरश्वघेन ॥

जो वैद्य इस प्रकार इस पूर्वोक्त विधान को बिना किसी भेद के ग्रहण कर लेता है, बुद्धिमान् कालादि के सामर्थ्य द्वारा रोगसमूहों को भेषज्य रूपी कुल्हाड़े से काटता है ॥५०॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने आतुरोपक्रमणीयो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥१५॥

पट्त्रिंशतमोऽध्यायः

अथातो भूमिप्रविभागीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१,२॥

इसके आगे 'भूमि-प्रविभागीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१॥

श्वभ्रशर्कराश्मविषमवलमीकरमशानाघातनदेवतायतनसिकताभरतुपहतामनूषरामभङ्गुरामदूरोदकां स्निग्धां प्ररोहवतीं मृद्वीं स्थिरां समां कृष्णां गौरां लोहितां वा भूमिमौषधग्रहणाय परीच्येत् । तस्यां जातमपि क्रुमिविष-शक्षांतपपवनदहनतोयसंवाधमार्गेरनुपहतमेकरसं पुष्टं पृथक्वगाढमूलमुदीच्य्यां चौषधमाद्वीतेत्येष भूमिपरीक्षा-विशेषः सामान्यः ॥३॥

यह भूमि का विभाग दो प्रकार का है—सामान्य और विशेष। सामान्य भूमि को कहते हैं—श्वभ्र (बिल), शर्करा (पत्थर के टुकड़े), अश्म (पत्थर), विषम, वलमीक, रमशान, आघातन (वधस्थान), देवायतन (मन्दिर), सिकता (बालुका) से रहित, अनूषरा (ऊधर रहित), अभंगुर (दराड़ों रहित), भङ्गुरादका (जहाँ पर पानी दूर न हो साधारण), स्निग्धा, प्ररोहवती (जहाँ पर बीजअंकुर जन्मते हैं), कोमल, स्थिर

(वायु, पानी से जहाँ की मिट्टी न खिसकती हो), समान (ऊँची नीची नहीं), काली, सफेद, रक्तवर्ण भूमि की औषध के लिये परीक्षा करनी चाहिये। इस भूमि में उत्पन्न औषधि को भी—कृमि, विष, शस्त्र, धूप, वायु, अग्नि, पानी से अपीड़ित, एकरस (उत्कृष्ट रसयुक्त), पुष्ट (बलवान्), पृथु, विशाल, अवगाढमूल (भूमि में प्रविष्ट मूलवाली), उत्तर दिशा में स्थित औषध का (उत्तर दिशा में मुख करके) ग्रहण करना चाहिये। यह सामान्य भूमि परीक्षा-विधि है ॥३॥

विशेषस्तु तत्र अश्मवती स्थिरा गुर्वी श्यामा कृष्णा वा स्थूलवृक्षशस्यप्राया स्वगुणभूयिष्ठा; स्निग्धा शीतला-ऽऽसन्चोदका स्निग्धशस्यरुणकोमलवृक्षप्राया शुक्लाऽऽमृ-गुणभूयिष्ठा, नानावर्णा लब्धश्मवती प्रत्रिरलालपपाण्डु-वृक्षप्ररोहाऽग्निगुणभूयिष्ठा, रूक्षा भस्मरासभवर्णा तनु-वृक्षालपरसकोटरवृक्षप्रायाऽनिलगुणभूयिष्ठा, मृद्वी समा श्वभ्रवत्यन्यत्करसजला सर्वतोऽसारवृक्षा महापर्वतयुक्ष-प्राया श्यामा चाकागुणभूयिष्ठा ॥४॥

विशेष भूमिपरीक्षा—पत्थरोंवाली, स्थिर, गुरु, श्याम, कृष्ण, स्थूल वृक्षों से तथा मोटे अन्न से भरी, भूमि पृथ्वीगुण-भूयिष्ट होती है। स्निग्ध, शीतल एवं समीपवर्ती पानीवाली, स्निग्ध सस्य, तिनके एवं कोमल वृक्षों से युक्त एवं निर्मल भूमि पानी के गुणोंवाली होती है। नाना प्रकार के रङ्गों की, छोटे-छोटे पत्थरोंवाली विरले एवं छोटे-छोटे पीले वृक्ष एवं अंकुरों-वाली भूमि अग्निगुणबहुल होती है। रूक्ष, भस्म या गर्दम के रङ्गवाली, पतले रूक्ष, कोटर (घोवल), तथा अल्परसवाले वृक्षों से युक्त भूमि वायुगुणबहुल होती है। कोमल, समान, गड्ढों-वाली, अन्यत्करस, अन्यत्क जलवाली, सब स्थानों में सार रहित वृक्षोंवाली, बड़े-बड़े पर्वत-वृक्षोंवाली, श्यामवर्ण भूमि आकाश-गुणबहुल होती है ॥४॥

अत्र केचिदाहुराचार्याः—प्रावृद्धवर्षाशरद्देमन्तवसन्तग्रीष्मेषु यथासंख्यं मूलपत्रवक्रक्षीरसारफलाद्याददी-तेति, तत्तु न सम्यक्, सौम्याग्नेयत्वाद्भज्जगतः। सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वतुष्वाद्दीत, आग्नेयान्याग्नेयेषु एवम-न्यापन्नगुणानि भवन्ति। सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वतुषु गृहीतानि सोमगुणभूयिष्ठायां भूमौ जातान्यतिमधुरस्ति-ग्धशीतानि जायन्ते। एतेन शेषं व्याख्यातम् ॥५॥

कई आचार्यों का कथन है कि—प्रावृट् (वर्षा के आदि मास), वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतुओं में क्रमशः मूल, पत्र, त्वचा, क्षीर, सार और फलों का ग्रहण करना चाहिये। यह बात ठीक नहीं है। क्योंकि जगत् आग्नेय एवं सौम्य तत्त्वों से बना है। इसलिये सौम्य औषधियों को सौम्य ऋतु में (दक्षिणायन में) लेना चाहिये और आग्नेय औषधियों को आग्नेय ऋतु में (उत्तरायण में) ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार ग्रहण से अद्विषित गुणवाली होती है। सौम्य औषधियाँ

अ० ३६ ]

सूत्रस्थानम्

१३३

सौम्य ऋतु में संग्रह करने से, सोमगुण ( उदक-गुण ) बहुल भूमि में उत्पन्न होने से, अतिमधुर अतिसिन्ध और अतिशीत होती हैं। आग्नेय औषधियाँ आग्नेय ऋतु में ग्रहण करने पर अग्निगुण-बहुल भूमि में होने से अति उष्ण, अतिरूक्ष, अतिकटु होती हैं। इस प्रकार से शेष ( आग्नेय औषधियों ) की व्याख्या कर दी है ॥ ५ ॥

तत्र पृथिव्यम्बुगुणभूमिष्टायां भूमौ जातानि विरेचन-द्रव्याण्याद्वीत, अग्न्याकाशमास्तुगुणभूमिष्टायां वसन्-द्रव्याणि, उभयगुणभूमिष्टायामुभयतोभागानि, आकाश-गुणभूमिष्टायां संगमनानि, एवं बलवत्तराणि भवन्ति ॥६॥

पृथ्वी एवं जल गुण-बहुल भूमि में उत्पन्न विरेचन द्रव्यों का संग्रह करना चाहिये, अग्नि-आकाश एवं वायुगुण-बहुलभूमि में उत्पन्न वसन् द्रव्यों का संग्रह करना चाहिये। दोनों प्रकार के गुणवाली भूमि में से वसन् एवं विरेचन दोनों प्रकार के गुणवाली औषधियाँ लेनी चाहिये। आकाश गुण बहुल भूमि में उत्पन्न—शमन् द्रव्यों का संग्रह करे। इस प्रकार वे द्रव्य अधिक बलवान् होते हैं ॥ ६ ॥

सर्वाण्येव चाभिनवानि, अन्यत्र मधुघृतगुडपिप्पली-विडङ्गभ्यः ॥ ७ ॥

विडङ्गं पिप्पली श्लौद्रं सर्पिश्चाप्यनवं हितम्।

शेषमन्यस्त्वभिनवं गुह्नीयादोषवर्जितम् ॥ ८ ॥

( सर्वाण्येव सखीराणि वीयवन्ति, ) तेषामसंपत्ताव-तिक्रान्तसंवत्सराण्याद्वीतेति ॥ ९ ॥

सब द्रव्यों को नवीन ( ताजे ) रूप में ही चिकित्साकार्य में बरतना चाहिये। अपवाद—मधु, घी, गुड़, पिप्पली, विडङ्ग, ( धनियाँ ), इनको पुरातन अवस्था में बरतना चाहिये। सब औषधियाँ रसयुक्त होने पर ही बलवती होती हैं। इन औषधियों को कृमि आदि से खाई न होने पर एवं एक साल के न उत्तरने तक ही काम में लाना चाहिये ॥ ७-९ ॥

भर्वान्त चात्र—

गोपालास्तापसा न्याधा ये चान्ये वनचारिणः।

मूलाहाराश्च ये तेष्यो भेषजव्यक्तिरिष्यते ॥ १० ॥

सर्वावयवसाध्येषु पलाशलवणादिषु।

व्यवस्थितो न कायोऽस्ति तत्र सर्वो विधीयते ॥११॥

गाय को चरानेवाले, तापस ( तपस्वी ), व्याध ( शिकारी ), और जो जो अन्य वन में विचरनेवाले हैं और मूल ( जड़

१ कविराज हाराणचन्द्र जी ने चौदहवाँ श्लोक यहाँ पर दिया है। "इल्हणाचाय" ने 'तेषां' शब्द से मधु, घी आदि का ग्रहण किया है, परन्तु घी, गुड़ इनको एक साल व्यतीत होने पर ही पुराना कहते हैं। इसलिये 'तेषां' शब्द से इनका ग्रहण करना ठीक नहीं।

आदि ) का आधार करनेवाले पुरुषों को औषधि का ज्ञान होता है। पलाश लवण आदि-वस्तुओं में, जिनके कि सब अवयव कार्य में आते हैं, उनके लिए कोई समय नहीं है, उनका सब अवस्था में ग्रहण किया जा सकता है ॥ १०,११ ॥

गन्धवर्णरसोपेता षड्विधा भूमिरिष्यते।

तस्माद् भूमिस्वभावनेन वीजिनः षड्वरसायुताः ॥१२॥

अव्यक्तः किल तोयस्य रसो निश्चयनिश्चितः।

रसः स एव चाव्यक्तो व्यक्तो भूमिरसाद् भवेत् ॥१३॥

सर्वलक्षणसंपन्ना भूमिः साधारणा स्मृता।

द्रव्याणि यत्र तत्रैव तद्वगुणानि विशेषतः ॥ १४ ॥

विगन्धेनापरामृष्टमविपन्नं रसादिभिः।

नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्राह्यमेवं विनिर्दिशेत् ॥ १५ ॥

गन्ध, वर्ण एवं रस से युक्त भूमि छे प्रकार की है। इस-लिये भूमिस्वभाव के कारण वृक्ष भी छे रस से युक्त होते हैं। यह सिद्धान्त द्वारा निश्चित हो चुका है कि जल का रस अव्यक्त है। यही अव्यक्त रस जिस समय व्यक्त होता है, तब भूमि के रस के कारण है। सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त भूमि को साधारण भूमि कहते हैं। इस भूमि में जो द्रव्य/उत्पन्न होते हैं उनमें भी वे गुण विशेषकर होते हैं। विकृत गन्ध से अद्वित, रस आदि में अ विकृत, नये या पुराने द्रव्य का ग्रहण करना चाहिये। वाय-विडङ्ग, पिप्पली, मधु और घी ( धनिया भी ) इनको पुराना ( एक साल पुराना ) होने पर औषधकार्य में लाना चाहिये। इनसे अतिरिक्त शेष-नये, दोपरहित द्रव्यों का ग्रहण करना चाहिये ॥ १२-१५ ॥

जङ्गमानां वयःस्थानां रक्तरोमन्खादिकम्।

क्षारमूत्रपुराषाणि जीर्णोद्धारेषु संहरेत् ॥ १६ ॥

जङ्गम ( गति करनेवाले, पशु-पक्षियों ) प्राणियों के रक्त, रोम, नख आदि युवावस्था के ग्रहण करने चाहिये। दूध, मूत्र, मल ये वस्तुयें—आहार के जीर्ण होने पर ( पच जाने पर ) ग्रहण करनी चाहिये ॥ १६ ॥

प्लोतमुद्गाण्डफलकशङ्कुविन्यस्तभेषजम्।

प्रशस्तायां दिशि शुचौ भेषजागारमिष्यते ॥ १७ ॥

प्लोत ( वस्त्रखण्ड ), मिट्टी के बर्तन, फलक ( काष्ठपट्ट ), शंकु ( कीला ) आदि में रखना, औषध-भण्डार कहाता है। पवित्र स्थान एवं प्रशस्त दिशा ( पूर्वदिशा ) में औषधियों को रखना चाहिये।

वि० मन्तव्य - वह भेषज-भण्डार उत्तम होता है जो नगर के उत्तर अथवा पूर्व दिशा में हो और जिसमें—भेषज द्रव्य—प्लोत ( थैला, बोरा या कपड़ा की गठरी ), मुद्गाण्ड ( मिट्टी=

१ चरक में भी कहा है—

औषधनिर्मल्ल्यास्यां जानन्ते ह्यजपा बने ॥

११४

सुश्रुतसंहिता

[अ० ३७]

चीनी, काच के हण्डी का, मत्तवान्, बोटल), फलक (फट्टे-आलमारी, टॉड आदि) में घरे अथच शंकु (विलङ्ग, छत को कुण्डा आदि) पर लटकाए गये हों ॥ १७ ॥ इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने भूमिप्रविभागीयो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

सप्तत्रिंशतमोऽध्यायः

अथातो मिश्रकमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥ इसके आगे 'मिश्रक अध्याय' की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥ मातुलुङ्ग्याग्निमन्थो च भद्रवारु महौषधम् । अहिंसा चैव रास्ता च प्रलेपो वातशोफजित् ॥ ३ ॥ दूवां च नलमूलं च मधुकं चन्दनं तथा । शीतलाश्च गणाः सर्वं प्रलेपः पित्तशोफहृत् ॥ ४ ॥ आगन्तुजे रक्तजे च ह्येष एव विधिः स्मृतः । विधिर्विषधन्तो विषजे पित्तध्नोऽपि हितस्तथा ॥ ५ ॥ अजगन्धाऽश्वगन्धा च काला सरलया सह । एकैषिकाऽजशृङ्गी च प्रलेपः श्लेष्मशोफहृत् ॥ ६ ॥ एते वर्गाश्चयो लोभं पथ्या पिण्डीतकानि च । अनन्ता चेति लेपोऽयं सान्निपातिकशोफहृत् ॥ ७ ॥ मातुलुङ्ग (बिजौरा), अग्निमन्थ (अरणी), भद्रवारु (देवदारु), महौषध (सौठ), अहिंसा (बृहद् अहिंसा), और रास्ता—इनका प्रलेप वातजन्य शोथ को नष्ट करता है । दूवां, नलमूलं, मधुकं (मुलहर्डी), चन्दनं (श्वेत) एवं काकोल्यादि, उसलादि, न्यमाधादि, ये शीतल गण-इनका प्रलेप पित्तजन्य शूल को नष्ट करता है । आगन्तुज एवं रक्तजन्य शोफ में पित्त के समान चिकित्सा करनी चाहिये । विषजन्य शोफ में विषनाशक एवं पित्तनाशक विधि हितकारी है । अजगन्धा (अजवायन), अश्वगन्धा (असगन्ध), काला (अहिंसा) सरला (लाठ-जड़ की निशोथ), एकैषिका (श्वेत जड़ की त्रिवृत्), और अजशृङ्गी (काकड़ाशृङ्गी)—इनका प्रलेप कफजन्य शोथ को नष्ट करता है । ये उपयुक्त तीनों वर्ग, लोभं पथ्या (हरड), पिण्डीतक (मैनफल) और अनन्ता (सारिवा या दुगलमा)—सान्निपातजन्य शोथ को नष्ट करते हैं ॥ ३-७ ॥

स्निग्धानल्लवणो वाते कोष्णः, शीतः पयोयुतः । पित्ते, चोष्णः कफे क्षारमूत्राद्व्यस्तत्प्रगान्तये ॥ ८ ॥ लोप का संस्कार—वातजन्य शोफ में—लेप स्निग्ध, अम्ल,

१ व्रण के उपक्रमों में आठ उपाय अधिक प्रसिद्ध हैं । यथा— विस्लापन, पाचन, दारण, पीडन, शोचन, रोषण, उत्सेदन, अवसादन—इन आठों का मिश्रित रूप में वर्णन किया गया है ।

लवण, कोष्णः पित्त में—दूध मिश्रित शीत लेप, कफजन्य में— क्षौर एवं मूत्रवृह्ल उष्ण प्रलेप करना चाहिये ॥ ८ ॥ शणमूलकश्रिगुणां फलानि तिलसर्षपाः । सक्तवः किण्वमतसी द्रव्याण्युष्यानि पाचनम् ॥ ९ ॥ विस्लापन द्रव्य कहकर पाचन द्रव्यों को कहते हैं— सन के बीज, मूली (के बीज), सहजन का फल (पका), तिल, सरसों, सत्तू (जौ का), किण्व (सुरा का तलवट), और अलसी एवं उष्णवीर्य द्रव्य (कूठ, अगर आदि) शोथ को पकाने के लिये उत्तम हैं ॥ ९ ॥ चिरबिल्वोऽग्निनिको दन्ती चित्रको हयमारकः । कपोतकङ्कगुग्घ्राणां पुरोषाणि च दारणम् । क्षारद्रव्याणि वा यानि क्षारो वा दारणं परम् ॥ १० ॥

दारण द्रव्य— चिरबिल्व (नाटा करख), अग्निनिका (कलिहारिका या भल्लातक) दन्ती (जमालगोटा की जड़), चित्रक (चीता की जड़), हयमारक (करवीर-कनेर), कबूतर, गीध एवं कङ्क पक्षियों का मल, ये सब दारण काय में प्रयुक्त हो सकते हैं । क्षारद्रव्य (मुष्क, कुटज, पलाश, अश्वकर्ण, पारिमद्र आदि) या इनसे सिद्ध प्रतीसारणीय क्षार—उत्तम दारण हैं । दारण द्रव्य दो प्रकार के हैं—कपोतपुरीष आदि सुकुमार दारण हैं, क्षार कुच्छ दारण हैं ॥ १० ॥

द्रव्याणां पिच्छिलानां तु त्वङ्गमूलाणि प्रपीडनम् । यवगोधूमसाषाणां चूर्णाणि च समासतः ॥ ११ ॥ पीडन द्रव्य—पिच्छिल (सिम्बल, वट आदि) द्रव्यों की त्वचा-मूलप्रपीडन द्रव्य हैं । जौ, गेहूँ और माष (उड़द) ये संक्षेप में पीडन द्रव्य हैं । व्रण के मुख को बाहर करके, इन द्रव्यों का लेप करना चाहिये और फिर आग के द्वारा इनको शुष्क करना चाहिये । शुष्क होने से पीडन होता है ॥ ११ ॥

शङ्खिन्यङ्कोठसुमनःकरवीरसुवर्चलाः । शोधनानि कषायानि वर्गश्चाराश्वधादिकः ॥ १२ ॥ शोधन द्रव्य—शंखिनी (यवतिका), अङ्कोठ (अङ्कोठ), सुमन (मालती) करवीर (कनेर) सुवर्चला (हुलहुल या सूर्यमुखी)—एवं आश्वधादिवर्ग—इनका कषाय व्रण का शोधन करता है । शोधन—आठ प्रकार का है । यथा—कषाय, वर्त्ति, कल्क, घृत, रसक्रिया, चूर्ण एवं धूपन । धूपन चार प्रकार का है—श्रुत, शीत, फाण्ट और स्वरस । कल्क को पृथक् कहेंगे ॥ १२ ॥

अजगन्धाऽजशृङ्गी च गवाक्षी लाङ्गलाहया । पूतकश्चित्रकः पाठा विडङ्गैलाहरेणवः ॥ १३ ॥ कटुत्रिकं यवक्षारो लवणानि मनःशिला । कासीसं त्रिधूता दन्ती हरिताल सुराष्ट्रजा ॥ १४ ॥

३० ३७]

सूत्रस्थानम

११५

वर्त्ति—अजगन्धा (अजवायन), अजशृङ्गी (काकड़ाशृङ्गी), गवाक्षी (इन्द्रायण), लांगली (कलिहारिका), पूतीक (चिरविल्व), चित्रकं (चीतामूल), पाठा, वायविडङ्ग, एला (बड़ी इलायची), हरेणु (रेणुका), त्रिकुट, यवक्षार (जोखार), लवण (पौंचों नमक), मनःशिला (मैनसिल), कासीस (होरा कसीस), त्रिबुता (निशोथ), दन्ती (जमलागोटा की जड़), हरिताल (हरताल), सुराष्ट्रजा (सोराष्ट्र की मिट्टी या फिटकरी), इन द्रव्यों को प्रीसकर बत्ती पर लगाकर वृण पर रखना चाहिये। यह वर्त्ति नाड़ीवृण आदि संशोधनीय स्थानों में प्रयुक्त करनी चाहिये ॥१३,१६॥

संशोधनीनां वर्त्तिनां द्रव्याण्येतानि निर्दिशेत्। एतैर्यौषधैः कुर््यात्कल्कानपि च शोधनान् ॥१५॥

कासीसकटुरोहिण्यौ जातीकन्दहरिद्रयोः। पूर्वोहिष्टेषु चाङ्गेषु कुर््यात्तैलं घृतानि च ॥१६॥

कल्क—इन उपयुक्त अजगन्धा आदि औषधियों से शोधनीय कल्कों को तैयार करना चाहिये। कासीस, कटुरोहिणी (कुटकी), जाती-कन्द (चमेली की जड़), हरिद्रा (हल्दी-दारू-हल्दी), इनके कल्क द्वारा पूर्वोक्त अजगन्धा आदि के क्वाथ से तैल या घृत सिद्ध करना चाहिये। (क्वाथ से कल्क चतुर्थीश होना चाहिये) ॥१५,१६॥

अर्कोत्तमां स्तुहीक्षीरं पिष्ट्वा क्षारोत्तमानि च।

जातीमूलं हरिद्रं द्वे कासीसं कटुरोहिणीम् ॥१७॥

पूर्वोहिष्टानि आस्यानि कुर््यात् संशोधनं घृतम्।

अर्क (आक की जड़), उत्तमा (त्रिफला), स्तुहीक्षीर (थोहर का दूध), उत्तम क्षारद्रव्यों को (मुष्क, कुटज आदि को), जाती-मूल (जटामांसी, जातुकन्द इग पाठ में गुग्गुलु), दोनों हल्दियाँ, कासीस और कटुरोहिणी (कुटकी), एवं शोधन-वर्त्ति में कहे द्रव्यों के साथ संशोधनघृत तैयार करना चाहिये ॥१७॥

मयूरको राजवृक्षो निम्बः कोआतकी तिलाः ॥१८॥

बृहती कण्टकारी च हरितालं मनःशिला।

शोधनानि च योज्यानि तैले द्रव्याणि शोधने ॥१९॥

शोधन तैल—मयूरक (अपामार्ग), राजवृक्ष (अमलतास), निम्ब (नीम), कोषातकी (कडुवी तुर्दै), तिल, बृहती (बड़ी कटेरी), कण्टकारी (छोटी कटेरी), हरिताल (हरताल), मैनसिल, शोधनवर्त्ति में कहे हुए द्रव्यों को शोधन तैल में मिलाना चाहिये ॥१८,१९॥

कासीसे सैन्धवे किण्वे वचायां रजनीद्वये।

शोधनाङ्गेषु चान्येषु चूर्णं कुर्वीत शोधनम् ॥२०॥

शोधनचूर्ण—कासीस, सैन्धानमक, किण्व (घुरा-पिष्ट), वच, दोनों हल्दी, शोधनवर्त्ति में कही औषधियों का चूर्ण—शोधन कार्य में बरतना चाहिये ॥२०॥

सालसारान्निमारेषु पटोलत्रिफलासु च।

रसक्रिया विधातव्या शोधनी शोधनेषु च ॥२१॥

सालसारदिग्गण में कही औषधियों से, परवल एवं त्रिफला

से, शोधनवर्त्ति में कहे द्रव्यों से—शोधनी रसक्रिया बनानी चाहिये। (रसक्रिया विधि—द्रव्य की अपेक्षा से आठगुणा (कोमल द्रव्यों में) या सोलहगुण (कठिन द्रव्यों में) जल डालकर क्वाथ करना चाहिये। जब अधमांश पानी रह जाये या सोलहवाँ भाग क्वाथ रह जाये तब छानकर पुनः इस क्वाथ को राव के समान पकाना चाहिये, यही रसक्रिया है) ॥२१॥

श्रीवैष्टके सर्जरसे सरले देवदारुणि।

सारेष्बपि च कुर्वीत मतिमान् व्रणधूपनम् ॥२२॥

श्रीवैष्टक (धूप), सर्जरस (राल), सरल (सरलवृक्ष की त्वचा), देवदारु, सार (सालसारदिग्गण की औषधियों) से व्रण का धूपन बुद्धिमान् को करना चाहिये ॥२२॥

क्वाथाणामनुष्णां वृक्षाणानां त्वक्षु साधितः।

श्रुतः शीतक्वाथो वा रोपणाय प्रशस्यते ॥२३॥

रोपणक्वाथ—अनुष्ण वृक्षों की (न्यम्रोध, उदम्बर, पीपल, पिलखन आदि) त्वचा से बनाये क्वाथ अथवा शीत क्वाथ (फाण्टस्वरस) रोपणकाव्यों में प्रशस्त है। (द्रव्य को रात्रि में पानी में रखकर जो क्वाथ बनता है, वह शीत क्वाथ है) ॥२३॥

सोमामृताश्वगन्धासु काकोल्यादौ गणे तथा।

क्षीरिप्ररोहेऽवपि च वर्त्यो रोपणाः स्मृताः ॥२४॥

सोम (सोम का बल्कल ब्राह्मी), अमृता (गिलोय), अश्वगन्धा (असगन्ध) तथा काकोल्यादिगण में कही औषधियों से, क्षीरिप्ररोहो (न्यम्रोध, गूजर आदि के अंकुरों) से रोपणवर्त्तियों तैयार करनी चाहिये ॥२४॥

समङ्गा सोमसरला सोमवलकः सचन्दनः।

काकोल्यादिश्च कल्कः स्यात् प्रशस्तो वणरोपणे ॥२५॥

समङ्गा (मजीठ), सोम, सरल, सोमवलका (कायफल), चन्दन, काकोल्यादिगण की औषधियों इनका कल्क व्रण के संरोहण के लिये प्रशस्त है ॥२५॥

पृथक्पुष्पार्त्तमगुप्ता च हरिद्रं मालतीसिता।

काकोल्यादिश्च योज्यः स्याद्विषजा रोपणे घृते ॥२६॥

पृथक्पुष्पां (पुश्तिपुष्पां), आत्मगुप्ता (कौंच), दोनों हरिद्रा (हल्दी, दारूहल्दी), मालती (जाती-चमेली), सिता (शर्करा), या श्वेतदूर्वा और काकोल्यादिगण की औषधियों से सिद्ध घृत को रोपणकार्य में बरतना चाहिये ॥२६॥

कालानुसार्यगुरुणीहरिद्रं देवदारु च।

प्रियक्ववक्ष रोधं च तैले योज्यानि रोपणे ॥२७॥

कालानुसारी (तगर), अगर, हरिद्रा (हल्दी-दारूहल्दी), देवदारु, प्रियगु (फूल प्रियगु), रोध (पठानीलाध), ये रोपणतैल में प्रयुक्त करने चाहिये ॥२७॥

कडुका त्रिफला रोधं कासीसं श्रवणाह्वया।

धवाश्वकर्णयोस्तवक् च रोपणं चूर्णमिष्यते ॥२८॥