सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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सौम्य ऋतु में संग्रह करने से, सोमगुण ( उदक-गुण ) बहुल भूमि में उत्पन्न होने से, अतिमधुर अतिसिन्ध और अतिशीत होती हैं। आग्नेय औषधियाँ आग्नेय ऋतु में ग्रहण करने पर अग्निगुण-बहुल भूमि में होने से अति उष्ण, अतिरूक्ष, अतिकटु होती हैं। इस प्रकार से शेष ( आग्नेय औषधियों ) की व्याख्या कर दी है ॥ ५ ॥
तत्र पृथिव्यम्बुगुणभूमिष्टायां भूमौ जातानि विरेचन-द्रव्याण्याद्वीत, अग्न्याकाशमास्तुगुणभूमिष्टायां वसन्-द्रव्याणि, उभयगुणभूमिष्टायामुभयतोभागानि, आकाश-गुणभूमिष्टायां संगमनानि, एवं बलवत्तराणि भवन्ति ॥६॥
पृथ्वी एवं जल गुण-बहुल भूमि में उत्पन्न विरेचन द्रव्यों का संग्रह करना चाहिये, अग्नि-आकाश एवं वायुगुण-बहुलभूमि में उत्पन्न वसन् द्रव्यों का संग्रह करना चाहिये। दोनों प्रकार के गुणवाली भूमि में से वसन् एवं विरेचन दोनों प्रकार के गुणवाली औषधियाँ लेनी चाहिये। आकाश गुण बहुल भूमि में उत्पन्न—शमन् द्रव्यों का संग्रह करे। इस प्रकार वे द्रव्य अधिक बलवान् होते हैं ॥ ६ ॥
सर्वाण्येव चाभिनवानि, अन्यत्र मधुघृतगुडपिप्पली-विडङ्गभ्यः ॥ ७ ॥
विडङ्गं पिप्पली श्लौद्रं सर्पिश्चाप्यनवं हितम्।
शेषमन्यस्त्वभिनवं गुह्नीयादोषवर्जितम् ॥ ८ ॥
( सर्वाण्येव सखीराणि वीयवन्ति, ) तेषामसंपत्ताव-तिक्रान्तसंवत्सराण्याद्वीतेति ॥ ९ ॥
सब द्रव्यों को नवीन ( ताजे ) रूप में ही चिकित्साकार्य में बरतना चाहिये। अपवाद—मधु, घी, गुड़, पिप्पली, विडङ्ग, ( धनियाँ ), इनको पुरातन अवस्था में बरतना चाहिये। सब औषधियाँ रसयुक्त होने पर ही बलवती होती हैं। इन औषधियों को कृमि आदि से खाई न होने पर एवं एक साल के न उत्तरने तक ही काम में लाना चाहिये ॥ ७-९ ॥
भर्वान्त चात्र—
गोपालास्तापसा न्याधा ये चान्ये वनचारिणः।
मूलाहाराश्च ये तेष्यो भेषजव्यक्तिरिष्यते ॥ १० ॥
सर्वावयवसाध्येषु पलाशलवणादिषु।
व्यवस्थितो न कायोऽस्ति तत्र सर्वो विधीयते ॥११॥
गाय को चरानेवाले, तापस ( तपस्वी ), व्याध ( शिकारी ), और जो जो अन्य वन में विचरनेवाले हैं और मूल ( जड़
१ कविराज हाराणचन्द्र जी ने चौदहवाँ श्लोक यहाँ पर दिया है। "इल्हणाचाय" ने 'तेषां' शब्द से मधु, घी आदि का ग्रहण किया है, परन्तु घी, गुड़ इनको एक साल व्यतीत होने पर ही पुराना कहते हैं। इसलिये 'तेषां' शब्द से इनका ग्रहण करना ठीक नहीं।
आदि ) का आधार करनेवाले पुरुषों को औषधि का ज्ञान होता है। पलाश लवण आदि-वस्तुओं में, जिनके कि सब अवयव कार्य में आते हैं, उनके लिए कोई समय नहीं है, उनका सब अवस्था में ग्रहण किया जा सकता है ॥ १०,११ ॥
गन्धवर्णरसोपेता षड्विधा भूमिरिष्यते।
तस्माद् भूमिस्वभावनेन वीजिनः षड्वरसायुताः ॥१२॥
अव्यक्तः किल तोयस्य रसो निश्चयनिश्चितः।
रसः स एव चाव्यक्तो व्यक्तो भूमिरसाद् भवेत् ॥१३॥
सर्वलक्षणसंपन्ना भूमिः साधारणा स्मृता।
द्रव्याणि यत्र तत्रैव तद्वगुणानि विशेषतः ॥ १४ ॥
विगन्धेनापरामृष्टमविपन्नं रसादिभिः।
नवं द्रव्यं पुराणं वा ग्राह्यमेवं विनिर्दिशेत् ॥ १५ ॥
गन्ध, वर्ण एवं रस से युक्त भूमि छे प्रकार की है। इस-लिये भूमिस्वभाव के कारण वृक्ष भी छे रस से युक्त होते हैं। यह सिद्धान्त द्वारा निश्चित हो चुका है कि जल का रस अव्यक्त है। यही अव्यक्त रस जिस समय व्यक्त होता है, तब भूमि के रस के कारण है। सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त भूमि को साधारण भूमि कहते हैं। इस भूमि में जो द्रव्य/उत्पन्न होते हैं उनमें भी वे गुण विशेषकर होते हैं। विकृत गन्ध से अद्वित, रस आदि में अ विकृत, नये या पुराने द्रव्य का ग्रहण करना चाहिये। वाय-विडङ्ग, पिप्पली, मधु और घी ( धनिया भी ) इनको पुराना ( एक साल पुराना ) होने पर औषधकार्य में लाना चाहिये। इनसे अतिरिक्त शेष-नये, दोपरहित द्रव्यों का ग्रहण करना चाहिये ॥ १२-१५ ॥
जङ्गमानां वयःस्थानां रक्तरोमन्खादिकम्।
क्षारमूत्रपुराषाणि जीर्णोद्धारेषु संहरेत् ॥ १६ ॥
जङ्गम ( गति करनेवाले, पशु-पक्षियों ) प्राणियों के रक्त, रोम, नख आदि युवावस्था के ग्रहण करने चाहिये। दूध, मूत्र, मल ये वस्तुयें—आहार के जीर्ण होने पर ( पच जाने पर ) ग्रहण करनी चाहिये ॥ १६ ॥
प्लोतमुद्गाण्डफलकशङ्कुविन्यस्तभेषजम्।
प्रशस्तायां दिशि शुचौ भेषजागारमिष्यते ॥ १७ ॥
प्लोत ( वस्त्रखण्ड ), मिट्टी के बर्तन, फलक ( काष्ठपट्ट ), शंकु ( कीला ) आदि में रखना, औषध-भण्डार कहाता है। पवित्र स्थान एवं प्रशस्त दिशा ( पूर्वदिशा ) में औषधियों को रखना चाहिये।
वि० मन्तव्य - वह भेषज-भण्डार उत्तम होता है जो नगर के उत्तर अथवा पूर्व दिशा में हो और जिसमें—भेषज द्रव्य—प्लोत ( थैला, बोरा या कपड़ा की गठरी ), मुद्गाण्ड ( मिट्टी=
१ चरक में भी कहा है—
औषधनिर्मल्ल्यास्यां जानन्ते ह्यजपा बने ॥